शुक्रवार, 1 मई 2009

जो झूठा मक्कार,फरेबी नेता वही महान

और एक दूसरी बड़ी पूंजीवादी पार्टी इन सब उपर्युक्त सवालों पर तो इनसे पीछे है ही नही ,परन्तु अपनी सत्ता के लिए असंवैधानिक भाषणो को देकर समाज में दंगा कराने से भी नही चुकते है ,यह जनता के सवाल उठाते ही नही यह मन्दिर मस्जिद के सवाल उठा रहे है ,और कुछ क्षेत्रिय पार्टिया जातिवाद के आधार पर ही चुनाव लड़ रही है । उन्होंने कल्याण सिंह को अपने साथ इसलिए लिया की लोध वोट पक्का हो जाए । परन्तु यह भूल जाते है की यही वह व्यक्ति है जिसने बाबरी मस्जिद गिरवाई थी और पब्लिक में सीना ठोककर भाषण करता था की हमने ही यह मस्जिद गिरवाई है । जब सुप्रीम कोर्ट ने पूँछ लिया तो इसने झूठा सपथ पत्र लगाकर यह कहा की हमने मस्जिद नही गिराई है इसके अलावा हमारी मुस्लिम जनता की भी आज रोजी ,रोटी, शिक्षा,गरीबी,कुपोषण आदि समस्याएं हैउल्टे मुस्लिम समुदाय की समस्याओं की आवाज दबाने के लिए उनके गले में आतंकवाद का तमगा लटका कर आजमगढ़ से लेकर लखनऊ रामपुर तक आतंक का माहौल तैयार किया गयाइस देश के अन्दर मुंबई में बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगो को मारा पीटा गया और कांग्रेस शासित केन्द्र की संप्रंग सरकार एवं महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी रही जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने वरुण को बंद किया तो चारो तरफ़ हाहाकार मचने लगा .क्योंकि बड़े आदमियों के लड़के चाहे जो कुछ करें वह संविधान से ऊपर है। गरीब संविधान तोङता है। उनकी नजर में संविधान और कानून का पालन करना नेताओं का काम नही है यह सावल भी चुनाव के मुद्दे नही है ।
लोकतंत्र का अर्थ कुछ लोग अपने अपने हिसाब से निकलते है और चूंकि वह अपने को बड़ा नेता कहते है इसलिए वही सही है। आज एक पार्टी ने अपने प्रधानमंत्री का नाम चुनाव के प्रारंभ से ही घोषित कर रखा परन्तु वह नेता न तो लोकसभा का सदस्य है और न ही वह चुनाव लड़ रहा है ऊपर से रौब यह है की तीसरे मोर्चे ने अपना प्रधानमंत्री कौन होगा?घोषित नही किया है। संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री को लोकसभा का सदस्य होना चाहिए । किन्ही परिस्तिथियों में ऐसा नही हो सके तो किसी को भी प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है । जो 6 माह में किसी संस्था लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य बन जाए ,लेकिन यह कौन सी बात है की चुनाव आगे है और प्रधानमंत्री पीछे के दरवाजे से आएगा । यह संविधान को अंगूठा दिखाना नही है तो और क्या है?
कुल मिलकर राज्यों और केन्द्र में शासन करने वाली सभी पार्टियों से लगभग आम जनता से कुछ लेना देना नही है। जन प्रतिनिधि पैसे वाले हो जाते है और जिनके लिए कानून बनाते है वे पीछे लौट रहे है । वामपंथी पार्टियों को छोड़कर सभी पार्टियों के सदस्य भ्रष्ट आचरण में पकड़े जा चुके है इसके बावजूद वह बड़ी ही बेशर्मी से जनता में चुनाव लड़ा भी रहे है और दूसरो पर आरोप भी लगा रहे है ।
कांग्रेस पार्टी श्री जवाहर लाल नेहरू या श्रीमती इंदिरा गाँधी की कांग्रेस नही रह गई हैउनकी कांग्रेस गुटनिरपेक्षता विदेश नीति का पालन करती थी परन्तु मनमोहन सिंह और श्रीमती सोनिया गाँधी की का में जमीन आसमान का अन्तर है यह कांग्रेस अमेरिका की पिछलग्गू विदेश नीति का पालन कर रही है और इसलिए आर्थिक एवं विदेश नीति में इसमे और राजग में कोई अन्तर नही है .केवल साम्प्रदायिकता के सवाल पर थोड़ा बहुत फर्क है।
चुनाव में मतदाताओं से यह अपील है वह देश विदेश नीति आम जनता की जिंदगी से जुड़े हुए पहलुओ पर विचार करें ,तत्पश्चात यह तय करें की आप किसको वोट करेंगेयह देश आपका है आपको कदम उठाने होंगे ,इसको ठीक करने के लिएआपके सामने बड़े-बड़े करोड़पति , अरबपति उमीदवार और उनकी पार्टिया हैउनकी चमचमाती हुई मोटरें आप देख रहे हैतय कीजिये की इनको वोट देना है या नही?

-डॉक्टर रामगोपाल वर्मा
समाप्त
लोकसंघर्ष पत्रिका के चुनाव विशेषांक में प्रकाशित ॥

कोई टिप्पणी नहीं: