शनिवार, 20 जून 2009

वेदना विकल रोती है...

मधु स्मृति के कानन वन में,
वेदना विकल रोती है।
स्नेह भरे दीपक लौ से
दुःख की कालिख घिरती है॥

परिचय की अभिलाषा में ,
लहरें तट से टकराती।
सुंदर होगा आलिंगन ,
आतुरता में बढ़ जाती॥

तुम थे तो केवल तुम थे,
या पथ था सूना-सूना।
या गंध सुमन का संगम ,
कलियों का तरपन सूना ॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ''राही''

कोई टिप्पणी नहीं: