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मंगलवार, 18 सितंबर 2018

नागरिकता पर राजनीति

असम में शेष भारत से जा कर बसने वालों का इतिहास नया नहीं है। अंग्रेजी शासनकाल में बंगालियों को असम में बसने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। आजादी के बाद कई हिंदी भाषी राज्यों झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि के अलावा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और यहाँ तक कि नेपाल से भी लोग जाकर असम में बसते रहे हैं। निःसंदेह इसमें बंगलादेश से भी गैर कानूनी तौर पर असम में दाखिल हो गए बंगलादेशी (हिदू, मुसलमान दोनों) भी शामिल हैं। बंगलादेश की जनगणना में हिंदू अल्पसंख्यकों का घटता प्रतिशत भी इसे पुष्ट करता है जो विभाजन के समय 24 प्रतिशत थी और अब घटकर 9 प्रतिशत रह गई है। असम के गैर असमियों में बंगला भाषियों की संख्या अधिक होने के कारण स्थानीय लोगों का गुस्सा उनके खिलाफ ही था। उनके खिलाफ असम के मूलनिवासी समुदाय के छात्र, नवजवान 1977 से 1985 तक आनदोलनरत् रहे। यह आनदोलन शुद्ध रूप से बंगाली और विदेशी विरोधी था। 1985 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में आनदोलनकारी छात्र संगठन आल असम स्टूडेंट्स यूनियन, भारत सरकार और असम सरकार के बीच असम समझौता हुआ। इस समझौते में स्पष्ट कहा गया था कि 24 मार्च 1971 की आधी रात के बाद असम में प्रवेश करने वाले विदेशियों को भारतीय नागरिक नहीं माना जाएगा और उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा। इसके बाद केन्द्र और असम में सरकारें बदलती रहीं, यहाँ तक कि असम गणपरिषद की सरकार भी बनी लेकिन इस समझौते पर अमल नहीं हुआ।  मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि (मतगणना के आधार पर तैयार) 1951 के राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को विशुद्ध नागरिकों की पहचान के लिए अपडेट किया जाए। इस प्रकार एनआरसी की वर्तमान प्रक्रिया 2015 में शुरू हुई। सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता के चलते तीन साल की प्रक्रिया के बाद पहली ड्राफ्ट रिपोर्ट 31 दिसम्बर 1917 को जारी की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार कुल 3.29 करोड़ लोगों ने पंजीकरण के लिए आवेदन किया था जिसमें 1.9 करोड़ लोगों को पंजीकृत किया गया था। 30 जुलाई 2018 को दूसरा और फाइनल ड्राफ्ट जारी किया गया जिसके मुताबिक 2.89 करोड लोगों को वैध नागरिक माना गया। इस प्रकार कुल 40 लाख लोगों की नागरिकता पर सवालिया निशान लग गया। यह आँकड़ा असम सरकार के गृह एवं राजनैतिक विभाग द्वारा 2012 में जारी श्वेत पत्र के आँकड़ों से 800 प्रतिशत अधिक है। 20 अक्तूबर 2012 को  असम सरकार के गृह एवं राजनैतिक विभाग ने विदेशियों के मुद्दे पर एक श्वेत पत्र जारी किया जिसके अनुसार शुरू में असम में विदेशियों की संख्या 1,50,000-2,00,000 आँकी गई थी बाद में इस संख्या के 5,00,000 तक होने का अनुमान लगाया गया। वैसे भी अगर मान लिया जाए कि चालीस लाख लोग अवैध तरीके से 25 मार्च 1971 से 2014 बीच (एनआरसी प्रक्रिया शुरू होने तक) बंगलादेश से भारत आए तो घुसपैठ का प्रति वर्ष औसत 90,000 और प्रति माह 7,500 से अधिक आता है। इतने बड़े पैमाने पर इतने लम्बे समय तक घुसपैठ कम से कम उस सीमा पर सम्भव नहीं है जहाँ सीमा सुरक्षा बल सरहदों की निगहबानी के लिए तैनात हों। वहीं यह तथ्य भी कि 1977 से 1985 तक बंगला भाषियों के खिलाफ स्थानीय छात्रों, नवजवानों के हिंसक आनदोलनों और नस्लीय दंगों के दौरान घुसपैठ की सम्भावना नगण्य रह जाती है। अगर इन वर्षों को निकाल दिया जाए तो घुसपैठ का यह औसत बहुत बढ़ जाता है जो स्वभाविक नहीं है। इसका मतलब यह हरगिज नहीं है कि अवैध प्रवास की समस्या नहीं है लेकिन शायद जिस स्तर पर इसका होना सामने आ रहा है वह न हो। इसके ऐतिहासिक कारण भी हैं। यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि 1971 के पाकिस्तान विभाजन से पहले पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तानी सरहदों पर एक जैसी चौकसी नहीं थी। इसके रणनीतिक कारण थे। इसी के चलते 1971 में भारत के सैन्य हस्तक्षेप से पूर्वी पाकिस्तान बंगलादेश बना। इस दौरान दोनों देशों के बीच आम नागरिकों और उन्हीं के भेस में दोनों देशों की एजेंसियों अहलकारों का बड़े स्तर पर सरहदों के पार आना जाना रहा।
    राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) ने अपने फाइनल ड्राफ्ट में जिन लोगों को भारतीय नहीं माना है उनमें पूर्व राष्ट्रपति भारत सरकार फखरुद्दीन अली अहमद के परिजन भी हैं, सेवानिवृत्त सेना के अधिकारी मो. अजमल हक, भाजपा विधायक रमाकांत देवरी, परेश बरुआ की पत्नी और बेटों के नाम भी शामिल नहीं हैं। ऐसे सैकड़ों लोग हैं जिनके परिवार के कुछ लोगों के नाम तो मौजूद हैं लेकिन कुछ अन्य के नाम नहीं हैं। बलिया उत्तर प्रदेश की छोटकी देवी का परिवार 1945 में असम चला गया था। उनके बेटे और बहू को संदिग्ध मतदाता सूची में डाल कर जेल भेज दिया गया। सदमें में छोटकी देवी को दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई। एनआरसी की बहस के दौरान त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देव और गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी की नागरिकता को लेकर कुछ दिलचस्प बातें सामने आई। इस बीच बिप्लब देब के विकीपीडिया पेज को तीन दिनों में 37 बार एडिट किया गया जिसमें यह दावा किया गया कि देब का जन्म स्थान बंग्लादेश का कछुआ उपजिला चाँदपुर का राजधर गाँव है जहाँ वह 25 नवम्बर 1971 को पैदा हुए। उसके बाद ही उनके पिता 1971 में असम आए। बंगलादेशी सूत्रों के हवाले से कहा गया कि श्री देब बंगलादेश में ही गर्भ में आए और त्रिपुरा में उसी तारीख में पैदा हुए। बिप्लब देब के मीडिया सलाहकार संजय मिश्रा का दावा है कि उनके पिता हरधरन ने शरणारर्थी के बतौर नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत 27 जून 1967 को पंजीकृत करवाया और देब 25 नवम्बर 1971 को उदयपुर, जनपद गोमाती त्रिपुरा में पैदा हुए। इसी प्रकार गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी की वेबसाइट www.vijayrupani.in के हवाले से कहा गया है कि वह 2 अगस्त 1956 को मियांमार की राजधानी रंगून में पैदा हुए। उनका परिवार बेहतर भविष्य के लिए 1960 में भारत आ गया। उन्होंने या उनके परिवार ने भारतीय नागरिकता के लिए किस प्रकार औपचारिकताएँ पूरी की इसकी कोई जानकारी नहीं है, लेकिन रूपानी पहले एबीवीपी और आरएसएस में शामिल हुए और उसी रास्ते से गुजरात के मुख्यमंत्री भी बने। 

    असम या भारत के अन्य भागों में जहाँ साक्षरता दर कम है, नागरिकों से अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उनके पास अपनी नागरिकता के सबूत होंगे ही या वह उन्हें सुरक्षित रख पाए होंगे। हिंदी भाषी क्षेत्रों ही के बहुत से परिवारों के पास राशन कार्ड तक नहीं है और न ही उन्होंने कभी बैंक देखा है। जिन लोगों ने स्कूल, कालेज का मुँह नहीं देखा, शादियों का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ, जमीन जायदाद खरीदने की हैसियत नहीं है उनके लिए नागरिकता का प्रमाण जुटा पाना आसान नहीं है। असम में भीषण बाढ़ की वजह से कई बार पूरे-पूरे गाँव तबाह हो गए। सब कुछ बह गया और परिवारों को राहत कैम्पों में शरण लेनी पड़ी। एनआरसी ने नागरिकता के प्रमाण के तौर पर 14 दस्तावेजों की सूची जारी की है जिसमें 1. एनआरसी 1951, 2. 24 मार्च 1971 का इलेक्ट्रोलर राल, 3. जमीन या किराएदारी का रिकार्ड, 4. नागरिकता प्रमाण पत्र, 5. स्थाई निवास प्रमाण पत्र, 6. शरणार्थी पंजीकरण प्रमाण पत्र, 7. पासपोर्ट, 8. जीवन बीमा, 9. सरकार द्वारा जारी कोई लाइसेन्स या प्रमाण पत्र, 10. सरकारी नौकरी का प्रमाण पत्र, 11. बैंक या पोस्ट आफिस खाता, 12. जन्म प्रमाण पत्र, 13. बोर्ड या विश्वद्यालय की शिक्षा प्रमाण और 14. न्यायालय का रिकार्ड या प्रक्रिया। लेकिन वहाँ की परिस्थितियों को देखते हुए इन सरल शर्तों को भी पूरा कर पाना आसान नहीं है। समाज के  कमजोर और अनपढ़ लोगों के लिए यह कभी आसान नहीं होता। पंचायतों द्वारा जारी किए प्रमाणपत्र को एनआरसी ने मानने से इनकार कर दिया। सरकार का भी पक्ष यही था और हाईकोर्ट ने भी इसे कायम रखा। राजनैतिक विश्लेषक और स्वराज पार्टी के नेता योगेंद्र यादव ने जनवरी 2018 में ‘क्या भारत को असम के उबलते हुए ज्वालामुखी बन जाने की परवाह है’ शीर्षक से प्रकाशित अपने लेख में इस समस्या पर अपना मत इस प्रकार जाहिर किया है “तीन तरह के लोग हैं जिनके नाम सूची में नहीं हैं मूल निवासियों के नियमित मामले जिनके कागजात पूरे नहीं हैं, संदिग्ध मामले और विशेष वर्ग जिन्होंने पंचायतों द्वारा जारी किए गए प्रमाण पत्र दाखिल किए हैं। वर्तमान विवाद इसी तीसरी कटेगरी को लेकर है। हाईकोर्ट ने इन प्रमाण पत्रों को निरस्त कर दिया है और राज्य सरकार भी इस निर्णय का समर्थन करती है। इस कटेगरी में 27 लाख मुस्लिम महिलाएँ शामिल हैं जिनके पास कोई कागजी सबूत नहीं हैं, उनकी शादियों का पंजीकरण नहीं हुआ और न ही उनके पास कोई ‘शैक्षिक डिग्री है। उन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित किया जा सकता है”। इससे स्पष्ट होता है कि जिन लोगों को एनआरसी सूची में स्थान नहीं मिल सका है उनमें बड़ी संख्या उन भारतीयों की भी हो सकती है जिनके पास अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए दस्तावेजी सबूत नहीं है खासकर महिलाओं की।
    एनआरसी के फाइनल ड्राफ्ट में जिन 40 लाख लोगों को शामिल नहीं किया गया है उनमें अपुष्ट आँकड़ों के मुताबिक 24 लाख मुसलमान और 16 लाख हिंदू समुदाय के लोग हैं। आरएसएस और भाजपा राजनैतिक लाभ के लिए असम की स्थानीय बनाम बंगाली समस्या को हिंदू बनाम मुस्लिम बनाने के लिए बेचैन है। फाइनल ड्राफ्ट के जारी होते ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सहित कई माननीयों ने ड्राफ्ट का स्वागत करते हुए बंगलादेशी मुसलमानों को देश से निकालने की वकालत शुरू कर दी। हालाँकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि फाइनल ड्राफ्ट के आधार पर किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। यह भी कहा गया है कि जिन लोगों के नाम फाइनल ड्राफ्ट में नहीं हैं उन्हें फिर से अपनी नागरिकता के पक्ष में 30 अगस्त से 28 सितम्बर 2018 तक आवेदन करने का कानूनी अधिकार है। साफ जाहिर है कि फाइनल ड्राफ्ट भी अभी फाइनल नहीं है। दूसरी तरफ केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 19 जुलाई 2018 को संसद में संशोधन विधेयक लाकर असम में भारतीय नागरिकता के मामले को पूरी तरह साम्प्रदायिक बना दिया है। इस विधेयक के अनुसार बंगलादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से बिना किसी वैध दस्तावेज के भारत में प्रवेश करने वाले वहाँ के अल्पसंख्यकों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) को 6 साल तक भारत में रहने की शर्त पर नागरिकता प्रदान की जाएगी। विधेयक में बंगलादेश के अलावा अफगानिस्तान, पाकिस्तान का नाम शामिल कर के यह कहा गया है कि उन देशों में अल्पसंख्यकों को भेदभाव का शिकार बनाया जाता है और पड़ोसी देशों में उनका उत्पीड़न भी होता है जबकि अवैध मुस्लिम प्रवासियों को आर्थिक प्रवासी माना गया है। हालाँकि भारत में स्वयं अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव और उत्पीड़न के आरोप लगते रहे हैं। इसके अतरिक्त भारत सरकार द्वारा ऐसे समय पर यह कदम उठाया गया है जब देश में अल्पसंख्यकों पर सुनियोजित हमले हो रहे हैं और असम में एनआरसी द्वारा अवैध नागरिकों की पहचान के काम को लेकर कई तरह के सवाल हैं। ऐसे में सरकार के इस कदम के पीछे छुपा साम्प्रदायिक एजेंडा एक खुला हुआ रहस्य है। यह विधेयक 1985 में होने वाले असम समझौते की शर्तों का भी उल्लंघन करता है जिसमें अवैध प्रवासियों वापस उनके देश भेजने की बात पर सहमति हुई थी। लेकिन मोदी सरकार ने उसमें हिंदू, मुस्लिम का पुछल्ला लगा दिया। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एनआरसी की कार्यपद्धति पर सवाल उठाते हुए पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के वंशजों को सूची में शामिल न किए जाने पर आश्चर्य व्यक्त किया है। उन्होंने अवैध घोषित किए गए नागरिकों को पश्चिम बंगाल में बसाने की भी बात कही। उनके इस बयान के पीछे भी राजनीति देखी जा सकती है। चूँकि सूची में जगह न पाने वालों में सबसे बड़ी संख्या बंगला भाषियों की है इस लिए संभव है कि उन पर ऐसे बंगाली परिवारों का दबाव भी हो जो असम चले गए थे लेकिन उनकी जडं़े पश्चिम बंगाल में मौजूद हैं।
    असम वास्तव में योगेन्द्र सिंह के शब्दों में ‘उबलता हुआ ज्वालामुखी है’ और इस अत्यंत जटिल समस्या का राजनीतिक और कूटनीतिक समाधान ही सम्भव है। जैसा कि कई बुद्धिजीवियों ने सुझाया है कि एनआरसी की प्रक्रिया को जारी रखते हुए पंचायत प्रमाण पत्रों को नागरिकता के लिए वैध प्रमाण माना जाए और साम्प्रदायिक आधार पर नागरिकता सम्बंधी विधेयक को वापस लिया जाए। अवैध प्रवासियों के मामले में उनके देशों खासकर बंगलादेश को कूटनीतिक स्तर पर अपने नागरिकों को वापस लेने के लिए आमादा किया जाए, लेकिन जिस तरह से भाजपा और केंद्र व असम की भाजपा सरकारों ने अब राजनैतिक लाभ के लिए इस समस्या का साम्प्रदायीकरण किया है और आगामी लोक सभा चुनावों में इस मुद्दे को गरमाने के आसार दिखाई दे रहे हैं उससे इतिहास की सबसे बड़ी मानव की त्रासदी आशंका बढ़ती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने अब सफलतापूर्वक इसे टालने का प्रयास किया है और वही एक मात्र आशा की किरण भी है।
असम के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स का अंतिम ड्राफ्ट आ चुका है। इसके मुताबिक लगभग 40 लाख लोग ऐसे हैं जो भारत के नागरिक नहीं हैं या संदिग्ध मतदाता हैं। उन्हें बंगलादेशी बताया जाता है। बंगलादेश का कहना है कि उसका कोई नागरिक भारत में गैरकानूनी प्रवासी नहीं है। बंगलादेश के सूचना एवं प्रसारण मंत्री हसनुल हक ने स्पष्ट कहा है कि “किसी बंगला भाषी को बंगलादेशी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि “असम में एक शताब्दी पुराने नस्लीय संघर्ष से सभी अवगत हैं। पिछले 48 सालों में किसी भारतीय सरकार ने बंगलादेश के साथ अवैध अप्रवास का मामला नहीं उठाया”। संकेत स्पष्ट है कि जिन लोगों को भारत का नागरिक नहीं माना गया है, बंगलादेश उन लोगों को लेने के लिए तैयार नहीं है। अगर इस तरह की स्थिति बनती है और उसका सर्वमान्य समाधान नहीं निकाला जाता है तो निश्चित ही आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी मानव त्रासदी मुँह बाए खड़ी है। यह सवाल हर संवेदनशील मस्तिष्क को झिझोड़ रहा है कि इन 40 लाख लोगों का भविष्य क्या होगा? क्या बंगलादेश को इन्हें स्वीकार करने पर आमादा किया जा सकेगा? क्या इनके नागरिक अधिकार समाप्त हो जाएँगे और इन्हें शरणार्थी कैम्पों में पीढ़ी दर पीढ़ी रहने पर मजबूर होना पड़ेगा? इनकी जान, माल, मान, सम्मान की सुरक्षा की क्या गारंटी होगी? भारत के जंगलों में हजारो साल से रह रहे आदिवासियों के गाँवों को उजाड़ दिया गया और उन्हें अपने ही जल, जंगल, जमीन से बेदखल होना पड़ा। ऐसा केवल इसलिए संभव हो पाया क्योंकि उनके पास अपनी दावेदारी के दस्तावेजी सबूत नहीं थे। ऐसा नहीं है कि असम में बंगलादेशियों के घुसपैठ की समस्या नहीं है लेकिन एनआरसी में पंजीकरण की प्रक्रिया में सुविधा की राजनीति के हस्तक्षेप के चलते ऐसे नतीजे सामने आ रहे हैं जिनसे हजारो भारतीयों के सामने भी विदेशी घोषित कर दिए जाने का संकट उत्पन्न हो गया है।

-मसीहुद्दीन संजरी
मोबाइलः 09455571488
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2018 में प्रकाशित 

मंगलवार, 19 जून 2018

कर्नाटक चुनाव

इस बार यह कीर्तिमान कर्नाटक के हिस्से में आया। 55 घंटे में ही सरकार गिर गई। येदुरप्पा ने विधानसभा के पटल पर मत विभाजन का सामना किए बिना ही उसी राज्यपाल को अपनी सरकार का त्याग पत्र सौंप दिया जिसने उन्हें 55 घंटे पहले मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी। येदुरप्पा ने इस तरह से अपने पूर्व के दावे के उलट यह स्वीकार कर लिया कि उनके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त विधायकों का समर्थन नहीं था। यह बात राज्यपाल महोदय को पता थी, कर्नाटक और देश की जनता भी जानती थी। राजनैतिक दायरों में यह आम धारणा थी कि सरकार बनाने के लिए भाजपा हर अनैतिक कदम उठाने से गुरेज नहीं करेगी। इसमें भी किसी को शक नहीं था कि महामहिम ने बहुमत सिद्ध करने के लिए जो 15 दिन का समय दिया था उसमें भाजपा विधायकों की खरीद फरोख्त करेगी। कांग्रेस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गई। एक नहीं दो बार। पहले सुप्रीम कोर्ट ने महामहिम के फैसले में टाँग अड़ाने से इनकार कर दिया। शपथ ग्रहण की औपचारिकता पूरी हो गई। कांग्रेस दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट गई। खरीद फरोख्त का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत सिद्ध करने की समय सीमा घटा दी। वह समय सीमा शनिवार को शाम चार बजे खत्म होनी थी। कर्नाटक के राज्यपाल वाजूभाई वाला ने कभी मोदी के लिए गुजरात में अपनी सीट छोड़ी थी। हमेशा वफादार रहे थे। कर्नाटक में उसी वफादारी की नवीनीकरण का समय था। सदन के पटल पर मत विभाजन के समय स्पीकर की भूमिका अहम हो सकती थी। परंपरा के हिसाब से दसवीं बार विधान सभा के लिए चुने गए कांग्रेस के रघुनाथ विश्वनाथ देशपांडे प्रोटेम स्पीकर बनने के हकदार थे। चूंकि देशपांडे से भाजपा के हक में बेइमानी की उम्मीद नहीं की जा सकती थी इसलिए परंपरा से इतर जाते हुए वाजूभाई वाला ने तीसरी बार चुनकर सदन में जाने वाले के०जी० बुपय्यह को प्रोटेम स्पीकर बना दिया। बुपय्यह इससे पहले येदुरप्पा सरकार में स्पीकर रह चुके थे और उन पर येदुरप्पा की सरकार को बचाने के लिए विपक्ष के कई विधायकों को निलम्बित करने का आरोप लग चुका है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की वजह से समय हाथ से निकला जा रहा था। पहला विकल्प विधायकों की खरीद का था। समय कम था इसलिए इस काम की शुरूआत ही उच्चतम स्तर से कर दी गई। खुद येदुरप्पा और जनार्दन रेड्डी विधायकों को फोन करके आफर देने लगे। सरकारी मशीनरी का भी इस्तेमाल हुआ। काम जल्दी में निपटाना था। कांग्रेस और जनता दल (एस) अपने विधायकों को बचाने में लगे रहे। कहीं रिसॉर्ट की बुकिंग कैंसिल तो कही फ्लाइट नहीं उड़ी। इस बीच विधायकों की बोली 150 करोड़ और मंत्री पद तक पहुँच गई। येदुरप्पा और जनार्दन रेड्डी के बोली लगाने वाले आडियो टेप भी आ गए। बात नहीं बनी। विश्वास मत हासिल कर पाना असम्भव हो गया इसलिए मत विभाजन से पहले ही येदुरप्पा और उनके विधायक राष्ट्रगान बजने के दौरान ही सदन छोड़कर चले गए। राष्ट्रगान के सम्मान में फिल्म थिएटरों में खड़े होने की वकालत करने वालों को यह अंदाजा ही नहीं हुआ कि राष्ट्रगान बज रहा है। सत्ता हाथ से निकली तो उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि राष्ट्रगान को राष्ट्रवाद और देशभक्ति का मानक उन्हीं लोगों ने बनाया था। फिर भी अब डैमेज कंट्रोल की बारी थी। हार को जीत बताने की बारी। त्यागपत्र को नैतिक आधार देने के प्रयास किए जाने लगे। कुछ अपवाद के साथ इस दौरान मीडिया ने सत्ता के पक्ष में “धूर्तबाजी को अकलमंदी और आपराधिक लम्पटई को बहादुरी” बताने वाला अपना पूर्व का रवैया कायम रखा। लोकतांत्रिक मूल्यों का चीरहरण करते हुए त्यागपत्र देने को मीडिया ने मास्टर स्ट्रोक बना दिया। यह नहीं बताया कि गोल अपनी ही पोस्ट में मार ली गई है। नया अभियान शुरू किया गया। कांग्रेस जनता दल सेक्युलर के गठबंधन को अनैतिक बताने में पूरी ऊर्जा लगा दी गई। हालाँकि गोवा, मेघालय और मणिपुर में इसका व्यवहार कर्नाटक का ठीक उलटा था। देश को यह बताने की सर तोड़ कोशिश होने लगी कि जनादेश इस 
गठबंधन को नहीं मिला है। 
कर्नाटक भाजपा के लिए अहम था। उत्तर पूर्व के बाद दक्षिण भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार थी। कांग्रेस के लिए भी भाजपा के विजय रथ को रोकना चुनौती थी। गोवा, मणिपुर, मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया था। नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के मनोबल का भी सवाल था। राहुल गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस पहला चुनाव लड़ रही थी। 2019 को सामने रख कर देखें तो दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए कर्नाटक काफी अहम हो जाता है। यह दक्षिण का गेट है। इसीलिए भाजपा का जोर इस बात पर है कि वह चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है तो वहीं कांग्रेस मत प्रतिशत की बात करती है। चुनाव का गणित भी कुछ अलग होता है। कांग्रेस को इस चुनाव में 38 प्रतिशत मत मिले हैं जबकि भाजपा का मत प्रतिशत 36.2 रहा है। लगभग दो प्रतिशत का अंतर सीटों में बड़ा अंतर लेकर आता है। यह अंतर यहाँ भी मौजूद है मगर उलटा। भाजपा को 104 सीटों पर जीत मिली है जबकि कांग्रेस को मात्र 78 सीटों पर ही संतुष्ट होना पड़ा। जनता दल (एस) 18.3 प्रतिशत मतों के साथ 37 सीटें जीतने में सफल रही। 224 विधायकों वाली कर्नाटक विधान सभा के लिए 222 घोषित परिणामों में एक सीट निर्दलीय विधायक को और एक अन्य छोटे स्थानीय दल (कर्नाटका प्रगन्यावंथा जनता पार्टी) को मिली है। समाजवादी पार्टी ने भी इस चुनावी समर में अपने प्रत्याशी उतारे थे। सपा के 24 प्रत्याशियों को कुल 10,385 वोट मिले जिसे प्रतिशत में बदल कर पढ़ लेना आसान नहीं है। पार्टी को सबसे अधिक 3,471 मत नरसिम्हा राजा सीट पर मिले। कई स्थानों पर प्रत्याशी 100 का आँकड़ा भी नहीं पार कर पाए। वहीं बसपा जनता दल (एस) के साथ गठबंधन में थी, 18 सीटों पर चुनाव लड़ी, कोल्लेगल की सीट पर जीत भी दर्ज किया लेकिन उसके अलावा कहीं पर जमानत नहीं बचा पाई। बसपा को कुल 1,08,592 मतों (71792 कोल्लेगल सीट पर) के साथ 0.3 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। 28 प्रत्याशियों को कुल 23,441 मत प्राप्त हुए जिसमें अधिकतम 3,311 वोट देवर हिप्पर्गी सीट से आसिफ को मिले। यह सीट भाजपा ने 3,353 वोटों के अंतर से जीती। इसी तरह जनता दल यू को 23 सीटों पर कुल 41,638 वोट मिले जिसमें कुंडगोल सीट पर मिलने वाले 7,318 वोट शामिल हैं। स्वराज इंडिया ने भी इस चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई। 10 सीटों पर चुनाव लड़ी। मेलूकोटे सीट पर 73,779 मतों के साथ दूसरे नम्बर पर रही लेकिन कुल 79,400 मत ही प्राप्त कर पाई। इसी तरह शिवसेना को 34 सीटो पर 13,790 तो आरपीआई को 8 सीटों पर 10,465 वोट मिले। अगर गौर से देखा जाए तो साफ मालूम होता है कि वोटों का धु्रवीकरण भाजपा, कांग्रेस और जनता दल एस गठबंधन के पक्ष में हुआ। हिंदुत्व के आधार पर ध्रुवीकरण का फायदा केवल भाजपा को मिला जबकि धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर होने वाली गोलबंदी दो ध्रुवी रही और यह गोलबंदी उतनी मजबूत भी नहीं थी। ऐसा शिवसेना और दूसरे हिंदुत्ववादी दलों को मिलने वाले वोटों से स्पष्ट होता है जबकि दूसरी तरफ देखें तो एसडीपीआई को तीन सीटों पर 45,781 मत प्राप्त हुए। यहाँ यह बात अहम हो जाती है कि जब एमआईएम उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ती है तो समाजवादी पार्टी उसका विरोध इस आधार पर करती है कि इससे सेक्युलर वोटों का बिखराव होगा। यही तकलीफ दिल्ली में आम आदमी पार्टी को रहती है। इन्हीं बुनियादों पर एमआईएम को भाजपा का एजेंट भी घोषित कर दिया जाता है। लेकिन कर्नाटक चुनाव नतीजे साफ जाहिर करते हैं कि इन दोनों दलों का वहाँ कोई नेटवर्क नहीं था फिर बिना किसी तैयारी के उनके वहाँ चुनाव में कूदने को क्या नाम दिया जाए। यही बात स्वराज इंडिया, एनसीपी या 18 सीटों पर 81,191 वोट पाकर सभी सीटों पर जमानत गंवा देने वाली भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पर भी लागू होती है। इस बात में कोई शक नहीं कि अगर थोड़ा और समझदारी से काम लिया जाता तो परिणाम काफी भिन्न भी हो सकते थे। इसे केवल चुनाव में हासिल होने वाले मतों के आधार पर नहीं देखा जा सकता बल्कि समझदारी से काम लेने पर जो वातावरण तैयार हो सकता था उससे परिदृश्य काफी कुछ बदला हुआ होता। 
कर्नाटक चुनाव प्रचार भी बहुत खास था। इस चुनाव में प्रधानमंत्री के अलावा भाजपा शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों और विधायकों का कर्नाटक में जमावड़ा रहा। प्रधानमंत्री द्वारा चुनावी सभा को सम्बोधित करते हुए कई बार जनता को आभास कराने का प्रयास किया गया कि कांग्रेसी परिवार को देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले वीर क्रान्किरियों की कोई परवाह नहीं थी। वैसे भी भाजपा सरकार जब से सत्ता में आई है वह लगातार यह जताने का प्रयास करती रही है कि कांग्रेस सेना और सेना के अधिकारियों का सम्मान नहीं करती थी। स्वभाविक है कि उनके निशाने पर सबसे अधिक पंडित नेहरू होते हैं क्योंकि संघ भाजपा ने आजादी के दो बड़े नेताओं पंडित नेहरू और सरदार पटेल को दो खानों में बाँट दिया है। बार-बार यह जताने का प्रयास करते रहे हैं (उनके पैमाने के हिसाब से) कि पटेल के मुकाबले नेहरू कुछ कम राष्ट्रवादी या देशभक्त थे। प्रधानमंत्री ने कई बार अपने पद की गरिमा को दाँव पर लगाकर भी पंडित नेहरू में कमियाँ ढूँढने बल्कि कहा जाना चाहिए कि कमियाँ गढ़ने का प्रयास किया है। बीदर की रैली में प्रधानमंत्री ने भगत सिंह का नाम लेकर कहा कि जब वह जेल में थे, मुकदमा चल रहा था तो क्या कांग्रेसी परिवार का कोई व्यक्ति जेल में उनसे मिलने गया। उसके बाद बटुकेश्वर दत्त का नाम लेकर भी यही बात कही कि क्या उनसे जेल, कोर्ट या अस्पताल में कोई मिलने गया। यह आरोप लगाने से पहले प्रधानमंत्री ने बताया कि उन्होंने इतिहास पढ़ा है लेकिन अगर कोई गलती हो तो वह उसमें सुधार कर लेंगे। इतिहास में इसका संदर्भ ढूंढना मुश्किल नहीं है। जिस समय भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त सरीखे क्रान्तिकारी जेल में अनशन कर रहे थे पंडित नेहरू उनसे मिले थे। 9,10 अगस्त 1929 के ट्रिब्यून अखबार में इसका ब्योरा है। जवाहर लाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में भी उन मुलाकातों के बारे में लिखा है। नेहरू देश के लिए कुर्बान होने वाले उन वीर योद्धाओं के बारे में इन शब्दों का प्रयोग करते हैं “मैं नायकों की दुर्दशा देखकर बहुत ज्यादा दुखी हूँ। उन्होंने अपनी जान इस संघर्ष में लगा दी है। मुझे उम्मीद है कि उनका बलिदान सफल होगा”। एक बार वायसराय को चुनौती देते हुए पंडित नेहरू ने भगत सिंह के बारे में कहा “मेरे मन में भगत सिंह जैसे व्यक्तित्व के साहस और बलिदान के लिए श्रद्धा भरी है। भगत सिंह जैसा साहस दुर्लभ है। अगर वायसराय हमसे उम्मीद करते हैं कि कि वे हमें इस आश्चर्यजनक साहस और उसके पीछे के ऊँचे उद्देश्यों की तारीफ करने से रोक सकते हैं, तो वह गलत समझते हैं”। नेहरू ने कांग्रेस बुलेटिन में भगत सिंह द्वारा अदालत के सामने दिया गया बयान भी छापा। अगर प्रधानमंत्री चाहें तो इतिहास की इन घटनाओं से रूबरू हो सकते हैं। राजनैतिक लाभ के लिए पंडित नेहरू पर लांछन लगाने के क्रम में उन्होंने कर्नाटक के सेना अधिकारियों, फील्ड मार्शल करिअप्पा और जनरल के०एस० थिम्मैया का अपमान करने के गंभीर आरोप लगाए। ये आरोप भी पूरी तरह निराधार निकले। वास्तव में देखा जाए तो ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर अगर बात करना आवश्यक भी हो जाए तो एक पूर्व प्रधानमंत्री के मामले में आम चुनावी सभा में कुछ कहना अमर्यादित है। लेकिन अगर वह झूठ और गढ़ा हुआ हो तो प्रधानमंत्री की गंभीरता पर ही सवाल उठना स्वाभाविक है, और ऐसा बार-बार हो रहा है। चार साल तक देश की सरकार चलाने के बाद भी सत्ताधारी दल के पास देश को बताने के लिए उपलब्धियों का टोटा ही है वह जन सरोकार के मुद्दों पर वह बात नहीं करना चाहती। उसे झूठे इतिहास गढ़ने और भावनाओं से खेलने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
कर्नाटक का संदेश और राहुल गांधी की अध्यक्षता मे कांग्रेस की रणनीति बहुत स्पष्ट है। कर्नाटक में जब येदुरप्पा के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया था तो भाजपा की स्थिति इससे कहीं बेहतर थी। इस बार मोदी का करिश्मा और अमित शाह के प्रबंधन के बावजूद उसका मत प्रतिशत और सीटें दोनों घटी हैं। इस चुनाव में मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की पूरी फौज भाजपा ने कर्नाटक में उतार दी थी। पैसों और सरकारी मशीनरी का जम कर इस्तेमाल किया गया। प्रचार अभियान के दौरान चुनाव आयोग ने आँखे बंद रखी थीं। राज्यपाल की सेवा भी उपलब्ध थी। कुछ अपवादों के साथ मीडिया हर सही को गलत और गलत को सही प्रचारित करने को तत्पर था। उसके बावजूद साधारण बहुमत भी नहीं मिला और सरकार बनाकर अपमानित होना पड़ा। फिर भी ढिठाई देखिए, खुद को सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष कहलाने वाला यह कहने से गुरेज नहीं करता है कि अगर विधायकों को छुपाया नहीं गया होता तो वह विश्वास मत प्राप्त कर लेता। दूसरी ओर कांग्रेस जनता दल (एस) के साथ अन्य दलों ने चुनाव प्रचार के दौरान शालीनता बनाए रखी। जनता दल (एस) को बिना शर्त समर्थन देकर आगामी लोकसभा चुनाव के लिए गोलबंदी का मजबूत आधार बना दिया। राहुल के इस संदेश को उत्तर प्रदेश और बिहार में भी खुली आँखों देखा और पढ़ा जा सकता है। आने वाले दिनों में इसे और व्यापकता मिल सकती है। इसी के साथ यह भी गौरतलब है कि फासीवाद के वर्तमान स्वरूप को खाद पानी भी इन्हीं सेक्युलर दलों की वजह से मिली थी। इसने देश को उस जगह ले जाकर खड़ा कर दिया जहाँ चार साल पूरा होने के बावजूद सरकार की उपलब्धियाँ और जन समस्याएँ, महँगाई, बेरोजगारी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाईं। भारतीय लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाना है तो संस्थाओं के अलोकतांत्रीकरण और केंद्रीकरण के खिलाफ भी ठोस कार्यनीति के साथ आना होगा। सबसे बढ़कर यह कि खुद अपने अंदर मौजूद और पनप रहे फासीवादी कीटाणुओं को भी नष्ट करना होगा।

-मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2018 अंक में प्रकाशित

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

फ्रेड्रिक एंजिल्स


“अपने दोस्त कार्ल मार्क्स के बाद फ्रेड्रिक एंजिल्स पूरी सभ्य दुनिया में आधुनिक सर्वहारा में सबसे बड़े विद्वान और अध्यापक थे”। ऐसा कहना था आधुनिक युग के एक अन्य महापुरूष और महान क्रान्तिकारी व्लादिमीर लेनिन का। मार्क्स और एंजिल्स ने ही सबसे पहले समाजवाद की व्याख्या की और बताया कि यह कोई सपना नहीं बल्कि आधुनिक समाज में उत्पादक शक्तियों के विकास का अंतिम लक्ष्य और आवश्यक परिणाम है। ऐसे महान क्रान्तिकारी और समाजवादी दार्शनिक फ्रेड्रिक एंजिल्स का जन्म 28 नवम्बर 1820 में जर्मनी के रहाइन प्रान्त में बारेन नामक स्थान पर एक टेक्सटाइल फैक्ट्री के मालिक के घर में हुआ। एंजिल्स का परिवार ईसाई धर्म के प्रोटेस्टेंट पंथ को मानने वाला था। ऐसे में अपने क्रान्तिकारी विचारों के चलते उनके रिश्ते घर से बहुत अच्छे नहीं थे। उनके पिता चाहते थे कि वे अपने पैतृक कारोबार को आगे बढ़ाएँ, इसीलिए उन्हें 18 साल की आयु में व्यापरिक अनुभव प्राप्त करने के लिए ब्रेमेन भेज दिया। ब्रेमेन में 30 साल के प्रवास के दौरान उदारवादी और क्रान्तिकारी कामों में उनकी रुचि बढ़ती गई। कई छोटे वामपंथी विचारकों ने उन्हें आकर्षित किया लेकिन वह संतुष्ट नहीं हुए और हेजेल के दर्शन को अपना लिया। ईसाइयत के खिलाफ आक्रमक रुख ने एंजिल्स को अज्ञेयवादी से नास्तिक बना दिया लेकिन उनके क्रान्तिकारी संकल्प अभी किसी भी दिशा में जा सकते थे। 1842 में वह मोसेस हेस से मिले जिन्होंने उन्हें कम्युनिस्ट बना दिया। उन्होंने एंजिल्स को बताया कि हेलेजियन दर्शन का तार्किक नतीजा साम्यवाद है। एंजिल्स को कविता लिखने का शौक था और अब तक पत्रकारिता के मैदान में भी उन्होंने अपनी पहचान बना ली थी, हालाँकि उनके लेख फ्रेड्रिक ओसवाल्ड के छद्म नाम से कई जर्नलों और अखबारों में छपते थे। उनका मार्क्स से परिचय भी उनके लेखों के माध्यम से ही हुआ। मार्क्स से मुलाकात करने के मकसद से वे दस दिन के लिए पेरिस गए। उसके बाद दोनों क्रांतिकारी यात्रा में 1983 में मार्क्स की मृत्यु तक साथ रहे। अपने इंग्लैंड में प्रवास के दौरान वहाँ की चमक दमक वाली औद्योगिक क्रांति के पीछे अंधकार में डूबी मजदूरों की दुर्दशा पर ‘द कंडीशन आफ वर्किंग क्लास इन इंगलैंड’ नाम से शोध कार्य प्रकाशित किया। एंजिल्स ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मार्क्स के साथ मिलकर कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो और द होली फैमिली लिखा तो वहीं दास कैपिटल के दूसरे और तीसरे भाग का संपादन भी किया। उन्होंने द ओरिजिन आफ द फैमिली, प्राइवेट प्रापर्टी एंड द स्टेट, आउटकम आफ क्लासिकल जर्मन फिलासफी जैसी मशहूर किताबें लिखीं।     
       
 -मसीहुद्दीन संजरी
मो0 09455571488
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

कासगंज की साम्प्रदायिक हिंसा

               कासगंज की साम्प्रदायिक हिंसा इस मामले में अन्य दंगों से बिल्कुल अलग है क्योंकि इसकी शुरूआत एक राष्ट्रीय पर्व को लेकर दो अलग अलग आयोजनों के नाम पर हुई। एक समुदाय के लोगों ने परम्परागत ध्वाजारोहण समारोह आयोजित किया तो दूसरे ने नई परम्परा शुरू करते हुए तिरंगा यात्रा निकाला। यहाँ यह बात गौरतलब है कि अगर दोनों समुदायों के लोग गणतंत्र दिवस मना रहे थे और दोनों ही राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान में आयोजन कर रहे थे तो टकराव की स्थिति कैसे बनी? अचानक एक तकरार से शुरू हुआ विवाद पथराव, फायरिंग, आगजनी और लूटपाट में क्यों और कैसे तब्दील हो गया? संविधान को लागू किए जाने का राष्ट्रीय पर्व और राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा कम से कम उस दिन दोनों समुदायों को किसी कलंकित कर देने वाली घटना से बचने के लिए प्रेरित क्यों नहीं कर पाई? इन सवालों का जवाब ढूंढने के प्रयास में सबसे पहले आयोजकों की नीयत पर ही सवाल खड़ा होता है और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ किसी पूर्व साजिश की तरफ इशारा करती हैं। पक्षों के आरोप प्रत्यारोप, पुलिस प्रशासन की प्रतिक्रिया के अलावा नागरिक और मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले तीन संगठनों रिहाई मंच, सिटिजन्स अगेंस्ट हेट और एआईपीएफ (टीम के सदस्यों के नाम नीचे दिए गए हैं) ने कासगंज साम्प्रदायिक हिंसा के तथ्यों को संकलित कर रिपोर्टें जारी की हैं, आयोजनों और हिंसा सम्बंधी कुछ वीडियो भी सामने आए हैं जिनसे परत दर परत बहुत कुछ खुल कर सामने आ जाता है। तीनों संगठनों की रिपोर्टों में कासगंज साम्प्रदायिक हिंसा को पूर्व नियोजित बताया गया है और यह भी कहा गया है कि पुलिस की भूमिका संदिग्ध और पक्षपातपूर्ण रही है। 26 जनवरी की सुबह मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र हुल्का मुहल्ले में वीर अब्दुल हमीद चौक पर ध्वजारोहण कार्यक्रम की तैयारियाँ चल रही थीं। कुर्सियाँ लगाई जा चुकी थीं। ध्वजारोहण का समय बिल्कुल करीब था कि संकल्प फाउंडेशन और एबीवीपी के नवजवान (जिनमें से कुछ के पास तमंचे भी थे) 50-60 मोटर साइकिलों से तिरंगा यात्रा लेकर अब्दुल हमीद चौक पर पहुँच गए और यात्रा के लिए रास्ता देने की मांँग करने लगे। आयोजकों ने उन्हें ध्वजारोहण तक रुकने के लिए कहा और समारोह में शामिल होने के लिए आमंत्रित भी किया लेकिन बाइक सवार युवक इसके लिए तैयार नहीं हुए और यात्रा जारी रखने पर अड़े रहे। कुछ समझदार लोगों ने यात्रा में तिरंगे से ज्यादा भगवा झंडों को देखते हुए भाँप लिया कि ये लोग टकराव की स्थिति उत्पन्न करना चाहते हैं इसलिए उन्होंने एक पंक्ति कुर्सी हटा कर रास्ता देने का प्रस्ताव किया लेकिन बाइक सवार इतने से संतुष्ट नहीं हुए। इस बीच बाइक सवारों ने नारे लगाने शुरू कर दिए। नारे कुछ धार्मिक थे और कुछ में मुस्लिमों के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हुए उनके पाकिस्तान जाने की बात कही गई थी। उनमें से कुछ मुस्लिमों से तिरंगा के साथ भगवा झंडा फहराने की भी माँग करने लगे। अभी तकरार और नारेबाजी चल ही रही थी कि यात्रा में शामिल किसी ने एक बच्चे पर भगवा रंग फेक दिया। तकरार हाथा पाई में बदल गई। करीब पंद्रह मिनट तक यह टकराव चलता रहा उसके बाद बाइक सवार अपनी बाइकें छोड़कर भाग गए। इस घटना में किसी को गम्भीर चोट नहीं आई। सिटिजन्स अगेंस्ट हेट की रिपोर्ट में सवाल किया गया है कि जब सुबह 8 बजे के करीब प्रभू पार्क से एबीवीपी और संकल्प फाउंडेशन की बाइक रैली बंदूक से फायर करने के साथ निकल रही थी उनसे इस बाबत कोई सवाल क्यों नहीं किया गया  या रैली के साथ पुलिस क्यों नहीं थी? वीर अब्दुल हमीद चौक से एक सँकरी गली मुस्लिम बाहुल्य मुहल्ले की तरफ जाती है। बाइक सवार उसी गली से तिरंगा यात्रा ले जाना चाहते थे जबकि प्रशासन ने उनको इसकी अनुमति नहीं दी थी। हालाँकि हमीद चौक से सौ मीटर की दूरी पर ही चौड़ी सड़क थी जहाँ से यह यात्रा निकाली जा सकती थी। बाइक सवारों की इस जिद को कुछ लोग यह कह कर तर्कसंगत साबित करने की कोशिश कर सकते हैं कि ‘तिरंगा यात्रा निकालने के लिए भी प्रशासन की अनुमति लेनी पड़ेगी?’ यह भावनात्मक तर्क सुनने में अच्छा लग सकता है लेकिन गणतंत्र दिवस के अवसर पर भी, जिस दिन देश में संविधान लागू हुआ था, अगर हम कानून का सम्मान नहीं कर सकते तो हम
संविधान और कानून के राज की बात कैसे कर सकते हैं? दूसरे यह कि तिरंगा यात्रा में भगवा या किसी और झंडे या भगवा रंग होने का क्या औचित्य हो सकता है? इससे तिरंगा यात्रा का मकसद ही संदेहजनक हो जाता है। घटना का एक सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है जिससे पता चलता है कि 8.56 बजे सुबह अब्दुल हमीद चौक पर गणतंत्र दिवस समारोह की तैयारियाँ चल रही थीं जबकि 9.40 बजे वहाँ अफरातफरी का माहौल था और गणतंत्र दिवस समारोह के लिए बिछाई गई कुर्सियाँ फेंकी जा रही थीं।
इस घटना के बाद तिरंगा यात्रा में शामिल युवक भागकर बिलराम चौक पर पहुँचे और उस घटना को ‘हिंदुओं का अपमान’ प्रचारित कर वहाँ मौजूद स्थानीय भाजपा नेताओं की मदद से लोगों को इकट्ठा किया और एक घंटे से भी कम समय में लगभग 500 की भीड़ जो ईंट पत्थर, तमंचे, पिस्टल और रायफल से लैस थी मुख्य बाजार से होती हुई मुस्लिम कालोनी की तरफ बढ़ने लगी। गणतंत्र दिवस होने की वजह से बाजार बंद था। भीड़ ने जन सम्पत्ति और मुस्लिमों की दुकानों पर हमले किए। उसके बाद पत्थरबाजी और फायरिंग शुरू हो गई। नौशाद के पैर में गोली लगी। उसने घायल अवस्था में भाग कर किसी तरह अपनी जान बचाई। नौशाद का कहना था कि जब वह बाजार में दुकाने बंद होने की वजह से लौट रहा था तो अचानक उसने भीड़ देखी जिनमें कुछ पुलिस वाले भी थे। भीड़ के साथ पुलिस वाले भी फायर कर रहे थे और उसे पुलिस फायरिंग में ही गोली लगी। दूसरी तरफ संकल्प फाउंडेशन के सक्रिय सदस्य और तिरंगा यात्रा निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अभिषेक उर्फ चंदन गुप्ता की गोली लगने से संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। चंदन पर गोली चलाने का आरोप सलीम जावेद नामक एक प्रमुख कपड़ा व्यापारी पर लगाया गया। सिटिजन्स अगेंस्ट हेट ने कासगंज दौरे के बाद अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए जो तथ्य सामने लाए हैं उसके अनुसार चंदन गुप्ता का मृत्यु स्थल स्पष्ट नहीं है और न ही सलीम जावेद की उसकी मौत में कोई भूमिका लगती है। दर असल बाइक सवार संकल्प और एबीवीपी के लोग हाथों में असलहे लहराते और फायरिंग करते हुए बड्डू नगर की ओर बढ़े तो वहाँ सरकारी गर्ल्स कालेज के पास हिंदू मुसलमानों की भीड़, जो दंगे की खबर सुनकर अपनी बच्चियों को सुरक्षित घर वापस ले जाने के लिए इकट्ठा हो गई थी, उन्हीं अभिभावकों ने अपने बच्चों की सुरक्षा के मद्दे नजर हमलावरों को खदेड़ने के लिए उन पर पत्थर फेंके जिसके बाद बाइक सवार पीछे हट गए थे। इसलिए जीआईसी कालेज या उसके सामने सलीम के घर के पास चंदन गुप्ता को गोली लगने का सवाल ही नहीं पैदा होता। दूसरे यह कि सलीम जावेद के घर के पास कहीं खून के धब्बे या गोलियों के निशान नहीं मिले। खुद सलीम जावेद साढ़े नौ बजे गणतंत्र दिवस समारोह में भाग लेने के लिए मुलका रोड स्थित मुहम्मद हसन कालेज में थे जिसके फोटो मौजूद हैं। जब अब्दुल हमीद चौक की घटना की उनको जानकारी हुई तो वे भी अपने बच्चों को स्कूल से वापस लाने वहाँ पहुँचे थे। ऐसे में वह घटना स्थल पर मौजूद नहीं रह सकते थे। कुछ स्थानीय लोगों ने यह आशंका भी जताई कि सलीम जावेद के परिवार को फँसाने में कोई अज्ञात हाथ भी हो सकता है क्योंकि वे कपड़े के कामयाब व्यापारी हैं और अगर यह परिवार बरबाद होता है तो इससे प्रतिस्पर्धा में शामिल अन्य व्यापारियों को लाभ हो सकता है। इसी तरह आरोपी बनाए गए सलीम के भाई वसीम के बारे में बताया गया कि वे तबलीगी जमात में गए हुए थे और दंगों के समय महाराष्ट्र में थे। स्थानीय लोगों में चंदन की मौत के लेकर यह भी चर्चा थी कि चंदन को गोली स्टेशन रोड पर लगी और सम्भवतः अंधाधुंध फायरिंग कर रहे चंदन के साथियों में से ही किसी की गोली उसे लगी हो या फिर पुलिस फायरिंग में। एआईपीएफ की रिपोर्ट में कहा गया है की ‘पत्रकारों की मौजूदगी में पुलिस ने दावा किया कि “सलीम के घर से पुलिस ने कोई चीज उठाई और उसे लहराते हुए यूएस की बनी हुई गन बताया और कहा कि चंदन को उसी से मारा गया। लेकिन वह खिलौना निकला। उसके घर से 12 बोर की दो लाइसेंसी बंदूकें बरामद की गईं ...। उसके बाद पुलिस ने कहा कि चंदन की मौत देसी कट्टे के फायर से हुई लेकिन उसकी मारक क्षमता उतनी दूर तक नहीं हो सकती”। सिटिजन्स अगेंस्ट हेट ने यह सवाल भी उठाया कि चंदन गुप्ता की एफआईआर उसकी मृत्यु के चौदह घंटे बाद लिखी गई है और इस विलम्ब का कोई कारण नहीं बताया गया है जो संदेह उत्पन्न करता है। चंदन गुप्ता की मौत के साथ ही राहुल उपाध्याय नामक एक अन्य युवक की हत्या की अफवाह भी फैलाई गई। सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल हुई जबकि राहुल उपाध्याय उस दिन कासगंज में था ही नहीं। इस घटना के बाद वह सामने आया और बताया कि “कासगंज हिंसा में मेरे मरने की अफवाह के बारे में मेरे एक दोस्त ने मुझे फोन पर बताया। मैंने उससे वह पोस्ट फारवर्ड करने को कहा और देखा तो बात सही थी”।
                 लखीमपुर खीरी निवासी मो. अकरम हबीब अस्पताल में भर्ती अपनी पत्नी को देखने के लिए कार से अलीगढ़ जा रहा था। कासगंज में एक जगह वह चाय पीने के लिए रूका। शाम हो चुकी थी। चाय बनने में समय था। इस बीच अकरम नमाज अदा करना चाहता था। हिंदू चाय वाले ने अपने घर में अकरम को नमाज पढ़ने की जगह दी। चाय पीने के बाद उसने अकरम को बताया कि शहर में हिंदू मुस्लिम दंगा हो गया है। लेकिन 26 जनवरी को ही अपनी पत्नी के सम्भावित प्रसव से पहले वह अलीगढ़ पहुँच जाना चाहता था। अकरम ने कुछ गाड़ियाँ जाती देखी तो खुद भी चल पड़ा। दाढ़ी की वजह से उसके मुसलमान होने की पहचान  आसानी से की जा सकती थी। नदराई गेट के पास भीड़ उसकी गाड़ी की तरफ दौड़ी। पुलिस चौकी से मात्र 200 मीटर के फासले पर उसे रोक लिया गया और गाड़ी का शीशा तोड़ कर निर्ममता से उसकी पिटाई की गई। उसने बताया कि सब कुछ करीब 15 मिनट तक चलता रहा लेकिन पुलिस ने कोई मदद नहीं की। कुछ अन्य लोगों के हस्तक्षेप पर उसे छोड़ा गया लेकिन वह बुरी तरह घायल था और एक आँख में गहरी चोट आई थी। उसने बताया कि वह सीधे पुलिस चेक पोस्ट पर गया और सहायता मांगी। उसको तब बहुत आश्चर्य हुआ जब पुलिस के अधिकारी ने कहा ‘आज तुमको कोई मदद नहीं मिलेगी’। लेकिन इसी दरम्यान कोई बड़ा अधिकारी वहाँ पहुँच गया उसने अपने मातहतों को उसे मिशनरी अस्पताल पहुँचाने को आदेश दिया। अकरम की जान तो बच गई लेकिन उसकी एक आँख चली गई। इसी तरह कासगंज के पास गंज डुंडुवारा का एक मुस्लिम मजदूर छोटन 28 जनवरी को अपनी साइकिल से चूजे बेचने के लिए निकल पड़ा। पिछले दो दिनों से दंगों के कारण वह कुछ कमा नहीं पाया था। अपने परिवार (पत्नी और तीन बच्चों) को भूख से बचाने के लिए उसे पैसों की जरूरत थी। जब देर शाम तक वह वापस नहीं आया तो उसकी पत्नी ने पड़ोसियों की इसकी जानकारी दी। पड़ोसी एक जीप से उसे ढूंढने निकले तो चितेरा में उसे सड़क के किनारे झाड़ियों में पाया। जीप देखकर हमलावर फरार हो गए थे। उसको सिर में गम्भीर चोटें आई थीं। उसे अलीगढ़ मेडिकल कालेज में सिर की सर्जरी के बाद वेंटीलेटर पर रखा गया। डाक्टर इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि अगर छोटन बच भी गया तो वह कभी काम लायक हो पाएगा या नहीं? लेकिन जहाँ उत्तर प्रदेश सरकार ने चंदन गुप्ता के परिजन के लिए बीस लाख रूपये मुआवजा देने की घोषणा की और कई विधायक और सांसद उसके घर भी गए हालांकि चंदन का आपराधिक रिकार्ड भी है। वह अपनी भाभी की दहेज के लिए की जाने वाली हत्या का अभियुक्त था और कुछ दिनों पहले ही जेल से जमानत पर छूट कर आया था। वहीं नौशाद, अकरम और छोटन के लिए न तो किसी मुआवजे की घोषणा की गई और न ही उनसे अस्पताल में कोई मिलने ही गया। ऐसा इस तथ्य के बावजूद हुआ कि नौशाद को गोली लगी थी, अकरम पर जानलेवा हमला हुआ जिसमें उसकी एक आँख चली गई जबकि छोटन अस्पताल में मौत और जिन्दगी के बीच संघर्ष कर रहा है।
                          चंदन गुप्ता की लाश को तिरंगे में लपेट कर उसके घर लाया गया। भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के नेता चंदन गुप्ता के घर पहुँचने लगे। कासगंज के विधायक और सांसद भी पहुँच गए। भीड़ इकट्ठा होने दी गई और इन नेताओं ने सम्बोधित भी किया। सांसद राजवीर सिंह जो कल्याण सिंह के बेटे हैं, ने भड़काऊ भाषण दिया। सांसद महोदय ने केवल चंदन गुप्ता को ‘अपना आदमी’ कहते हुए मुसलमानों के खिलाफ उकसाया ही नहीं बल्कि प्रशासन के उच्च अधिकारियों को, जिनकी भूमिका अभी बहुत पक्षपातपूर्ण नहीं दिख रही थी, यह कह कर दबाव बनाने का प्रयास किया कि यह हिंदुओं पर पूर्वनियोजित हमला था और मामले की जाँच कासगंज से बाहर के अधिकारियों से करवाई जाएगी। चंदन गुप्ता के परिजन को 20 लाख रूपये का मुआवजा देकर योगी सरकार ने अपनी तरफ से उसके निर्दोष होने की सनद पहले ही दे दिया है। हालाँकि सरकार ने उसके शहीद घोषित करने की माँग पर या उसके भाई को नौकरी देने के सवाल पर अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। 27 जनवरी को चंदन गुप्ता का अंतिम संस्कार कर के लौटते हुए भीड़ ने बिलराम बाजार में मुसलमानों की दुकानों में लूटपाट और आगजनी की। बिलराम में बाजार की किसी घटना की आशंका के बावजूद वहाँ बड़ी संख्या में पुलिस बल को तैनात नहीं किया गया, शवयात्रा के साथ मौजूद पुलिस कर्मियों ने इन घटनाओं को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया।
               28 फरवरी को पीस मीटिंग बुलाई गई जिसमें जिलाधिकारी ने सुरक्षा का आश्वासन देते हुए मुसलमानों से अपनी दुकानें खोलने के लिए कहा। एसपी कासगंज सुनील सिंह ने हिंदू नवजवानों को चेतावनी देते हुए शान्ति बनाए रखने के लिए कड़े कदम की चेतावनी दी तो अगले ही दिन उनका ट्रांसफर कर दिया गया। प्रशासन के आश्वासन पर जब मुसलमानों ने अपनी दुकानें खोलीं तो उनको गिरफ्तार किया जाने लगा। सिटिजन्स अगेंस्ट हेट ने क्षेत्र का दौरा करने के बाद पाया कि मुसलमानों की दुकानों को चिह्नित कर के लूटा और जलाया गया था। जिन मुस्लिम दुकानदारों के पड़ोसी हिंदू दुकानदार थे और दोनों दुकानों के बीच लकड़ी की दीवार थी उनको या तो बहुत सावधानी से यह ध्यान रखते हुए जलाया गया था कि आग दूसरी दुकान तक न पहुँचे या फिर उन्हें छोड़ दिया गया था। चंदन गुप्ता की हत्या के आरोप में गिरफ्तार सलीम जावेद की दुकान बर्की क्लाथ स्टोर को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया गया क्योंकि उसकी दीवार पुलिस स्टेशन से सटी हुई थी। कुल मिलाकर 2 फरवरी तक मुसलमानों की 27 दुकाने (करीब पाँच बड़ी दुकानें और बाकी छोटी दुकानें जिनको स्थानीय भाषा में खोखा कहा जाता है) और दो मस्जिदों (खेरिया और बरदेवारी) को क्षतिग्रस्त किया गया या जलाया गया था जबकि किसी हिंदू की एक भी दुकान या मंदिर को नुकसान नहीं पहुँचा था। इसके अलावा 5 फरवरी को गंज डुंडवारा में साम्प्रदायिक तत्वों ने एक मस्जिद को आग लगा दी। इसके विपरीत मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में स्थित चामुंडा मंदिर और मंदिर के पीछे एचपी गैस एजेंसी की हिफाजत खुद मुसलमानों ने की। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि झंडा चौक जहाँ सबसे अधिक आगजनी की घटनाएँ हुई थीं वहाँ पर योगेश बैट्री, तूफान सोप और योगेश कास्मेटिक्स की दुकानों में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं जिनके जरिए से भीड़ में शामिल लोगों को आसानी पहचाना जा सकता है लेकिन पुलिस ने ऐसा करने में कोई रुचि नहीं दिखाई। एक सप्ताह बाद भी पुलिस ने लूटी और जलाई गई दुकानों की कोई जाँच नहीं की और न ही पड़ोसियों से ही किसी तरह की पूछताछ की। स्थानीय लोगों का कहना था कि अगर 27 जनवरी को पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया गया होता और पुलिस ईमानदारी से अपना काम करती तो इन घटनाओं को रोका जा सकता था। जाँच टीम ने यह आरोप भी लगाया कि मुस्लिम रिहाइशी इलाकों में बड़े पैमाने पर पुलिस बल को तैनात किया गया था जिससे मुसलमान कैद होकर रह गए। उनकी दुकानों, मकानों और धर्मस्थलों को कोई सुरक्षा नहीं दी गई थी। जबकि हिंदू इलाकों में पुलिस बल की तैनाती नगण्य थी और जुनूनी नवजवान आजादी से घूम रहे थे। लूटपाट और आगजनी में शामिल एबीवीपी और संकल्प फाउंडेशन से जुड़े युवकों की बड़ी संख्या पास के साहबवाला, श्वाले वाली और चित्रगुप्त कालोनी से आई थी जिसके वीडियो होने का भी दावा किया गया है लेकिन उन स्थानों पर पुलिस बल तैनात नहीं किया गया था। इसी तरह जब मुसलमानों ने आगजनी, लूटपाट और हमलों की प्राथमिकी दर्ज करवाने का प्रयास किया तो पहले उन्हें टाल दिया गया और बाद में स्पष्ट कह दिया गया कि जब तक सभी गिरफ्तारियाँ नहीं हो जातीं कोई एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी। कुछ दुकानदारों से नुकसान के आँकड़े निकाल देने की शर्त पर तहरीर तो ली गई लेकिन उन्हें दर्ज नहीं किया गया। मुसलमानों के घरों के दरवाजे तोड़कर एकतरफा मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारियाँ की जाने लगीं। पुलिस की इस अंधाधुंध कार्रवाई से भयभीत कई घरों में ताला लगाकर रहवासी पलायन कर गए। पुलिस ने सलीम जावेद के घर पर छापा मार कर दरवाजा तोड़ दिया, घर का सामान तहस नहस कर दिया और उसे खुला ही छोड़ कर चली गई। सिटिजन्स अगेंस्ट हेट की जाँच टीम ने थानाध्यक्ष से सलीम के घर में ताला लगाने का अनुरोध किया लेकिन आश्वासन के बावजूद जब ताला लगा कर घर को सुरक्षित नहीं किया गया तो जाँच टीम ने मौके पर मौजूद पुलिस वाले से अनुमति लेकर स्थानीय लोगों की मौजूदगी में घर में ताला लगाया।
    पुलिस के इसी भेदभाव पूर्ण रवैये के कारण मुस्लिमों में पुलिस के प्रति अविश्वास और भय का माहौल बन गया। कई घरों खासकर जिनमें नवयुवक थे पुलिस द्वारा उत्पीड़ित किए जाने के डर से या तो उनको हटा दिया गया या फिर घरों में ताला बंद कर के पूरा परिवार ही पलायन कर गया। कई स्थानों पर हिंदू पड़ोसियों ने इन ज्यादतियों पर अफसोस जाहिर किया लेकिन वह सामने आने या गवाही देने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। रिहाई मंच ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि “कासगंज के मुस्लिमों ने यह भी बताया कि जो कोई भी मीडिया में अपने बयान दे रहा है या मीडिया को घटना के बारे में अवगत करा रहा है पुलिस उन्हें चिह्नित कर उत्पीड़ित कर रही है। इस तरह पुलिसिया कार्यवाही जाँच को प्रभावित कर रही है और निष्पक्ष जाँच सम्भव नहीं हैं”। जिलाधिकारी के आश्वासन पर दुकानें खोलने वाले मुसलमानों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने की घटना ने उन्हें भयभीत और आशंकित कर दिया।          
 
      एआईपीएफ की टीम जो 5 फरवरी को तथ्य संकलन के लिए कासगंज पहुँची थी उसके सदस्यों को 6 फरवरी को धारा 144 के उल्लंघन के आरोप में जिला कारागार के पास महिला कारागार में एक घंटे तक बंद रखा गया। टीम ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि वे जिला कारागार में दंगों के आरोप में कैद लोगों से मिलना चाहते थे लेकिन पुलिस ने अनुमति नहीं दी और अधिकारियों ने खुद भी कोई बात करने से मना कर दिया। टीम ने बंदियों के कई हिंदू मुस्लिम परिजनों से बात की और इस निष्कर्ष पर पहुँची कि गिरफ्तार हिंदू-मुस्लिमों में से बहुतेरे बेकसूर हैं। सवर्ण और लोधी जातियों के हिंदुओं की गिरफ्तारी बहुत कम हुई और जिन्हें गिरफ्तार किया भी गया उन पर 151 जैसी मामूली धारा लगाई गई जिससे उनको फौरन जमानत मिल गई जबकि ओबीसी और दलितों पर आगजनी और लूट मार की गम्भीर धाराएँ लगाई गई हैं और कुछ मामलों में यूएपीए भी लगाया गया है जब कि मुस्लिम बंदियों पर धारा 302 और 307 भी जोड़ी गई है। गिरफ्तार अनुज तोमर के भाई और लवकुश नगर, कासगंज के निवासी आलोक तोमर ने बताया कि अनुज 27 जनवरी को बीमार पिता के लिए दवा लेने निकला था लेकिन पुलिस वालों ने बताया कि दुकानें बंद हैं इतने में एक पुलिस कार आई और उसे उठा लिया गया। थानाध्यक्ष रिपुदमन सिंह ने अनुज के खिलाफ जो केस दर्ज किया है उसके मुताबिक अनुज 27 जनवरी को अमापुर अड्डा पर आगजनी और तोड़फोड़ में शामिल था और उसे चिह्नित कर गिरफ्तार किया गया। राजवीर सिंह यादव ने बताया कि उनका बेटा राज डॉ० नवीन गौड़ के क्लीनिक पर कम्पाउंडर है। वह और उसका एक साथी कम्पाउंडर क्लीनिक बंद कर के जा रहे थे कि पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया। राज का साथी लोदा राजपूत जाति का है जिस जाति से सांसद राजवीर सिंह और वीएचपी अध्यक्ष प्रमोद जाजू आते हैं। उसकी धारा 151 में चालान कर दी गई और जमानत पाकर घर वापस आ गया। लेकिन राज पर गम्भीर धाराओं में मुकदमा कायम किया गया जिसमें यूएपीए की धारा 7 भी शामिल हैं।
थानाध्यक्ष रिपुदमन सिंह के अनुसार राज को घंटाघर के पास गिरफ्तार किया गया जहाँ वह आगजनी और तोड़फोड़ कर रहा था। जब राजवीर यादव से जाँच कर्ताओं ने पूछा कि वास्तविक अपराधी कौन लोग हैं तो उसका जवाब था “एबीवीपी और संकल्प के लोगों ने तिरंगा यात्रा निकाला और अब्दुल हमीद चौक पर ध्वजारोहण कर रहे मुसलमानों से भगवा झंडा भी फहराने की माँग की जिससे मुसलमानों ने इनकार कर दिया .... वही लोग भाजपा नेताओं से मिले, फिर से समूह बनाकर हथियारों से लैस बाइक से तहसील गए जहाँ चंदन का शव पाया गया था। पुलिस ने अब तक बाइक छोड़ कर भागने वालों में से किसी को गिरफ्तार क्यों नहीं किया? निश्चित रूप से वह लोग उस हिंसक भीड़ का हिस्सा थे जिन्होंने हमारे कासगंज की शान्ति को तबाह कर दिया, यदि वे लोग पकड़े जाते हैं तो उनके अन्य साथियों का भी पता चल जाएगा, पुलिस केवल बेगुनाह लोगों को गिरफ्तार कर रही है”। रिक्शा चालक जमशेद को भी गिरफ्तार किया गया जबकि वह 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाने के लिए स्कूल जाने वाले बच्चों को सेन्ट जोजेफ स्कूल छोड़ने गया था जिसे सीसीटीवी फुटेज में देखा जा सकता है। एआईपीएफ, एपवा और वरिष्ठ पत्रकारों की टीम के सामने दो बेमिसाल दोस्तों का मामला भी सामने आया है जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार किया है। शहजाद और प्रदीप बदायूँ के रहने वाले दो दोस्त स्कूटर से बिलराम कस्बे में शहजाद की दादी से मिलने जा रहे थे। रास्ते में पुलिस ने रोक लिया। खालिद पर हत्या के प्रयास और यूएपीए की धारा 7 समेत अन्य गम्भीर
धाराएँ लगाई गइंर् जबकि प्रदीप का चालान धारा 151 के तहत की गइंर् और उसके लिए जमानत का भी प्रस्ताव किया गया लेकिन प्रदीप ने रिहाई से इनकार कर दिया और अपने दोस्त के साथ जेल में रहने का निर्णय किया।
                   कासगंज साम्प्रदायिक हिंसा पर सबसे पहले रिहाई मंच ने 30 जनवरी को अपनी रिपोर्ट जारी की थी। रिहाई मंच नेता राजीव यादव और मो. आरिफ ने 28-29 जनवरी को कासगंज का दौरा करने के बाद वहाँ होने वाली साम्प्रदायिक हिंसा, आगजनी और लूटपाट की घटनाओं को सुनियोजित, मुस्लिम विरोधी और साजिश के तहत अंजाम दी गई बताया। रिहाई मंच ने अपनी रिपोर्ट में कहा “जाँच में प्रथम दृष्टया पाया गया कि कासगंज हिंसा पूर्वनियोजित है और पुलिस के पूर्व ज्ञान में अंजाम दी गई है”। रिहाई मंच की जाँच रिपोर्ट में कहा गया है “सोशल साइट फेसबुक पर संकल्प फाउंडेशन के सदस्यों और मुसलमान लड़कों के बीच तकरार हुई थी और यह तकरार लम्बे समय तक चलती रही जिस पर 1000 से अधिक कमेंट किए गए थे। इस तकरार के बाद संकल्प फाउंडेशन के सदस्यों की गुप्त बैठकें भी हुई थीं। इन्हीं आशंकाओं के चलते संकल्प फाउंडेशन के उपाध्यक्ष आयुष शर्मा उर्फ पंडित जी ने 20 जनवरी को गृह मंत्री, मुख्यमंत्री और यूपी पुलिस को ट्वीटर के माध्यम से सचेत करने का प्रयास भी किया था। यह बात खुद आयुष शर्मा उर्फ पंडित जी ने स्वंय अपने फेसबुक पोस्ट पर कही है। 25 जनवरी की रात भी (एक बार फिर से) आयुष शर्मा ने एसएसपी को फेसबुक पर मेसेज कर इसके बारे में चेतावनी दी थी फिर भी जानबूझकर इसे नजरअंदाज किया गया और साम्प्रदायिक तत्वों को हथियार इकट्ठा करने और हिंसा करने की ढील दी गई”। रिहाई मंच ने अपनी रिपोर्ट में कासगंज रेलवे स्टेशन के पास स्थित नाग परम्परा से जुड़े हुए शेरनाथ मंदिर, जिसके (नागपंथ के अन्य मंदिरों के) मुख्य संरक्षक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, के सम्बंधों पर भी सवाल खड़े किए। योगी के ही आदेश पर कासगंज शेरनाथ मंदिर का प्रभार वर्तमान महंत सोमनाथ को दिया गया। रिहाई मंच की रिपोर्ट कहती है कि “जाँच के दौरान यह तथ्य सामने आया है कि इस मंदिर के नए महंत के आने के बाद से हर सोमवार को संकल्प फाउंडेशन की तरफ से महा आरती का आयोजन किया जाता था जिसमें संकल्प फाउंडेशन के संस्थापक सदस्य मृतक चंदन गुप्ता की मुख्य भूमिका होती थी और वह महंत के करीबी सम्पर्क में था। रिहाई मंच की रिपोर्ट में कहा गया है कि “इसके (शेरनाथ मंदिर के) पूर्व महंत रतननाथ की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई। पूरे शहर में जुलूस भी 24 जनवरी को निकाला गया था। इस पूरे कार्यक्रम के कर्ताधर्ता संकल्प संगठन और उसके सदस्य थे”। रिहाई मंच की रिपोर्ट में अपने उक्त दावों के पक्ष में लिंक भी दिए गए हैं। संकल्प फाउंडेशन के दंगे में लिप्त होने को इस बात से भी समझा जा सकता है कि कथित तिरंगा यात्रा की अगुवाई चंदन गुप्ता कर रहा था और उसकी मृत्यु के बाद संगठन के अध्यक्ष ने मुसलमानों को नतीजा भुगतने की धमकी भी दी थी जिसका उल्लेख रिहाई मंच की रिपोर्ट में इस तरह किया गया है “ संकल्प फाउंडेशन के अध्यक्ष अनुकल्प विजय चंद्र चौहान द्वारा चंदन की मौत के बाद सोशल मीडिया और फेसबुक पर एक लम्बा वीडियो पोस्ट किया गया जिसमें चंदन की मौत के गंभीर परिणाम मुस्लिम समाज को भुगतने की चेतावनी दी गई थी। इसके बाद अगले दो दिनों तक लगातार मुसलमानों के घरों और दुकानों पर हमले और आगजनी की घटनाएँ हुईं।
                         इसके अतिरिक्त कई अन्य घटनाएँ हैं जिनसे कासगंज साम्प्रदायिक हिंसा गुजरात 2002 की तर्ज पर सुनियोजित लगती है। कासगंज में भले ही जानी नुकसान कम हुआ हो लेकिन दंगाइयों ने मुसलमानों के व्यापार को तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके कारोबार और दुकानों को तबाह किया। दूसरी तरफ पुलिस ने दंगा भड़काने के नाम पर जिन मुसलमानों को आरोपी बनाया है उनमें ज्यादातर व्यापारी हैं। पहले से लुट चुके व्यापारियों पर मुकदमे उन्हें आर्थिक तौर पर इस कदर कमजोर कर सकते हैं कि उसकी भरपाई के लिए उन्हें अपनी दुकानों और कारोबार से ही समझौता करना पड़े। जाँच रिपोर्टों में यह बात सामने आई है कि संघ भाजपा से जुड़े हिंदू मुसलमानों को खुराफाती और शान्ति का दुश्मन कहते हैं और चाहते हैं कि वह कहीं और चले जाएँ। यह अफवाह भी फैलाई गई कि मुस्लिम व्यापारी अपनी दुकानें बेचना चाहते हैं। इसके बाद जब सम्पन्न हिंदू व्यापारियों की तरफ से बहुत कम कीमत पर मुसलमानों की दुकानों को खरीदने का प्रस्ताव आता है तो कड़ियाँ अपने आप जुड़ने लगती हैं। पुलिस का रवैया बेहद पक्षपातपूर्ण रहा है। सिटिजन्स अगेंस्ट हेट की रिपोर्ट में एक प्रत्यक्षदर्शी के हवाले से कहा गया है कि अब्दुल हमीद चौक से एबीवीपी, संकल्प फाउंडेशन के लोगों की पुलिस ने सत्तर मोटर साइकलें उठाई थीं लेकिन जाँच टीम को थाने में पुलिस शुक्ला ने बताया कि वहाँ केवल 30-35 मोटर साइकिलें हैं। जबकि एआईपीएफ की टीम ने दावा किया है कि थाने में खड़ी करीब 50 मोटर साइकिलों के नम्बरों का फोटोग्राफ उनके पास है। इसका मतलब यह हुआ कि पुलिस ने किसी कानूनी कारवाई से बचाने के लिए कुछ लोगों की मोटर साइकिलें पहले ही उनके हवाले कर दी हैं और कुछ अन्य के लिए यह गुंजाइश बाकी रखी गई है। आशंका है कि ये तथ्य रिकार्ड पर नहीं लाए जाएँगे ताकि उनको किसी कानूनी पचड़े में पड़ने से बचाया जा सके और इस सिलसिले में दर्ज एफआईआर में भी किसी को नामजद नहीं किया गया, गिरफ्तारी की बात तो दूर किसी से पूछताछ तक नहीं की गई है। इसी तरह बिलराम गेट और तहसील पर दोनों समुदायों में टकराव के मामले में थानाध्यक्ष रिपुदमन सिंह द्वारा एफआईआर दर्ज कराई गई है जिसमें चार मुस्लिमों को नामजद किया गया है लेकिन किसी हिंदू का नाम नहीं है जबकि शरारती तत्वों के कानून हाथ में लेने के वीडियों भी सामने आ चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह कि गुजरात के ही तर्ज पर मुस्लिमों द्वारा एफआईआर के लिए दी गई तहरीरों के आधार पर अलग अलग मुकदमे कायम न कर के पुलिस ने सामूहिक रूप से दर्ज करवाई हैं और आशंका है कि दंगों के साजिशकर्ता और रसूख वाले लोगों तक कानून के हाथ नहीं पहुँचने दिए जाएँगे जैसा कि अब तक की गिरफ्तारियों से स्पष्ट होता है।
                       कुछ विशेषज्ञ इस दंगे के राजनैतिक पहलुओं पर बहस करते हुए संदेह जता रहे हैं कि मध्य यूपी में इस तरह के दंगों के जरिए से भाजपा हिंदुओं को एक जुट कर क्षेत्र को यादव राजनीति के दबदबे से बाहर लाना चाहती है। मुजफ्फरनगर दंगों के सहारे जाटों को अपने साथ रहने पर लगभग विवश कर चुकी भाजपा यादव राजनीति को भी उखाड़ फेंकना चाहती है और कृषि आधारित इन समुदायों के किसान आन्दोलन को दफन कर रोजी रोटी के सवाल को भगवा परचम में लपेट कर आलू और प्याज के संकट से भी छुटकारा पाना चाहती है जो पिछले दिनों उसके लिए शर्म का कारण बने थे। दूसरी तरफ मुस्लिम व्यापारियों के कारोबार तबाही के हवाले से नोटबंदी, एफडीआई और जीएसटी से बुरी तरह प्रभावित छोटे (हिंदू) व्यापारियों को लाभ पहुँचाने का झुनझुना देकर एक बार फिर अपने पक्ष में खड़ा करने का प्रयास भी हो सकता है। जाहिर सी बात है इसे 2019 के लोक सभा चुनाव की तैयारी के तौर पर भी देखा जा रहा है। अगर विशेषज्ञों का आँकलन सही साबित होता है तो आने वाले समय में इस तरह के और दंगों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रदेश की इस पूरी घटना में विपक्ष कहीं नजर नहीं आया और आगे भी इसके लक्षण नहीं दिखाई देते इसलिए प्रतिरोध की जिम्मेदारी जागरूक नागरिकों को ही निभानी होगी जिसके लिए उन्हें तैयार रहने की जरूरत है।
    (रिहाई मंच की तरफ से राजीव यादव और मो. आरिफ ने तथ्य संकलन किया। सिटिजन्स अगेंस्ट हेट की टीम में शामिल हैं पूर्व आईजी एसआर दारापुरी, पत्रकार अमितसेन गुप्ता, हसनुलबन्ना, अलीमुल्लाह खान, एक्टिविस्ट राखी सेहगल, एडवोकेट असद हयात, मोहित पांडे जेएनयूएसयू, बनोज्योत्सना लाहिरी अध्यापिका, एक्टिविस्ट नदीम खान, खालिद सैफी, शारिक हुसैन अंतिम पाँच सिटिजन्स अगेंस्ट हेट से भी जुड़े हैं। एआईपीएफ की टीम में वरिष्ठ पत्रकार और एक्टिविस्ट जॉन दयाल, किरन शाहीन, एक्टिविस्ट लीना दबेरू, AIPWA की कविता कृष्णन, किसान महासभा के उपाध्यक्ष प्रेम सिंह गहलोत, जेएनयू-आइसा से विजय कुमार और परवेज अहमद)


मसीहुद्दीन संजरी
मो0 09455571488
लोकसंघर्ष पत्रिका मार्च 2018 में प्रकाशित

गुरुवार, 30 जून 2016

आज़मगढ़ दंगा-दलित कंधों पर साम्प्रदायिकता की बंदूक

राजनैतिक हलकों में इस बात की आशंका तो पहले से ही जताई जा रही थी कि उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक खेल खेला जा सकता है। आशंका यह भी थी कि पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश इसकी चपेट में पहले आ सकते हैं। इस लिहाज़ से आज़मगढ़ का दंगा बहुत आश्चर्य में डालने वाला नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस तरह से एक छोटी सी घटना का लाभ दंगे के लिए उठाया गया वह सोचने पर मजबूर अवश्य करती है। इस पूरी घटना को दलित उत्पीड़न से जिस प्रकार जोड़ा गया वह भी गौर तलब है और दंगों के लिए साम्प्रदायिक ताकतों की पहले से तैयारी को भी जाहिर करता है। आमतौर यह होता आया है कि दंगे भड़काने के लिए किसी लड़की से छेड़छाड़, मूर्तियों को खंडित करने या किसी धार्मिक जुलूस पर पत्थरबाज़ी जैसे आरोप लगाए जाते रहे हैं लेकिन इस बार आज़मगढ़ के खोदादादपूर गाँव में एक मुस्लिम और दलित परिवार के बीच के आपसी रंजिश के मामले को जिस तरह से साम्प्रदायिक रूप दिया गया वह साम्प्रदायिक राजनीति की आगामी रणनीति का खुलासा करने के लिए काफी है। इसे समझने के लिए इस पूरे घटनाक्रम को समझने की ज़रूरत है। खोदादादपूूर आज़मगढ़-लखनऊ रोड पर स्थित गाँव से लगी हुई एक छोटी बाज़ार है जिसके पश्चिमी भाग पर रोड के दोनों तरफ दलित बस्ती है और मुस्लिम आबादी बाज़ार के उत्तर तरफ है। 14 मई की शाम को पहले से चली आ रही एक रंजिश को लेकर दलित युवक मुसाफिर राम ने कथित रूप से दानिश पर कट्टे से फायर किया लेकिन दानिश बच गया और पास में ही वालीबाल खेल रहे अपने गाँव के मुस्लिम नौजवानों की तरफ भागा। आक्रोशित युवकों ने अपने घर की तरफ भागते मुसाफिर का पीछा किया। उसके घर को घेर लिया लेकिन मुसाफिर अपने घर के पीछे से निकल कर फरार हो चुका था। पीछा करने वालों ने मुसाफिर के घर का सामान बाहर निकाल कर आग लगा दिया। जिस समय यह घटना घटित हो रही थी मौके पर एक सब इंस्पेक्टर और चार पाँच पुलिस वाले मौजूद थे लेकिन उन्होंने न तो मुसाफिर को पकड़ने की कोशिश की और न ही भीड़ को आगज़नी से रोकने का कोई प्रयास किया। मुसाफिर आपराधिक पृष्ठिभूमि का है। उस पर हत्या और छिनैती के कई मामले दर्ज हैं। फायर करने की घटना हमेशा ही उत्तेजित करने वाली होती है लेकिन पूरे घटनाक्रम को देखते हुए इस बात में संदेह नहीं रह जाता कि अगर मुसाफिर दलित न होता तो इस घटना से उपजा आक्रोश इस हद तक न होता कि घर का सामान निकाल कर आग के हवाले कर दिया जाता। करीब 6ः30 बजे शाम को फायर की घटना से शुरू होकर यह मामला करीब 7ः00 बजे शाम तक आगज़नी पर जाकर समाप्त हो गया। अब तक पुलिस बल की संख्या भी बढ़ चुकी थी। इस पूरी घटना में भीड़ ने दलित बस्ती के किसी भी दूसरे व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया और न ही किसी तरह का कोई टकराव हुआ और किसी को चोट आई। आक्रोशित भीड़ का रुख अब प्रशासन की तरफ मुड़ गया। उसने प्रशासन से मुसाफिर की तत्काल गिरफ्तारी और फायर की घटना के बाद मुसाफिर को पकड़ने का प्रयास न करने के लिए सब इंस्पेक्टर के निलंबन की माँग शुरू कर दी। धीरे-धीरे भीड़ बढ़ती गई और पुलिस बलों की संख्या भी। इस बीच जिले के उच्च अधिकारी भी मौके पर पहुँच गए लेकिन भीड़ अपनी जगह डटी रही। भीड़ में से कुछ लोगों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ अपशब्द कहे और डीएम आज़मगढ़ की विकलांगता को निशाना बनाते हुए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। स्थिति को बेकाबू होता देख प्रशासन ने लाठी चार्ज किया जिसके जवाब में पथराव हुआ और दोनों तरफ लोगों को चोटें आईं। इसके बाद पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े जो गाँव में काफी अंदर जाकर घरों में भी गिरे। भीड़ बिखर गई, भय का राज हो गया, हर तरफ खामोशी छा गई। यह सब कुछ रात में साढ़े आठ बजे तक होता रहा। हालाँकि मुसाफिर के घर पर आग लगाने की घटना हो या फिर पुलिस प्रशासन से दुव्र्यवहार का मामला गाँव में एक बड़ा वर्ग इसके खिलाफ था। उसने इसके खिलाफ आवाज़ भी उठाई लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली। उनमें से कुछ को तो भीड़ का आक्रोश भी झेलना पड़ा। करीब डेढ़ घंटे की खामोशी के बाद अचानक रात में दस बजे के करीब मुख्य मार्ग पर स्थित इलियास अंसारी के घर, जो बाज़ार में किसी मुसलमान का इकलौता घर है, का दरवाज़ा तोड़े जाने और महिलाओं की चीख़-पुकार की आवाज़ रात के सन्नाटे को चीरती हुई दूर तक सुनाई देने लगी। घर की महिलाओं और गाँव वालों का आरोप है कि दरवाज़ा आला अधिकारियों की मौजूदगी में पुलिस बल के लोगों ने तोड़ा था। इस घटना ने पूरे दृश्य को ही बदल दिया। खोदादादपूूर के पश्चिम में पड़ोस के गाँव दाऊदपूर के लोग रोड पर आ गए। खोदादादपूर की मस्जिद के लाउड स्पीकर से बिखर चुकी भीड़ को प्रशासन की ज़्यादती के खिलाफ एकजुट होने की अपील की जाने लगी। अब आक्रोश की जगह भय का माहौल बन चुका था। उधर दाऊदपूर से लोग घटना स्थल की तरफ बढ़ने लगे। लेकिन सही समय पर वहाँ की मस्जिद के लाउड स्पीकर से लोगों को आगे न बढ़ने की अपील की जाने लगी और साथ ही प्रशासन से अनुरोध किया गया कि रात में किसी तरह की कार्रवाई न की जाए। प्रशासन की तरफ से भी लाउड स्पीकर पर ही उक्त सम्बोधन के जवाब में आश्वस्त किया गया कि अब रात में कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। इस तरह से एक बड़ी घटना जिसके बहुत संगीन परिणाम हो सकते थे, टल गई। इसी दौरान खोदादादपूर दलित बस्ती से आग की लपटें उठती हुई दिखाई पड़ीं। तीन घरों में आग लगी थी और बाहर रखे सरपत-घास आदि जलकर खाक हो गए। लेकिन इस सवाल का जवाब मिलना बाकी है कि जिस स्थान पर सैकड़ों की संख्या में पुलिस व पीएसी के जवान तैनात थे ठीक उसके बीचो बीच घरों में आग कैसे लगी जबकि किसी असामाजिक तत्व के वहाँ तक पहुँचने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी? अब तक रात के साढ़े दस बज चुके थे। इस बीच खोदादादपूर से करीब 500-600 मीटर पूर्व में सड़क के किनारे स्थित यादव बहुल गाँव फरीदाबाद से खबरें आने लगीं कि वहाँ राहगीरों को रोक कर उनके धर्म की पहचान करके मुसलमानों को मारा पीटा जा रहा है और पुलिस बल की तैनाती के बाद भी यह सिलसिला जारी है। इसके बाद रात शान्ति से बीती। कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। खोदादादपूर में उसके बाद कोई छोटी सी भी घटना नहीं हुई। अब अराजकता का केंद्र खोदादादपूर की जगह फरीदाबाद बन चुका था। जनपद के बड़े अधिकारियों की मौजूदगी में घर का दरवाज़ा तोड़ने की घटना पुलिस द्वारा ठण्डे दिमाग से की गई कार्रवाई थी जिसे किसी भी तरह अनुमोदित नहीं किया जा सकता। इसे बदले की कार्रवाई तो कहा जा सकता है लेकिन प्रशासनिक दृष्टिकोण से यह घटना उत्तेजना पैदा करने वाली थी जिसे टाला जाना चाहिए था। अगली सुबह साढ़े नौ बजे करीब आईजी पुलिस एस0के0 भगत ने खोदादादपूर  का दौरा किया। स्थानीय पुलिस ने पड़ोस के गाँवों से भी कुछ सम्मानित लोगों को आमंत्रित किया  था। लेकिन आई जी महोदय ने शान्ति स्थापित करने के लिए जनता से किसी तरह के सहयोग की बात नहीं की। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि कानून तोड़ने वालों को बख्शा नहीं जाएगा और वह दोषियों को पुलिस के हवाले न करने की स्थिति में पुलिसिया तरीके अपनाने की बात कह कर चले गए। आईजी साहब की कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कठोर रुख पर अभी बहस चल ही रही थी कि
धारा 144 लागू होने और पुलिस बल की नाक के नीचे फरीदाबाद में दंगाइयों की भीड़ जमा होने की खबरें गश्त करने लगीं। दोपहर बाद तीन बजे के करीब भाजपा के बाहुबली नेता रमाकांत यादव अपने दल बल के साथ खोदादादपूर दलित बस्ती में करीब दस मिनट रुकने के बाद फरीदाबाद गए और पाँच बजे तक कई अन्य गाँवों का दौरा किया। भाजपा जिला अध्यक्ष सहजानंद राय भी आ गए। भीड़ तेज़ी से बढ़ने लगी। करीब डेढ़ से दो हज़ार लोग फरीदाबाद में मुख्य सड़क से इतने करीब इकट्ठा थे कि कोई भी आने जाने वाला आसानी से उसे देख सकता था। उतनी ही भीड़ उनकी उत्तर दिशा में रेलवे लाइन के पास और दक्षिण दिशा में नहर के दूसरी तरफ भी मौजूद थी। वहाँ से गुज़रने वालों ने तो उस भीड़ को देखा और अनुमान भी लगा लिया कि अगले कुछ घंटों में क्या होने वाला है लेकिन जिला प्रशासन और फरीदाबाद में तैनात पुलिस बल ने कुछ नहीं देखा। पुलिस की निष्क्रियता को देखते हुए समाजवादी पार्टी के हिंदू मुस्लिम सभी नेताओं से सम्पर्क किया गया लेकिन उन्होंने यह कह कर घटना स्थल तक आने से इनकार कर दिया कि प्रशासन ने नेताओं के वहाँ जाने पर रोक लगा रखी है और वह प्रशासन से सम्पर्क में हैं। शाम को करीब साढ़े पाँच से पौने छः बजे के बीच फरीदाबाद मे मौजूद दंगाई भीड़ ने अचानक खोदादादपूर गाँव पर पूरब से हमला कर दिया। हाथों में तेल के गैलन, लाठी, भाला और तमंचे लिए हुए तेज़ी से गाँव के बिल्कुल करीब पहुँच गए। गाँव के लोगों ने बहुत कम संख्या बल के बावजूद उनका मुकाबला किया और उन्हें भागने पर विवश कर दिया। जिस समय भीड़ हमलावर थी उस समय घटना स्थल से थोड़ी ही दूर दो ट्रक पीएसी के जवान मौजूूद थे लेकिन मूक दर्शक बने रहे, पुलिस अधिकारियों ने भी कोई जुंबिश नहीं की। इसी दौरान डीएम आज़मगढ़ भी वहाँ पहुँच गए और पीएसी के जवानों के साथ भागती हुई भीड़ को वापस फरीदाबाद तक ले गए।
    कुछ देर बाद भीड़ वहाँ से बिखर गई। रेलवे लाइन के पास और नहर के दूसरी तरफ की भीड़ जो अपनी जगह खड़ी पूरा नज़ारा देख रही थी, छंटने लगी। फरीदाबाद से वापस जाती हुई दंगाइयों की टोलियों ने फरीदाबाद के पूर्व बनगाँव बाज़ार जहाँ मुसलमानों की केवल पाँच दुकानें थीं, को लूटा और जलाया और पास में ही स्थित शेखावत की आरा मशीन को तेल छिड़क कर आग लगी दी। इसके साथ ही दंगा कई किलोमीटर के दायरे में फैल गया। रात में करीब आधा दर्जन से अधिक जगहों पर राहगीरों में मुसलमानों की पहचान करके महिलाओं बच्चों समेत पचास से ज़्यादा लोगों को बुरी तरह पीटा और लूटा गया, कई वाहनों में तोड़फोड़ की गई और जलाया गया। भारी संख्या में पुलिस व पीएसी बल की मौजूदगी के बावजूद प्रशासन नाम की कोई चीज़ कहीं दिखाई नहीं पड़ रही थी। देर रात तक अराजकता का माहौल बना रहा। अगले दिन 16 मई को प्रशासन अलग रंग में दिखा। गश्त बढ़ गई। रैपिड एक्शन फोर्स का मार्च शुरू हो गया। राहगीरों की पिटाई की एक घटना को छोड़ दें तो सब कुछ शान्त रहा। तीन दिनों के लिए इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गईं। पास के बाज़ार और जिले के स्कूल कालेज भी बंद कर दिए गए। चैबीस घंटे में ही स्थिति काबू में आ गई और तीसरे दिन स्थिति काफी हद तक सामान्य हो गई। इसके बाद कानूनी कारवाई का सिलसिला शुरू हुआ। पहले दिन की घटना की पुलिस की तरफ से एफ.आई.आर. दर्ज की गई जो केवल मुसलमानों के खिलाफ थी। हत्या के प्रयास समेत कई अन्य गम्भीर धाराओं में 21 नामज़द और 250 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। इस बात की भी व्यवस्था की गई कि खोदादादपूर के लोगों का कहीं मेडिकल न होने पाए। जहाँ भी लोगों ने मेडिकल करवाने का प्रयास किया उन्हें साफ मना कर दिया गया। जिन राहगीरों को गम्भीर चोटें आई थीं उनको इलाज के नाम पर अस्पतालों से मरहम पट्टी करवाकर घर भेज दिया गया। जिनकी हड्डियाँ टूटी थीं उनका एक्स रे तक नहीं किया गया। दूसरी तरफ 15 मई को दंगाई भीड़ द्वारा खोदादादपूर पर किए जाने वाले एकतरफा दंगाई हमले को दो समुदायों के बीच टकराव का रूप दे दिया गया और कहा गया कि 100-150 हिंदू और 200-250 मुसलमानों की आपस में भिड़न्त हुई। हिंदू भीड़ की तरफ से मुसाफिर और दो तीन अन्य दलितों को नामज़द करते हुए इस बात का संकेत भी दे दिया गया कि यह टकराव दलितों और मुसलमानों के बीच हुआ। जबकि दंगाई भीड़ की तरफ से यादव समाज के लोग अग्रणी भूमिका में थे। यादव बहुल गाँव फरीदाबाद उसके केंद्र में था। जिन स्थानों पर राहगीरों पर हमले किए गए उनमें भी एक दो को छोड़कर सभी घटनाएँ यादव बहुल आबादी के गाँवों के पास ही हुई थीं। इस बीच हिंदी मीडिया पुलिस के प्रवक्ता की तरह काम करता रहा। दंगाई भीड़ के हमले या राहगीरों की इतने व्यापक स्तर पर पिटाई उनके लिए कोई खबर नहीं थी। दरअसल खोदादादपूर की घटना का राजनैतिक लाभ उठाने के लिए ही उसे हिंदू-मुस्लिम बनाया गया थी। इसकी तैयारी पहले से ही चल रही थी। पिछली होली में 24 मार्च को फरीदाबाद में कुछ युवकों ने मुख्यमार्ग पर होली खेलना शुरू कर दिया और आने जाने वालों पर रंग डालने लगे। जब उन्होंने दाढ़ी वाले मुसलमानों और बुरकापोश महिलाओं पर जबरन रंग डाला तो बात बढ़ गई। अपनी इस हरकत पर शर्मिन्दा होने के बजाए मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं को एकजुट करने के लिए कई हिंदू गाँवों में माहौल बनाने का उस समय प्रयास भी किया था लेकिन कामयाबी नहीं मिली थी। खोदादादपूर में एक दलित के घर में आगज़नी की घटना पर फरीदाबाद के यादव समाज की प्रतिक्रिया उनका दलित प्रेम नहीं मुस्लिम दुश्मनी और राजनैतिक पैंतरेबाज़ी थी। इस उदाहरण से इसे आसानी से समझा जा सकता है। ग्राम खिल्लूपूर के एक दलित युवक का एक यादव लड़की से प्रेम हो गया और दोनों घर से फरार हो गए। इस घटना से आक्रोशित फरीदाबाद के यादव नौजवानों ने तीन किलोमीटर दूर खिल्लूपूर जाकर उक्त दलित के घर में तोड़फोड़ की और पूरा घर जला कर राख कर दिया। हद तो यह है कि हैंड पम्प तक तोड़ डाला और महिलाओं को बुरी तरह मारा पीटा। दलित परिवार को घर छोड़ कर भागने पर मजबूर कर दिया। डेढ़ साल तक दलित परिवार को अपने ही घर वापस नहीं आने दिया और न ही उनकी एफआईआर किसी थाने में दर्ज होने दी। इसके बावजूद अगर उसी जगह से दलित अत्याचार के नाम पर बदला लेने के लिए दंगे जैसी स्थिति पैदा की जाती है तो उसे स्वभाविक कैसे माना जा सकता है? वास्तविकता यह है कि दलितों के कंधे पर बंदूक रख कर साम्प्रदायिक उन्माद उत्पन्न करने का यह पूरा खेल भाजपा और समाजवादी पार्टी का मिला जुला खेल है जिसमें एक ने दंगे जैसी स्थिति पैदा की तो दूसरे ने अपनी आँखें बंद कर लीं। इस घटना के बाद सपा को यह एहसास होने लगा कि यादव समाज भाजपा के बाहुबली नेता रमाकांत यादव की झोली में चला जाएगा जिसे बचाने के लिए उसने उन्हें मुकदमों के जंजाल से बचा कर एहसान कर दिया। दूसरी तरफ मुसलमानों पर बड़े पैमाने पर शान्तिभंग की आशंका 107/116 का नोटिस जारी कर दिया गया। इसमें वह गाँव भी शामिल हैं जो खोदादादपूर से कई किलोमीटर की दूरी पर है और उन जगहों पर कोई घटना भी नहीं हुई थी। इस तरह सपा के मुस्लिम नेताओं को यह मौका दिया गया कि वह मुसलमानों को इस नई बला से बचाने के नाम पर अपनी पार्टी का कृतज्ञ बना सकें। इस तरह जहाँ एक तरफ भाजपा दलित वोट बैंक में  सेंधमारी की फिराक में है तो सपा नाराज़ मुसलमानों को अपने जाल में फँसाने के दाव खेल रही है।
-मसीहुद्दीन संजरी
मो 0 09455571488
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2016 में प्रकाशित

बुधवार, 30 दिसंबर 2015

अल्पसंख्यकों और दलितों पर बढ़ते हुए हमले


        घर वापसी, लव जिहाद, गोहत्या और इस जैसे न जाने कितने दूसरे मुद्दे अचानक भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की आंधी में तब्दील हो गए। धर्म और आस्था के खतरे के नारे के साथ सौ, दो सौ या पाँच सौ की भीड़ ने वह कारनामे अंजाम दिए जिसने भारतीय लोकतंत्र की चूलें हिला दीं। साम्प्रदायिकता, सामंतवाद और जातीय अस्मिताओं के पर निकल आए। इसका स्वाभाविक नतीजा हिंसा, दुराचार, कटुता और कट्टरता के रूप में जाहिर ही होना था। वह हुआ भी। इनके दुष्प्रभाव का सबसे ज्यादा शिकार हुए अल्पसंख्यक और दलित और इसके अलावा वह लोग भी जो जीवन के मूलभूत सवालों पर शासन और प्रशासन से कुछ अपेक्षाएँ रखते थे और उन सवालों के जवाब पाने को अपना अधिकार समझते थे। लेकिन साम्प्रदायिक और जातीय हिंसा के इस तांडव में वह वर्ग भी बह गया जो सामान्य परिस्थितियों में जनता के मूलभूत सवालों और अधिकारों पर सत्ता को घेरने और उससे जवाब माँगने के लिए मजबूत आवाज बनता। देश में गरीबी, किसानों की बदहाली और आत्महत्या, मजदूरों का शोषण, महिलाओं और बच्चों की दुर्गति, यौन शोषण, अभूतपूर्व महँगाई सारे सवाल पीछे रह गए। वह लोग सफल रहे जो नहीं चाहते थे कि देश में गरीब और वंचित समाज से सीधे तौर पर जुड़े इन सवालों पर बहस हो।
    एखलाक की हत्या का मामला ही लेते हैं। दादरी के बिसाहड़ा गाँव में घर में गोमाँस रखने और खाने का आरोप लगा कर 50 वर्षीय एखलाक अहमद की भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी और उसके बेटे दानिश को बुरी तरह घायल कर दिया। यह घटना 28 सितम्बर की रात दस बजे की है। अंतिम समय तक एखलाक या गाँव वालों को किसी अनहोनी की कोई आशंका तक नहीं थी। रात में दस बजे गाँव की मंदिर से लाउडस्पीकर पर एखलाक के घर गोमाँस होने का एलान होता है, मिनटों में सौ से ज्यादा लोग इकट्ठा होकर एखलाक के घर पर हमला कर देते हैं। कोई पूछताछ या बहस नहीं सीधे मारपीट शुरू हो जाती है। मंदिर के पुजारी का बयान है कि कुछ लोगों ने उसे लाउडस्पीकर से एलान करने पर मजबूर किया जिन्हें वह पहचानता नहीं है। इसके तीन कारण हो सकते हैं। पहला यह कि उन उपद्रवी तत्वों से उसे खतरा हो। वह उनके साथ खुद मिला हो या वह बाहरी लोग रहे हों जिन्हें पुजारी सचमुच नहीं पहचानता हो। इन तीनों स्थितियों में साजिश की आशंका ही प्रबल होती है। गाँव के लोगों का कहना है कि घटना के समय वह सो रहे थे। वैसे भी गाँवों में आमतौर से दस बजे तक लोग सो जाते हैं। फिर सौ के करीब वह कौन लोग थे जो न सिर्फ जाग रहे थे बल्कि इस स्थिति में थे कि किसी भी अफवाह पर मिनटों में घटना स्थल तक पहुँच जाएँ। सबसे बड़ा सवाल यह कि एखलाक के घर में गोमाँस है यह खबर किसने दी जबकि फोरेंसिक जाँच से यह साबित हो चुका है कि वह बकरे का मांस था। जब हत्या के बाद हिंदुत्वादी संगठनों और भारतीय जनता पार्टी की तरफ उंगुलियाँ उठने लगीं तो एसडीएम ने एखलाक के परिजनों को धमकी देते हुए कहा कि यदि उन्होंने भाजपा सरकार को बदनाम करने की कोशिश की तो उन्हें उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। नामजद हत्यारोपियों की गिरफ्तारी के समय विरोध प्रदर्शन, पुलिस से टकराव और आगजनी की घटनाएँ यह साबित करती हैं कि पूरे वातावरण में पहले से ही जहर घोलकर लोगों को गोलबंद किया गया था। भाजपा
विधायक संगीत सोम पीडि़त परिवार से न मिल कर हत्यारोपियों के परिजनों से मिलने गए और यह तर्क दिया कि उनसे मिलने कोई नहीं जा रहा है। क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि उनकी हमदर्दी हत्यारोपियों के साथ थी। जब इस मामले पर बहस तेज हो गई तो भाजपा के नेताओं और मंत्रियों ने घटना की गम्भीरता पर ही सवाल खड़े करना शुरू कर दिया। स्थानीय सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री महेश शर्मा ने उसी मंदिर में जाकर सभा किया जहाँ से गोहत्या की अफवाह फैलाई गई थी। इस साम्प्रदायिक हिंसा को जायज ठहराने के सारे पैंतरे असफल होते देख आर0एस0एस0 के छात्र संगठन ए0बी0वी0पी0 ने इसको एक नया मोड़ देने की कोशिश की और कहा कि मामला गोमाँस का नहीं बल्कि एखलाक के एक बेटे का हिंदू लड़की से प्रेम का था। राजनेताओं ने अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के लिए इसे गोमाँस का की अफवाह का रंग दे दिया। शायद एबीवीपी को भरोसा था कि इस नई चाल से वह माहौल को अपने पक्ष में कर सकती है। बड़े पैमाने पर होने वाली आलोचनाओं और विरोध के कारण यह गिरोह एक के बाद दूसरा झूठ बोलने पर बाध्य था। प्रधानमंत्री और भाजपा सरकार के अन्य नेताओं और मंत्रियों का शुरू से यह रवैया रहा है कि उनके कार्यकर्ता या आरएसएस से जुडे़ अन्य संगठन जब भी गैरकानूनी और अमानवीय आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते हैं तो पहले वह उसे हिंदुओं की सुरक्षा से जोड़ कर राजनैतिक ध्रुवीकरण का प्रयास करते हैं लेकिन जब बात बिगड़ती हुई महसूस होती है तो उस पर इस तरह से दुख व्यक्त करते हैं कि कहीं से भी निंदा का भाव न निकले। एखलाक की हत्या के बाद प्रधानमंत्री का घटना को दुखद बताने वाला वक्तव्य भी इसी की अक्कासी करता है।
     गोहत्या या गोतस्करी ही मात्र ऐसा मुद्दा नही है, एखलाक अकेला व्यक्ति नहीं है जिसकी हत्या इन तत्वों ने की है और न ही यह सब कुछ मात्र अल्पसंख्यकों तक सीमित है। कश्मीर के अनंतनाग निवासी ट्रक ड्राइवर शौकत अली और कंडक्टर जाहिद बट पर 9-10 अक्तूबर की रात में उसके ट्रक का विंडस्क्रीन तोड़ कर साम्प्रदायिक चरमपंथियों ने पेट्रोल बम से हमला कर दिया। पहले उन्हें जम्मू कश्मीर मेडिकल कालेज फिर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में इलाज के लिए लाया गया लेकिन जाहिद बट की जल जाने के कारण मृत्यु हो गई। हुआ यह था कि उधमपुर के शिवनगर क्षेत्र में जहरखुरानी के चलते तीन गायें मर गई थीं। साम्प्रदायिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने उसका आरोप मुसलमानों पर लगाया और देर रात कश्मीर से आने वाले ट्रक पर पेट्रोल बमों से हमला कर दिया।
    9 अक्तूबर को ही उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के करबल गाँव में एक गाय के बीमारी से मर जाने के बाद गोहत्या की अफवाह फैला कर लल्ला और शफीक पर हमला कर दिया। बुरी तरह पिट रहे बेकसूरों को वहाँ पर पहुँची पुलिस ने बचा तो लिया लेकिन भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया और पुलिस की हवाई फायरिंग के जवाब में खुद भी फायरिंग की। इसी तरह शिमला के पास सरहाना गाँव में गाय की तस्करी का आरोप लगाते हुए जनपद सहारनपुर के मिर्जापुर निवासी नोमान और उसके पाँच साथियों को बजरंग दल के गुंडों ने बुरी तरह पीटा जिससे नोमान की मौत हो गई। नोमान के परिजनों ने बताया कि वह कोई तस्कर नहीं बल्कि दूध देने वाली गाय और खेती के काम आने वाले बैलों का व्यापार करता था। उस समय भी उसके ट्रक में दूध देने वाली पाँच गायें और कुछ बैल थे। शिमला पुलिस नोमान के हत्यारों का कोई सुराग तो नहीं लगा पाई लेकिन नोमान के साथियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उनकों प्रताडि़त किया।
    एक तरफ पूरे देश में गोतस्करी के नाम पर व्यापारियों का साम्प्रदायिक आधार पर उत्पीड़न, पशुओं को लूटना, धन उगाही आदि की घटनाओं में काफी तेजी से वृद्धि हुई है तो दूसरी तरफ दलितों की हत्या, उत्पीड़न और उन्हें सरेआम नंगा करने की घटनाओं में भी बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है। एखलाक की हत्या की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि दादरी से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर हरियाणा के फरीदाबाद में सवर्ण राजपूतों ने एक दलित परिवार के घर में 20 अक्तूबर की रात करीब 2 बजे खिड़की के रास्ते पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी। इस घटना में 2 वर्ष का वैभव और 9 महीने की दूध पीती बच्ची दिव्या की जल जाने से मौत हो गई। अपने मासूमों को आग से बचाने के प्रयास में पिता जीतेंद्र कुमार और माता रेखा भी बुरी तरह झुलस गए। अभियुक्तों ने इससे पहले ही रेखा का सार्वजनिक रूप से बलात्कार करने की धमकी दी थी जिसकी रिपोर्ट भी पीडि़ता ने दर्ज करवाई थी। सत्ताधारी दल के साथ अभियुक्तों के मजबूत राजनैतिक सम्बंध हैं जिसकी वजह से हरियाणा की खट्टर सरकार के सभी खोखले आश्वासनों के बावजूद पीडि़तों के पास अब गाँव से पलायन के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
     लव जिहाद के नाम पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलने और दलितों को अपनी इस साजिश का हिस्सा बनाने के लिए उन्हें उकसाने वालों के वास्तविक एजेंडे की पोल खोलने के लिए गोकुलराज की हत्याकांड और इस जैसी अनेक घटनाएँ काफी हैं। 24, जून 2015 को तमिलनाडु के जनपद नमक्कल में 21 वर्षीय दलित इंजीनियर गोकुलराज की लाश रेलवे लाइन पर पड़ी हुई मिली। लेकिन सीसीटीवी की तस्वीरों से पता चला कि रेलवे स्टेशन से गोकुलराज का कुछ लोग अपहरण करके ले गए थे और उसकी हत्या कर के शव रेलवे लाइन पर डाल दिया था। उसका अपराध यह था कि उसने स्वर्ण जाति की एक लड़की से बात की थी जिससे कुछ लोगों की जातीय अस्मिता जाग उठी। उन्हें इस बात का संदेह था कि दोनों का आपस में प्रेम सम्बंध है। दो वर्ष पूर्व इसी जनपद के इलावरासन को भी एक सवर्ण लड़की से विवाह करने के अपराध में मार कर रेलवे लाइन पर फेक दिया गया था। बड़ी धूमधाम से अम्बेडकर जयंती मनाने का पाखंड करने वालों का अम्बेडकर के प्रति कितना स्नेह और सम्मान है उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 16 मई को महाराष्ट्र के शिरडी में दिन में दो बजे सागर शेजवाल नामक दलित युवक की कुछ सवर्ण और पिछड़ी जाति के लोगों ने मिलकर इसलिए हत्या कर दी क्योंकि उसने डाॅ० भीमराव अम्बेडकर की प्रशंसा में लिखे गए एक गीत “करा कितही हल्ला, मजबूत भीमाचा किल्ला” (कितना भी शोर मचाओ, भीम का किला बहुत मजबूत है) को अपने मोबाइल का रिंगटोन बनाया था। उसे शिरडी से अगवा करके शिंगवी गाँव के पास ले जाया गया जहाँ बियर की बोतलों और पत्थरों से मार-मार कर उसकी हत्या कर दी गई और फिर बाइक से उसके शव को बार-बार कुचला गया।
    उत्तर प्रदेश के नोएडा में सुनील गौतम उसके भाई और उनकी पत्नियों को पूरी भीड़ के सामने पुलिस ने नंगा करके अपमानित किया और यह अफवाह फैलाने की कोशिश किया कि दलित परिवार ने विरोध जताने के लिए खुद अपने कपड़े उतारे थे। इस परिवार की गलती यह थी कि उसने जाति सूचक गाली दिए जाने के खिलाफ थाने में रपट लिखवाने की हिम्मत की थी। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। इसी तरह की एक घटना में मध्यप्रदेश के छतरपुर जनपद में एक 45 वर्षीय दलित महिला को नंगा किया गया और फिर उसे पेशाब पीने पर मजबूर किया गया। घटना 24 अगस्त को उस समय पेश आई जब महिला अपने खेत में पशुओं के चरने की शिकायत करने के लिए पशु मालिक एक यादव जी के घर गई थी। मनबढ़ों के हौसले इतने बुलंद हैं कि इस घटना के बाद दलित महिला को उन्होंने यह धमकी भी दी कि अगर उनके खिलाफ कोई रपट लिखवाने का दुस्साहस किया तो जान से हाथ धोना पड़ेगा।
इसी वर्ष 16 मई को राजस्थान के नागौर जनपद में भूमि विवाद को लेकर एक दलित की तरफ से होने वाली फायरिंग में एक जाट की मौत हो गई। इससे गुस्साए जाट समुदाय के लोगों ने दलित बस्ती पर हमला कर दिया और भागते हुए दलितों को ट्रैक्टर से कुचल दिया जिसमें तीन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई और एक दर्जन से ज्यादा लोग घायल हो गए। महिलाओं के साथ मारपीट की गई उनके कपड़े नोचे गए और अभद्र व्यवहार किया गया। भीड़ द्वारा बलपूर्वक मृतकों के अंतिम संस्कार करने में बाधा उत्पन्न की गई और अस्पताल में घायलों के इलाज करने से डाॅक्टरों को रोक दिया गया। घटना की गम्भीरता को देखते हुए बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किए गए तब जाकर पीडि़तों का अंतिम संस्कार और घायलों का इलाज सम्भव हो पाया। इन सभी घटनाओं के पीछे वही हिंदुत्ववादी चरमपंथी मानसिकता काम कर रही है जिसे लगता है कि उसने केंद्र में सत्ता परिवर्तन के साथ ही भारत फतह कर लिया है। अब कानून और संविधान उनकी मुट्ठी में है वह जैसे चाहें उसकी व्याख्या कर सकते हैं। यह देखा गया है कि ऐसे तमाम मामलों में जब विरोध के स्वर मुखर होते हैं तो तुरंत कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है, कुछ गिरफ्तारियाँ भी होती हैं लेकिन बाद में अपराधी किसी न किसी बहाने आसानी से छूट जाते हैं। कभी साक्ष्यों का अभाव तो कभी आरोपियों को भीड़ के नाम पर छुपाने का प्रयास होता है। लेकिन एक उल्लेखनीय बात जो पिछले कुछ समय से देखी जा सकती है वह है घटना के बाद चलने वाली बहस में पीडि़त को सही या गलत साबित करने का प्रयास। एखलाक हत्याकांड में भी यह चर्चा अगले दिन ही से शुरू हो गई थी कि उसके घर में रखा मांस गाय का था या नहीं। नागौर में दलितों पर होने वाले हमले का तर्क एक जाट की हत्या को बताने का प्रयास इसी साजिश का हिस्सा है। अगर किसी ने कोई अपराध किया भी है तो कुछ अन्य लोगों या समूह को यह अधिकार किस कानून के तहत मिल जाता है कि वह उस नाम पर हत्या, मारपीट, बलात्कार और महिलाओं को नंगा करने जैसे घृणित अपराध कर सकता है। साम्प्रदायिक या जातीय आधार पर भीड़ द्वारा हिंसा का यह चलन बहुत खतरनाक है। साम्प्रदायिक और फासीवादी ताकतें भीड़ में अपने चेहरे को छुपा कर अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए संगठित रूप से इस तरह की हिंसा को बढ़ावा देने का काम कर रही हैं। बहस के इस मकड़जाल में उलझने के बजाए इस तरह की हिंसा को तुरंत खारिज किए जाने और उनकी ऐसी तमाम योजनाओं को नाकाम करने के लिए सकारात्मक प्रयास किए जाने की जरूरत है। बड़ी संख्या में साहित्यकारों, कवियों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों, सिने जगत से जुड़े विशिष्ट लोगों ने बढ़ती हुई असहिष्णुता और साम्प्रदयिक एवं जातीय हिंसा के खिलाफ पुरस्कार वापसी जैसे असाधारण कदम उठाए और देश की राजधानी में इसके खिलाफ सम्मेलन करके सड़कों पर उतरने का संकल्प लिया इससेे सरकार और फासीवादियों को कड़ा संदेश गया है। देश और लोकतंत्र के हित में इस प्रतिरोध को जारी रखना हम सब का दायित्व है।
-मसीहुद्दीन संजरी
मो0 09455571488

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

याकूब मेमन को फाँसी

 याकूब मेमन को 1993 के सीरियल बम धमाकों के आरोप में 30 जुलाई 2015 को नागपुर सेन्ट्रल जेल में फाँसी दे दी गई। लेकिन फाँसी की सजा सुनाए जाने से लेकर फाँसी के तख्ते पर चढ़ाए जाने तक कई सवालों पर अब भी बहस जारी है। क्या याकूब मेमन को जो सजा मिली वह उसका हकदार था? याकूब दिल्ली में गिरफ्तार किया गया था या उसने खुफिया एजंसियों और सीबीआई के साथ किसी डील के तहत आत्मसमर्पण किया था? क्या राष्ट्रपति ने याकूब मेमन की दया याचिका खारिज करते समय उससे जुड़े सभी पहलुओं पर विचार किया था?                क्या याकूब मेमन को फाँसी दिए जाने के राजनैतिक कारण थे? क्या इस फाँसी को बाबरी विध्वंस और 92, 93 के दंगों से जोड़ कर देखा जा सकता है। महत्वपूर्ण सवाल यह कि क्या याकूब की फाँसी से भारत में आतंकवाद के खिलाफ चल रहे अभियान को मजबूती मिलेगी और सबसे बढ़कर क्या वास्तव में भारत से आतंकवाद को जड़मूल से समाप्त करने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए जा रहे हैं या आतंकवाद भावनात्मक शोषण और वोट बैंक की राजनीति का हथियार बनता जा रहा है। याकूब मेमन को 1993 में होने वाले मुम्बई सीरियल धमाकों की साजिश के आरोप में विशेष टाडा अदालत ने 27 जुलाई 2007 को मृत्यु दंड की सजा सुनाई। 21 मार्च 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने टाडा अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए सजा की पुष्टि कर दी। 9 अप्रैल 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने याकूब मेमन का रिविव पेटीशन भी खारिज कर दिया। उसी महीने की 30 तारीख को महाराष्ट्र सरकार ने मेमन की मौत का वारंट जारी कर 30 जुलाई 2015 को नागपुर सेंट्रल जेल में उसकी फाँसी का दिन तय कर दिया। इस बीच 21 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने मेमन की क्योरेटिव पेटीशन भी खारिज कर दिया। अब फाँसी को केवल 9 दिन बचे थे। याकूब की फाँसी के खिलाफ कई तरफ से आवाजें उठने लगीं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश एचएस बेदी, मार्कंडेय काटजू, मशहूर अधिवक्ता राम जेठमलानी, हुसैन जैदी, आर जगन्नाथन, समेत कई विशिष्ट व्यक्तियों, संगठनों और मानवाधिकार नेताओं ने फाँसी की सजा और उस पर क्रियान्यवन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। रॉ के पाकिस्तानी डेस्क के प्रभारी अधिकारी बी0 रमन जिन्होंने याकूब मेमन को भारत वापस लाने में अहम भूमिका निभाई थी, का एक लेख रेडिफ डाट काम पर प्रकाशित हुआ जिसमें कहा गया था याकूब मेमन को फाँसी नहीं होनी चाहिए। दूसरी तरफ केंद्र सरकार और कई अन्य लोग फाँसी के पक्ष में अपने तर्क दे रहे थे। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने फाँसी की सजा सुनाई है, आतंकवाद देश के लिए एक बड़ा खतरा है इसलिए आतंकवादियों को कड़ा संदेश देने और धमाकों के पीडि़तों को न्याय दिलाने के लिए याकूब मेमन को फाँसी होनी ही चाहिए।
    इस दौरान घटनाक्रम बहुत तेजी से बदलता रहा। 26 जुलाई को कुछ विशिष्ट नागरिकों ने जिनमें पूर्व जज, पत्रकार, सांसद, विधायक आदि शामिल थे, राष्ट्रपति को मेमन की दया याचिका पर पुनर्विचार करने का आग्रह करते हुए पत्र लिखा। सुप्रीम कोर्ट में 29 जुलाई को दिन में और फिर 30 जुलाई की सुबह 4 बजकर 55 मिनट तक सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के दया याचिका खारिज करने और फाँसी दिए जाने के बीच 14 दिन का समय देने से भी इनकार कर दिया और अन्ततः उसी दिन सुबह साढ़े सात बजे याकूब मेमन के जन्म दिवस पर उसे फाँसी दे दी गई।
    कई लोगों का अब भी यह मानना है कि याकूब मेमन को इंसाफ नहीं मिला। याकूब मेमन की गिरफ्तारी के दावों से लेकर राष्ट्रपति के दया याचिका खारिज करने तक कई महत्वपूर्ण बिंदु ऐसे रहे हैं जो अदालती फैसले को भी प्रभावित कर सकते थे और राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका स्वीकार कर लेने का कारण भी बन सकते थे। दर असल याकूब मेमन को दिल्ली से 5 अगस्त 1994 को गिरफ्तार नहीं किया गया था बल्कि उसने 28 जुलाई 1994 को नेपाल में भारतीय खुफिया एवं जाँच एजेंसियों से एक डील के तहत आत्मसमर्पण किया था। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तारी दिखाए जाने के बाद उसके पास से जो कुछ बरामद हुआ था वह अपने आप में यह संदेह पैदा करने के लिए काफी था। एडवोकेट सतीश माने शिंदे ने रोजनामा इंकलाब में प्रकाशित अपने एक लेख में कहा “याकूब को सबूतों से भरे सूटकेस के साथ गिरफ्तार किया गया है। यह दस्तावेज धमाकों में आईएसआई की सक्रिय भूमिका के खुले हुए सबूत थे। याकूब के पास से जो चीजें मिली हैं उनमें पाकिस्तान में उसके परिवार के कई लोगों के भारतीय पासपोर्ट, उनके पाकिस्तान की नागरिकता के दस्तावेज, कराची में उन्हें रहने के लिए दिए गए शानदार बंगलों की वीडियो कैसेट और दाऊद इब्राहिम व टाइगर मेमन समेत भारत से फरार आरोपियों को आईएसआई द्वारा पनाह दिए जाने के सबूत मौजूद थे। फौजदारी का वकील होने की हैसियत से मैं यह मानने को तैयार नहीं था कि याकूब को वास्तव में उसी समय, उसी जगह और उन्हीं परिस्थितियों में “हिरासत” में लिया गया है जिनका दावा किया जा रहा है। मुझे यकीन था कि यह गिरफ्तारी किसी डील (समझौते) का नतीजा है”। उन्होंने यह भी दावा किया कि याकूब मेमन से एक दिन टाडा कोर्ट में लंच ब्रेक के समय उन्हें बात करने का अवसर मिला। बातचीत के दौरान याकूब ने बताया कि कराची में भारतीय खुफिया एजेंसियों के कुछ अधिकारी उसके सम्पर्क में आए फिर कराची और दुबई में उनकी मुलाकातें हुईं। एक समझौता हुआ जिसके तहत उसे ऐसे सबूत अपने साथ लाने थे जिन से बम
धमाकों के हर चरण में आईएसआई और पाकिस्तान का लिप्त होना साबित हो जाए। यह भी तय हुआ था कि वह पाकिस्तान से काठमांडू आएगा जहाँ उसे हिरासत में लेकर भारत लाया जाएगा। सतीश माने शिंदे के अनुसार याकूब ने अपनी बेटी और मां-बाप की कसम खा कर कहा था कि उसने कोई अपराध नहीं किया है। उसने उन्हें बताया था कि वह या उसके परिवार के लोगों ने अगर वास्तव में कोई अपराध किया होता तो वह कराची छोड़ने की कल्पना भी नहीं करता जहाँ उसका और उसके परिवार का पूरी तरह खयाल रखा जाता था। उसने यह भी बताया कि सब कुछ योजना के अनुसार ही हुआ लेकिन भारतीय एजेंसियाँ अपना वादा पूरा करने में नाकाम रहीं। जाहिर सी बात है किसी आरोपी और एजेंसियों के बीच कोई लिखित समझौता नहीं हो सकता जिसे किसी अदालत में पेश किया जा सके। शायद यही कारण था कि रॉ के पाकिस्तान डेस्क के प्रभारी बी रमन याकूब मेमन की फाँसी की खबर से परेशान हो गए थे। याकूब मेमन की फाँसी से कुछ दिनों पहले रेडिफ डाट काम पर प्रकाशित अपने एक लेख में उन्होंने कहा “जब से मैंने अदालत द्वारा याकूब मेमन को मृत्यु दंड दिए जाने की खबर मीडिया में पढ़ी तब से मैं अपने दिमाग में एक नैतिक असमंजस की स्थिति से गुजर रहा था, मैं यह जान कर परेशान था कि इस मुकदमे में याकूब मेमन और उसके परिवार के कुछ सदस्यों के बारे में परिस्थितियों की गम्भीरता को कम कर देने वाले तथ्य शायद अभियोजन द्वारा न्यायालय की जानकारी में नहीं लाए गए। अपनी (अभियोजन की) मृत्यु दंड प्राप्त करने की इच्छा में (इस केस) गम्भीरता को कम कर देने वाली परिस्थितियाँ कभी भी प्रकाश में आती हुई प्रतीत नहीं हुईं”। इसी लेख में उन्होंने यह स्वीकार किया कि उनके सेवामुक्त होने से कुछ दिनों पहले याकूब को काठमांडू से उठाया गया, नेपाली पुलिस की मदद से उसे भारतीय क्षेत्र (बिहार) में लाकर रिसर्च एविएशन सेंटर के जहाज से दिल्ली लाया गया। मुकदमे की गम्भीरता को कम कर देने वाली वह परिस्थितियाँ उस समझौते के अलावा और क्या हो सकती थीं जिसके तहत उसे भारत आना था, अपने परिवार के अन्य सदस्यों का आत्मसमर्पण करवाना था और धमाकों में आईएसआई और पाकिस्तान की भूमिका के सबूत लाना था। उसके इस सहयोग के बदले उसके साथ मुकदमे में अदालत से किसी कड़ी सजा की माँग न करना निश्चित रूप से शामिल रहा होगा। किसी डील की पुष्टि सीबीआई के पूर्व प्रमुख शान्तनों सेन के मीडिया में आए इस बयान से भी हो जाती है जिसमें उन्होंने कहा है कि रॉ और आईबी समेत भारत की कई खुफिया एजेंसियां मेमन को भारत लाने के लिए राजी करने हेतु उसके सम्पर्क में थीं। वह कहते हैं “हमने उन्हें भारत के उत्कृष्ट न्याय का प्रस्ताव दिया था। सीबीआई ने मेमन को इस बात का यकीन दिलाने के लिए कि उसकी सुरक्षा भारत में रहने में है, पाकिस्तान में अपने तमाम सम्पर्कों का इस्तेमाल किया था”। इस महान न्याय और भारत में उसकी सुरक्षा का मतलब साफ है कि उससे वादा किया गया था कि उसे कड़ी सजा या कम से कम मृत्यु दंड नहीं दिया जाएगा।
    इस तरह हम देख सकते हैं कि एडवोकेट सतीश माने शिंदे की आशंका, याकूब मेमन का भारतीय एजेंसियों पर विश्वासघात करने का आरोप, बी रमन का नैतिक अपराधबोध और शान्तनों सेन की स्वीकारोक्ति सबके तार आपस में मिल जाते हैं। शायद यही कारण था कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश हरिजीत सिंह बेदी ने इंडियन एक्सप्रेस को लिखे गए एक पत्र में कहा कि बी रमन के लेख को बुनियाद बनाकर “उच्चतम न्यायालय को लेख का स्वतः संज्ञान लेना चाहिए और दोनों पक्षों को सुनने के बाद सजा के सवाल पर और सबूतों को समाहित करने के लिए मामले को ट्रायल को लौटा देना चाहिए”। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने न केवल 29 जुलाई को दिन में और फिर 30 जुलाई की रात में जिस तेजी के साथ इस मामले की सुनवाई की और फाँसी पर लटकाए जाने से पहले याकूब मेमन को उसके खिलाफ दिए गए फैसले को पढ़ने तक का अवसर नहीं दिया उसके इस रवैये पर सवाल उठाते हुए कृष्ण दास राजगोपाल लिखते हैं “संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मेमन द्वारा दायर ‘डेथ वारेंट’ रद करने की याचिका पर सुप्रीम ने 29 जुलाई की शाम सवा चार बजे फैसला सुनाया जिसे उसकी फाँसी दिए जाने के लिए निश्चित समय से कुछ घंटे पहले रात में ग्यारह बजे अपलोड किया गया। ऐसे में क्या उसके पास फाँसी के तख्ते पर जाने से पहले इस फैसले को खुद से पढ़ने के लिए उचित अवसर था, क्या यह न्याय के प्राकृतिक नियम का उल्लंघन नहीं है। इसी तरह क्या राष्ट्रपति की दया याचिका खारिज किए जाने और फाँसी दिए जाने के बीच 14 दिन की मोहलत दिए जाने से सुप्रीम कोर्ट के इनकार वाले फैसले को जो 30 जुलाई की सुबह लगभग पांच बजे दिया गया था, पढ़ने का अवसर याकूब मेमन के पास था, केवल इतना पर्याप्त नहीं है कि वकील फैसला जानता है, मुकदमा मेमन द्वारा दायर किया गया है उसे खुद पढ़ना चाहिए। फैसला वकील के लिए नहीं है, मेमन के लिए है”। याकूब के भाई सुलेमान द्वारा राष्ट्रपति को दी गई दया याचिका के खारिज किए जाने के बाद दोबारा समय न दिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के तर्क से असहमति जताते हुए राजगोपाल कहते हैं “क्या आखिरी बार ‘नही’ कहने के बाद नियति के अनुरूप अपने को तैयार करने के लिए उचित समय नहीं दिया जाना चाहिए। क्या इतिहास में कही भी किसी संवैधानिक अदालत ने किसी व्यक्ति की केवल दो हफ्ते जिंदा रहने की विनती ठुकराई है अगर जेल में 21 साल बिताने के बाद एक छोटी से सेल में मेमन को मात्र 14 दिन और जिंदा रहने दिया जाता तो क्या हो जाता”। राजगोपाल ने 9 अगस्त को ‘द हिंदू’ में छपे अपने लेख में सुप्रीम कोर्ट में अन्तिम दो दिनों में तेजी से होने वाली सुनवाई और इस मुकदमे से जुड़े कुछ अन्य बिन्दुओं पर भी गम्भीर सवाए उठाए हैं।
    उन्होंने राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज किए जाने पर उनसे भी कई सवाल पूछे हैं। उनका कहना है कि क्या फाँसी देने से मात्र आठ घंटे पहले दया याचिका पर इससे पहले कभी निर्णय लिया गया है, क्या फाँसी पर निर्णय लेते समय बी रमन के रहस्योद्घाटन पर राष्ट्रपति द्वारा विचार किया गया, क्या निर्णय लेते समय राष्ट्रपति ने उसकी बीमारी का ध्यान रखा था क्योंकि किसी बीमार आदमी को फाँसी नहीं दी जा सकती, 21 साल जेल में बिताने के बाद उसके अंदर आए सुधार का संज्ञान लिया गया था क्योंकि सजा की परिभाषा के अनुसार किसी सुधर गए व्यक्ति को फाँसी पर लटकाया नहीं जा सकता।   
    इतना ही नहीं राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने जिस शीघ्रता के साथ याकूब की दया याचिका खारिज की वह भी अभूतपूर्व था। 29 जुलाई की शाम को फैसला सुनाए जाने के तुरंत बाद याकूब मेमन की दया याचिका खारिज करने के लिए भारत सरकार के गृहमंत्री राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए राष्ट्रपति भवन पहुँच गए। हालाँकि अब तक की परम्परा यह रही है कि गृह मंत्रालय ऐसे मामलों में अपनी सिफारिश लिखित रूप में राष्ट्रपति को भेजा करता था। साफ है कि यह सारी कवायद केवल इसलिए थी कि केंद्र सरकार ने याकूब मेमन को उसके जन्म दिन पर फाँसी देने का मन पहले ही बना लिया था। सरकार याकूब को उसी दिन और उसी समय फाँसी के फंदे पर लटकाने के लिए बेचैन थी और उसने इसकी व्यवस्था कर रखी थी। शायद यही वजह थी कि अभी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल ही रही थी कि याकूब को फाँसी के लिए जगा दिया गया और सुनवाई समाप्त होने से पहले ही उसकी मेडिकल जाँच भी करवा दी गई। इस परिपेक्ष्य में अगर हम देखें तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले का वह वाक्य बहुत अर्थपूर्ण हो जाता है जिसमें कहा गया है “अगर फैसले को बदला जाता रहा तो यह कानून का मजाक बन जाएगा”। यह सवाल बिल्कुल वाजिब है कि आतंकवादी वारदातों के अन्य अभियुक्तों की फाँसी की सजा पर अमल करने में यह तत्परता इससे पहले कभी क्यों नहीं दिखाई पड़ी। यहाँ यह बात स्पष्ट रहनी चाहिए कि फाँसी की सजा देना अदालत का अधिकार क्षेत्र है लेकिन फाँसी की सजा पर अमल करना राजनैतिक सत्ता का काम है। फाँसी पर लटकाए जाने के हिसाब से याकूब मेमन का केस उपर्युक्त कारणों से बहुत कमजोर था लेकिन उसे तय समय पर ही फाँसी देने के लिए सभी दाँवपेच इस्तेमाल किए गए। परंतु इसके विपरीत राजीव गांधी तथा 22 अन्य को आत्मघाती विस्फोट में मार डालने वाले सनाथन, मुरूगन और पेरारीवालन को फाँसी नहीं दी गई बल्कि तमिलनाडु विधानसभा ने उनकी फाँसी के खिलाफ प्रस्ताव तक पारित किया और बाद में उनकी फाँसी उम्रकैद में बदल दी गई। पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह रजावना को फाँसी की सजा होने और राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज कर दिए जाने के बावजूद उस पर अमल नहीं किया गया। जबकि उसने अपना अपराध स्वीकार ही नहीं किया था बल्कि उस पर गर्व भी करता था। भाजपा की सहयोगी अकाली दल ने उसको फाँसी पर लटकाए जाने का विरोध किया और अंत में उसकी फाँसी की सजा को उम्र कैद में बदल दिया गया। यह दोनों आतंकी वारदातें थीं। इस तरह यह तर्क अपने आप ही खारिज हो जाता है कि याकूब मेमन की फाँसी आतंकियों को कड़ा संदेश देने या आतंकी वारदात के पीडि़तों को इंसाफ दिलाने के लिए दी गई। इसी से यह भी साफ हो जाता है कि फाँसी पर लटकाए जाने का फैसला राजनैतिक था। यह उस साम्प्रदायिक चेतना को संतुष्ट करने के लिए किया गया जिसे संघ परिवार अपनी स्थापना से विकसित करने में लगा हुआ है और पिछले दो ढाई दशकों से संघ की राजनैतिक शाखा भाजपा के ताकतवर होने और कांग्रेस समेत सेक्यूलर कहे जाने वाले क्षेत्रीय दलों में मूल्यों के पतन के कारण इसमें बहुत तेजी से वृद्धि हुई है। याकूब मेमन की फाँसी से पहले होने वाली बहस में फाँसी का विरोध करने वालों को आतंकवाद समर्थक कह कर पाकिस्तान चले जाने की सलाह देने वालों में भाजपा सांसदों से लेकर संघ के कार्यकर्ता तक एक ही भाषा बोल रहे थे। लेकिन जब तमिलनाडु विधान सभा और भाजपा की सहयोगी अकाली दल द्वारा पंजाब विधान सभा में आतंकवाद के आरोप में फाँसी की सजा पाने वालों को क्षमादान देने का प्रस्ताव पारित किया जा रहा था तो संघ या भाजपा की तरफ से इसके खिलाफ कोई अभियान नहीं चलाया गया। अकाली दल आज भी उनकी सहयोगी है और राज्य सभा में अम्मां के समर्थन पाने के लिए भाजपा बेताब है। याकूब की फाँसी पर होने वाली बहस के दौरान यह सवाल भी उठा था कि बाबरी विध्वंस और उसके बाद फूट पड़ने वाले दंगों के अपराधियों के खिलाफ सरकार का रवैया लचर है जबकि याकूब को फाँसी देने के मामले में उसकी सक्रियता अभूतपूर्व है। यह इंसाफ का दोहरा मापदंड है। 92 और 93 के दंगों में ही करीब 900 लोग मारे गए थे लेकिन दंगा पीडि़तों को इंसाफ दिलाने के बजाए दंगा भड़काने वालों का महिमामंडन किया जाता रहा। इस बहस को साम्प्रदायिक रंग देते हुए सरकार और मीडिया ने बार-बार यह जताने का प्रयास किया कि इसे धमाकों की घटना से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। जबकि यह बिल्कुल आधारहीन बात है। श्री कृष्णा कमीशन की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि बम धमाके बाबरी विध्वंस और दंगों की प्रतिक्रिया थे। बाबरी विध्वंस और दंगों का आतंकी वारदातों से रिश्ता है, कई आतंकी घटनाओं की विवेचना में जाँच एजेंसियों ने यह दावा किया है। अक्षरधाम आतंकी हमला से लेकर दिल्ली, जयपुर, अहमदाबाद, मुम्बई में होने वाली आतंकी वारदातों की चार्जशीट में बाबरी विध्वंस और 2002 के गुजरात जनसंहार समेत अन्य दंगों का बदला लेने का आरोप अब दस्तावेज बन चुका है। मालेगांव, अजमेर शरीफ, मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस समेत करीब एक दर्जन धमाकों में भगवा आतंकियों की संलिप्तता का खुलासा होने से पहले उन धमाकों में मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी के बाद भी इसी तरह के तर्क दिए गए थे। यह अजीब स्थिति है एक तरफ मुसलमानों और मानवधिकार एवं नागरिक संगठनों समेत देश के सभ्य समाज ने इस तर्क को हमेशा खारिज किया और वह इन आरोपों को आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों को उत्पीडि़त करने के बहाने के तौर पर देखता रहा। दूसरी तरफ खुफिया और जांच एजेंसियाँ तथा सरकारें उसी को आधार बना कर इस्लामी आतंकवाद का हव्वा खड़ा करती रहीं। यह दोगलापन है। अगर वास्तव में बाबरी विध्वंस और दंगे आतंकी वारदातों के पीछे बड़ा कारण हैं तो सरकार दंगों को रोकने के लिए कड़े कानून क्यों नहीं बनाती, खुफिया और जाँच एजेंसियाँ आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून बनाने के लिए हमेशा माँग करती रहीं और एक के बाद दूसरे क्रूर और अलोकतांत्रिक कानून बनाए भी गए लेकिन दंगों पर काबू पाने के लिए उन्होंने कठोर कानून बनाने की वकालत कभी क्यों नहीं की इससे यह बात स्वतः स्पष्ट होती है कि हमारे तंत्र को दंगों को रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं है, बाबरी विध्वंस के अपराधियों को सजा दिलाने में उसकी कोई रुचि नहीं है बल्कि इन घटनाओं के सहारे वह देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का दानवीकरण करने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर रहा है। अगर सरकारी पक्ष को सही मान लिया जाए यह कहना गलत न होगा कि आतंकवाद के मूल कारणों पर हमारी सरकारें प्रहार नहीं करना चाहतीं। वरना क्या कारण है कि जब आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों को घेरना होता है तो बाबरी विध्वंस और दंगे आतंकवादी
गतिविधियों से जुड़ जाते हैं और जब मुसलमान उन्हें आतंकवाद के मामलों में कठोर सजाओं के साथ दंगों के अपराधियों को भी कड़ी सजा देने की बात करता है तो कहा जाता है कि दोनों को जोड़ कर नहीं देखा जा सकता।
    अपराध को खत्म करने की पहली और सबसे बड़ी शर्त इंसाफ है। न्याय के दो पैमाने नहीं हो सकते। एक अपराध में न्याय की दुहाई देना और दूसरे मामले में
अपराधियों का पोषण करना इंसाफ का खून है। याकूब को फाँसी पर लटकाने का फैसला न्याय की उसी एकतरफा अवधारणा का प्रतीक है। इसके दूरगामी परिणाम सामने आएँगे और आतंकवाद के खिलाफ हमारे अभियान को कमजोर करेंगे। एडवोकेट सतीश माने शिंदे के शब्दों में “मैं नहीं समझता कि याकूब मेमन के साथ जो कुछ हुआ उसके बाद अब भविष्य में कभी यह एजेंसियाँ किसी आरोपी को वापसी पर ‘प्रेरित’ करने या उनका ‘सहयोग’ प्राप्त करने में कामयाब हो पाएँगी”।
  -मसीहुद्दीन संजरी
  मोबाइल: 09455571488
लोकसंघर्ष  पत्रिका  के सितम्बर 2015  अंक में प्रकाशित

रविवार, 14 जून 2015

अप्रत्याशित फैसला

कचेहरी धमाकों के आरोपी हकीम तारिक कासमी को 24 अप्रैल 2015 को पुलिस द्वारा लगाए गए तमाम आरोपों में विद्वान जज एसपी अरविंद ने दोषी पाते हुए छः बार उम्र कैद बा मशक्कत, और 50000-50000 रूपया का तीन जुर्माना की सजा सुनाई। ऐसा बहुत कम ही होता है जब पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपों को अदालत ने अक्षरशः स्वीकार कर लिया हो। देश के इस बहुचर्चित मुकदमे में, तारिक कासमी और स्व० खालिद मुजाहिद की बेगुनाही साबित करने वाली जस्टिस निमेष आयोग की रिपोर्ट की मौजूदगी में अभियोजन की इतनी बड़ी कामयाबी किसी चमत्कार से कम नहीं है। आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तारियों के बाद यह पहला अवसर था जब तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी (गिरफ्तारी जाहिर किए जाने से दस दिन पहले किए गए अपहरण) के खिलाफ आन्दोलन चला, एफ.आई.आर. दर्ज कराई गई, सी.जी.एम. कोर्ट आजमगढ़ में मुकदमा कायम हुआ, धरने और जन सभाएँ हुईं, अखबारों में गिरफ्तारी दिखाए जाने से पहले दर्जनों खबरें भी छपीं, प्रदेश सरकार ने निमेष आयोग का गठन किया उसकी रिपोर्ट में तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी को
अवैध मानते हुए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विधि अनुसार कार्रवाई करने की संस्तुति की गई। प्रदेश सरकार ने जन दबाव में इस रिपोर्ट को स्वीकार भी किया और सदन के पटल पर भी रखा लेकिन कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाई। शायद यह आतंकवाद से सम्बंधित पहला मुकदमा था जिसमें प्रत्यक्षदर्शियों ने निमेष आयोग के समक्ष और अदालत में अपनी गवाहियाँ दर्ज करवाईं। अदालत को बताया कि उन्होंने हकीम तारिक और खालिद मुजाहिद को क्रमशः रानी की सराय, आजमगढ़ और मडि़याहू, जौनपुर से 12 दिसम्बर और 16 दिसम्बर 2007 को एस.टी.एफ. के जवानों द्वारा अगवा करते हुए देखा था। दोनों 22 दिसम्बर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार नहीं हुए थे जैसा कि एस.टी.एफ. दावा कर रही है बल्कि उस दिन गिरफ्तारी दिखाई गई थी। क्या निमेष आयोग की रिपोर्ट को मुँह चिढ़ाता बाराबंकी सेशन कोर्ट का यह फैसला उन सवालों का जवाब देता है जो जस्टिस निमेष ने अपनी रिपोर्ट में उठाए थे। यहाँ यह गौर तलब है कि निमेष आयोग के समक्ष प्रस्तुत क्षेत्राधिकारी राजेश पाण्डेय ने अपने शपथपत्र में कहा है “एस.टी.एफ. कार्यालय में एस.टी.एफ. टीम से विचार विमर्ष कर रहा था कि तभी समय करीब 2ः30 बजे द्वारा मुखबिर एस.टी.एफ. टीम के पुलिस उपाधीक्षक एस आनंद, निरीक्षक अविनाश मिश्रा, उपनिरीक्षक विनय कुमार सिंह, उप निरीक्षक धनन्जय सिंह व उप निरीक्षक ओ.पी. पाण्डेय को सूचना मिली कि कुछ संदिग्ध व्यक्ति बाराबंकी रेलवे स्टेशन के पास समय करीब प्रातः 6ः00 बजे आने वाले हैं, जिनके सम्बंध आतंकवादी संगठन से हैं। इनके पास घातक शस्त्र व विस्फोटक पदार्थ भी हैं जो किसी संगीन घटना को अंजाम देने की नीयत से लेकर आ रहे हैं”। (रिपोर्ट-एकल सदस्यीय निमेष जाँच आयोग, पेज-105) इस हलफनामे से स्वतः स्पष्ट होता है कि 22 दिसम्बर को तारिक और खालिद की कथित गिरफ्तारी से पहले इन दोनों के किसी आतंकवादी घटना में शामिल होने के बारे में एस.टी.एफ. को जानकारी नहीं थी। एस.टी.एफ. के अनुसार गिरफ्तारी के बाद उनके पास से हथियार और विस्फोटक बरामद हुए और पूछताछ में यह पता चला कि उनके सम्बंध आतंवादी संगठन हूजी से हैं और वह कचेहरी सीरियल धमाकों में शामिल थे। इस तरह अगर 22 दिसमबर 2007 को इन दोनों की बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तारी
संदिग्ध साबित हो जाती है या यह साबित हो जाता है कि एस.टी.एफ. के जवानों ने उन्हें पहले ही अगवा कर लिया था और अपनी गैरकानूनी हिरासत में  यातना का शिकार बनाया था जैसा कि अभियुक्तों का दावा है। ऐसे में हथियारों और विस्फोटकों की बरामदगी से लेकर कचेहरी धमाकों में उनकी संलिप्तता का आरोप खुद ही खारिज हो जाता है और निमेष आयोग की रिपोर्ट में इस गिरफ्तारी को पूरी तरह संदेहास्पद मानते हुए यह संस्तुति कि “अतः उपरोक्त घटना क्रम में सक्रिय भूमिका निभाकर विधि विरुद्ध कार्य करने वाले
अधिकारी, कर्मचारीगण को चिह्नित कर उनके विरुद्ध विधि के अनुसार कार्यवाही करने की संस्तुति की जाती है”। (रिपोर्ट- एकल सदस्यीय निमेष जाँच आयोग, पेज-235)
    जस्टिस निमेष ने आजमगढ़, जौनपुर और बाराबंकी में घटना स्थलों का दौरा किया। स्थानीय लोगों से बात चीत की। अभियोजन पक्ष के 46 और बचाव पक्ष के 25 साक्षीगणों से शपथपत्र लिए इसके अलावा 45 अन्य गवाहों का आयोग की तरफ से परीक्षण किया गया। तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद के मोबाइल की लोकेशन उनके बयान और बचाव पक्ष के साक्षीगण द्वारा दिए गए हलफनामे की पुष्टि करती है। मिसाल के तौर पर हकीम तारिक ने अपने हलफनामे में कहा है कि उसे शंकरपुर चेक पोस्ट रानी की सराय जनपद आजमगढ़ के पास से बुधवार के दिन दोपहर में सफेद टाटा सूमो सवार एस.टी.एफ. के अहलकारों ने जबरदस्ती गाड़ी में बैठा लिया और लेकर बनारस की तरफ चले गए। उसके बाद शाम को वहाँ से लखनऊ लाए, लखनऊ में रख कर प्रताडि़त किया और 22 दिसम्बर की सुबह बाराबंकी रेलवे स्टेशन लाकर वहाँ से गिरफ्तारी दिखाई। प्रत्यक्षदर्शियों ने भी निमेष कमीशन और बाराबंकी अदालत के सामने अपनी गवाही में इसकी पुष्टि की है। इसके अलावा हकीम तारिक के मोबाइल का लोकेशन भी 12 दिसम्बर को दिन में 12ः23 बजे रानी की सराय यू०पी० (ईस्ट) की है। इस तरह मोबाइल का लोकेशन, अभियुक्त तारिक कासमी का बयान, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान तथा अखबारों में छपी खबरें इस बात की तस्दीक करती हैं कि तारिक कासमी 12 दिसम्बर 2007 को रानी की सराय चेकपोस्ट पर थे और वहीं से उसे अगवा किया गया था। उसके बाद तारिक कासमी का कहना है कि उसी दिन शाम को उसे बनारस से लखनऊ ले जाया गया था। उसके मोबाइल का लोकेशन भी उसके बाद 13 दिसम्बर से 21 दिसम्बर तक का लखनऊ बताता है। तारिक कासमी के परिजनों ने भी रानी की सराय थाने में जो रिपोर्ट लिखवाई थी उसमें साफ कहा गया था कि तारिक का मोबाइल कभी आफ हो जाता है कभी आन। इसलिए उसको सर्वेलांस पर लगा कर पता किया जाए कि तारिक कहाँ है और उसे किन लोगों ने अगवा किया है? लेकिन पुलिस ने यह तकलीफ कभी नहीं उठाई। पुलिस का यह रवैया कोई पहेली नहीं बल्कि साफ संकेत था कि कुछ गलत हो रहा है और चूँकि उसमें बड़े अधिकारियों की भूमिका है इसलिए वह कुछ भी करने में असमर्थ हैं। बहुत कम मामलों में खासकर आतंकवाद से जुड़ी हुई किसी घटना में सिलसिलेवार चार-चार साक्ष्य (अभियुक्त एवं प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, मोबाइल लोकेशन और अखबारों में छपी खबरें) एक दूसरे की पुष्टि करते हुए पाए जाएँ। इसके अलावा रानी की सराय थाने में लिखवाई गई रिपोर्ट और सी.जे.एम. की अदालत में किया गया मुकदमा भी इन साक्ष्यों पर अपनी मुहर लगाता है। लेकिन अदालत ने इतने मजबूत साक्ष्यों को नजरअंदाज करके हकीम तारिक को छः बार उम्रकैद और 50000-50000 रूपये के तीन जुर्माने की सजा सुनाई।
    वास्ताविकता यह है कि जस्टिस निमेष आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद से ही उत्तर प्रदेश के पुलिस मुहकमें में हड़कम्प मचा हुआ था। जिस प्रकार से इस केस में अभियुक्तों को गैरकानूनी हिरासत में रख कर प्रताडि़त करने और झूठा मुकदमा बनाने का आरोप प्रदेश के बड़े पुलिस
अधिकारियों पर लगा था और आयोग की रिपोर्ट में उन्हें चिह्नित कर विधि अनुसार कार्यवाही करने की संस्तुति की गई थी इससे उन
अधिकारियों के पसीने छूट गए थे। खालिद मुजाहिद की फैजाबाद से पेशी के बाद लखनऊ वापस जाते हुए बाराबंकी में अचानक होने वाली मौत के बाद भी उन्हीं अधिकारियों पर हत्या का आरोप लगाते हुए रिहाई मंच ने लखनऊ में विधान सभा के सामने अनिश्चित कालीन धरना दिया था जो 121 दिनों तक चला था। धरने के माध्यम से भी इन
अधिकारियों की गिरफ्तारी की माँग लगातार की जाती रही थी और यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि अपनी जान बचाने के लिए निमेष आयोग के अनुसार “विधि विरुद्ध कार्य करने वाले (पुलिस) अधिकारी, कर्मचारीगण” कोई खतरनाक खेल भी खेल सकते हैं या अपने पद और अपने राजनैतिक सम्पर्कों का दुरुपयोग कर सकते हैं। खालिद मुजाहिद की मौत-हत्या को भी इसी नजरिए से देखा गया था और बाराबंकी अदालत के इस फैसले के बाद अखबारों में छपने वाली प्रतिक्रिया में भी इसका अक्स साफ तौर पर देखा जा सकता है। किसी ने इसे राजनैतिक फैसला कहा है तो किसी ने दबाव में दिया गया फैसला। रिहाई मंच ने सीधे तौर पर यह आरोप लगाया कि “इस फैसले ने साफ कर दिया है कि जिस तरीके से सरकार ने बाराबंकी में झूठी बरामदगी दिखाने वाले एसटीएफ के अधिकारियों के अलावा पूर्व डी.जी.पी. विक्रम सिंह पूर्व ए.डी.जी. बृजलाल समेत 42 पुलिस आई.बी.
अधिकारियों को बचाने के लिए निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर एक्शन नहीं लिया अब उसी काम को अदालत द्वारा करवाया जा रहा है”। (जाँच कमीशनों का सियासी खेल हुकूमत को बंद कर देना चाहिए रिहाई मंच, इनकलाब उर्दू, 27 अप्रैल, 2015, पेज-7) जजमेन्ट के पेज नं0-56 व 57 पर माननीय न्यायाधीश ने विवेचनाधिकारी पर अपनी टिप्पणी भी की है जो इस प्रकार है- ‘‘बचाव पक्ष की ओर से विद्वान अधिवक्ता ने अपने विस्तृत तर्कों में विवेचक पी0डब्लू0-8 के सम्बन्ध में यह आरोप लगाया कि विवेचक के द्वारा विवेचना के दौरान सत्यता जानने हेतु उन समाचार पत्रों या पत्रों की जो प्रति अभियुक्त के व्यपहरण के सम्बन्ध में उसे दी गई को विवेचना में सम्मिलित कर कोई जांच नहीं की गई, पर आरोप लगाते हुए कहा कि विवेचन ने निष्पक्ष विवेचना नहीं की बल्कि अभियुक्त के विरुद्ध फर्जी साक्ष्य गठित कर उसे दोषी साबित करने का प्रयास करता रहा। ऐसे विवेचक के द्वारा दिया गया निष्कर्ष साक्ष्य से ग्राह्य नहीं है। जहाँ तक इस सम्बन्ध में मेरी राय है, विवेचक पी0डब्लू0-8 की जिरह की स्वीकृति से जाहिर है कि बचाव पक्ष ने विवेचना के दौरान उसे अभियुक्त के गुम होने या उसे अपहृत कर ले जाने के सम्बन्ध में विवेचक को समाचार-पत्रों की जो कटिंग या उच्चाधिकारियों को प्रेषित पत्रों की जो प्रतियाँ दी गईं, उन्हें विवेचक ने विवेचना में सम्मिलित न करके विवेचना की लापरवाही अवश्य नजर आ रही है।’’
    राजनैतिक कलाबाजियाँ, अदालती दाँव-पेच, पुलिस के हथकंडे, साम्प्रदायिकता, कारपोरेट जगत के कुचक्र और एक आम नागरिक की सीमाएँ यह सब अपनी जगह, बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों ने अपनी आँखों से अपहरण की इस घटना को देखा, पूरे एक सप्ताह तक अखबारों में खबरें पढ़ते रहे, धरनों और प्रदर्शनों में भाग लिया या उसके साक्षी रहे, जिनकी आवाज मीडिया या सरकारी हल्कों तक नहीं पहुँच पाती है, वह इस फैसले के बारे क्या सोच रहे होंगे? वह सीधा साधा नागरिक जो अदालतों को इंसाफ का मंदिर समझता है और जिसने 22 दिसम्बर 2007 को हकीम तारिक और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी दिखाए जाने से पहले बहुत कुछ देखा, सुना और जाना था उसके मन में इस मंदिर के प्रति अब क्या तस्वीर होगी? माननीय उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालतों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर विगत में कई सख्त टिप्पणियाँ की हैं। लेकिन इस मामले का अलग महत्व है। यह मामला गाँव के किसी झगड़े की तरह नहीं है। आजमगढ़ और जौनपुर में कम ही लोग ऐसे होंगे जिन्हें गिरफ्तारी दिखाए जाने के दिन से पहले ही इस बड़े खेल के बारे में जानकारी न हो चुकी रही हो। इस मामले की गूँज विभिन्न माध्यमों से प्रदेश और देश के जागरूक और सामाजिक सरोकार रखने वालों तक भी पहले ही पहुँच चुकी थी। ऐसे में इस फैसले से उन्हें जो आघात पहुँचा होगा उसकी भारपाई कैसे हो पाएगी। इस फैसले को एक व्यक्ति या एक परिवार किस्मत का सितम मान कर सह लेगा लेकिन न्यापालिका पर आस्था को जो चोट पहुँची है उसके जख्म लम्बे समय तक हरे रहेंगे।            
 -मसीहुद्दीन संजरी 
मो0-08090696449
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