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शनिवार, 4 अप्रैल 2015

भागो-भागो, विकास आया, पहले से भी तेज आया

वित्त मंत्री द्वारा हर वर्ष बजट पेश करना सरकार और मीडिया के लिए एक वार्षिकोत्सव जैसा होता है। बजट के आँकड़ों और घोषणाओं के साथ-साथ सेंसेक्स का उतार-चढ़ाव नाटकीय ढंग से दिखाया जाता है। राजनेताओं से उनके रुख को जाना जाता है। काॅर्पोरेट घरानों की नुमाइंदगी करने वाले लोग और अर्थशास्त्री स्टूडियो में आकर अपना विशेषज्ञ विष्लेषण देते हैं। मीडिया रिपोर्टर बीच-बीच में आम लोगों से बजट पर उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहते हैं। गृहिणियों व महिलाओं से और रास्ते चलते युवाओं से भी कुछ सवाल पूछे जाते हैं। ज़ाहिर है कि सरकार और सरकार के हिमायती बजट की तारीफ़ करते हैं और विपक्षी दलों के लोग और सरकार विरोधी सोच से प्रभावित लोग बजट को और कुछ नहीं, बस गलतियों का पुलिंदा भर मानते हैं।
इस बार भी सरकार का कहना है कि मोदी का (माफ़ कीजिए, अरुण जेटली का) वर्ष 2015-16 का बजट बजट देश की अर्थ व्यवस्था का कायाकल्प कर देगा। वहीं काँग्रेस सरकार में वित्तमंत्री रहे चिदम्बरम का कहना है कि न तो सरकार ने इस बजट में राजकोषीय और वित्तीय संतुलन पर ध्यान दिया है और न ही पुनर्वितरण संबंधी कोई कदम उठाये हैं कि जिनसे ग़रीब तबक़ों को कुछ तो हासिल हो।
इस सारे उत्सव को देखकर कोई अगर यह सोचे कि बजट देश की आर्थिक नीति की दिशा तय करता है तो ये उसका भोलापन ही कहा जाएगा। बजट केवल सरकार द्वारा चुनी गई आर्थिक नीति पर मुहर लगाता है। वो तय तो पहले ही की जा चुकी होती है। मोदी सरकार का ‘मेक इन इंडिया’ का आह्वान, बीमा और ज़मीन अधिग्रहण के अध्यादेश और ऐसे तमाम आदेश स्पष्ट संकेत देते हैं कि सरकार की प्रतिबद्धता देशी और विदेशी पूँजी के मुनाफ़े के रास्ते को आसान और सुविधाजनक बनाना है। अरुण जेटली के शब्दों में कहें तो, ‘कुछ तो फूल खिलाए हमने, और कुछ फूल खिलाने हैं।’ देश की ग़रीब जनता की बढ़ती हुई बदहाली से सरकार का कोई ख़ास सरोकार नहीं है।
वर्ष 1991 से हिंदुस्तान में नई आर्थिक नीति अपनाने के बाद से प्रत्येक वर्ष के बजट का केन्द्र बिंदु  वित्तीय घाटे को सीमा में बाँधे रखने का रहता है। राजग-1 के कार्यकाल के दौरान वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने ‘राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन’ संबंधी विधेयक पेश किया था जिसे 2003 में बाकायदा कानून बना दिया गया। उक्त विधेयक का मकसद राजकोषीय अनुशासन को संस्थागत रूप देना था। इस कानून में कुछ समयबद्ध लक्ष्य तय किये गए। एक लक्ष्य था 2008 तक राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3 प्रतिशत तक ले आना और दूसरा लक्ष्य था राजस्व घाटे को शून्य पर ले आना।
    बहरहाल 2007-8 में वैष्विक वित्तीय संकट से मंदी का खतरा सारी दुनिया पर मंडराया। तब दुनियाभर के देषों ने ‘कीन्सियन’ नसीहत के अनुसार राजकोषीय घाटे से अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का नुस्खा अपनाया। हिंदुस्तान में भी मंदी का ख़तरा सामने देख 2003 में बनाये गए क़ानून के सारे लक्ष्य भुला दिए गए और 2008-9 और 2009-10 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 5.9 और 6.5 प्रतिशत के स्तर तक पहुँच गया।
अब चिदांबरम कह रहे हैं कि 2008-9 और 2009-10 में जो खर्चीली राजकोषीय नीतियाँ अपनायी गईं, वे ही महँगाई का और इस तरह काँग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के चुनाव हारने का कारण बनीं। दरअसल राजकोषीय घाटे का महँगाई या भुगतान संतुलन के संकट के साथ सीधा संबंध स्थापित करना सही नहीं है। लेकिन नवउदारवाद के साँचे में बार-बार यही दुहाई देकर तीसरी दुनिया की राजकोषीय  स्वतंत्रता पर यह अंकुश लगाया जा रहा है कि अगर किसी देश को उसकी जनता के लिए कुछ कल्याणकारी काम शुरू करने के लिए खर्च करना की ज़रूरत है तो भी वह देश इस पर खर्च न कर सके। वस्तुतः यह मेट्रोपोलिटन वित्तीय पूँजी का तीसरी दुनिया के व योरप के कमज़ोर अर्थव्यवस्था वाले मुल्कों की आर्थिक संप्रभुता पर सीधा हमला है। जब भी कोई देश व्यापार या कर्ज के संकट में होता है तो उसे मदद करने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौतों की ये शर्त होती है कि वह पहले अपने देश में ख़र्च कम करे या तथाकथित ‘आॅस्टेरिटी मेजर्स’ अपनाये जैसा अभी ग्रीस में हुआ। इसका सीधा आशय है कि अगर आप अपने राजकोषीय घाटे को अपने देश की जनता की ज़रूरत के मुताबिक कम या ज़्यादा करना चाहते हैं तो ये अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी को चुनौती देना है। और ये काम न तो संप्रग के बस का था और न ही राजग के बस का है। इसलिए राजकोषीय घाटे को पटरी पर लाना, जैसा कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी चाहती है, हमारी सरकारों की मजबूरी है। बस यही हमारे वित्तमंत्रियों की योग्यता का पैमाना है। अरुण जेटली की उपलब्धि यह है कि वे पिछले साल के 4.1 प्रतिषत के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा करने में समर्थ हैं। उनका वादा है कि इस वर्ष का राजकोषीय घाटा 3.9 प्रतिशत रहेगा और अगले तीन सालों में यह कम होकर 3 प्रतिशत हो जाएगा।
पिछले साल के 4.1 प्रतिशत के लक्ष्य को कायम करने के लिए जो कवायद की गई उसे नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए। पिछले वर्ष के बजट में जो अनुमानित आय करों से और सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश से बतायी गई, वो वास्तविकता से कहीं ज़्यादा थी। असल में आय अनुमान से काफ़ी कम हुई और राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए ये ज़रूरी था कि ख़र्च को काफ़ी कम किया जाए। यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि कुछ ख़र्चों को कम करने का अखि़्तयार वित्तमंत्री के वश में भी नहीं होता मसलन ब्याज भुगतान या रक्षा बजट। ये करने ही होते हैं। जो कम किया जा सकता है, वो सामाजिक क्षेत्र पर होने वाला व्यय ही है।
पिछले वर्ष के 4.1 प्रतिषत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए मंत्रालयों के केन्द्रीय योजना के बजट समर्थन में 20 से 50 प्रतिशत तक की कमी की गई। इनमें स्वास्थ्य मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय प्रमुख हैं। इस वर्ष के बजट में ये किस्सा दोहराया जाएगा कि नहीं, ये तो अगले ही साल पता चलेगा लेकिन 3.9 प्रतिशत का लक्ष्य तय करते समय अरुण जेटली ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि आय और व्यय, दोनों ही दृष्टियों से काॅर्पोरेट सेक्टर और अमीर तबक़े को फायदा हासिल हो। टैक्स से होने वाली आमदनी बढ़ाने के लिए उन्होंने सर्विस टैक्स बढ़ा दिया जिससे रुपये 23383 करोड़ का राजस्व मिलेगा। इसका अपेक्षाकृत अधिक भार ग़रीब तबक़े पर पड़ेगा। दूसरी तरफ़ काॅर्पोरेट टैक्स की दर 30 प्रतिशत से कम करके 25 प्रतिशत कर दी गई है और संपत्तिकर हटा दिया गया है। इससे राजस्व की आमदनी में रुपये 8315 करोड़ की कमी आएगी।
जहाँ तक व्यय का सवाल है, उसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए भारी वृद्धि की गई है। इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण का अर्थ कोई गाँव व ग़रीबों के लिए सुविधाजनक जीवन स्थितियों का निर्माण नहीं, बल्कि एक्सप्रेस हाइवे, आधुनिक एयरपोर्ट, आधुनिक सूचना-संचार सुविधाएँ और काॅर्पोरेट सेक्टर के लिए अन्य सुविधाएँ बढ़ाना ही है। मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कोशिश की थी कि देश के इस इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत हो। मनमोहन-मोंटेक माॅडल से प्राइवेट और काॅर्पोरेट सेक्टर के लिए बनी जगह में मुनाफ़े की आस में तमाम कंपनियाँ इस क्षेत्र में दाखि़ल हो गईं जिन्हें सार्वजनिक बैंकों से सस्ती दरों पर भारी-भरकम कर्ज मुहैया कराया गया। नतीजा ये है कि अब बैंकों के पास नाॅन परफाॅर्मिंग असेट्स का अंबार लग गया है। जेटली जी ने इस मुष्किल का समाधान ये निकाला कि उन्होंने काॅर्पोरेट को रियायत देते हुए कहा कि कोई बात नहीं। अगर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप भी आपको रास नहीं आ रही तो पब्लिक सेक्टर ही आपके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित कर देगा।
काॅर्पोरेट सेक्टर को ये सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए जिन मदों में बजट में कटौती की गई है, वे हैं आईसीडीएस (आँगनवाड़ी और आशा), सर्वशिक्षा अभियान, कृषि, एससी-एसटी सबप्लान, पेयजल, पंचायती राज, आदि वे सभी मदें जो ग़रीबों की जि़ंदगी को थोड़ी राहत पहुँचाती हैं। तर्क ये है कि चूँकि राज्यों को आवंटित किया जाने वाला कोष बढ़ा दिया गया है इसलिए केन्द्र की इस कटौती की भरपाई राज्य सरकारों द्वारा की जाएगी।
अंत में मनरेगा का उल्लेख करना ज़रूरी है। बजट में मनरेगा को 34000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 34600 करोड़ रुपये कोष आवंटित किया गया है। ये ज़रूरत के सामने कितना अपर्याप्त है इसका अंदाज़ा एक इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि मनरेगा में ऐसे बहुत से मामले हैं जहाँ लोगों से काम करवा लिया गया लेकिन पैसे न होने से भुगतान नहीं किया गया। इसका जो आंशिक भुगतान राज्य सरकारों ने अपने कोष से कर दिया था, अभी उसका ही केन्द्र सरकार को 6000 करोड़ रुपया देना बाकी है। और फिर अब तो मनरेगा पर खर्च की कोई सीमा नहीं बाँधी जा सकती क्योंकि अब यह लोगों का संवैधानिक अधिकार है कि अगर वे काम माँगें तो उन्हें काम देना सरकार की जिम्मेदारी होगी। संक्षेप में इस बजट का विष्लेषण यही है कि मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह देश को जिस दिशा में ले जा रहे थे, मोदी और जेटली हमें उसी दिशा में और तेज रफ्तार के साथ धकका देने के लिए कमर कसे हैं।
-जया मेहता
जन अर्थशास्त्री हैं और दिल्ली स्थित जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट आॅफ़ सोशल स्टडीज़ के साथ संबद्ध हैं।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

उत्तर प्रदेश ................बजट में बुनियादी विकास का प्रश्न ?



1 जून को प्रदेश के नव निर्वाचित सरकार का पहला बजट प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री अखिलेश यादव ने ने प्रस्तुत किया | कुल बजट लगभग 2 लाख करोड़ रूपये का प्रस्तुत किया गया है | विभिन्न क्षेत्रो के लिए ऊँचे से नीचे के क्रमानुसार बजटीय धन आवंटन का मोटी -- मोटा लेखा -- जोखा इस प्रकार है |
(1 )------ शिक्षा के गुणवत्ता में सुधार की योजनाओं के लिए 33 हजार करोड़ 263 करोड़ रूपये (2 ) सडक , सेतु , सिंचाई एवं ऊर्जा के विकास व के लिए 23 हजार 512 करोड़ रूपये (3 )-- समाज कल्याण की योजनाओं के लिए 14 .951 करोड़ रूपये (4 )----- चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 7 हजार 34 सौ करोड़ रूपये (5 )------- कृषि एकं सम्बद्ध सेवाओं के लिए (5 ) हजार 432 करोड़ रूपये (6 )--- दसवी एवं बारहवी कक्षा के छात्रो के लिए टैबलेट और लैपटाप के लिए 23 हजार 721 करोड़ रूपये (7 )--बेरोजगारी भत्ते के लिए 1 .100 करोड़ रूपये (8 )- किसानो की ऋण राहत योजना के लिए 500 करोड़ (9 )--- छात्राओं के कन्या विद्या धन योजना के लिए 446 .35 करोड़ रूपये ( 10 ) गन्ना किसानो के अवशेष बकाये के भुगतान के लिए 400 करोड़ रूपये (11 )--- बुनकरों के बकाया बिजली बिल माफ़ी के लिए 128 करोड़ रूपये | सभी जानता है यह प्रदेश कृषि -- प्रदेश के रूप में जाना जाता है | फिर यह बात भी सर्वविदित है की पश्चिमी उत्तर प्रदेश और किसी हद तक मध्य उत्तर प्रदेश को छोडकर बाकी का प्रदेश -- बुन्देलखण्ड से लेकर समूचा पूर्वी उत्तर प्रदेश पिछड़ा हुआ है | खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तो कई फसला उपज देने में सक्षम कृषि योग्य भूमि की मौजूदगी के वावजूद पिछड़ा हुआ है | पूरे प्रदेश का में औद्योगिक विकास की कमी के साथ कृषि प्रदेश का एक पिछड़े प्रदेश की ही पहचान देता आ रहा है | इसके वावजूद प्रदेश की सरकारे कृषि विकास को कोई प्राथमिकता नही प्रदान कर रही है | उदाहरण --- इस बजट में भी देख ले तो कृषि क्षेत्र को बजटीय आवंटन के क्रम में पांचवे पायदान पर अर्थात विकास के लिए बजटीय धन के सबसे निचले पायदान पर रखा गया है | फिर उसके नीचे तो बजटीय धन का आवंटन गैर विकास योजनाओं के लिए ही है | चाहे वह टैबलेट या लैपटाप देने का मामला हो या बेरोजगारी भत्ता या कन्या धन योजना आदि का मामला हो या फिर किसान कर्ज माफ़ी या बुनकरों की बिजली बिल के बकाये का मामला हो | ध्यान देने लायक बात यह है की कृषि क्षेत्र के लिए इस धन का आवंटन में कृषि से सम्बन्धित क्षेत्र भी है | इसमें बागवानी , मत्स्य पालन , मुर्गी पालन , सूअर पालन जैसे क्षेत्रो के साथ -- साथ अब आधुनिक तकनीकि वाला खाद्द एवं प्रसंस्करण क्षेत्र भी शामिल कर लिया गया है | इन क्षेत्रो को शामिल किए जाने के बाद शुद्ध रूप से कृषि क्षेत्र के लिए आवंटित धन निश्चित तौर पर और कम हो जाएगा | उल्लेख्य्नीय रूप से कम हो जाएगा | सरकार ने बजटीय घोषणा में सिंचाई को बुनियादी ढाचागत क्षेत्र में शामिल किया हुआ है | यह बात एकदम उचित भी है क्योंकि सिंचाई अपने आप में खेती के लिए ढाचागत विकास का मामला है | यहाँ भी एक बड़ी गड़बड़ी है | ढाचागत विकास के अन्य क्षेत्रो अर्थात सडक सेतु ऊर्जा के लिए तो सरकार स्वंय या फिर पब्लिक ( सरकार ) ( प्राइवेट ) पूंजीपतियों के पाट्नरशिप ( पी. पी .पी . ) के माध्यम से विकास करेगी लेकिन सिचाई के लिए वह बजटीय घोषणा अनुसार एक लाख चालीस हजार की नि: शुल्क बोरिंग का खर्च उठाएगी | साफ़ बात यह है की नि:शुल्क बोरिंग के अलावा सिचाई के लिए बाकी का सारा खर्च किसानो को ही करना पडेगा | इसके अलावा लोहिया राजकीय नलकूप योजना के तहत 748 नये ट्यूबेल लगाये जायेंगे | जाहिर सी बात है एक नलकूप एक गाँव के भी समूचे क्षेत्र की सिंचाई नही कर पायेगा | अर्थात अगर यह राजकीय ट्यूबेल लग भी जाए तो वह ज्यादा से ज्यादा प्रदेश के 748 गाँवों तक ही सीमित रहेगा जाता तक पुराने राजकीय टयूबेलो की बात है तो उनकी स्थिति पहले से बदहाल है | नहरों के नाम पर नई नहरों के विकास की कोई बात बजट में नही कही गयी है | नहरों के पानी को टेल तक पहुचाने और नहरों की सफाई की बात जरुर कही गयी है | पर इससे सिंचाई का ढाचागत विकास होने वाला नही है | खाद बीज के विक्रय और उत्पादों की खरीद के लिए ढाचागत विकास की कोई बात नही कही गयी है | अत: कृषि का सारा या प्रमुख बोझ बढ़ते लागत मूल्य से त्रस्त्र किसानो को ही ढोना है | जिसे वह पहले से ढोते चले आ रहे है | इसी के चलते वे खेती से अदायगी न कर सकने वाले कृषि ऋणों में फंसते भी रहे है ||
प्रदेश सरकार बजट में किसानो के ऋण माफ़ी के लिए 500 करोड़ रुपयेका धन आवंटित किया है | 2007 में केंद्र सरकार द्वारा किसानो की कर्जमाफी की घोषणा के बाद अब प्रदेश सरकार की यह कर्जमाफी भी उन्हें कृषि ऋण में फसने से रोक नही पाएगी | कयोंकि मामला ऋण माफ़ी का नही बल्कि श्रम व अन्य संसाधनों की लागत के हिसाब से कृषि उत्पादन को बढावा दिये जाने और फिर उसका उचित मूल्य भाव मिलने का है | उसके लिए तो इस बजट में न तो किसी समाधान की रूप रेखा है और न ही डंकल प्रस्ताव को लागू करती आ रही इस ( व अन्य ) प्रांत की पूर्वव्रती सरकारों के बजटो व घोषणाओं में उसके समाधान की कोई रूप रेखा है | बुनकरों के लिए जिस प्रमुख छुट की गयी है | वह है बकाया बिजली बिल की माफ़ी | इसके लिए सरकार ने 128 करोड़ की राशि आवंटित की है | कर्ज और माफ़ी की तरह ही असल मामला बिजली बिल बकाया और उसकी माफ़ी का नही है , बल्कि यह मामला भी बुनकरों के लिए सुता , बिजली आदि के बढ़ते लागत बड़ी मिलो के कपड़ो तथा विदेशो के आयातित कपड़ो से उनके कटते - - घटते बाजार का है | उसे दुरुस्त करने की घोषणा न तो इस सरकार ने की और न ही किसी पूर्व की सरकारों ने | उल्टे बड़े उद्यमियों और विदेशी आयातकों को और ज्यादा छूट जरुर मिलती रही है | पुरे बजट में उद्योगों के विकास और उसके लिए धन के आवंटन का मामला गायब है | जाहिर सी बात है की प्रदेश की इस सरकार और पूर्व की सरकारों ने भी उद्योगों के विकास को उद्योगपतियों के लिए छोड़ दिया है | इतना ही नही , बल्कि स्थिति यह भी है की सरकारों द्वारा संचालित उद्योग खस्ता हाल होते जा रहे है | प्रदेश के औद्योगिक नगर कानपुर से लेकर पूर्वांचल के विभिन्न शहरों की राजकीय औद्योगिक इकाइयों का हाल यही है | गोरखपुर खाद का कारखाना , आजमगढ़ जौनपुर की कई चीनी मिले मऊ, अकबरपुर की कताई मिले आदि बन्द पड़ी है | उसे सरकारे निजी मालिको को बेच रही है और औने-- पौने में बेच रही है |विकास की ऐसी स्थिति में ज्यादातर बेरोजगारों को रोजगार मिलने की उम्मीद तो कत्तई नही है | हां अगर एक हिस्से को बेरोजगारी भत्ता फिलहाल मिल भी जाए तो वह भी लम्बे दिनों तक मिलने वाला नही है | रह गयी बात टैबलेट व लैपटाप की तो उससे 10 वी 12 वी के बच्चो की मेधा के बढने की न के बराबर उम्मीद है पर टैबलेट और लैपटाप कम्पनियों की बिक्री बाजार व मुनाफे बढ़ने की सौ फीसदी गारंटी है |
-सुनील दत्ता
पत्रकार
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