रविवार, 12 अप्रैल 2009

दक्षिण एशिया -भयंकर साम्राज्यवादी तूफ़ान की चपेट में-3




अमर प्रताप सिंह

लेखिका -निलोफर भागवत ,उपाध्यक्ष, इंडियन एसोसिएशन ऑफ़
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अनुवादक -मोहम्मद एहरार , मो .न. 09451969854
प्रस्तुतकर्ता- अमर प्रताप सिंह



नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रान्त जो कि दक्षिण एशिया का सबसे ज्यादा खतरनाक एवं युद्ध की विभीषिका से ग्रसित क्षेत्र है, अब एक बार फिर एक भयानक तूफ़ान कि चपेट से घिरा हुआ प्रतीत हो रहा है
खान अब्दुल्ला गफ्फार खा जिनको हिंदुस्तान में फ्रंटियर गाँधी के नाम से जाना जाता है एवं जिन पर स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान अंग्रेजी सेनाएं भी फायरिंग करने से गुरेज करती थी । उनक पुत्र खान वली खान ने ब्रिटिश अभिलेखों का अध्ययन करने के बाद लिखा है कि मैंने अपने बुजुर्गो के उन आरोपों पर कभी पूरी तरह से एतमाद नही किया था जिनमे उन्होने ब्रिटेन पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने अपने हितों को बढ़ावा देने के लिए सबसे घटिया किस्म कि चालो का इस्तेमाल किया है । .......मैं भी यह कभी कल्पना नही कर सका कि उनके आरोप उस सच्चाई का केवल एक हल्का सा अंश है। अंग्रेजो ने दास हिन्दुस्तानियों को गुलाम बनाने के लिए जिन घटिया योजनाओ को क्रियान्वित किया , उनको उन्होंने खुलेतौर से स्वीकार भी किया। भारतीय आवाम यह जानकर आवाक् रह जायेगी कि उनके 'पवित्र नेताओं एवं देशभक्तों 'ने अपने ही मुल्क कि एकता एवं अखंडता को तोड़ने का सौदा किया एवं वे देश के नम्बर वन के शत्रु गद्दार एवं ब्रिटिश सरकार के एजेंट थे । " यही बात आजकल के कुछ नेताओं राजनितिक दलों एवं मुख्य अधिकारियों के बारे में कही जा सकती है चाहे वे हिंदुस्तान के हो या पाकिस्तान के हो ।
मुंबई एवं दिल्ली में अफगानी चर्च 19 एवं 20 शताब्दी में हुए तीन एंग्लो अफगान युद्धों में ब्रिटिश इंडियन आर्मी की पराजय का जश्न मनाता है। शासन ही अब कोई ब्रिटिश सैनिक जीवित हो जो इन युधो में हुई बुरी पराजय के कलंक की विभीषिका का बखान कर सके । अंगेज़ो के निष्फल अफगानी प्रयासों के पश्चात् , शाह अमानुल्लाह , जो उस समय अफगानिस्तान के शासक थे , वे प्रथम सरबराह थे जिन्होंने 1917 की रूसी क्रांति के पश्चात रूसी सरकार को मान्यता प्रदान दी । उन्होंने एक दूत भी भेजा जो की मैत्री संधि करे एवं न्योता दिया की यूरोप , अमेरिका एवं रूस की सरकारें सैन्य शक्ति के सहारे दक्षिण एशिया की समृदधिशाली प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करे । उसी उपनिवेशिक नीति का पालन आज भी दक्षिण एशिया में किया जा रहा है।
भारत के प्रमुख राजनैतिक दलों में ऐसे कारपोरेट ( उद्योगपति ) राजनैतिक संवर्ग है , जैसा कि दक्षिण एशिया के दूसरे देशो में भी है , जो अमेरिका एवं ब्रिटेन के धाराशायी होते हुए आर्थिक दुर्गो से घनिष्ट सम्बन्ध रखते है तथा वे मिलकर दक्षिण एशिया को ऐसे छोटे टुकडो (मुल्को )में बाट देना चाहते है जिनमें आपस में एक दूसरे के प्रति रंजिश एवं शत्रुता हो ताकि वे अपना उल्लू सीधा कर सके और उन पर पूरा कब्जा कर सके । लोगो को धोखे में रखने के लिए दिखावे के तौर पर वे यह साबित करते है कि भारत के उद्योगपति ब्रिटेन एवं अमेरिका के बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों का 'टेक ओवर ' (नियंत्रण) कर रहे है एवं पूँजी निवेश कर रहे है । हम इस बात को अनदेखा कर रहे है कि पडोसी मुल्क पाकिस्तान को नष्ट करने के उपरांत वे भारत का नंबर लगायेंगे । इसी कारण दक्षिण एशिया के विभिन्न स्थानों पर बम विस्फोट कराये जा रहे जिनका सीधा निशाना मुख्य रूप से आम जनता है तथा लोगो के अन्दर आपस में शक की भावना पैदा करना है । आतंकवाद के नाम पर आम लोगो का एनकाउंटर किया जा रहा है । हजारों बेगुनाह गुप्त रूप से गिरफ्तार किए जा रहे । उनको प्रताडित किया जा रहा है एवं उनसे जबरदस्ती हल्फिया बयानात लिए जा रहे है। यदि कोई इस साज़िश का पर्दाफाश करता है तो ऐसे इमानदार एवं कर्मठ पुलिस एवं अन्य अधिकारियों को साजिश कर के मार्ग से हटाया जा रहा है। हेमंत करकरे की हत्या इसका उदाहरण है ।

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