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मंगलवार, 2 जुलाई 2013

ममता के अवसान का शोक गीत



   

पश्चिम बंगाल में जब से सारधा चिटफंड कांड सामने आया है यहाँ का सारा राजनैतिक माहौल गुस्से और गहरे अवसाद से भर गया है। अब तक 10 लोग आत्महत्या कर चुके हैं इनमें कई एजेंट हैं और कई अमानतगीर हैं। इसकांड से यहाँ के छोटे बचतकर्ताओं को बड़ा झटका लगा है और इससे राज्य की राजनीति अस्थिर हो उठी है।  इसने राजनैतिक सामाजिक असंतुलन को भी जन्म दिया है। सारधा कंपनी का आना और बंद होना कई महत्वपूर्ण सवालों को छोड़ गया है। भावी राजनीति की दिशा  इन सवालों के समाधान पर बहुत कुछ निर्भर करेगी।

    पहला विचारणीय सवाल है कि लंबे समय से इस राज्य में वाम विचारधारा का राजनैतिक-सांगठनिक असर रहा है, वे जानते हैं चिटफंड कंपनियाँ किस तरह ठगती हैं, लोभ-लालच पैदा करती हैं, इसके बावजूद इन कंपनियों के खिलाफ वाम शासन के दौरान संगठित प्रचार अभियान क्यों नहीं चलाया गया? वामशासन ने इस समस्या को तदर्थभाव से कानूनी भाव से देखा। 
    राज्य विधानसभा ने चिटफंड कंपनियों को कानूनी घेरे में बाँधने के लिए दो बार कानून बनाने का प्रस्ताव विधानसभा से पास कराकर अध्यादेष की शक्ल में क्रमषः 2003 और 2008 में विधेयक के रूप में राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा था लेकिन केन्द्र सरकार ने उसे मंजूरी नहीं दी। मंजूरी न देने की वजह भी अंत तक नहीं बताई गई, हाल ही में जब चिटफंड घोटाला सामने आया और मुख्यमंत्री ने नए कानून बनाने की मंशा जाहिर की तो राष्ट्रपति के यहाँ से पुराने अध्यादेश का मसौदा बिना किसी टिप्पणी और कारण बताए वापस भेज दिया गया। वामदलों ने जानना चाहा कि आखिरकार क्या कारण हैं जिनके कारण उनके बनाए अध्यादेश को राष्ट्रपति ने मंजूरी नहीं दी? लेकिन राष्ट्रपति और राज्य सरकार दोनों ने कोई कारण नहीं बताया। इससे एक तथ्य साफ है कि केन्द्र सरकार की चिटफंड कंपनियों की ठगई के खिलाफ एक्षन लेने में कोई दिलचस्पी नहीं है। हाल ही में राज्य विधानसभा ने वामशासन में तैयार अध्यादेश को मात्र 3 नए संषोधनों के साथ फिर से राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया है। देखना यह है कि इस बार के कानून से चिटफंड कंपनियों के खिलाफ राज्य सरकार सख्त कार्रवाई कर पाती है या नहीं ? राज्य सरकार ने चिटफंड घोटाले के पीडि़तों को न्याय दिलाने के लिए 5 सदस्यीय एक कमीशन बनाया है। इस कमीशन का अध्यक्ष कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक पूर्व जज को बनाया गया है। साथ ही 500 करोड़ रूपये की सहायता राषि देने की घोषणा भी की गई है।
    सारधा चिटफंड घोटाले में तकरीबन 22 हजार करोड़ रूपये की ठगी का मामला बनता है। लाखों नागरिकों की संचित पूँजी को इस कंपनी ने 260 से ज्यादा कंपनियाँ बनाकर कई राज्यों में लूटा है। सारधा कंपनी का नेटवर्क पष्चिम बंगाल, उड़ीसा, त्रिपुरा, असम, झारखण्ड, बिहार आदि में सक्रिय रहा है।
       इस पूरे प्रपंच का एक आयाम सामाजिक सचेतनता से जुड़ा है जिसकी ओर  राजनैतिक दलों ने कभी ध्यान ही नहीं दिया। विगत जितने भी चुनाव (लोकसभा विधानसभा) हुए हैं उनमें किसी भी दल ने चिटफंड कंपनियों की लूट को बंद कराने का चुनावी घोषणापत्र में वायदा तक नहीं किया।
    उल्लेखनीय है जब भी चिटफंड कंपनियों के बारे में षिकायत हुई तब ही केन्द्र सरकार के मातहत चलने वाले संस्थान सक्रिय हुए हैं। अपनी निजी पहल पर किसी भी केन्द्रीय संस्थान ने कभी भी चिटफंड कंपनियों के खिलाफ कदम नहीं उठाए हैं।
    चिटफंड कंपनियों की ठगी को राजनेताओं ने कानून और व्यवस्था की समस्या के रूप में ही देखा है। अभी भी जितना बहस और विवाद चल रहा है उसके केन्द्र में एक सख्त कानून बनाने की माँग प्रमुख माँगों में प्रथम है। हाल ही में सारधा कांड जब सामने आया तो पता चला कि तृणमूल कांग्रेस के कद्दावर सांसद सोमेन मित्र ने ही केन्द्र सरकार के कंपनी मंत्रालय को एक साल पहले लिखित चिट्ठी के माध्यम से षिकायत की थी और उनकी षिकायत पर सेबी, रिजर्व बैंक और कंपनी मंत्रालय सक्रिय हुआ और इसके बाद धीरे-धीरे केन्द्र सरकार के अन्य विभागों ने भी इस मामले में दिलचस्पी लेनी आरंभ की, लेकिन राज्य सरकार ने कोई पहल नहीं की। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चिटफंड कंपनियों की लूट और ठगी के बारे में और भी कई तृणमूल नेताओं ने आगाह किया लेकिन मुख्यमंत्री ने इस दिषा में ध्यान ही नहीं दिया। इसके विपरीत चिटफंड कंपनी के मुखिया को हर स्तर पर संरक्षण दिया गया।
    चिटफंड कंपनियों की राज्य में नेटवर्किंग और राजनैतिक संगठनों के साथ उनके व्यापक संबंधों की ओर पहले कभी
    सारधा चिटफंड कंपनी और अन्य चिटफंड कंपनियों के द्वारा जिस तरह और जिन नामों से आम जनता से चालाकी से
धन वसूली की जा रही है उसकी वैधता पर कई केन्द्रीय संगठनों जैसे सेबी और कंपनी मंत्रालय ने सवाल खड़े किए हैं लेकिन कभी सीधे इन कंपनियों को धंधा बंद करने का आदेष नहीं दिया। ये संस्थान राज्य सरकार को पत्र लिखते रहे और राज्य सरकार उन पत्रों को छिपाए बैठी रही। कायदे से चिटफंड या लघु पूँजी के निजी संचय के कारोबार पर केन्द्रीय संस्थानों को निजी पहल पर रीयलटाइम में ही हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन वे यह काम करने में असमर्थ रहे और चिटफंड कंपनियों ने सेबी और कंपनी मंत्रालय की निष्क्रियता का लाभ उठाकर अरबों रूपये आम जनता से ठग लिए।
    यह सच है कि चिटफंड रोकने या चालू करने का कानून केन्द्र के अधीन है और यदि कोई राज्य सरकार चाहे तो इस मामले में अपना कानून बना सकती है। अभी तक पाँच राज्यों में कानून हैं, यह राज्य हैं- तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, आंध्र, कर्नाटक आदि। जबकि चिटफंड के जरिए ठगने की समस्या राष्ट्रीय है और इसके लिए राष्ट्रीय कानून ही होना चाहिए।
    चिटफंड कंपनियाँ अपने नेटवर्क के जरिए आम लोगों में सघन प्रचार अभियान चलाकर ज्यादा से ज्यादा आर्थिक लाभ का भरोसा पैदा करती हैं और वे यह कोषिष करती हैं कि लोग पैसा उनके यहाँ जमा करें। इस काम में उन्होंने परंपरागत प्रचार के तरीकों की जमकर मदद ली है।
    मसलन् इलाके में ईमानदार, कर्मठ या मेहनती, जरूरतमंद को एजेंट बनाकर अपनी साख जमाना, इलाके के राजनैतिक कार्यकर्ता को पटाकर रखना और संभव हो सके तो उसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन हासिल करना। सारधा कंपनी ने यह काम करने के लिए एक नया मैथड अपनाया,  उसने सीधे लोकसभा-विधानसभा-पंचायत चुनाव में अपनी पूरी मषीनरी ही चुनावों में झोंक दी।
    सन् 2008 में सम्पन्न पंचायत चुनावों में सारधा चिटफंड के अधिकांष एजेंट सीधे तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता बन गए और रातों-रात गाँवों में ममता का दल खड़ा हो गया। जिन इलाकों में कोई संभावना नहीं थी वहाँ तृणमूल कांग्रेस की शाखाएँ बन गईं और पंचायतों में उसने पचास फीसदी सीटें हासिल कर लीं।
    सन् 2008 के पंचायत के चुनावों के पहले तक गाँवों में प्रवेष करना तृणमूल के लिए मुष्किल काम रहा है लेकिन 2008 में जिस तरह गाँवों में तृणमूल ने अपना संगठन विस्तार किया उसने समूची राजनैतिक प्रक्रिया को एक नए तत्व से भर दिया और वह था चिटफंड कंपनी का एजेंट। सारधा कंपनी के एजेंटों ने खुलकर वामविरोधी मुहिम में हिस्सा लिया और पंचायतों के चुनाव में 2008 में  राज्य स्तर पर पहली बार तृणमूल कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता मिली।
    सवाल यह है कि वामदलों को ये सारधा चिटफंड एजेंट-तृणमूल कांग्रेस का सांगठनिक याराना नजर क्यों नहीं आया और उसने इस गठजोड़ को आम जनता के सामने नंगा क्यों नहीं किया? वामदलों ने उस समय चिटफंड कंपनी के एजेंटों की राजनैतिक भूमिका की पूरी तरह अनदेखी की। वे इन एजेंटों को अराजनैतिक तत्व मानकर चल रहे थे। 
    सच यह है कि तकरीबन एक लाख से ज्यादा सारधा कंपनी के एजेंट रातों-रात ममता के नेतृत्व में गाँवों में टी.एम.सी. के साथ मैदान में उतर गए। चिटफंड का एजेंट वैसा ही समर्पित व्यक्ति है जैसा कि कॉमरेड हुआ करते हैं। अंतर यह है कि वह चिटफंड कंपनी के लिए समर्पित है तो कॉमरेड अपने दल के लिए। लेकिन मेहनत करके आदमी को बहलाने-फुसलाने की कला में एजेंट माहिर होता है। इसके अलावा एक अन्य प्रवृत्ति यह भी नजर आई कि गाँवों में हठात हिंसाचार बढ़ गया। इसका प्रधान कारण यह है कि चिटफंड की वसूली में स्थानीय गुण्डों का बृहत्तर नेटवर्क काम कर रहा था और अब वह पंचायतों में चुनाव जीतने के साथ ही महज एजेंट नहीं था बल्कि वह राजनैतिक दादा-एजेंट था। उसे खुले तौर पर सत्ता का समर्थन मिल रहा था, सन् 2009 के संसद के चुनाव और 2011 के विधानसभा चुनाव में उसने सक्रिय रूप से ममता के साथ भूमिका अदा की।
    दूसरी ओर सारधा कंपनी के मालिक सुदीप्तसेन ने बड़े ही कौशल के साथ टी.एम.सी. के सभी नेताओं के साथ इस तरह का गठबंधन विकसित कर लिया कि यह अंतर ही खत्म हो गया कि सारधा चिटफंड कंपनी और टी.एम.सी. दो अलग संगठन हैं। आम लोगों में यह धारणा पुख्ता हो गई कि ममता के लोग ही सारधा के लोग हैं। चिटफंड और राजनीति का इस तरह का सम्मिश्रण पहले कभी कहीं पर भी नहीं देखा गया।
    चिटफंड कंपनी के साथ ममता का याराना आरंभ होता है सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन के दौरान। पहलीबार खुले तौर पर भ्रष्ट तरीकों से अर्जित भ्रष्ट पूँजी की कोई राजनैतिक दल खुली मदद लेता है और यह तथ्य मीडिया से लेकर राजनैतिक दलों की आँखों से ओझल रहता है।
    सारधा चिटफंड कंपनी के एजेंटों की सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन के दौरान अति सक्रियता और उसके पीछे तैयार हो रहे घृणित राजनैतिक-चिटफंड गठबंधन को कोई देख ही नहीं पाया। सभी ने यही माना कि सिंगूर-नंदीग्राम का मसला तो किसानों की जमीन के अधिग्रहण का मसला है। किसानों की जमीन बचाने के नाम पर ममता ने जिस तरह का उन्माद और राजनैतिक अराजकता पैदा की उस स्थिति का सारधा चिटफंड ने कौशल के साथ फायदा उठाया, सारधा कंपनी का सारा कारोबार मात्र पाँच सालों (2007-8 से 2012-13) में व्यापक स्तर पर फैला है। इस बीच राज्य प्रशासन और केन्द्र सरकार उसके खिलाफ कोई भी कदम नहीं उठा पाए। सन् 2008 के पंचायत चुनाव, 2009 के लोकसभा चुनाव और 2011 के विधानसभा चुनावों में सारधा कंपनी ने ममता बनर्जी  के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों के समर्थन में पानी की तरह पैसा बहाया।  इस समूची प्रक्रिया में सारधा ग्रुप ने एक और काम किया। वह जानते थे कि पष्चिम बंगाल में आम जनता में राय बनाने वालों में यहाँ के बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों, फिल्मीकलाकारों आदि की बड़ी भूमिका रही है अतः उसने विभिन्न कार्यक्रमों, प्रकल्पों, समारोहों आदि के जरिए बंगाली सैलीब्रेटी संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों को अपने साथ ले लिया और इसके लिए उसने विभिन्न बहानों का इस्तेमाल किया। मसलन किसी के कार्यक्रम को स्पांसरषिप दे दी, किसी की पत्रिका को विज्ञापन दे दिया, किसी को  सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बुलाकर सम्मानित किया, किसी के लिए पत्र-पत्रिका का प्रकाषन करके मोटी-मोटी पगार की व्यवस्था कर दी। इस तरह सारधा कंपनी ने बंगाली सैलीब्रिटी लोगों को सहज ही अपने मोहपाश में बाँध लिया।
     दिलचस्प बात यह है कि पष्चिम बंगाल में लंबे समय से चिटफंड कंपनियां काम करती रही हैं, ठगी करती रही है, पकड़ी गई हैं लेकिन राजनीति और संस्कृति के साथ चिटफंड कंपनी का ऐसा बृहद गठबंधन पहलीबार सामने आया। 
    पहलीबार ऐसा होता है कि कोई चिटफंड कंपनी आक्रामक ढंग से किसी दलविषेष के लिए काम करने के लिए अपने पूरे तंत्र को झोंक देती है। मजेदार बात यह है ममता का दल सारधा कंपनी के साथ अपनी मित्रता को छिपाता नहीं था बल्कि गर्व से कहता था कि वे हमारे साथ हैं। इस समूची प्रक्रिया को आँखों से ओझल रखने के लिए फेक राजनैतिक एजेण्डे को केन्द्र में रखा गया। फेक मसले और फेक उन्मादना के जरिए वामदलों की सत्ता को चुनौती दी गई।
    सारधा कंपनी के राज्य-राजनीति में सक्रिय होते ही स्थानीय राजनीति का चरित्रबदल जाता है। विवाद के मसले बदल जाते हैं। फेकमसले, कम्युनिस्टों पर हमले, उनके खिलाफ झूठे मुकदमे, तरह-तरह से मा.क.पा. और अन्य वामदलों पर हमले और भाड़े के लठैतों की एक फौज हमेशा चंद घंटों के नोटिस पर ममता के साथ सड़कों पर हंगामा करने के लिए तैयार रहती थी। यह भाड़े की फौज आज भी सक्रिय है। ममता के शासन में आने के बाद तकरीबन चार हजार से ज्यादा मा.क.पा. कार्यकर्ताओं पर झूठे मुकदमे लादे गए हैं, उनकी गिरफ्तारी हुई है। कई हजार कार्यकर्ता अभी तक अपने घरों से बाहर अन्यत्र शरण लेकर रह रहे हैं। कई हजार पार्टी ऑफिसों पर हमले किए गए, तोड़-फोड़ की गई और पुलिस ने एक भी हमलावर को नहीं पकड़ा। कहने का तात्पर्य यह कि चिटफंड कंपनी के राजनैतिक मैदान में आने के साथ अराजकता में इजाफा हुआ और आम जीवन में असुरक्षा बढ़ी। इस असुरक्षा के माहौल को लोभ-लालच के सघन अभियान के जरिए भरने की कोषिष की गई। इसके परिणाम स्वरूप सारधा कंपनी ने तेजी से अरबों-खरबों रूपये की वसूली करने में सफलता हासिल कर ली।  
    आक्रामक राजनीति और चिटफंड कंपनियों का अन्तस्संबंध पुख्ता हुआ। पहले यह संबंध क्षीणरूप में मौजूद था लेकिन सारधा कंपनी के अस्तित्व में आने के बाद से इसने प्रत्यक्ष तौर पर राजनैतिक ताकतों को मदद देने का फैसला किया। इसके अलावा पष्चिम बंगाल के ओपिनियन मेकर बुद्धिजीवियों को भी विभिन्न तरीकों से गोलबंद किया और मंच पर अपने साथ एकत्रित करके अपनी साख में इजाफा किया।
    कुछ तथ्य हैं जिनको ध्यान में रखा जाना चाहिए। पहला, सारधा कंपनी ने राजनेता, बुद्धिजीवी, फिल्मी अभिनेता आदि के पीछे खुलकर पूँजी निवेष किया। पहले मा.क.पा. के प्रकाशनों में सारधा कंपनी के विज्ञापन निरंतर छपते रहे हैं। लेकिन खुलकर राजनैतिक निवेश से यह कंपनी किनाराकषी करती रही है, लेकिन 2008 से इस कंपनी ने ममता बनर्जी और उनके साथ जुड़े राजनैतिक संगठनों  और संस्कृतिकर्मियों को खुलकर स्पांसरषिप दी।
    दूसरा, तथ्य यह कि पष्चिम बंगाल में चिटफंड और पूँजीनिवेष का धंधा देष के सभी मान्य कानूनों की अवहेलना करके चल रहा था, पहले वामषासन इसे जानता था लेकिन उसने इसे न्यायिक प्रक्रिया में उलझाकर रख दिया। विचारणीय बात यह है कि जब सरकार जानती थी कि चिटफंड कंपनियाँ जो धंधा कर रही हंै वह अवैध है तो राज्य सरकार ने पहल करके उनके खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं की?
    मैं 22 साल से कोलकाता में रह रहा हूँ मैंने कभी कोई पोस्टर-पैम्फलेट आदि चिटफंड कंपनियों के खिलाफ प्रकाषित रूप में नहीं देखा। किसी भी दल को इन कंपनियों के खिलाफ सक्रिय भूमिका अदा करते नहीं देखा। खासकर वामदलों की निष्क्रियता परेशानी पैदा करती है। वामदलों का राज्य में हर स्तर पर वर्चस्व है। गाँव से शहर तक इकाइयाँ हैं लेकिन चिटफंड कंपनियो की ठगी के खिलाफ संगठित प्रचार अभियान चलाने में वे असफल रहे हैं। इस समस्या का एक अन्य पहलू है ममता बनर्जी का राजनैतिक चरित्र और भविष्य।   
    मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों आम जनता में अ-लोकप्रिय हैं। इतनी अ-लोकप्रिय वे कभी नहीं रहीं। हम सबने ममता को आक्रामकभाषा, लोकप्रियता और मर्दानगी के राजनैतिक पर्याय के रूप में देखा है। ममता की राजनैतिक भाषा की धुरी है आक्रामकता और छद्म विष्वास। आक्रामक भाषा के जरिए वे वैसे ही उन्माद पैदा करती हैं जैसे किसी प्रोडक्ट की बिक्री के समय कंपनी पैदा करती है। राजनीति में विज्ञापन की आक्रामक मार्केटिंग रणनीति के पुरस्कृता के रूप में वे हमेशा मानक रहेंगी। आक्रामक भाषा को उन्होंने पश्चिम बंगाल के राजनैतिक विमर्ष का हिस्सा बनाया है।
    ममता और उनके दल का सारधा चिटफंड कंपनी से गहरा नजदीकी संबंध है। तृणमूल के अनेक नेताओं और हजारों कार्यकर्ताओं को सारधा चिटफंड कंपनी ने अपने धंधे के विस्तार में इस्तेमाल किया है। सारधा चिटफंड कंपनी ममता की पोषक है और ममता उनकी संरक्षक हैं।
    ममता और सारधा का गठजोड़ भारत में विरल घटना है। दोनों लोभी हैं। ममता में सत्तालोभ और सारधा का धनलोभ मिलकर आम जनता की दमित भावनाओं का दोहन करते रहे हैं। दोनों के निशाने पर आम नागरिक और उनका विष्वास है।
    ममता और सारधा का साझा लक्ष्य है विवेक और ईमानदारी की विदाई। दोनों पापुलिज्म के हथकंडे अपनाते रहे हैं। पापुलिज्म तात्कालिक लाभ देता है लेकिन एक अवधि के बाद स्वयं को ही खाने लगता है। आज ममता और सारधा दोनों की साख रसातल में है।
    लोकप्रियता या पापुलिज्म बेहद खतरनाक खेल है इसको खेलने वाला हमेशा खतरों से घिरा होता है, वह उन्हीं मोहरों का षिकार होता है जो उसने बनाए होते हैं। वह अपने ही लोगों के हाथों लोकप्रियता खोता है।
    ममता का सबसे बड़ा संबल था ईमानदारी और आज सारधा चिटफंड घोटाला कांड के बाद ममता बनर्जी दागदार मुख्यमंत्री की कोटि में आ गई हैं। ममता की ईमानदारी को और किसी ने नहीं उनके सहयोगी नेताओं, दलालों, भाड़े के बुद्धिजीवियों और ठगों ने कलंकित किया। कल तक जो ममता ईमानदारी की प्रतीक थीं आज वे अपनी इमेज को विलोम में बदल चुकी हैं। वे जानती हैं उनके नेताओं के पास ईमानदारी का पैसा कम है, चिटफंड और अन्य अवैध वसूली के स्रोतों से वसूला गया धन ज्यादा है।
    सारधा चिटफंड घोटाला एक दिन में तैयार नहीं हुआ। यह सालों से चल रहा था। सारधा कंपनी के कर्णधार सुदीप्तसेन ने सुनियोजित ढंग से अपने चिटफंड नेटवर्क के विकास में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं-सदस्यों का व्यापक इस्तेमाल किया। कमीषनखोर एजेण्टों की एक साखदार टीम कोलकाता से लेकर गाँवों तक बनाई।
    सारधा कंपनी के एजेंट दो तरह के काम करते थे, पहला वे चिटफंड कंपनी के ग्राहक जुगाड़ करते और दूसरा, हर समय तृणमूल कांग्रेस का बैनर उठाए ममता के पीछे सक्रिय रहते थे। ममता का बैनर स्थानीय एजेंट की साख का प्रतीक था और इससे सारधा कंपनी को आम नागरिकों में खासकर निम्नवर्ग और मध्यवर्ग के लोगों में तेजी से अपने कारोबार को फैलाने में मदद मिली।
    किसी भी चिटफंड कंपनी के लिए एजेंट की साख महत्वपूर्ण होती है। सारधा कंपनी के कर्णधार सुदीप्तसेन ने चिटफंड, संस्कृति और राजनीति का सम्मिश्रित गठजोड़ तैयार किया। तेजी से स्थानीय स्तर पर नेताओं और बुद्धिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों- फिल्मी अभिनेता- अभिनेत्रियों-चित्रकारों को स्पांसरषिप देनी शुरू की। एजेंटों को स्थानीय पूजा कमेटियों में सक्रिय किया और स्थानीय जनता का संपर्क और विष्वास अर्जित किया।
    उल्लेखनीय है ठग हमेशा ईमानदारी और भरोसे का इस्तेमाल मुखौटे के रूप में करते हैं। ईमानदार नेता की इमेज के भ्रष्ट लोग राजनैतिक कवच की तरह इस्तेमाल करते हैं। भ्रष्टाचार कभी भ्रष्ट इमेज में नहीं आता। ईमानदार नेता और राजनैतिक भ्रष्टाचार का आदर्ष उदाहरण हैं केन्द्र सरकार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। निजी तौर पर मनमोहन ईमानदार हैं लेकिन सरकार में भ्रष्टाचार गहरे जड़ें जमाए है। उसी तरह ज्योति बाबू की ईमानदार इमेज का भ्रष्टाचार पर पर्दादारी के लिए वाम भ्रष्टाचार मंडली इस्तेमाल करती रही है। एक जमाने में ज्योति बाबू के इर्द-गिर्द किस तरह भ्रष्ट लोगों ने घेराबंदी की हुई थी उसकी ओर तत्कालीन मंत्रियों विनय कृष्ण चैधरी और बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने बयानों में ध्यान खींचा था। ठीक उसी तरह ममता की ईमानदार और सादगी भरी इमेज का 4 सालों से भ्रष्ट और ठग किस्म के लोग जमकर इस्तेमाल करते रहे हैं।
    ममता की राजनैतिक भाषा और चिटफंड कंपनी के एजेंट की भाषा में विलक्षण साम्य है। चिटफंड एजेंट विष्वास करो और भूल जाओ की भाषा का इस्तेमाल करता है। यही भाषा ममता भी बोलती हैं। ममता कभी राजनेता की भाषा नहीं बोलतीं, वह चिटफंड एजेंट की भाषा बोलती हैं। चिटफंड एजेंट झूठे सपने दिखाता है ,सतह पर पूँजी की लाभकारी वापसी का सपना जगाता है, लोभ पैदा करता है और विवेक छीन लेता है। ममता ने भी यही काम किया है। उन्होंने पष्चिम बंगाल में राजनैतिक लोभ पैदा किया है। राजनैतिक लोभ की पहली उपलब्धि है राजनैतिक विवेक की हत्या।
    यह त्रासद है कि सारधा चिटफंड कंपनी के बंद होते ही ममता की चमक फीकी पड़ गई है। उनकी ईमानदारी संदेह के घेरे में आ गई है। कल तक ममता संदेह से परे थीं, इन दिनो संदेहों से घिरी हैं। नेता जब संदेहों में घिरता है तो समझो उसका राजनैतिक अवसान समीप है।
-जगदीश्वर चतुर्वेदी
    मोबाइल: 09331762360

ध्यान ही नहीं गया। राजनेताओं और चिटफंड कंपनियों के बीच में बने गठबंधन का ही परिणाम है कि सारधा चिटफंड कंपनी ने सन् 2008 के बाद पष्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों में सैंकडों एकड़ जमीन वैध-अवैध ढंग से खरीदी और कहीं पर भी उसे किसी प्रतिवाद का सामना नहीं करना पड़ा, जबकि पष्चिम बंगाल में कोई व्यक्ति इतनी आसानी से कहीं पर जमीन नहीं खरीद सकता। हर इलाके में गुण्डों से लेकर राजनेताओं तक के विरोध का सामना करना पड़ता है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि कहीं पर भी फ्लैट या दुकान तक खरीदना आसान काम नहीं है। लेकिन  सारधा ग्रुप को कहीं पर भी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा।

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

असुरों के वंशज ही अपने पूर्वजों के नरसंहार का उत्सव में निष्णात!

भारत के राष्ट्रपति हिंदू हैं और कुलीन ब्राह्मण। उनेक राष्ट्रपति बनने पर बांग्ला मीडिया ने इस पर बहुत जोर दिया। क्यों?राष्ट्रपति के हिंदुत्व पर दुनियाभर का मीडिया फोकस कर रहा है। अखब।र नहीं निकल रहे हैं तो क्या, संवाददाताओं और कैमरामैन प्रणव​मुख्रजी की पूजा कवर करने के लिए तैनात हैं। क्या यही धर्म निरपेक्ष भारत की सही छवि है?मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के तमाम सहयोगी पूजा उद्घाटन में व्यस्त हैं।मंत्री, सांसद, विधायक पूजा कमिटियों के कर्ता धर्ता हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है।उत्तरी बंगाल में आज भी असुरों के उत्तराधिकारी हैं। जो दुर्गोत्सवके दौरान अशौच पालन करते हैं। उनकी मौजूदगी साबित करती है कि महिषमर्दिनी दुर्गा का मिथक बहुत पुरातन नहीं है। राम कथा में दुर्गा के अकाल बोधन की चर्चा जरूर है, पर वहां  वे महिषासुर का वध करती नजर नहीं आतीं। जिस तरह सम्राट बृहद्रथ की हत्या के बाद पुष्यमित्र के राज काल में तमाम महाकाव्य और स्मृतियों की रचनी हुई प्रतिक्रांति की जमीन तैयार करने के लिए। और जिस तरह इसे हजारों साल पुराने इतिहास की मान्यता दी गयी, कोई शक नहीं कि अनार्य प्रभाव वाले आर्यावर्त की सीमाओं से बाहर के तमाम शासकों के हिंदूकरण की प्रक्रिया को ही महिषासुरमर्दिनी का मिथक छीक उसी तरह बनाया गया , जैसे शक्तिपीठों के जरिये सभी लोकदेवियों को सती के अंश और सभी लोक देवताओं को भैरव बना दिया गया। वैसे भी बंगाल का नामकरण बंगासुर के नाम पर हुआ। बंगाल में दुर्गापूजा का प्रचलन सेन वंश के दौरान भी नहीं था। भारत माता के प्रतीक की तरह अनार्य भारत के आर्यकरण का यह मिथक निःसंदेह तेरहवीं सदी के बाद ही रचा गया होगा। जिसे बंगाल के सत्तावर्ग के लोगों ने बांगाली ब्राहमण राष्ट्रीयता का प्रतीक बना दिया।​विडंबना है कि बंगाल की गैरब्राह्मण अनार्य मूल के या फिर बौद्ध मूल के बहुसंख्यक लोगों ने अपने पूर्वजों के नरसंहार को अपना धर्म मान लिया। बुद्धमत में कोई ईश्वर नहीं है, बाकी धर्ममतों की तरह। बौद्ध विरासत वाले बंगाल में ईश्वर और अवतारों की पांत अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बनी, जो विभाजन के बाद जनसंख्या स्थानांतरण के बहाने अछूतों के बंगाल से निर्वासन के जरिये हुए ब्राह्मण वर्चस्व को सुनिश्चित​करने वाले जनसंख्या समायोजन के जरिये सत्तावर्ग के द्वारा लगातार मजबूत की जाती रहीं।
 राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी हर साल की तरह इस साल भी नवरात्रि के मौके पर पश्चिम बंगाल के बीरभूमि जिले के मिरीती गांव में मौजूद अपने पैतृक निवास जा रहे हैं। बीरभूमि के जिलाधिकारी ने जानकारी दी है कि मुखर्जी शनिवार को दोपहर में कोलकाता से 240 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद अपने गांव हेलीकॉप्टर से पहुंचेंगे। तय कार्यक्रम के मुताबिक राष्ट्रपति 23 अक्टूबर तक अपने पैतृक गांव में रहेंगे। मुखर्जी अपने गांव में दुर्गापूजा में बतौर मुख्य पुजारी शामिल होंगे। प्रणब के करीबी लोग अंदाजा लगा रहे हैं कि शायद प्रणब खुद प्रोटोकॉल तोड़कर गांव वालों के बीच घुलेंगे मिलेंगे और पूजा करेंगे। प्रणब पश्चिम बंगाल के हैं और वहां दुर्गापूजा का अलग ही महत्‍व है। बंगाल की जया भादुड़ी बच्‍चन भी हैं और वह भी मुंबई में बंगाली अंदाज में ही दुर्गापूजा मनाती हैं। लेकिन इस बार वह ऐसा नहीं कर पाएंगी।
तनिक इस पर भी गौर करें!

महिषमर्दिनी ;बक्रेश्वरम्द्धण् अधि विकिपीडियाए एकः स्वतन्त्रविश्वविज्ञानकोशण् गम्यताम् अत्र रू पर्यटनम्ए अन्वेषणम्ण् महिषमर्दिनी ;बक्रेश्वरम्द्ध एतत् पीठं भारतस्य पश्चिमबङ्गालस्य बदहाममण्डले विद्यमानेषु शक्तिपीठेषु अन्यतमम् ।
दुर्गा पार्वती का दूसरा नाम है। हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है ;शाक्त साम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है । वेदों में तो दुर्गा का कोई ज़िक्र नहीं है, मगर उपनिषद में देवी उमा हैमवती ;उमा, हिमालय की पुत्रीद्ध का वर्णन है । पुराण में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है । दुर्गा असल में शिव की पत्नी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने लिया था .. इस तरह दुर्गा युद्ध की देवी हैं । देवी दुर्गा के स्वयं कई रूप हैं । मुख्य रूप उनका गौरी है, अर्थात शान्तमय, सुन्दर और गोरा रूप । उनका सबसे भयानक रूप काली है, अर्थात काला रूप । विभिन्न रूपों में दुर्गा भारत और नेपाल के कई मन्दिरों और तीर्थस्थानों में पूजी जाती हैं । कुछ दुर्गा मन्दिरों में पशुबलि भी चढ़ती है । भगवती दुर्गा की सवारी शेर है ।उग्रचण्डी दुर्गा का एक नाम है। दक्ष ने अपने यज्ञ में सभी देवताओं को बलि दीए लेकिन शिव और सती को बलि नहीं दी। इससे क्रुद्ध होकर, अपमान का प्रतिकार करने के लिए इन्होंने उग्रचंडी के रूप में अपने पिता के यज्ञ का विध्वंस किया था। इनके हाथों की संख्या १८ मानी जाती है। आश्विन महीने में कृष्णपक्ष की नवमी दिन शाक्तमतावलंबी विशेष रूप से उग्रचंडी की पूजा करते हैं।
बाजारविरोधी दीदी के मां माटी मानुष राज में बाजार बम बम है और चहुं दिशाओं में धर्मध्वजा लहरा रहे हैं।नवजागरण के समय से बंगाल में विज्ञान और प्रगति की चर्चा जारी है। नवजागरण के मसीहा जमींदारवर्ग से थे या फिर अंग्रेजी हुकूमत के खासमखास।ज्ञान तब भी कुलीन तबके से बाहर के लोगों के लिए वर्जित था। औद्योगिक क्रांति और पाश्चात्य शिक्षा के असर में विज्ञान और प्रगति का दायरा भी इसी वर्ग तक सीमित रहा। जैसा कि पूंजी और एकाधिकारवादी वर्चस्व के लिए विज्ञान और वैज्ञानिक आविष्कार अनिवार्य है ताकि उत्पादन प्रणाली में श्रम और श्रमिक की भूमिका सीमाबद्ध या अंततः समाप्त कर दी जाये। पर पूंजी और बाजार के लिए ज्ञान और विज्ञान को भी सत्तावर्ग तक सीमित करना वर्गीय हितों के मद्देनजर अहम है।ईश्वर , धर्म और आध्यात्मिकता कार्य परिणाम के तर्क और स्वतंत्र चिंतन का निषेध करती हैं, जिससे विरोध, प्रतिरोध  या बदलाव की तमाम संभावना शून्य हो जाती है। जर्मनी से अमेरिका गये आइन स्टीन को भी धर्मसभा में जाकर यहूदी और ईसाई, दोनों किस्म के सत्तवर्ग के मुताबिक धर्म और विज्ञान के अंतर्संबंध की व्याख्या करते हुए वैज्ञानिक शोध, आविष्कार और ज्ञान के लिए अवैज्ञानिक, अलौकिक प्रेरणा की बात कहनी पड़ी। बंगाल में ३५ साल के प्रगतिवादी वामपंथी शासन दरअसल बहुजनों, निनानब्वे फीसद जनता के बहिष्कार के सिद्धांत के मुताबिक ही जारी रहा। साम्यवाद की वैश्विक दृष्टि बंगाली ब्राह्मणवाद के माफिक बदल दी जाती रही।वाममोर्चा की सरकार​ब्राह्मणमोर्चा बनकर रह गयी। जो दुर्गोत्सव सामंतों और जमीदारों की कुलदेवियों की उपासना तक सीमाबद्ध था, प्रजाजनों पर अपने उत्कर्ष साबित करने काए वह सामंतों के अवसान और स्वदेशी आंदोलन के जरिये सार्वजनिक ही नहीं हो गया, क्रमशः बंगीय और भारतीय हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया। वाम शासन ने इसपर सांस्कृतिक मुलम्मा चढ़ाते हुए बंकिम की भारत माता और वंदेमातरम के हिंदुत्व का स्थानापन्न बना दिया। ममता राज में इसी बंगीय वर्चस्ववादी परंपरा की उत्कट अभिव्यक्ति देखी जा रही हैए जब दुर्गोत्सव के दरम्यान लगातार दस दिनों तक सरकारी दफ्तर बंद रहेंगे। सूचना कर्फ्यू के तहत चार दिनों के लिए कोई अखबार नहीं छपेगा और टीवी पर चौबीसों घंटा पूजा के बहाने बाजार का जयगान!
इतिहास की चर्चा करने वालों को बखूब मालूम होगा कि वैदीकी सभ्यता का बंगाल में कोई असर नहीं रहा है और न यहां वर्ण व्यवस्था का वजूद रहा है। ग्यरहवीं सदी तक बंगाल में बुद्धयुग रहा। सातवीं शताब्दी में गौड़ के राजा शशांक शाक्त थे। शाक्त और शैव दो मत प्राचीन बंगाल में प्रचलित थे, जो लोकधर्म के पर्याय हैं, और जिनका बाद में हिंदुत्वकरण है।डिसकवरी आफ इंडिया में नेहरू ने भी वर्ण व्यवस्था को आर्यों की अहिंसक रक्तहीन क्रांति माना और तमाम इतिहासकार इसके जरिये भारत के एकीकरण की बात करते हैं। वामपंथी नेता कामरेड​नंबूदरीपाद वर्ण व्यवस्था को आर्य सभ्यता की महान देन बताते थे। बंगाल में पाल वंश के पतन के बाद कन्नौज के ब्राह्मणों को बुलाकर सेनवंश के कर्नाटकी मूल के  राजा बल्लाल सेन ने ब्राह्ममी कर्मकांड और पद्धतियां लागू कीं। पर उनका शासलकाल खत्म होते न होते उनके पुत्र​लक्ष्मण सेन ने पठानों के आगे खुद को पराजित मानते हुए गौड़ छोड़कर भाग निकले। तो इस हिसाब से ब्राह्मणी तंत्र लागू करने के लिए बल्लालसेन के कार्यकाल के अलावा बाकी कुछ नहीं बचता। पठानों और मुगलों के शासनकाल में ब्राह्मण सत्ता वर्ग में शामिल होने की कवावद जरूर करते रहे। बंगाल में जो धर्मांतरण हुआए जाहिर है , वह बौद्ध जन समुदायों का ही । जो हिंदू हु, वे सीधे अछूत बना दिये गयेए सेन वंश के​दौरान। मुसलमान शासनकाल में इन अछूतों ने और जो बौद्ध हिंदुत्व को अपनाकर अछूत बनने को तैयार न थे, उन्होंने व्यापक पैमाने पर इस्लाम को कबूल कर लिया।हिंदू कर्मकांड के अधिष्ठाता विष्मु का तो मुसलमानों के आने से पहले नामोनिशान न था। इस्लामी शासनकाल में पांच​सौ साल पहले चैतन्य महाप्रभु के जरिए वैष्णव मत का प्रचलन हुआ और उनके खास अनुयायी नित्यानंद ने बंगाल की गैर हिंदू जनता​का वैष्णवीकरण किया। बंगाल ही नही, उत्तरप्रदेश, बिहार और पंजाब को छोड़कर बाकी भारत में तेरहवीं सदी से पहले वैदिकी सभ्यता का कोई खास असर नहीं था।व्ध्यि और अरावली के पार स्थानीय आदिवासी शासकों का क्षत्रियकरण के जरिए हिंदुत्व का परचम लहराया गया। लेकिन पूर्व और मध्य भारत में सत्रहवीं सदी तक अनार्य या फिर अछूत या पिछड़े शासकों का राज है। इसी अवधि को तम युग कहते हैंए जब महाराष्ट्र के जाधव शासकों और बंगाल के पाल राजाओं तक मैत्री संबंध थेए जब चर्या पद के जरिये भारतीय भाषाएं आकार ले रही थी।

आलोकसज्जा की आड़ में अंधकार के इस उत्सव में हम भी चार दिनों तक खामोश रहने को विवश हैं। घर का कम्प्यूटर खराब है और इन चार दिनों में बाहर जाकर काम करने के रास्ते बंद हैं। कहीं कुछ भी हो जाये, हम अपना मतामत दर्ज नहीं कर सकते। वैसे भी बंगाल में मीडिया को बाकी देश की सूचना देने की आदत नहीं है। नीति निर्धारण की किसी प्रक्रिया के बारे में पाठकों को अवगत कराने की जवाबदेही नहीं है। अर्थ व्यवस्था के खेल को बेनकाब करने के बजाय आर्थिक सुधारों के अंध समर्थन अंध राष्ट्रवाद के मार्फत करते रहने की अनवरत निरंतरता है।पार्टीबद्ध प्रतिबद्धता के साथ। अखबार छपें , न छपें, इससे शायद कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। कम से कम चार दिनों तक बलात्कार,​अपराध और राजनीतिक हिंसा की खबरों से निजात जरूर मिल जायेगी। दीदी खुद इल खबरों से परेशान हैं और जब तब मीडिया को नसीहत देते हुए धमकाती रहती हैं। उनका बस चले तो सरकार की आलोचना के तमाम उत्स ही खत्म कर दिये जायें। मजे की बात है कि​अखबारों के दफ्तरों में अवकाश नहीं होगा। पर संस्करण नहीं निकलेगा। पत्रकारं गैरपत्रकारों को आकस्मिक, अस्वस्थता या फिर अर्जित अवकाश लेकर सेवा की निरतंतरता बनाये रखनी होगी। प्रबंधन के मुताबिक वे अखबार बंद नहीं कर रहे हैं , बल्कि हाकरों ने अखबार उठाने से मना कर दिया है।जाहिर है कि इस पर ज्यादा बहसकरने की गुंजाइश नहीं है कि अचानक हाकर दुर्गोत्सव के दौरान अखबार उठाने से मना क्यों कर​रहे हैं और उनके पीछे कौन सी राजनीति है। पत्रकारों और गैरपत्रकारों के लिए वेतन बोर्ड की सिफारिशें लागू करने के लिए दीदी दिल्ली में आवाज बुलंद करने से पीछे नहीं हटतीं। पर राज्य में बाहैसियत मुख्यमंत्री मीडिया कर्मचारियों के हित में उन्होंने कोई कदम उठाया हो या वेतनमान लागू करने के लिए अखबार मालिकों से कहा होए ऐसा हमें नहीं मालूम है। जबकि अनेक अखबारों के कर्णधार उनके खासमखास हैं और कई संपादक​मालिक तो उनके सांसद भी हैं।कम से कम उन मीडिया हाउस में कर्मचरियों के लिए हालात बेहतर बनाने में उन्हें कोई रोक नहीं सकता।
-पलाश विश्वास

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

ममता, माओवाद और आतंक - 4

मसलन् माओवादी संगठन हिंसा ममता, माओवाद और आतंक के जरिए असुरक्षा का वातावरण बनाते हैं, और इस तरह वे पुलिसबलों को अत्याधुनिक हथियारों से लैस करने की जरूरत का एहसास तेज करते हैं। माओवादी या आतंकी हमलों के बाद यह माँग उठती रही है कि अत्याधुनिक हथियार खरीदे जाएँ, अत्याधुनिक संचारप्रणाली खरीदी जाए, पुलिसबलों को और भी सशस्त्र किया जाए। फलतः केन्द्र सरकार के विकासफंड का बहुत बड़ा हिस्सा सुरक्षामद में खर्च हो जाता है और देश में विकास के लिए पैसे का अभाव बना रहता है।
सामाजिक असुरक्षा और अस्थिरता का सब समय बने रहना, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए बेहद जरूरी है। इसे बहाना बनाकर हथियार और संचार उपकरण बेचने में उन्हें सुविधा होती है, वहीं दूसरी ओर केन्द्र सरकार को भी दबाव में रखने में मदद मिलती है। इस तरह के संगठनों के माध्यम से प्रच्छन्नतः ड्रग कार्टेल, शस्त्र निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियों, संचार कंपनियों को अपना कारोबार बढ़ाने में मदद मिलती है।
माओवादी विचारधारा के नाम पर जो संगठन सक्रिय हैं उनका माओ के विचारों से कोई लेना देना नहीं है। इस संदर्भ में उन्हें छद्म माओवादी कहना समीचीन होगा। माओवादी जिन इलाकों में रहते हैं वहाँ सामान्य जनजीवन ठप्प हो जाता है। वहाँ दहशत का माहौल रहता है। दहशत के माहौल में सबसे बड़ी क्षति लोकतंत्र की होती है। राजसत्ता और प्रशासनिक मशीनरी निष्क्रिय हो जाती है और ये चीजें बहुराष्ट्रीय निगमों के वैचारिक लक्ष्य को पूरा करने में मदद करती हैं। वे भारत में निष्क्रिय लोकतंत्र देखना चाहते हैं और माओवादी यह काम बड़े कौशल के साथ करते हैं।
यह अचानक नहीं है कि नव्य उदारीकरण के दौर में बहुराष्ट्रीय निगमों की शक्ति बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर माओवादियों की भी शक्ति में इजाफा हुआ है। केन्द्रीय गृहमंत्रालय की 2010 की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2001 में 54 जिलों में माओवादी सक्रिय थे आज 230 से ज्यादा जिलों में सक्रिय हैं। संक्षेप में हम माओवाद के मीडिया कवरेज को भी समझ लें।
माओवादी संगठनों के बारे में मीडिया में आने वाली सूचनाएँ हमें माओवाद के बारे में कम उनके हिंसाचार के बारे में ज्यादा जानकारी देती हैं। आधुनिक सूचना क्रांति की यह सामान्य विशेषता है कि वह सूचना का विभ्रम पैदा करती है।यह दावा किया जा रहा है कि सूचना के जरिए सब कुछ बताया जा सकता है। सूचना में सभी प्रश्नों के जबाव होते हैं। लेकिन प्रसिद्ध मीडिया विशेषज्ञ बौद्रिलार्द ने इस प्रसंग में लिखा है कि सूचनाओं से हमें ऐसे सवालों के जबाव मिलते हैं जो उठाए ही नहीं गए हैं। तथाकथित मीडिया क्रांति-नेट क्रांति आदि के माध्यम से आनेवाली माओवादी संगठनों की सूचनाएँ हमें माओवादी संगठनों से जुड़े बुनियादी सवालों या प्रासंगिक सवालों का कोई उत्तर नहीं देतीं।
माओवादियों की जो इमेज मीडिया में आई है उससे उनकी वास्तविक इमेज सामने नहीं आती बल्कि निर्मित इमेज सामने आती है। नकली इमेज सामने आती है। इन इमेजों से माओवाद का आख्यान समझ में नहीं आता। माओवादी हिंसा जब होती है तब ही मीडिया में माओवादी संगठनों की कोई खबर सामने आती है। इससे यही आभास मिलता है कि माओवादी हिंसक हैं।
हिंसा की इमेज असल में माओवाद का हाइपररीयल यथार्थ है इसका वास्तव में यथार्थ से अंशमात्र संबंध है। जिस तरह उपभोक्ता मालों के विज्ञापनों की इमेज देखकर, बाजार में भीड़ देखकर, दुकानों में ठसाठस भरे माल देखकर यह कहना कि भारत बहुत समृद्ध है, यहाँ मालों की कोई कमी नहीं है। यह बात हाइपररीयल है। इसका भारत के यथार्थ से कोई संबंध नहीं है।
मीडिया इमेजों में हमें हाइपररीयल और रीयल में अंतर पैदा करना चाहिए। अमूमन मीडिया में हाइपररीयल इमेजों की वर्षा होती है और इसके आधार पर यथार्थ के बारे में सही समझ बनाना संभव नहीं होता। बाजार में भीड़, क्रेताओं ने दुकानों को सब समय घेरा हुआ है, दुकान में माल भरे हैं, ये सारी चीजें यह सूचना नहीं देतीं कि भारत में चीजों का सरप्लस उत्पादन हो रहा है। इनसे यह भी पता नहीं चलता कि भारत के नागरिक की क्रयक्षमता क्या है?
उसी तरह भारत में माओवादी इमेजों में हाइपररीयल और रीयल में अंतर करने की जरूरत है। मीडिया में माओवादी हिंसा की जो इमेज दिखाई जाती है वह वास्तविक नहीं है बल्कि संकेत या प्रतीक या साइन मात्र के रूप में सामने आती है।
माओवादी संगठनों का सबसे ज्यादा विस्तार ऐसे समय में हुआ है जब दक्षिणपंथी भाजपा, दक्षिणपंथी मिलीटेंट और जातिवादी संगठनों की राजनैतिक शक्ति में सबसे ज्यादा इजाफा हुआ है। माओवादियों ने अपनी प्रमुख क्रीडास्थली के रूप में उन राज्यों में तेजी से विकास किया है जहाँ भाजपा का शासन है या भाजपा तेजी से मजबूत हुई है। पश्चिम बंगाल में भी ममता बनर्जी के राजनैतिक उदय के समय में माओवादी संगठनों की शक्ति में अभूतपूर्व विकास हुआ है।
अतिदक्षिणपंथ के मिलीटेंट राजनैतिक प्रत्युत्तर के रूप में माओवादी संगठनों ने अपील पैदा की है। खासकर बुद्धिजीवियों में अपील पैदा करने में उन्हें सफलता मिली है। आज के माओवादी हों या पुराने नक्सलवादी हों ,ये मूलतः अतिदक्षिणपंथी राजनीति के सिक्के के दूसरे पहलू का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस अर्थ में ये कारपोरेट राजनीति के एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यह भी कह सकते हैं कि माओवादी मूलतः अतिदक्षिणपंथी राजनीति की औलाद हैं। याद करें स्वतंत्र भारत में अतिदक्षिणपंथ का सबसे पहला आक्रामक उभार 60-70 के बीच में ही देखा गया और उस समय नक्सलबाड़ी हुआ। दूसरा बड़ा उभार रामजन्मभूमि आंदोलन के साथ पैदा हुआ और इसने भारत में दक्षिणपंथी राजनीति को सम्मानजनक स्थान दिला दिया।इसके समानान्तर माओवादी आतंक और विभिन्न किस्म के आतंकी संगठनों ने जन्म लिया।
माओवादी हिंसा की इमेज का मीडिया में प्रसारण उनके प्रति नफरत पैदा नहीं करता बल्कि उनके प्रति हमदर्दी पैदा करता है। हिंसा की इमेज के साथ यह प्रचारित किया जाता है कि जिस इलाके म हिंसा की घटना घटी है उस इलाके में सड़क नहीं है, पानी नहीं है, सामान्य नागरिक सुविधाएँ नहीं हैं। यानी माओवादी हिंसा की इमेज के साथ एक-दूसरे किस्म का विचार धारात्मक शोषण आरंभ हो जाता है जिसकी दर्शक ने कल्पना तक नहीं की थी, अब दर्शक को जिससे घृणा करनी चाहिए उससे वह प्रेम करने लगता है। इस अर्थ में माओवादी कवरेज माओवादियों के प्रति हमदर्दी पैदा करता है। यह कारपोरेट विचार धारा और माओवाद का प्रेम संबंध है। माओवादी हिंसा की इमेज में जो चीज सामने ज्यादा आती है वह है हिंसा से बड़ी राजसत्ता जनित हिंसा, जो उपेक्षा के गर्भ से पैदा होती है।
माओवादियों का अहर्निश हिंसा करना, अपने से भिन्न राजनीति करने वाले को कत्ल कर देने का भावबोध मूलतःधार्मिक उन्मादी (फैनेटिक) के भावबोध से मिलता-जुलता है। माओवादी कार्यकर्ता सीधे हिंसा करते हैं, निर्दोष लोगों को कत्ल करते हैं, उनको हीरो या नायक के रूप में माओवादी सम्मान देते हैं। यह वैसे ही है जैसे भिण्डरावाले या बिनलादेन को उनके भक्त पूजते हैं। यानी माओवादी हिंसा के कवरेज में मीडिया के चरित्र के कारण कातिल नायक हो जाता है और निर्दोष व्यक्ति जालिम या जुल्मी-शोषक-उत्पीड़क हो जाता है। यही वजह है कि माओवादी हिंसा का कवरेज उनके लिए मददगार साबित होता है।
प्रत्येक माओवादी हिंसा या कत्ल के बाद उनको समझना और भी मुश्किल हो जाता है। वे हिंसा करते हैं अपना संदेश देने के लिए, लेकिन उनका संदेश प्रत्येक हिंसा या कत्ल के बाद और भी जटिल हो जाता है। उन्होंने हिंसा क्यों की? उसके तर्क और भी मुश्किल क्यों होते चले जाते हैं? यह हिंसा अंततः नागरिक के चिंतन को कुंद करता है। वे हिंसा के जरिए माओवाद का प्रतीकात्मक विनिमय करते हैं। हिंसा उनकी राजनीति का अंतिम बिन्दु नहीं है बल्कि यहाँ से तो बात आगे जाती है। यानी माओवाद में कत्ल समापन नहीं है, नए के जन्म की सूचना नहीं है, बल्कि मौत या हिंसा या आतंक का विकास है। यह अनिश्चितता और सामाजिक असुरक्षा का विकास है।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो. 09331762368
समाप्त

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

ममता, माओवाद और आतंक -3

लालगढ़ में अभी जो ऑपरेशन चल रहा है वह केन्द्र सरकार के दबाव के कारण चल रहा है। केन्द्र का दबाव ही है जिसके कारण लालगढ़ से सैन्यबलों को हटाया नहीं गया है। माओवादियों ने ममता सरकार के पुनर्वास पैकेज की पूरी तरह उपेक्षा की है। उल्लेखनीय है कि माओवादियों के खिलाफ लालगढ़ इलाके में माकपा का एकमात्र सांगठनिक मोर्चा लगा हुआ था और माकपा अपने सक्रिय सदस्यों के जरिए आम लोगों को संगठित करके माओवाद विरोधी जनमत तैयार कर रही थी और दूसरी ओर सशस्त्र बलों की भी लोकल ताकत के रूप में मदद कर रही थी।
लेकिन ममता सरकार आने के बाद सशस्त्र बलों का माकपा को सहयोग मिलना बंद हो गया और राज्य सरकार ने विभिन्न किस्म के झूठे मुकदमों में माकपा के कार्यकर्ताओं को फँसाना आरंभ कर दिया और स्थानीय स्तर पर माकपा कार्यकर्ताओं और हमदर्दों को लालगढ़ इलाक़ा छोड़ने के लिए मजबूर किया और इसका माओवादियों को सीधे लाभ मिला। लालगढ़ इलाके में अन्य किसी दल के पास माओवादियों से लड़ने की सांगठनिक क्षमता नहीं है। ऐसे में ममता बनर्जी सरकार का माकपा पर किया गया हमला मूलतः माओवादियों के लिए एक तरह से खुली छूट की सूचना थी कि वे अब लालगढ़ में मनमानी कर सकते हैं।
माओवादियों ने इस मौके का लाभ उठाया और दुकानदारों से लेकर मकानमालिकों-किराएदारों और सरकारी नौकरों तक सबसे रंगदारी हफ्ता वसूली का धंधा तेज कर दिया है। वे लालगढ़ में प्रतिमाह दो करोड़ रूपये से ज्यादा चैथ वसूली कर रहे हैं। चैथ वसूली करने वालों के खिलाफ यदि कोई व्यक्ति पुलिस में शिकायत करने जाता है तो उसकी शिकायतदर्ज ही नहीं की जाती है और उलटे पुलिसवाले माओवादी आतंक से परेशानी की अपनी दास्तानें सुनाने लगते हैं।
ममता सरकार के आने के बाद केन्द्र-राज्य सरकार की संयुक्त कमान में चल रहा संयुक्त अभियान कमजोर हुआ है। जबकि वामशासन में लालगढ़ इलाके से माओवादियों को पूरी तरह खदेड़ दिया गया था और कई दर्जन माओवादी गिरफ्तार किए गए थे। लेकिन ममता सरकार आने के बाद किसी भी माओवादी को सशस्त्रबलों ने पकड़ा नहीं है,उलटे राज्य सरकार गिरफ्तार माओवादियों को रिहा करने का मन बना चुकी है। संयोग की बात है कि केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् ने ममता बनर्जी से साफ कहा है कि किसी भी माओवादी को रिहा नहीं किया जाना चाहिए।
सवाल यह है कि माओवाद की समस्या का समाधान क्या है? यह एक खुला सच है कि माओवाद की समस्या उन इलाकों में ज्यादा है जहाँ पुलिस थानों की संख्या कम है, थानों में पर्याप्त पुलिस नहीं है। सामान्य पुलिस व्यवस्था का जहाँ अभाव है वहाँ पर माओवादी जल्दी अपनी गतिविधियाँ संगठित करते हैं। माओवाद से लड़ने के लिए पुलिस व्यवस्था के विकास, थानों में पर्याप्त पुलिसकर्मी नियुक्त करने, थानों के अपग्रेडेशन की जरूरत है, इसके अलावा पुलिसकर्मियों को चुस्त-दुरूस्त बनाए जाने की भी सख्त जरूरत है। इसके अलावा माओवाद और विभिन्न किस्म के आतंकी संगठनों से निबटने के लिए माओवाद प्रभावित इलाकों में विशेषदलों की पर्याप्त मात्रा में समान रूप से नियुक्ति करने की जरूरत है।
भारत के प्रसिद्ध सुरक्षा विशेषज्ञ अजय साहनी के अनुसार माओवाद प्रभावित जिलों में आज तकरीबन 70 बटालियन नियुक्त करने की जरूरत है। एक बटालियन में 400 सैनिक होते हैं। साहनी का मानना है कि किसी एक इलाके में सैन्यबलों की खास मौजूदगी देखकर माओवादी उस इलाके से निकलकर अन्य कम पुलिसवाले इलाकों में चले जाते हैं। अतः माओवाद प्रभावित इलाकों में स्थाई तौर पर 28 हजार सैन्यबलों को नियुक्त किया जाना चाहिए और यह काम दीर्घ कालिक (मियादी) होना चाहिए। माओवाद से दीर्घ कालिक (मियादी) योजना बनाकर ही लड़ा जा सकता है। इस समस्या का समाधान यह नहीं है कि माओवाद प्रभावित इलाकों में विकास के कार्यक्रम लागू कर दिए जाएँ। विकास को माओवादविरोधी रणनीति के रूप में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए बल्कि विकास को निरंतर चलने वाली सामान्य प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
माओवाद का समाधान विकास नहीं है। माओवाद का समाधान पुलिस एक्शन भी नहीं है। विकास को निरंतर जारी प्रक्रिया के रूप में लिया जाना चाहिए, दूसरा, माओवाद प्रभावित इलाकों में थानों को चुस्त बनाया जाना चाहिए। सामान्य तौर पर थानों में पर्याप्त पुलिस बलों की मौजूदगी और विशेषबलों द्वारा तुरंत, प्रभावशाली एक्शन लेने की मनोदशा तैयार करने की जरूरत है और इस काम को दलीय स्वार्थ से मुक्त होकर करना चाहिए।
कुछ विशेषज्ञ तर्क दे रहे हैं कि माओवादियों के सक्रिय होने का प्रधान कारण यह है कि नव्य आर्थिक उदारीकरण के कारण बड़े पैमाने पर देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों को जमीनें दी गई हैं और इसके कारण ही माओवादी संगठनों को इन इलाकों में अपना जाल फैलाने का अवसर मिला। यह तर्क एब्सर्ड है। माओवादी पहले से हैं और उन्हें हम नक्सल नाम से जानते हैं। नेपाल में विदेशी कपनियों का कोई पैसा नहीं लगा है फिर वहाँ माओवादी संगठनों ने व्यापक जनाधार कैसे बना लिया?
गरीबी, विकास का अभाव, बहुराष्ट्रीय निगमों या करपोरेट घरानों के हाथों में बड़े पैमाने पर आदिवासियों की जमीन के स्वामित्व के कारण माओवादी संगठनों का प्रसार नहीं हुआ है। इसका प्रधान कारण है
मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के लोगों का किसान, आदिवासी आदि के प्रति रोमैंटिक क्रांतिकारी नजरिया। दूसरा प्रधान कारण है माओवादी संगठनों का अवैध धंधों, जैसे फिरौती वसूली, तस्करी, ड्रग स्मगलिंग,
अवैध हथियारों की खरीद-फरोख्त के ग्लोबल नेटवर्कों के साथ साझेदारी और मित्रता। खासकर बहुराष्ट्रीय शस्त्रनिर्माता कंपनियों के हितों के विकास के लिए काम करना।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो. 09331762368
क्रमश:

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

ममता, माओवाद और आतंक -2

ये वे लोग हैं जो वाम शासन में भूमिसुधार कार्यक्रम लागू किए जाने के बाद से विगत 20 सालों से भी ज्यादा समय से इस जमीन पर खेती, मछली पालन आदि कर रहे थे। लेकिन राज्य विधानसभा चुनावों में वाममोर्चे की हार के बाद अचानक इन लोगों पर तृणमूल कांग्रेस और भूस्वामियों के गुण्डों के हमले बढ़ गए। जिन किसानों पर हमले किए गए उनके पास वैध पट्टे थे।
इन हमलों में टेंटुलिया मौजा में 1263 बीघा, बातारगाछी में 800 बीघा, मुन्शीर घेरी में 1200 बीघा और नेबुतला में 2800 बीघा जमीन पर गुण्डों ने कब्जा कर लिया और पट्टादार किसानों को बेदखल कर दिया और पूरे इलाके में आतंकराज कायम कर दिया । टेंटुलिया में पूर्व वाम शासन के तहत भूमिसुधार के लिए अधिगृहीत 508 बीघा जमीन को 1205 किसानों में बाँटा गया था। इसके अलावा यहीं पर 755 बीघा जमीन और है जोअदालती मुकदमों में फँसी हुई थी और इसीलिए इस जमीन के औपचारिक पट्टे नहीं दिए जा सके थे। बहरहाल 2000 किसान इन जमीनों पर खेती कर रहे थे और सुप्रीम कोर्ट ने भी यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। लेकिन इस जमीन पर खेती कर रहे तीन हजार किसानों पर तृणमूली गुण्डों ने हमले किए और उनको इस जमीन से बेदखल कर दिया।
उल्लेखनीय है हरोआ एक जमाने में सामंती भूस्वामियों का मजबूत गढ़ हुआ करता था। लंबे किसान आंदोलन के बाद इस इलाके में वाममोर्चा सरकार भूमि
सुधारों को लागू कर पाई थी। भूस्वामियों ने अपनी पुरानी जमीन को हथियाने के लिए दो स्तरों पर हमले आरंभ किए हैं। पहले स्तर पर सीधे माकपा के कार्यकर्ताओं और हमदर्दों को निशाना बनाया जा रहा है, उन्हें डरा-धमकाकर इलाका छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जो घर-द्वार छोड़कर नहीं जाना चाहते उन्हें सीधे झूठे मुकदमों में फँसाकर पुलिस ने गिरफ्तार किया है। इस योजना में तथाकथित हथियारों की तलाशी के नाम पर झूठे केस बनाकर गिरफ्तारियाँ की जा रही हैं।
हरोआ के अलावा वीरभूमि, नानुर, दुबराजपुर, इलमबाजार, बाकुंडा के कोतुलपुर,इंदपुर, मेदिनीपुर के कांथी, नंदीग्राम, खेजुरी, भगवानपुर, पाताशपुर, एगरा, हुगली के पुरशुरा, खानकुल, धनियाखाली आदि में बड़े पैमाने पर किसानों को बेदखल किया गया है। इसी तरह वर्द्धवान जिले के कमरकाटी इलाके में 2200 किसान परिवारों की 1200 बीघा जमीन छीनी गई है। दूसरी ओर किसान सभा के नेतृत्व में पुनः नए सिरे से किसानों ने अपने को एकजुट किया और 1200 बीघा जमीन में से 700 बीघा पर फिर से अपना कब्जा जमा लिया। उसी तरह हरोआ में भी किसानों ने अपनी जमीन पर कब्जा करने के लिए सशस्त्र आंदोलन किया और तृणमूली गुण्डों और भूस्वामियों को जमीन छोड़कर भागने को मजबूर किया।
ममता सरकार आने के साथ ही लालगढ़ इलाके में माओवादियों के खिलाफ चल रहा सशस्त्र सैन्यबलों का ऑपरेशन बिना कहे ढीला कर दिया गया और इस बीच में माओवादियों ने जो इलाके सैन्यबलों के ऑपरेशन के कारण खोए थे उन पर पुनः कब्जा जमा लिया। लालगढ़ में चल रहा माओवाद विरोधी ऑपरेशन केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के संयुक्त कमान के तहत चलाया जा रहा है, लेकिन ममता बनर्जी ने अपने माओवादी प्रेम के चलते इस ऑपरेशन को ठंडा कर दिया और विगत 5 महीनों में पुनः आतंक का राज कायम कर लिया, अपने खोए हुए इलाकों पर पुनः कब्जा जमा लिया, ममता सरकार से मित्र संबंध के बावजूद एक भी माओवादी ने न तो समर्पण किया और न ही माओवादियों ने लालगढ़ में आतंक और हत्या की राजनीति को बंद किया।
इसके विपरीत स्थिति यह है कि लालगढ़ में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर भी माओवादियों के कातिलाना हमले हो रहे हैं। किसी भी दल को लालगढ़ में काम करने की मनाही है और इस इलाके में माओवादियों ने जबरिया धन वसूली का
धंधा तेज कर दिया है। पहले माओवादियों ने माकपा के 270 से ज्यादा सदस्यों की हत्या की और उनके आतंक के कारण सैंकड़ों लोग आज भी लालगढ़ से बाहर रह रहे हैं।
ममता सरकार ने यह मान लिया था कि वह विधानसभा चुनाव जीतने के चंद घंटों में माओवादी हिंसा को बंद कर देगी। लेकिन माओवादियों ने हिंसा और तेज कर दी और सीधे तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेताओं को सरेआम कत्ल करके मौत के घाट उतार दिया।
हाल में ममता बनर्जी सरकार को केन्द्र सरकार ने हिदायत दी है कि किसी भी माओवादी नेता या कार्यकर्ता को छोड़ा न जाए। दूसरी हिदायत यह दी है कि लालगढ़ में सैन्यबलों का ऑपरेशन तेज किया जाए। फलतः ममता सरकार को मजबूर होकर माओवादियों के खिलाफ अभियान चलाना पड़ रहा है।
उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव जीतने के पहले बार-बार यह कहती रही हैं कि लालगढ़ में माओवादी नहीं हैं वहाँ तो माकपा की हरमदवाहिनी हमले कर रही है। ममता बनर्जी लंबे समय से पश्चिम बंगाल में खासकर लालगढ़ में माओवादियों की मौजूदगी को अस्वीकार करती रही हैं। इसके पीछे साफ कारण था कि वे माओवादियों के साथ साँठ-गाँठ करके किसी तरह चुनाव जीतना चाहती थीं और इसके लिए वे एकसिरे से झूठ बोलती रही हैं। अभी भी वास्तविकता यह है कि वे खुलकर माओवादियों के खिलाफ सक्रिय रूप से एक्शन नहीं ले रही हैं। पिछले दरवाजे से अपने हमदर्दों और मानवाधिकार कर्मियों के जरिए माओवादियों से मधुर
संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो. 09331762368
क्रमश:

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

ममता, माओवाद और आतंक -1

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार को शासन में आए 6 माह हो चुके हैं। इन छह महीनों में अनेक चीजें बदली हैं। सामान्यतौर पर जिस लोकतांत्रिक माहौल के लौटकर आने की कल्पना की जा रही थी उसकी आशाएँ धूमिल हुई हैं। किसानों, मजदूरों, छात्रों और आदिवासियों पर राज्य सरकार, तृणमूल कांग्रेस और माओवादियों के हमलों में इजाफा हुआ है। साथ ही कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण छात्र विरोधी फैसला दिया है। इस फैसले के अनुसार कोई भी स्कूली छात्र, स्कूल समय में किसी भी किस्म की रैली-जुलूस आदि में भाग नहीं ले सकता। यदि वह ऐसा करता है तो यह अवैध होगा। जबकि पश्चिम बंगाल में उच्च माध्यमिक और माध्यमिक स्कूलों में लोकतांत्रिक ढ़ंग से चुने हुए छात्रसंघ हैं और इनमें अधिकांश पर वाम छात्र संगठनों का कब्जा है।
ममता सरकार आने के बाद तकरीबन 50 हजार से ज्यादा वाम कार्यकर्ताओं को अपने इलाके छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है। विभिन्न जिलों में अब तक तीन करोड़ रूपये से ज्यादा का रंगदारी भत्ता तृणमूल कांग्रेस के गुण्डों ने वाम कार्यकर्ताओं और समर्थकों से जबरिया वसूला है। तृणमूल कांग्रेस के गुण्डों ने 150 से ज्यादा माकपा कार्यालयों, 450 से ज्यादा ट्रेड यूनियनों और जनसंगठनों के दफ्तरों पर अवैध कब्जा कर लिया है। तृणमूली गुण्डों के जरिए वाम दलों के सदस्यों-हमदर्दों को कहा जा रहा है कि वे यदि अपने घर या इलाके में रहना चाहते हैं तो अपनी राजनैतिक वफादारी बदलें वरना वे इलाके में नहीं रह पाएँगे। दूसरी ओर शहरी इलाकों में झुग्गी-झोपडि़यों में रहने वाले वाम समर्थकों पर बड़े पैमाने पर हमले हो रहे हैं और उनको वामदलों का साथ छोड़ने के लिए दबाव डाला जा रहा है।
राज्य में इस तरह का आतंकराज लोग पहली बार नहीं देख रहे हैं बल्कि इस तरह की घटनाएँ 1971-1977 के बीच में देख चुके हैं। आम लोगों में जो लोग 1977 के बाद जन्मे हैं उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि 71-77 के बीच का आतंकराज कैसा था? ममता बनर्जी की राजनैतिक शिक्षा उसी दौर में हुई है और उनको आतंक की राजनीति का गहरा अनुभव है।
आश्चर्य की बात है कि इस समय ममता बनर्जी के साथ माओवादियों की सहानुभूति और समर्थन है। जबकि 71-77 के बीच में कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के शासन में सैकड़ों नक्सली पुलिस की गोलियों के शिकार बने। लेकिन इसबार नक्सलियों और माओवादियों ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस के संयुक्त गठबंधन को जिताने के लिए काम किया और एक पूर्व नक्सल नेता को ममता सरकार में श्रममंत्री बनाया गया है। रोचक बात यह है कि ममता सरकार नव्य-उदारीकरण के पक्ष में है और माओवादी-नक्सल और तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवी महाश्वेता देवी के नेतृत्व में ममता सरकार की प्रत्येक नीति को समर्थन दे रहे हैं। नव्य-आर्थिक उदारीकरण के मार्ग पर जाने का विगत वाममोर्चा सरकार का फैसला मौजूदा सरकार ईमानदारी से लागू कर रही है।
पहले विभिन्न इलाकों में माकपा के आतंक की खबरें आ रही थीं लेकिन नई सरकार आने के बाद गुण्डों की टोलियों ने माकपा का साथ छोड़कर ममता बनर्जी की शरण ले ली है और राज्य के विभिन्न इलाकों में आतंक की घटनाएँ आम हो गई हैं। इस तरह की घटनाओं की खबर सुनकर किसी को आश्चर्य नहीं होता।
पश्चिम बंगाल में राजनैतिक आतंक एक आम फिनोमिना है। आम लोग राजनैतिक सत्ता परिवर्तन के बाद राजनैतिक आतंक को लेकर गुस्से में कम हैं, इसके विपरीत आतंक के प्रति सहिष्णुताभरा व्यवहार कर रहे हैं। आतंक देख रहे हैं, लेकिन चुप हैं। मीडिया भी आतंक देख रहा है लेकिन चुप है।
दूसरी बात यह कि ममता बनर्जी को राज्य सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं है और यह अनुभवहीनता उनके सभी फैसलों में साफ झलकती है। दूसरी सबसे बड़ी समस्या है विगत वाम मोर्चा सरकार से भिन्न किस्म की कार्यप्रणाली और नीतियों को पेश करने में वे अभी तक सफल नहीं रही हैं। विधानसभा चुनाव के समय वे वाममोर्चा से भिन्न लोकतांत्रिक शासन प्रणाली देने का वायदा करके जीती हैं। आम लोगों में उनकी जनप्रिय इमेज भी है लेकिन राज्य प्रशासन में दलीय प्रतिबद्धता के आधार पर काम करने की जो बीमारी वाम शासन के दौरान घुस गई थी वह अभी तक बरकरार है। योग्यता, पेशेवर क्षमता, निष्पक्षता और सक्रियता के आधार पर फैसले कम और दलीय पक्षधरता के आधार पर फैसले ज्यादा लिए जा रहे हैं।
दूसरा एक बड़ा परिवर्तन यह आया है कि राज्य में बड़े किसान या पुराने जमींदार जो वाम शासन में हाशिए पर थे वे नए सिरे से आक्रामक हो उठे हैं, अपनी पुरानी जमीनों के स्वामित्व को जोर-जबरदस्ती और सरकारी मदद से हासिल करना चाहते हैं और गाँवों में बरगादार किसानों पर हमले तेज हो गए हैं। मीडिया और राज्य प्रशासन इस तरह के विवादों को जमीन हड़पने के मामले के बजाय माकपा बनाम तृणमूल की दलीय लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है।
पश्चिम बंगाल में ममता सरकार आने के बाद से वामदलों और खासकर माकपा के कार्यकर्ताओं पर हमले तेज हुए हैं, तकरीबन 50 हजार लोग विस्थापित होकर अपने गाँव के बाहर अन्यत्र शिविरों में, मित्रों और रिश्तेदारों के यहाँ रह रहे हैं। सैंकड़ों कार्यकर्ताओं पर फर्जी मुकदमे दायर करके गिरफ्तार किया गया है। तकरीबन 1200 से ज्यादा माकपा कार्यकर्ताओं को राज्य प्रशासन विभिन्न किस्म के झूठे मुकदमों में फँसा चुका है। इस माहौल में वामदलों को अपनी एकजुटता का इजहार करके नए सिरे से उनका विश्वास जीतना होगा। इस प्रसंग में उत्तर चैबीस परगना के हरोआ इलाके की घटना का जिक्र करना बेहद जरूरी है। इस इलाके में जुलाई के प्रथम सप्ताह में तृणमूल कांग्रेस और भूस्वामियों ने स्थानीय प्रशासन की मदद से तकरीबन दस हजार किसानों को 7063 बीघा जमीन से बेदखल कर दिया । (एक एकड़ में तीन बीघे होते हैं।)।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो. 09331762368
क्रमश:

शुक्रवार, 17 जून 2011

वाम की पराजय और बुद्धिजीवियों की भूमिका

पश्चिम बंगाल में इस बार विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चा बुरी तरह हार गया। देशभर में इस पराजय को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है। ज्यादातर लोग जो पश्चिम बंगाल के बाहर रहते हैं वे इस पराजय को सही ढंग से समझ नहीं पा रहे हैं। स्वयं वामपंथी संगठनों में विभ्रम की स्थिति है। कायदे से इस पराजय का वामदलों को गंभीरता के साथ मूल्यांकन करना चाहिए। पहली बार ऐसा हुआ है कि पूरे राज्य में चुनाव के दौरान हिंसा की इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़कर मतदान पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा है। यह स्वयं में इस बात का संकेत है कि 34 सालों के वामशासन में कानून-व्यवस्था की स्थिति किस तरह खराब हुई है।
पश्चिम बंगाल में जब प्रचार कार्य प्रारम्भ हुआ था तो यह साफ लग रहा था कि इस बार वाम मोर्चा चुनाव नहीं जीत पाएगा। आम जनता तकरीबन मन बना चुकी थी । परिवर्तन का नारा आम लोगों के दिलो-दिमाग में बैठ गया था। आम लोगों में वामदलों की साख गिरी है। दूसरी ओर मीडिया का चौतरफा वाम विरोधी प्रचार अभियान चल रहा है। सन् 2009 के लोकसभा चुनाव की तुलना में वाम का जनाधार और भी घटा है।
सवाल उठता है कि इतनी बुरी तरह वाम मोर्चा पराजित क्यों हुआ? इसका प्रधान कारण है वामदलों का सच न बोल पाना। वामदलों की कार्यप्रणाली में असत्य घुस आया है। पार्टी और प्रशासन की कार्यप्रणाली में असत्य का वर्चस्व इस कदर बढ़ गया कि सही और गलत में अंतर खत्म हो गया है। सन् 2006 में वाम मोर्चे ने उन्नत वाम मोर्चा के नारे के आधार पर विधानसभा चुनाव जीता था और उस समय तीन-चैथाई बहुमत हासिल किया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद पार्टी और प्रशासन में बनी हुई गड़बडि़यों को दुरूस्त करने के बजाय राज्य प्रशासन को पार्टी वर्चस्व के मातहत कर दिया गया । प्रशासनिक निष्पक्षता खत्म हो गई। प्रशासन पंगु होकर रह गया। प्रशासनिक निष्पक्षता, सक्रियता, संवाद और पारदर्शिता का अभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता चला गया। राज्य में धीरे-धीरे आलोचनात्मक लोकतांत्रिक सामाजिक परिवेश संकुचित होता चला गया और आज स्थिति इस कदर भयावह हो उठी है कि वामपंथी कतारों में दरारें आ गई हैं। वामपंथ के प्रति आस्थाएँ डगमगाने लगी हैं। जो वामपंथी हैं वे शर्मिन्दगी महसूस करने लगे हैं। सन् 2006 में विधानसभा चुनाव के मौके पर जो वायदे किए गए उनमें से एक भी वायदा वाम सरकार पूरा नहीं कर पाई। सन् 2006 की जीत ने वामदलों में अहंकार पैदा किया और आम जनता के साथ अलगाव बढ़ता चला गया।
पिछले दिनों अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तरह 4 दिन आमरण अनशन किया और उसका अहर्निश टीवी चैनलों से व्यापक प्रचार हुआ उसने वामदलों के भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बना दिया। इस बार के
विधानसभा चुनाव में वामदलों के लिए भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं था। वे ममता बनर्जी के रेल मंत्रालय की अक्षमताओं का ही रोना रोते रहे। जबकि रेल मंत्रालय का राज्य से कोई लेना-देना नहीं था। इसके विपरीत ममता बनर्जी ने वामदलों और खासकर सी0पी0आई0एम0 के भ्रष्टाचार को व्यापक मुद्दा बनाया। कम्युनिस्ट भ्रष्ट होते हैं यह बात आम लोगों के मन में बिठाने में वे सफल रही हैं। माकपा के भ्रष्ट कैडर, दबंगई और उत्पीड़न को व्यापक कवरेज के साथ पेश किया। फलतः अन्य सभी मसले हाशिए पर चले गए। विगत 34 सालों में देश के अन्य शहरों में जिस तरह के तेज परिवर्तन घटित हुए हैं, विकास हुआ है, वैसे परिवर्तन पश्चिम बंगाल में दूर-दूर तक नजर नहीं आते। एक अच्छे प्रशासन का आदर्श नमूना पेश करने में राज्य प्रशासन असफल रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, परिवहन, बिजली, पानी आदि के क्षेत्र में लगातार गिरावट आई है। राज्य का प्रत्येक क्षेत्र में स्तर गिरा है। यह स्थिति तब हुई है जब वाममोर्चे को तकरीबन दो-तिहाई बहुमत से शासन का अवसर मिला था। आर्थिक तौर पर राज्य के माली हालात ठीक नहीं हैं। ऐसी स्थिति में आम लोगों और बुद्धिजीवियों में असंतोष का फूट पड़ना स्वाभाविक है।
हमारे यहाँ जनतंत्र है, पार्टीतंत्र नहीं है। समाज को पार्टीतंत्र के आधार पर चलाने का खामियाजा सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी भोग रही है। वहाँ पर कम्युनिस्ट पार्टी को अब कोई देखना पसंद नहीं करता। सोवियत संघ में कोई प्रतिवादी जन आन्दोलन नहीं था और कम्युनिस्ट पार्टी अपने ही अन्तर्विरोधों और आपसी कलह में खत्म हो गई। पार्टी को बुनियादी तौर पर अपने दल के वर्चस्व के बजाय संविधान के अनुसार निष्पक्ष प्रशासन संचालन के तंत्र को विकसित करना चाहिए। आज स्थिति यह है कि जो व्यक्ति पार्टी के साथ नहीं है अथवा पार्टी के इशारे पर काम नहीं करता उसको तरह-तरह से अपमानित और उपेक्षित किया जाता है। सामाजिक अछूत की तरह उससे व्यवहार किया जाता है। यह फासीवादी कार्यप्रणाली का संकेत है।
वाममोर्चे और खासकर मा0क0पा0 को अपनी असफलता के लिए बहाने नहीं खोजने चाहिए। माकपा की सबसे बड़ी कमजोरी है जनतंत्र को आत्मसात न कर पाना। जनतंत्र का वे इस्तेमाल और सत्ता प्राप्ति के लिए दुरूपयोग करना जानते हैं किंतु लोकतांत्रिक व्यवहार, कार्यपद्धति, मूल्यों और संरचनाओं को वे अपने व्यवहार में लागू करने में असफल रहे हैं। पार्टी की कतारों में ऊपर से नीचे तक असहिष्णुता, संवेदनहीनता और स्वैराचार बढ़ा है। मसलन् सूचना अधिकार कानून के तहत कोई भी सूचना राज्य का कोई भी विभाग मुहैय्या नहीं कराता। पार्टी आदेश के बिना थानों में एफ0आई0आर0 तक दर्ज नहीं होती।
वाम मोर्चे की पराजय के कारणों को लेकर वामदलों को तदर्थ ढ़ंग से निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए। साथ ही स्टीरियोटाइप समीक्षा और मुहावरों में सोचना बंद कर देना चाहिए। मसलन्, जनता से वाम मोर्चा कट गया था, यह स्टीरियोटाइप कथन है, वे कौन से कारण और घटनाएँ हैं जिनके कारण जनता से अलगाव पैदा हुआ? वे कौन सी गलतियाँ हैं और वे कौन लोग हैं जिनकी कार्यप्रणाली ने वाम मोर्चे को आम जनता से काट दिया, इन सबकी पहचान की जानी चाहिए। ममता बनर्जी की जीत साधारण जीत नहीं है। इससे कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए गंभीर परिणाम निकल सकते हैं। पश्चिम बंगाल में मा0क0पा0 यदि तदर्थ ढंग से सोचती है और पराजय के सतही निष्कर्ष निकालती है तो यह कम्युनिस्ट आंदोलन की कु-सेवा होगी। गाँवों में वाम मोर्चे की पराजय के पीछे दो बड़े कारण हैं, पहला, विकास योजनाओं का आधे-अधूरेमन से क्रियान्वयन । दूसरा, गाँवों में कंगारू अदालतों की मानवाधिकार हनन की बढ़ती हुई घटनाएँ और पार्टी की दबंगई का आतंक। इन दो घटनाओं ने गाँवों में वाम मोर्चे को व्यापक क्षति पहुँचाई है। बुनियादी तौर पर वाम मोर्चा विगत 34 सालों में मानवाधिकारचेतना पैदा करने में असफल रहा और आम जीवन में नागरिक अधिकारों को उसने राजनैतिक बहस का मुद्दा ही नहीं बनने दिया। मानवाधिकारों की अवज्ञा में राज्य प्रशासन और पार्टीतंत्र जिस तरह सक्रिय रहा है उसने राज्य में कम्युनिस्ट आंदोलन के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। कम्युनिस्ट आंदोलन के भारत में प्रसार के लिए जरूरी है कि कम्युनिस्ट पार्टियाँ यह महसूस करें और मानें कि भारत में लोकतंत्र है और लोकतांत्रिक संस्थानों में व्यक्तिगत पहलकदमी और
मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता बेहद जरूरी है। पश्चिम बंगाल में 34 साल एक छत्र शासन करने के बाद भी मा0क0पा0 और अन्य वामदलों में मानवाधिकारों के प्रति सचेतनता नहीं बढ़ी है। नागरिक समाज के मुद्दे केन्द्र में नहीं आ पाए हैं। पुराने समाजवादी ढंग से देखने और सोचने का तरीका नहीं बदला है। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में 34 साल तक शासन करने के बाद भी वामदल अपनी न्यूनतम लोकतांत्रिक साख नहीं बचा पाए हैं। इसी प्रसंग में वामपंथी बुद्धिजीवियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वामपंथी बुद्धिजीवियों को पार्टी नीतियों की रक्षा के नाम पर असत्य बोलने से बचना चाहिए।
बुद्धिजीवी सत्य भक्त होता है। राष्ट्र, राष्ट्रीयता, दल, विचारधारा आदि का भक्त नहीं होता। सत्य के प्रति आग्रह उसे ज्यादा से ज्यादा मानवीय और संवेदनशील बनाता है। सत्य और मानवता की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया में तपकर ही बुद्धिजीवी अपने सामाजिक अनुभवों को सृजित करता है। कालजयी रचनाएँ दे पाता है। जनता के बृहत्तर तबकों की सेवा कर पाता है, सारे समाज का सिरमौर बनता है।
बुद्धिजीवी गतिशील और सर्जक होता है। वह मानवीय चेतना का रचयिता है। बुद्धिजीवी स्वभावतः लोकतांत्रिक होता है, लोकतंत्र ही उसकी आत्मा है। लोकतंत्र की आत्मा के बिना बुद्धिजीवी होना संभव नहीं है। लोकतंत्र के उसूलों के साथ समझौता करना उसकी प्रकृति के विरुद्ध है। लोकतांत्रिक मूल्य, लोकतांत्रिक संविधान, लोकतांत्रिक संरचनाओं में उसकी आस्था और विश्वास ही उसकी सम्पदा है यदि वह इनमें से किसी के भी साथ दगाबाजी करता है अथवा लोकतंत्र के रास्ते से जरा भी विचलित होता है तो उसे गंभीर कष्ट उठाने पड़ते हैं। साथ ही समाज को भी कष्ट उठाने पड़ते हैं। बुद्धिजीवी का सत्य के साथ किया गया समझौता सामाजिक दगाबाजी है।
यह दुर्भाग्य है कि हम दगाबाज बुद्धिजीवी और ईमानदार बुद्धिजीवी में अंतर भूल गए हैं। ईमानदार बुद्धिजीवी वह है जो अपने अंदर के सत्य और न्यायबोध को बेधड़क, निस्संकोच भाव से व्यक्त करता है। यह ऐसा बुद्धिजीवी है जो अपने सत्य को अर्जित करने के लिए किसी भी किस्म के भौतिक लाभ के जंजाल में नहीं फँसता। किसी भी किस्म का प्रलोभन उसे सत्य की अभिव्यक्ति से रोकता नहीं है, वह निडर भाव से न्याय के पक्ष में खड़ा रहता है। अपने जीवन के व्यावहारिक कार्यों की पूर्ति के लिए सत्य का दुरुपयोग नहीं करता। सत्य के लिए जोखिम उठाता है, सत्य पर दाँव लगाता है, यहाँ तक कि सत्य के लिए बलि चढ़ जाता है। तरह-तरह के उत्पीड़न और उपेक्षाओं को सहता है। वह हमेशा राज्य के विपक्ष में रहता है और यथास्थितिवाद का विरोध करता है।
यह सच है कि किसी भी किस्म का बड़ा परिवर्तन अथवा क्रांति बगैर बुद्धिजीवियों के हस्तक्षेप के नहीं हुई है। यह भी सच है कि किसी भी किस्म की प्रतिक्रांति भी बगैर बुद्धिजीवियों की भूमिका के नहीं हुई है। बुद्धिजीवीवर्ग ही किसी आंदोलन के माता-पिता, और बेटी -बेटा, पड़ोसी और मित्र होता है। बुद्धिजीवी की समाज में विशिष्ट भूमिका होती है उसे शक्लविहीन पेशेवराना रूपों में संकुचित करने की जरूरत नहीं है। वह अपने वर्ग का सक्षम सदस्य होता है, अपने कार्य-व्यापार में समर्थ होता है। व्यक्ति के तौर पर बुद्धिजीवी संदेश को अभिव्यक्त करता है, संदेश को बनाने या धारण करने की उसके पास फैकल्टी होती है जिसे वह अभिव्यक्ति देता है। यह अभिव्यक्ति उसके एटीट्यूट्स, दार्शनिक नजरिए के साथ-साथ जनता में व्यक्त होती है।
रुढि़यों और कठमुल्लेपन से लड़े बिना बुद्धिजीवी अपनी भूमिका नहीं निभा सकता। ये रुढि़याँ और कठमुल्लापन किसी भी तरह के हों, बुद्धिजीवी कभी भी इन्हें चुनौती दिए बगैर अपनी सामाजिक भूमिका अदा नहीं कर सकता। इसबार विधानसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर वाम बुद्धिजीवियों ने ममता बनर्जी का साथ दिया है। पहलीबार वामपंथी बुद्धिजीवियों ने व्यापक स्तर पर वामपंथी कठमुल्लेपन और रुढि़वादिता को चुनौती दी है। पहलीबार वामपंथी चिन्तन के सर्वसत्तावादी रुझानों को निशाना बनाकर सवाल किए हैं, इससे बुद्धिजीवीवर्ग में वामपंथी कठमुल्लापन कमजोर होगा। इससे स्वतंत्रता और न्याय के लक्ष्य को अर्जित करने, उसके लिए संघर्ष की भावना नए सिरे से जन्म लेगी। पुरानी वामपंथी प्रतिबद्धता के मानक टूटेंगे और प्रतिबद्धता के मानक के तौर पर मानवाधिकारों की स्वीकृति पैदा होगी। स्वतंत्रता और न्याय को प्रतिष्ठा मिलेगी। पुराने किस्म की वामपंथी प्रतिबद्धता विचारधारा और वर्ग विशेष के हितों से बँधी थी, यह बंधन और प्रतिबद्धता संकुचित और एकायामी थी। इसमें मानवता और मानवाधिकारों का बोध नहीं था। वह पार्टी बोध से संचालित प्रतिबद्धता थी। जबकि नए किस्म की प्रतिबद्धता का आधार स्वतंत्रता और न्याय है। यह बहुआयामी प्रतिबद्धता है। स्वतंत्रता और न्याय के आधार पर जब लिखेंगे अथवा संघर्ष करेंगे तो पुराने सभी विमर्श उलट-पलट जाएँगे। पुरानी वामपंथी प्रतिबद्धता जिन्दगी की अधूरी सच्चाई को सामने लाती है। जबकि स्वतंत्रता और न्याय के आधार पर निर्मित यथार्थ ज्यादा व्यापक, वैविध्यपूर्ण, जटिल और मानवीय होता है।
वामपंथी बुद्धिजीवियों की प्रतिबद्धता की मुश्किल यह है कि वे अंदर कुछ बोलते हैं और बाहर कुछ बोलते हैं। प्राइवेट जीवन में, पार्टी के अंदर बुद्धिजीवी कुछ बोलता है और बाहर कुछ बोलता है। उसके प्राइवेट और सार्वजनिक में भेद रहता है। यह उसके जीवन और विचार का दुरंगापन है। बुद्धिजीवी के विचारों और नजरिए में दुरंगापन नहीं पारदर्शिता होनी चाहिए। जब आप सार्वजनिक जीवन में सार्वजनिक सवालों से दो चार होते हैं तो उस समय प्राइवेट जैसी कोई चीज नहीं होती। उस समय बुद्धिजीवी पब्लिक या जनता का बुद्धिजीवी होता है, जनता के बुद्धिजीवी की भूमिका अदा करता है। बुद्धिजीवी का काम यह नहीं है कि अपनी ऑडिएंस को संतुष्ट करने वाली, आनंद देने, मजा देने वाली बातें कहे। इसके विपरीत बुद्धिजीवी का काम है अप्रिय सत्य का उद्घाटन करना, ऐसी बात को कहना जिसे ऑडिएंस नापसंद करती है। इसी अर्थ में बुद्धिजीवी किसी न किसी नजरिए का समाज में प्रतिनिधित्व करता है। सभी किस्म की बाधाओं के बावजूद अपनी जनता का प्रतिनिधित्व करता है। बुद्धिजीवी जब सामाजिक प्रतिनिधित्व करता है तो उसे प्रतिबद्धता, जोखिम, साहस से काम लेना होता है और असुरक्षा का सामना करना होता है।
बुद्धिजीवी कभी भी घरेलूपन के साथ सामंजस्य नहीं बिठाता। भाई-चारे और मित्रता के नाते स्वतंत्रता और न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को त्यागता नहीं है। बुद्धिजीवी का सामान्य स्वभाव यही होता है कि वह साफतौर पर कहता है वह क्या कर सकता है और क्या नहीं कर सकता। बुद्धिजीवी अपने कर्म के जरिए स्वतंत्रता पैदा करता है। वह मैलोड्रामा के जरिए स्वतंत्रता पैदा नहीं कर सकता।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो0 09331762360
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