शुक्रवार, 12 जून 2009

क्रय कर ली अभिलाषाएं...


मधु के ग्राहक बहुत मिले ,
क्रय कर ली अभिलाषाएं।
अब मोल चुका कर रोती
कुचली अतृप्त आशाएं ॥

अव्यक्त कथा कुछ ऐसी,
आँचल में सोई रहती।
हसने की अभिलाषा में,
आंसू में भीगी रहती ॥

मेरे दृगमबू सुमनों पर,
तुहिन कणों से बिखरे है
स्नेहिल सपनो के रंग में,
पोषित होकर संवरे है ॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ''राही''