सोमवार, 28 सितंबर 2009

चिर मौन हो गई भाषा...


द्वयता से क्षिति का रज कण ,
अभिशप्त ग्रहण दिनकर सा
कोरे षृष्टों पर कालिख ,
ज्यों अंकित कलंक हिमकर सा

सम्पूर्ण शून्य को विषमय,
करता है अहम् मनुज का
दर्शन सतरंगी कुण्ठित,
निष्पादन भाव दनुज का


सरिता आँचल में झरने,
अम्बुधि संगम लघु आशा
जीवन, जीवन- घन संचित,
चिर मौन हो गई भाषा

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

3 टिप्‍पणियां:

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

सरिता आँचल में झरने,
अम्बुधि संगम लघु आशा।
जीवन, जीवन- घन संचित,
चिर मौन हो गई भाषा॥

बहुत अच्छी लगी आपकी यह कविता.और भाव

हार्दिक बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

महफूज़ अली ने कहा…

सरिता आँचल में झरने,
अम्बुधि संगम लघु आशा।
जीवन, जीवन- घन संचित,
चिर मौन हो गई भाषा॥

wah! maun ho gayi bhasha..... bahut khoob.........

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत अच्छी लगी आपकी यह कविता.और भाव