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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

Azam Khan America kyo ja rahe the? Bhashan dena tha Mr Chief Minister koi gali galauj ka competition to tha nahi-Ameeque Jamei

कुम्भ मेल के प्रबंधन पर भाषण देने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव गए हैं उनके साथ शहरी विकास मंत्री मोहम्मद आजम खा भी गए थे। इलाहाबाद कुम्भ मेला की आयोजन समिति के अध्यक्ष मोहम्मद आज़म खा थे। इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर जीआ पी व आरपीऍफ़ के लाठी चार्ज के कारण  36 लोग रेलवे स्टेशन पर भगदड़ में मर गए थे और काफी लोग घायल हो गए थे। मेला परिसर में आने जाने के समुचित साधन उपलब्ध नहीं थे और मेला परिसर से अक्सर लाठियों के बल पर यात्रियों को इलाहाबाद के बाहर भगाया जाता था और जब तूफ़ान आता था तो सारे टेंट और तम्बू धराशायी हो जाते थे। तीर्थयात्रियों की भारी भीड़ को लेकर आयोजन समिति के पास प्रबंध की कोई व्यवस्था नहीं थी। उसके बावजूद भी हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने मेले के प्रबंध व्यवस्था को लेकर भाषण देने के लिए इन लोगों को बुलया। मोहम्मद आज़म खा उत्तर प्रदेश समझ कर अमेरिका गए थे जहाँ पर सूत्रों के अनुसार उनके कपडे उतरवाए गए। हिरासत में लिया गया। और फिर भारतीय दूतावास के हस्तक्षेप के बाद रिहा हुए। इसके विपरीत समाजवादी पार्टी ने पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का का भव्य स्वागत किया था। हमारे देश में अमेरिकी चापलूसी गौरव की बात होती है। इससे पहले अभिजात्य वर्ग ब्रिटिश चापलूसी में लगा रहता था।
                           अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम को भी प्रताड़ित किया जा चुका है। एनडीए के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज की अंडरवियर उतरवाई जा चुकी थी। प्रधामंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के ऊपर बिल क्लिंटन ने शराब गिरा दी थी। अमेरिका में भारत के राजदूत व संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के राजदूतों के साथ कई बार जान बूझ कर अपमानित व प्रताड़ित किया गया है और भारत सरकार कोई विरोध नहीं कर पाती है। और अमेरिकियों और उनके कुत्तों के आने पर देवताओं जैसा स्वागत सत्कार किया जाता है। शहरी विकास मंत्री आजम खा को यह सब जानकारियां पहले से ही थी फिर वो वहां करने क्या गया था। जिस चीज के लिए वह वहां गए थे वो चीज उनको अमेरिकियों ने हवाई अड्डे पर ही दे दी।
                            भारतीय इतिहास में स्वर्गीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से इन अमेरिकियों की फूंक निकलती थी।
एक किस्सा यह भी है कि प्रधामंत्री इंदिरा गाँधी का काफिला वाशिंगटन गया। काफिला होटल में पहुँच कर अपने सूट केस भी नहीं खोल पाया था कि इंदिरा गाँधी का आदेश आ गया कि तुरंत सब लोग तैयार हो जाएँ  एरोड्रम चलना है। यह आदेश इसलिए हुआ था कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने तय कार्यक्रम को रद्द कर तीन दिन के बाद मिलने का कार्यक्रम तय कर दिया था। एरो ड्रम से यह लोग उड़े और हिंदुस्तान पहुँचने के बजाये मास्को पहुँच गए। अमेरिका जब तक समझता समझता की भारत और सोवियत संघ की 20 वर्षीय संधि हो गयी और उस संधि के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद को कई बार मुंह की खानी पड़ी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

अखिलेश सरकार की नंगई

 होलिका दहन के समय उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद के राजघाट इलाके से धर्मेन्द्र मंझवार को पुलिस पकड़ ले गयी और कई दिन थाने  में रखने के बाद कचेहरी खुलने पर सिटी मजिस्ट्रेट के यहाँ धर्मेन्द्र मंझवार को नंगा कर पीटते हुए घुमाने के बाद पेश किया गया। माननीय उच्चतम न्यायलय से लेकर   अखिलेश सरकार  मूकदर्शक है। मानवाधिकार आयोग सिर्फ कागजी हैं। पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर ही कार्य करते हैं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार में पुलिस निरंकुश है। कानून नाम से पुलिस को अपने लिए चिढती है और वसूली करने के लिए दूसरे को कानून बताने का कम करती है। पुलिस के इन कार्यों का खामियाजा अखिलेश सरकार को भुगतना पड़ेगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष ! 

 

शनिवार, 30 जून 2012

खूफिया एजेंसियों और एटीएस साम्प्रदायिक संगठन

विधान सभा पर हुआ वादा निभाओ धरना
बेगुनाह मुस्लिम युवकों छोड़ने के चुनावी वादों को पूरा करने की उठी मांग
लखनऊ। 30 जून 2012। सपा सरकार के वादे को याद दिलाते हुए विधान सभा पर विशाल धरने का आयोजन किया गया, इस अवसर पर सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचे इसके अलावा मानवाधिकार नेताओंएकार्यकर्ताओं और अन्य संगठनों के प्रतिनिधि धरने में शामिल हुए। धरने का आयोजन आतंकवाद के नाम कैद निर्दोंषों का रिहाई मंच बैनर तले आयोजित किया गया ।
मिल्ली गजट के संपादक जफरउल इस्लाम ने कहा कि वादा निभाओ धरने को संविधान के वादे से जोड़कर देखना जरुरी है क्योंकि संविधान किसी भी निर्दोष व्यक्ति के उत्पीड़न की इजाजत नहीं देता हैएइसलिए यदि कोई सरकार किसी निर्दोष का उत्पीड़न करती हैए तो वह संविधान के साथ धोखा करने जैसा हैएजिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लखनऊ में हो रहे इस धरने के मकसद को पूरे सूबे में ले जाने की जरूरत है।
पूर्व पुलिस अधिकारी एस आर दारापुरी ने कहा कि हम मुलायम सिंह को उनका चुनावी वादा याद दिलाना चाहते हैं। सरकार को आगाह किया कि जिस तबके में सरकार को बनाने का माद्दा हैए वे सरकार को बदलने की ताकत भी रखते हैं। उन्होंने खूफिया एजेंसियों और एटीएस साम्प्रदायिक संगठन करार देते हुए कहा कि इनकी कार्यपद्धति से लगता है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार और धर्म निरपेक्ष मूल्यों के बजाय बजरंग दल के प्रति जिम्मेदार है। उन्होंने खूफिया और एटीएस की साम्प्रदायिकता के खिलाफ प्रदेश व्यापी आंदोलन छेड़ने का आवाह्न किया।
आजमगढ़ से आये मानवाधिकार नेता मसीहुद्दीन संजरी ने सवाल उठाया कि विधान सभा के सामने धरना स्थल पर बड़ी संख्या में मौजूद पुलिस बतलाता है कि अल्पसंख्यकों को लेकर सरकारी मंशा कितनी संदिग्ध है
सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पाण्डेय ने कहा कि कई जांच रिपोर्टों में यह साबित हो चुका है कि उच्चाधिकारियों की जानकारी में आतंकवाद के नाम पर फर्जी मुठभेड़ की जाती है। मरने वालों के सवाल को पाकिस्तानी कहकर खारिज कर दिया जाता है। इशरत जहां का केस इसका उदाहरण है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार ईमानदारी से आतंकी वारदातों में शामिल लोगों की जांच कराये तो बहुत से बेगुनाह जेलों से बाहर आ सकते हैं।
जन संघर्ष मोर्चा के नेता लाल बहादुर सिंह ने कहा कि हाशिमपुरा दंगे के 25 साल बीत जाने के बाद न्याय न मिलने का मामला उठाया। उन्होंने हिदुस्तान को सेकलुर बनाने और जम्बूरियत बहाल करने के लिए लंबे संघर्ष का आवह्नान किय़ा। उन्होंने कहा कि बेगुनाहों की छोड़ने के अपने वायदे से मुकरकर साम्प्रदायिक एजेंडा पर बढ़ रही हैएजिसे हर हाल में रोकना ही होगा।
राष्ट्रवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और पूर्व मंत्री कौशल किशोर ने कहा कि सपा की मौजूदा सरकार ने चुनाव के दौरान वादा किया था कि वह सरकार आने पर निर्दोष मुस्लिम युवकों को जेल से रिहा करेगी। लेकिन सरकार 100 दिन बीतने पर जश्न तो मना रही है और चुनावी घोषणा को भूल गई है। उन्होंने कहा कि विधानसभा में चुनकर आये मुस्लिम विधायक या तो बेगुनाहों की रिहाई सुनिश्चित करायें या फिर इस्तीफा दे दें। उन्होंने जनता से अपील की कि मुस्लिम विधायकों के घरों को घेराव करना चाहिएएताकि वे चुनावी वादों को अमल में ला सकें।
ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने कहा कि महिलाओं की भागीदारी इस आंदोलन को मजबूत करेगी। उन्होंने कहा कि इस मसले पर महिलाओं को गोलबंद कर सड़कों पर उतरना होगा। उन्होंने कहा कि प्रतापगढ़ के अस्थान में हुए दंगे में सपा सरकार के मंत्री राजा भैया की भूमिका से तय हो गया है कि सपा यूपी को गुजरात के नक्शे कदम पर ले जाना चाहती है।
रिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने कहा कि एटीएस जिस तरह से निर्दोष मुसलमानों को उठा रही हैए उससे तय है कि सपा सरकार अपना वादा निभाने के लिए और मुसलमान युवकों को जेल में ठूंसने पर आमादाहै। उन्होंने मीडिया की संजीदगी पर सवाल उठायाए कहा कि आतंकवाद के आरोप में की गई गिरफ्तारी की खबर को बड़ी प्रमुखता से लिखा जाता हैएलेकिन जब कभी कोई आरोपी निर्दोष साबित होता है या जेल से बाहर आता हैए तो उस खबर को न के बराबर जगह दी जाती है।
इंडियन नेशनल लीग के सैय्यद सुलेमान ने कहा कि हमें देश की जम्बूरियत को बचाने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। हमें जेल जाने से नहीं डरना चाहिए। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार को चेतावनी दी कि अगर सरकार नहीं चेती तो कांग्रेस की गुलामी 2014 में ले डूबेगी।

वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह ने कहा कि मुसलमानों को सुनियोजित तरीके से शिकार बनाया जा रहा है। इस मसले पर पूरे देश में एक राजनीतिक आंदोलन किया जाना चाहिए।
लोकसंघर्ष पत्रिका के संपादक रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि समाजवादी कार्यकर्ताओं पर लगाये गये फर्जी मुकदमें तो वापस से लिए गये हैंएलेकिन आतंकवादके आरोप में बंद लोगों को नहीं छोड़ा गया है। सरकार को तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद से इस काम की शुरुआत करनी चाहिए।
पत्रकार अंजनी कुमार ने कहा कि सरकार की नजरों में जो देशद्रोही पैदा हो रहे हैंएउसके बारे में हमें संजीदगी से सोचना पड़ेगा। सरकार की नजर जनांदोलनों पर टेढ़ी हैएइसलिए हमें मानवाधिकार आंदोलनों को तेज करना होगाएतभी बेगुनाह छूट पायेंगे। उन्होंने पीयूसीएलनेता सीमा आजाद और उनके पतिविश्व विजय की गिरफ्तारी पर सवालिया निशान उठाते हुए कहा कि उन्हें कुछ मार्क्सवादी साहित्यरखने पर माओवादी बताकर बंद कर दिया गया। जो राज्य के फासीवादी चरित्र को दर्शाता है।
एडवोकेट मोण्शोएब ने कहा कि अगर सरकार कचहरी विस्फोट में पकड़े गये निर्दोष तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद को जुलाई तक नहीं छोड़ती हैए तो इसके खिलाफ सिलसिलेवार धरना.प्रदर्शन किया जायेगा।
कुंडा से आये अनवर फारुखी ने बताया कि उनके भाई कौसर फारुकी को एटीएस ने रामपुर सीआरपीएफ कांड में पकड़ लियाएजबकि वे आज तक रामपुर कभी गये ही नहीं थे। उन्होंने बताया कि इसी तरह उनके परिवार के खिलाफ आये दिने जांच के नाम पर परेशान करती रहती है और इनके खिलाफ तथ्यहीन खबरें छपवाती है।
कार्यक्रम में सिद्धार्थ कलहंसए जैद फारुखीए तारिक सफीकए शौकत अलीए आरिफ नसीमए ऋषि कुमार सिंहए कौसर फारुकीए सादिक ,एकता, राजीव यादव इत्यादि उपस्थिति थे। संचालन पीयूसीएल के प्रदेश संगठन सचिव शाहनवाज आलम ने किया।
धरने के अंत में आठ सूत्री ज्ञापन सौंपा गया.
१-आतंकवाद के नाम पर बंद किये गये निर्दोष मुसलमानों को शीघ्र छोड़ा जाये तथा उन पर से मुकदमें उठाकर नए सिरे से विवेचना कराई जाये।
२-आर डी निमेश आयोग की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाये।
३-जेलों में बंद आरोपियों का उत्पीड़न बंद किया जाये और उनकी सुरक्षा की गारंटी दी जाये।
४-उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर होने वाली गिरफ्तारियों की निष्पक्ष जांच कराई जाये।
५- गैर कानूनी तरीके से होने वाली गिरफ्तारियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाये।
६-मानवाधिकार नेत्री सीमा आजाद व उनके पति विश्वविजय की गिरफ्तारी की सीबीआई से जांच कराई जाये।
७-प्रतापगढ़ में शौकत अली को एटीएस अधिकारियों द्वारा उत्पीड़ित किये जाने की जांच कराकर दोषी अधिकारियों कि दंडित किया जाये।
८-मथुरा के कोसी कलां और प्रतापगढ़ के स्थान में हुए दंगों में पुलिस व उपद्रवियों की भूमिका की जांच कराई जाये।

रविवार, 29 अप्रैल 2012

घिर गई है भारत माता-2


कपूतों की करतूत
हमारे गांव के पंडित लिखी राम अब दुनिया में नहीं हैं। वे एक स्वरचित गीत गाते थे। गीत के बोल बड़े मार्मिक और रोमांच पैदा करने वाले थे। गीत की टेक थी - भारत माता रोती जाती निकल हजारों कोस गया हजारों कोस का बीहड़ रास्ता हमारी नजरों के सामने खिंच जाता था जिस पर रोती-बिलखती भारत माता नंगे पांव चली जाती थी। गीत सुखांत नहीं था। भगत सिंह और उनके पहले के क्रांतिकारियों की शहादत, सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज और गांधी जी की हत्या पर गीत समाप्त होता था। तब हमें राष्ट्रवाद, उसकी विचारधारा और वर्ग चरित्र के बारे में जानकारी नहीं थी। हम अपनी जन्म देने वाली मां के अलावा एक और मां - भारत माता - से जुड़ाव का अनुभव करते थे और पाते थे कि वह कष्ट में है। भावना होती थी कि भारत माता के कष्ट का निवारण होना चाहिए। तब हमें भारत माता साड़ी, मुकुट और गहनों में सजी-धजी नहीं दिखाई देती थी। उसके हाथ में तिरंगा भी नहीं होता था। वह गांव की औरतों के वेश में उन्हीं जैसी लगती थी।
बड़े होकर भी हम पंडित लिखी राम का गीत सुनते रहे। भारत माता की विशिष्ट छवि, उससे संबंधित साहित्य और बहसों के बीच बचपन में पंडित लिखी राम द्वारा खींची गई भारत माता की तस्वीर मौजूद रहती रही है। मैला आंचलमें तैवारी जी का गीत - ‘गंगा रे जमुनवा की धार नवनवा से नीर बही। फूटल भारथिया के भाग भारत माता रोई रही।’’ पढ़ा तो उसकी टान (लय) लिखी राम के गीत की टान के साथ खट से जुड़ गई। तैवारी जी के गीत की टान को सुन कर बावनदास आजादी के आंदोलन में खिंचा चला आया था। उस टान पर वह अपना जीवन आजादी के संघर्ष में बिता देता है। अंत में माफिया द्वारा निर्ममता पूर्वक मारा भी जाता है। उसे मारा ही जाना था, क्योंकि वह यह सच्चाई जान लेता है कि आजादी के बावजूद भारत माता को स्वार्थी तत्वों ने कब्जे में ले लिया है और वह जार-जार रो रही है। बावनदास गांधी का अंधभक्त है। भारत माता अंग्रेजों की कैद से छूट कर कपूतों के हाथ में पड़ गई है - इस सच्चाई पर वह कोईनिगोसिएशनकरने को तैयार नहीं था। उसकी वैसी तैयारी ही नहीं थी। वह राजनैतिक से अधिक नैतिक धरातल पर था। भला भारत माता को लेकर सौदेबाजी की जा सकती है? वह अहिंसक क्रातिकारी था।
हमारे मित्र चमनलाल ने भगत सिंह पर काम किया है। काम को और बढ़ाने के लिए उन्होंने भारत में नवउदारवाद के प्रतिष्ठापक मनमोहन सिंह को पत्र लिखा था। पता नहीं मनमोहन सिंह ने उनकी बात सुनी या नहीं। एक बार वे कह रहे थे कि भगत सिंह जिंदा रहते तो भारत के लेनिन होते। उनसे कोई पूछ सकता है कि नवउदारवादी मनमोहन सिंह से भगत सिंह पर काम के लिए मदद मांगने का क्या तर्क बनता है; और भगत सिंह लेनिन क्यों होते, भगत सिंह क्यों नहीं होते? किन्हीं रूपकिशोर कपूर द्वारा 1930 के दशक में बनाए गये एक चित्र की प्रतिलिपि मिलती है। उसमें भगत सिंह तलवार से अपना सिर काट कर दोनों हाथों से भारत माता को अर्पित कर रहा है। भारत माता भगत सिंह को हाथ उठा कर रोते हुए आशीर्वाद दे रही है। (संदर्भ: ‘मैप्स, मदर/गोडेस, मार्टिर्डम इन माॅडर्न इंडिया)
नवजागरणकालीन चिंतकों, क्रांतिकारियों, कवियों-लेखकों, चित्रकारों ने विविध प्रसंगों में भारत माता की छवि का अंकन किया है।भारत माता ग्रामवासिनीसे लेकरहिमाद्रि तुंग श्रृग से प्रबुद्ध शुद्ध भारतीके रूप में उसके गुण गाए गए हैं। भारत माता की छवि की राष्ट्रीय और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में भूमिका की सीमाएं और अंतर्विरोध आज हम जानते हैं। विद्वानों के लिए शोध का यह एक प्रमुख विषय है। लेकिन हम यह भूल गए हैं कि क्रांतिकारियों का आंदोलन हो या गांधी के नेतृत्व में चलने वाला आंदोलन या इन दोनों से पहले आदिवासियों और किसानों का आंदोलन - उनमें भारत माता को पूंजीवादी बेडि़यों से मुक्त करने की मंशा थी। आजादी के बाद समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलन की तो टेक ही पूंजीवाद विरोध थी। तो फिर यह कैसे हुआ कि देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, हथियारों से लेकर हर तरह की दलाली करने वालों, बिल्डरों, माफियाओं, नेताओं, बुद्धिजीवियों ने एका बना कर भारत माता को घेर लिया है। सब मिल कर उसे नवउदारवादी हमाम में धकेल रहे हैं। निर्लज्जों ने भारत माता की लाज बचाने का ठेका उठा लिया है!
हम यहां टीम अन्ना और उसके आंदोलन पर इसलिए चर्चा करना चाहेंगे क्योंकि वे भारत माता का नाम बढ़-चढ़ कर लेने वालों में हैं। इस विषय में ज्यादातर जो आलोचना या विरोध हुआ वह यह कि टीम अन्ना ने जंतर-मंतर पर भारत माता की जो तस्वीर लगाई वह आरएसएस लगाता है। यह बहुत ही सतही आलोचना या विरोध है। हमने आलोचकों से पूछा था कि जो आरएसएस की भारत माता से खफा हैं वे बताएं कि उनकी अपनी भारत माता कौन-सी है? दूसरे, आरएसएस की भारत माता की तस्वीर से क्या परहेज हो सकता है जब पूरा आरएसएस ही आंदोलन में मौजूद है। भारत माता के घिराव में टीम अन्ना की सहभागिता पर थोड़ा विचार करते हैं।
अन्ना आंदोलन के दौरान सबसे ज्यादा अवमूल्यन भाषा का हुआ है। इस आंदोलन की बाबत यह गंभीर मसला है। कहीं से कोई वाकया उठा लीजिए, उसमें बड़बोलापन और खोखलापन एक साथ दिखाई देगा। आंदोलन में कई गंभीर लोग शामिल हुए। कुछ बाहर गए, कुछ अभी वहीं हैं। ऐसे लोगों की भाषा पर भी असर आया है। उनकी भाषा पिछली ताकत खो बैठी। जब विरोधी पृष्ठभूमियों के और विरोधी लक्ष्य लेकर चलने वाले व्यक्ति या समूह आंदोलन के उद्देश्य से एक सााि आते हैं तो भाषा में छल-कपट और सतहीपन आता ही है। टीम अन्ना के प्रमुख सदस्यों द्वारा भाषा का अवमूल्यन अभी जारी है। उसकी प्रमुख सदस्य किरण बेदी ने हाल में कहा कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर तीन फकीर हैं, जो देश का कल्याण करने निकले हैं। हमें 1989 का वह नारा - ‘राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है’ - याद गया जो समर्थकों ने वीपी सिंह के लिए गढ़ा था।
जिनका नाम किरण बेदी ने लिया है उन तीनों को धन से बड़ा प्यार है। इसीलिए वल्र्ड बैंक से लेकर भारत और विदेश के आला अमीरों तक इनके तार जुड़े हैं। बंदा अमीर होना चाहिए, वह कौन है, कैसे अमीर बना है, इसकी तहकीकात का काम बाबाओं का नहीं होता! यहफकीरीखुद किरण बेदी और टीम अन्ना के पीछे मतवाले मीडिया तथा सिविल सोसायटी को भी बड़ी प्यारी है। फकीरी का यह नया अर्थ और ठाठ है, जो नवउदारवाद के पिठ्ठुओं ने गढ़ा है। भारत का भक्ति आंदोलन सर्वव्यापक था, जिसमें अनेक अंतर्धाराएं सक्रिय थीं। फकीर शब्द तभी का है। संत, फकीर, साधु, दरवेश - इनका जनता पर गहरा प्रभाव था। दरअसल, उन्होंने सामंती ठाठ-बाट के बरक्स विशाल श्रमशील जीवन के दर्शन को वाणी दी। ऐसा नहीं है कि उन्हें संसार और बाजार का ज्ञान और सुध नहीं है।पदमावतमें ऐसे बाजार का चित्रण है जहां एक-एक वस्तु लाखों-करोड़ों में बिकती है। लेकिन भक्त बाजार से नहीं बंधता। भक्तिकाल में फकीरी भक्त होने की कसौटी है। जो फकीर नहीं है, गरीब नहीं है, वह भक्त नहीं हो सकता। फकीरी महज मंगतई नहीं है। वह एक मानसिक गठन है, जिसे संसार में काम करते हुए उत्तरोत्तर, यानी साधना के जरिए पाया जाता है। वह हद से बेहद में जाने की साधना है, जहां भक्त केवल प्रभु का रह जाता है। जब गरीब ही भक्त हो सकता है तो प्रभु गरीब नेवाज होगा ही। यह साधना बिना सच्चे गुरु के संभव नहीं होती। इसीलिए उसे गोविंद से बड़ा बताने का भी चलन है। जाहिर है, फकीरी गुरु होने की भी कसौटी है। दिन-रात भारी-भरकम अनुदान और दान के फेरे में पड़े तथाकथित गुरुओं और संतों को क्या कहेंगे - फकीर या फ्राड! काफी पहले हमनेत्याग का भोगशीर्षक से एकसमय संवादलिखा था। उसमें सोनिया गांधी के त्याग का निरूपण किया था। अन्ना हजारे सरीखों के आरएसएस टाइप त्याग के चैतरफा पूंजीवाद और उपभोक्तवाद चलता और फलता है। त्यागी महापुरुषों को उस व्यवस्था से कोई परेशानी नहीं होती। क्योंकि वहां दान के धन से ही सामाजिक काम किए जाते हैं। दान सामंत देता है या पूंजीपति या दलाल, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
हमारे मित्र जयकुमार ने सुबह की सैर में हमेंखुशखबरीदी कि बाबा रामदेव डॉ. लोहिया का नाम ले रहे थे। करीब दो साल पहले साथी हरभगवान मेंहदीरत्ता (अब दिवंगत) ने भी हमें बताया था कि रामदेव के एक कार्यक्रम में उन्हें डॉ. लोहिया का चित्र दिखा। इस देश में गांधी के नाम पर कोई भी जबान साफ कर सकता है। किसी को ऐतराज होता है, अचरज। लगभग ऐसी ही गति क्रांतिकारियों की बन चुकी है। वे माफियाओं से लेकर बाबाओं तक के हीरो हैं। लेकिन अन्ना के अंबेडकर का और रामदेव के लोहिया का नाम लेने पर किसी को भी कौतुक होगा। अज्ञेय ने लिखा है, ‘कालिदास की पीड़ा थी, अरसिकों को कवित्त निवेदन करना पड़ जा जाए; केशवदास की पीड़ा थी, च्रद्रबदनि मृगलोचनी बाबा कहि-कहि चली जाए; अज्ञेय की पीड़ा है, मैं क्या जानता था यह गति होगी कि हिंदी विभागों में हिंदी के अध्यापकों द्वारा पढ़ाया जाऊंगा!’ भारत में आत्मा मरने के पहले भी रहती है और मरने के बाद भी। लोहिया की आत्मा को जरूर कौतुक हुआ होगा कि भारत माता के नाम पर अपने उपभोक्ता उत्पाद बेचने वाले उनका नाम ले रहे हैं!
सुना है रामदेव का अपनाविचार साहित्यभी है। उसके बारे में जो ब्यौरे इधर-उधर पढ़ने को मिलते हैं, उनसे उनकी कुंठित मानसिकता का पता चलता है। वे दरअसल कुंठित मानसिकता के प्रतिनिधि बाबा हैं। भारत के मध्यवर्ग ने पढ़ना-लिखना बिल्कुल छोड़ दिया है। स्कूल स्तर पर की गई विभिन्न विषयों की पढ़ाई भी उसके जीवन में नहीं झलकती। मध्यवर्ग की नई से नई बसने वाली काॅलोनियों में सब कुछ मिलेगा, सिवाय विचार और रचना-साहित्य के। जहां तक पत्रिकाओं का सवाल है, मनोरंजन, खेल, प्रतियोगिता और राजनीतिक खबरों की पत्रिकाओं के अलावा वहां कुछ नहीं मिलता। मध्यवर्ग ने कर्मकांड को संस्कृति और अंधविश्वास को आस्था मान लिया है। ऐसे में कुंठित मानसिकता ही पनपती है जो मीडिया की मार्फत परवान चढ़ी हुई है। जबपढ़े-लिखेमध्यवर्ग का यह हाल है तो गांवों और कस्बों के बारे में अंदाज लगाया जा सकता है। ज्यादातर फिल्में, सीरियल और धार्मिक-आध्यात्मिक प्रवचन कुंठित मानसिकता का प्रतिफलन और उसे पोसने वाले होते हैं। उपभोक्तवाद के शिकंजे में पूरी तरह फंसा भारत कामहानमध्यवर्ग भावनाओं, संबंधों, मूल्यों आदि को लेकर अजीबो-गरीब आचरण करता है। मध्यवर्ग की इस परिघटना पर हम आगे कभी विस्तार से लिखेंगे।
यह फंसाव राजनीति में भी देखने को मिलता है। ताजा उदाहरण सीपीएम कादेसी समाजवादहै। संगठित और अपने को विचारधारात्मक कहने वाली पार्टी कैसे टोटके कर रही है! उससे पूछा जा सकता है कि आचार्य नरेंद्रदेव, जेपी और लोहिया के बाहर देसी समाजवाद के कौन स्रोत हैं? लेकिन यह किसी ने नहीं पूछा और पूरे मीडिया में सीपीएम प्रस्तावित भारतीय समाजवाद की खूब धूम रही। बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर को नेताओं से और नेताओं को इन दोनों से संबंध बनाने का बड़ा शौक है। रामदेवव्यवस्था परिवर्तनके लिए राजनीतिक पार्टी बनाने से पहले लालू यादव और नीतीश कुमार के एक साथ चहेते थे। श्री श्री की हसरतेंजीवन की कलाका कारोबार शुरू करने के समय से ही जवान रही हैं। हमें ज्यादा हैरानी नहीं हुई जब देखा कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय में घुस गए हैं। हम स्टाफ रूम में बैठे थे। चार-पांच युवक-युवतियां भक्तिभाव से भरे हुए आए और सूचना दी कि श्री श्री फलां तारीख को हिंदू काॅलेज में रहे हैं। फिर कहने लगे कि वे श्री श्री और कार्यक्रम के बारे में क्लास को संबोधित करना चाहते हैं। हमने उन्हें कहा कि अपना पोस्टर लगाइए और जाइए। हमें लगा कि क्या सचमुच हमारा बीमार समाज बाबाओं की बदौलत चल रहा है!
रामदेव के साथ न्याय करते हुए कहा जा सकता है कि जब अपने को समाजवादी कहने वाले नेता और पार्टियां कारपोरेट घरानों की राजनीति करते हैं तो बाबा के लोहिया को चेला मूंडने पर क्योंकर ऐतराज किया जा सकता है? यूपी के नए मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से मिलने गए तो उन्होंने वही सब बातचीत की जो दूसरे मुख्यमंत्री करते हैं। सोना से उसकी मां और भारत माता की गोद छीन लेने वाली नवउदारवादी नीतियों पर उन्होंने जरा भी सवाल नहीं उठाया। इसके बावजूद लोगों को वहां लोहिया का समाजवाद फलीभूत होने की संभावनाएं नजर रही हैं। भारतीय समाज और राजनीति में यह जो स्थिति बनी है, उसकी अभिव्यक्ति के लिए विडंबना, विद्रूप, विसंगति जैसे पद अपर्याप्त हैं। जब कोई समाज अंधी गली में प्रवेश कर जाता है तो यही होता है। जिस आंदोलन की पीठ पर उद्योग और व्यापार जगत की हस्तियां/संस्थाएं हैं, बड़े-बड़े एनजीओ हैं, संघियों के उसमें शामिल होने की बात तो समझ आती है, समाजवादी, गांधीवादी, माक्र्सवादी उसमें डुबकी लगा रहे हैं।
राजनैतिक समझ के अभाव में अन्ना और रामदेव नहीं समझ सकते कि वे क्या कह और कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, वे वही कह और कर रहे हैं जो उनकी समझदारी है। उनकी समझदारी के मेल का समाज बना हुआ है तो उनका कहना और करना रंग लाता है। उनके सिपहसालार उन्हें किसी विशेष नेता या विचारक का नाम लेने और मुद्दा उठाने की सलाह देते हैं। लेकिन किसी के कहने पर नेता या विचारक विशेष का नाम लेना या किसी विशेष मृद्दे को उठाना रंग को चोखा नहीं कर सकता। इसके पीछे एक जिंदगी बीत जाती है। लेकिन जिनकी राजनीतिक समझदारी है, जो महत्वपूर्ण भूमिका या तो निभा चुके हैं या निभा रहे हैं, उन्हें जवाब देना पड़ेगा।
यह विचारणीय है कि अगर 1990 के पहले के माहौल में पले-बढ़े लोगों का यह आलम है तो आगे आने वाली पीढि़यों का क्या रुख-रवैया होगा? आज अगर भले ही थोड़े लोग, कम से कम संविधान की कसौटी पर, सही हैं तो आगे ज्यादा सही होने की संभावना बनी रहेगी। लेकिन आज अगर सही नहीं हैं, तब आगे भी सही नहीं होंगे। भ्रष्टाचार विरोध की ओट बहुत दिन तक साथ नहीं दे सकती। विदेशी बैंकों में जमा काला धन हो या यहां की लूट, दोनों पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत हैं। काला धन फिर जमा हो जाएगा। जमा करने वालों में बाबाओं के चेले नहीं हैं या होंगे, इसकी क्या गारंटी है?
आजकल प्रैस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडे काटजू साहब खासे चर्चा में रहते हैं। उन्होंने कई मुद्दों, विशेषकर मीडिया से संबंधित, पर दो टूक बात रख कर बहस पैदा की है। कुल मिला कर, बाजार और विचार की बहस में उन्होंने विचार पर बल दिया। उन्होंने यह भी कहा है कि जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने से भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा। हमें लगा कि काटजू साहब की वैचारिकता नवउदारवाद विरोधी रुख अख्तियार करेगी। उनके पद और प्रतिष्ठा को देखते हुए उसका लाभ नवउदारवाद विरोधी मुहिम को मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वे शासक वर्ग के साथ ही खड़े हैं। अंग्रेजी का अंधविश्वास उन पर भी वैसा ही हावी है। उन्होंने ने अंग्रेजी जानने वालों को बैलगाड़ी हांकने वाला कहा है। उनका तर्क मानें तो केवल अंग्रेजी जानने वाले ही भारत माता के बेटे-बेटियां हैं। आपको ध्यान होगा ऐसा ही तर्क सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रमुख न्यायधीश बालाकृष्णन साहब ने भी दिया था। उन्होंने कहा अंग्रेजी नहीं जानने वाले केवल चपरासी बन सकते हैं। उनकी नजर में चपरासी और उनके बेटे-बेटियां भारत माता के बेटे-बेटियां नहीं हैं और ही कभी बन पाएंगे।
काटजू साहब और बालाकृष्णन साहब के हिसाबसे सोना का भारत माता पर कोई दावा ही नहीं है। दूरदर्शन पर देहाती महिलाओं को अंग्रेजी में बताया जाता है कि उनकी बेटियां अच्छी पढ़ाई करती हैं, यानी अंग्रेजी बोलती हैं। नवउदारवाद के पिछले 20 सालों में हिंदुस्तान का शासक वर्ग अंग्रेजी का अंधा हो चुका है। लोहिया इस वर्ग के इसलिए अपराधी हैं कि उन्होंने अंग्रेजी का विरोध कर सभी बच्चों को भारत माता की गोद में बिठाना चाहा था; जो उनका प्राकृतिक हक है।
अन्ना आंदेालन से भाषा के साथ दूसरा अवमूल्यन प्रतिरोध की अहिंेसक कार्यप्रणाली, जिसे लोहिया ने सिविल नाफरमानी कहा है, का हुआ है। इस मायने में कि जिस पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था और शोषण के खिलाफ उसका आविष्कार और उपयोग हुआ, उसी के समर्थन में उसे लगाया जा रहा है। इसके गहरे और दूरगामी परिणाम होने हैं। जाहिर है, इससे अहिंसक आंदोलन को गहरा धक्का लगेगा। अहिंसक कार्यप्रणाली में विश्वास करने वाले कई महत्वपूर्ण जनांदोलनकारी और राजनैतिक कार्यकर्ता इस आंदोलन को समर्पित हो गए हैं। यह शेखी भी जताई जाती है कि अरब देशों में जहां बदलाव के लिए हिंसा हो रही है, वहां यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है। लेकिन यह सच्चाई छिपा ली जाती है कि यह आंदोलन किसी बदलाव के लिए नहीं है। अपने स्वार्थ के लिए अहिंसक और अनुशासित रहना कोई बड़ाई की बात नहीं है। नवउदारवाद के पक्ष में अहिंसा को अगवा किया गया है। और उसके विरोध के लिए हिंसा का रास्ता छोड़ा गया है। मनमेाहन सिंह और चिदंबरम यही चाहते हैं।
इधर खबर आई है कि टीम अन्ना के एक सदस्य मुफ्ती शहमीम कासमी साहब को स्वामी अग्निवेश बना दिया गया है! वे टीम का मुस्लिम चेहरा थे। टीम अन्ना के सरदार ने कहा है कि कासमी चर्चा के किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले ही उसकी रिकाॅर्डिंग कर रहे थे, जिसे वे चैनलों को देते। अजीब बात है। चर्चा के दौरान रिकाॅर्डिंग करने में भला क्या बुराई हो सकती है। सही फैसला सही चर्चा से ही होकर आता है। इसलिए चर्चा की जानकारी टीम के बाहर भी साझा हो तो इसमें क्या ऐतराज हो सकता है? हालांकि कासमी साहब ने कहा है कि उन्हें रिकाॅर्डिंग करना आता ही नहीं है। मतभेद के कारण दूसरे हैं। जो भी हो, एक रिकाॅर्डिंग आदमी के दिमाग में भी चलती है। आपसी चर्चा के दौरान टीम अन्ना के सदस्यों के दिमाग में भी चलती होगी। क्या टीम अन्ना के सरदार का उसे भी प्रतिबंधित करने का इरादा है? लोकतंत्र और पारदर्शिता के पहरेदार इस पर क्या कहते हैं, अभी तक सुनने में नहीं आया है। कौन नहीं जानता कि विदेशी धन खाने वाले एनजीओ और उन्हें चलाने वाले फर्जीवाड़े पर पलते हैं।
मीडिया और सिविल सोसायटी के समर्थन का जो नशा टीम अन्ना को हुआ है वह जल्दी नहीं टूटने वाला है।हम एक हैंकी घोषणा करते हुए रामदेव और अन्ना फिर साझी हो गए हैं। वे अलग कभी थे ही नहीं। हमने कहा था कि कांग्रेस समेत ये सब एक पूरी टीम हैं। इस टीम का कारोबार आगे और चलेगा। प्रधानमंत्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार ने हाल में कहा है कि अब से आगे 2014 के आम चुनाव तक आर्थिक सुधारों की गति धीमी रहेगी। लेकिन आम चुनाव के बाद सुधारों में यथावत और विधिवत तेजी जाएगी। यानी सरकार किसी की भी हो, नवउदारवादी व्यवस्था इसी रूप में जारी रहेगी। कभी मनमोहन सिंह और कभी अटल बिहारी वाजेपयी द्वारा उछाला गया जुमला - आर्थिक सुधारों का मानवीय चेहरा’ - कभी का फालतू हो चुका है। अफसोस की बात है कि यह तय हो चुका है कि चुनावी महाभारतों का देश की व्यवस्था के संदर्भ में कोई मायना नहीं रह गया है। आर्थिक सलाहकार के बयान पर सबसे पहले और सबसे तीखी प्रतिक्रिया भाजपा की थी। उसने कहा कि आर्थिक सुधारों की तेजी पर ब्रेक सरकार की असफलता की निशानी है।
नवउदारवाद बढ़ेगा, कांग्रेस के राज में भी और भाजपा के राज में भी। जाहिरा तौर पर उसके दो नतीजे होंगे। एक तरफ पहले से बदहाल आबादी की बदहाली में तेजी आएगी और दूसरी तरफ पहले से विकराल भ्रष्टाचार और तेज होगा। इसके साथ यह भी होगा कि जनता की बदहाली के अंधकार को लूट के माल से मालामाल होने वालेशाहनिंग इंडियाकी चमक से ओट करने की कोशिश की जाएगी और दूसरी ओर कठोर कानून बनाने की मांग करके भ्रष्टाचार पैदा करने और बढ़ाने वाली व्यवस्था पर परदा डालने का खेल रचा जाता रहेगा। जन लोकपाल कानून यथारूप में बन जाने पर आगे और कड़े कानून की जरूरत उसके पैरोकार और वारिस बताएंगे। भले ही अभी तक कड़े कानूनों की दौड़ का अंत सैनिक तानाशाही में होता रहा है।
नवउदारवाद ने टीम अन्ना का रूप धर कर जनांदोलनकारियों का अपने हिसाब से पूरा इस्तेमाल कर लिया है। मुख्यधारा राजनीति के अंतर्गत फर्क होने का दावा करने वाले भी उस रूप के चक्कर में गए। भाकपा के वयोवृद्ध नेता एबी वर्धन रामलीला मैदान में हाजिरी लगाने पहुंचे। नवउदारवाद के विरोध में अभियान जीरो से शुरू होगा।
तो टीम अन्ना भारत माता को घेरने वाले कपूतों की साथी है। इसके अलावा उसका कोई और चरित्र होता या कुछ अच्छे लोगों के उसमें शामिल होने के चलते बन पाता, तो वह सामने चुका होता। यही सच्चाई है। इसका विश्लेषण जैसे और जितना चाहें कर सकते हैं।

-प्रेम सिंह
क्रमश:

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