मंगलवार, 10 अगस्त 2010

आजादी के मायने

बहरहाल, अब सोचा कि आजादी पर अपने उद्गार पेश कर ही दिये जायें। इस साल नहीं तो लोग अगले साल इसका महत्व समझेंगे ही। वैसे एक बात बता दें कि आज अमेरिका में इंडिया डे मनाया जा रहा है। बड़ा विकसित कहलातें हैं अमेरिका वाले। हैप्पी इंडियन इंडिपेंडेंस डे मनाने में पूरे चार दिन से पिछड़ गये हमसे शेम,शेम। इसीलिये हम भारत को अमेरिका बनाने के खिलाफ हैं।
हमने सोचा कि आजादी के बारे में अपने विचार लिखने से पहले जनता-जनार्दन का मूड जान लिया जाये कि वह क्या विचार रखती है इस आजादी के बारे में!
लोग आजादी को सोनपरी की छड़ी समझते हैं कि छड़ी घुमाते ही सब कुछ मिल जायेगा। धन दौलत, समृद्धि, खुशहाली, ताकत, हुनर, आधुनिकता। गरज यह कि दुनिया की हर चीज लोग चाहते हैं कि आजादी के बहाने मिल जाये।
आजादी के रूप में हम अलादीन का चिराग चाहते हैं जिसको घिसते ही हमें दुनिया की सारी नियामतें मिल जायें। आजादी लोगों के लिये एक ऐसा पैकेज हो गया है जिसमें हम बिना कुछ किये धरे सब कुछ पाना चाहते हैं। नहीं मिलता तो रोने लगते हैं- ये आजादी झूठी है।



आजादी कैसी? कौन सी? किस की? किस के लिए? कितनी आजादी? आजादी कहाँ तक? कब तक? इस आजादी को बचाए रखने के लिए हमे अभी और भी लड़ईयाँ लड़नी है!
वो लड़ईयाँ है गंदी राजनीति से, आतंक से,भ्रष्टाचार से, आर्थिक कमजोरी से,बेरोजगारी से,गरीबी से,भुकमरी से,समाज मे फैली बुराईयों से,सबसे महत्वपूर्ण अपने आप से,
अपनी सोच से,अपनी हरकतों सेक्योंकि आज हम आजादी का सदूपयोग नही वरण केवल भोग कर रहे है! भटके हुए हैआजादी का गलत इस्तेमाल कर रहे है!जिसे मिली है और जो उपयोग का सकते है,वो मान चाहा उपयोग कर रहे है,नेता,राजनेता,पुलिस,अधिकारी,उचे पद मे बैठे लोग,अब तो मीडिया भी जिसे जनता की आवाज माना जाता था! सब आजादी का अपनी तरह से उपभोग कर रहे है


ये कैसे हआ कि लोग साठ साल से इसे निभाते आ रहे हैं। हर कोई मानता है कि यह झूठी है लेकिन इसको ओढ़-बिछा रहे हैं। क्या यह कोई सरकारी कर्मचारी है जो एक बार नौकरी में आने के बाद निकाला नहीं जाता। लोग निभाते रहते हैं। आजकल तो उनको भी लोग निकालने लगे हैं। फिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि इसे बदल के नयी ,बढ़िया , धांसू च फांसू टाइप आजादी नहीं ले आते लोग। ऐसी कि लोग कहें- वाऊ क्या आजादी है।
करीब 6 दशक पहले का भारतीय समाज बेहद पिछड़ा, जटिल, निर्धन और विकास से कटा हुआ था. लंबी गुलामी के बाद जनता के मन में खुली हवा में सांस लेने की उत्कंठा तो थी लेकिन अपने अधिकारों के प्रति सजगता नहीं थी..गरीबी, बदहाली, शरणार्थियों का सैलाब, बेरोजगारी, सांप्रदायिक तनाव, भरपेट खाना की कमी आजादी मिलने की ख़ुशी में सेंध लगा रही थीं.
संविधान सभा के सामने चुनौती थी कि नए गणतंत्र का निर्माण ऐसे हो कि देश में फैली भाषाई, धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक विविधता को आत्मसात किया जा सके और लोगों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक दृष्टि से न्याय सुनिश्चित किया जा सके.
जरूरत एक नए गणतंत्र में नागरिकों को बराबरी का एहसास कराने की भी थी..गणतंत्र यानी एक ऐसी व्यवस्था जिसमें असली ताक़त राजा के पास नहीं बल्कि जनता और उसके चुने प्रतिनिधियों में हो.





समस्यायें हर कहीं हैं।
ये कहना गलत होगा कि गणतंत्र में समस्याएं नहीं हैं. समानता के तमाम वादों के बावजूद व्यवहारिक दिक्कतें कई बार निराशा पैदा करती हैं, चुनौतियां पहाड़ी सी खड़ी नजर आती हैं लेकिन उसके लिए राजनीतिक वर्ग और जनता की बेरुख़ी को ही जिम्मेदार दिखती हैं. संविधान तो हर एक को बराबरी का दर्जा देता है और आगे बढ़ने के समान अवसर मुहैया कराने का आश्वासन भी..6 दशक पहले इसी विजन के साथ गणतंत्र की नींव रखी गई थी और भारत का नागरिक होने के मायने वही तय कर रहा है..
मेरा मानना है कि भारत के संविधान में और अधिक संशोधनों की जरूरत है, क्योंकि आजादी के इन साठ सालों में हमारे रहन सहन, शिक्षा, विचारों और सोच में काफी परिवर्तन आ चुका है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. लगातार विकास कर रहे एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में विघटनकारी प्रवृत्तियां जिस तरह सिर उठा रही हैं, उसे ध्यान में रखते हुए संविधान में संशोधन की जरूरत है.. जाति-धर्म और भाषा के नाम पर बंटे इस देश में बहुत सारे संवैधानिक सुधारों की जरूरत है जो इस देश को सही मायने में एक कर सकता है. सामाजिक ढांचे में परिवर्तन और पुरानी गलतियों को सुधारने के लिए संविधान में परिवर्तन किया जाना चाहिए. आतंकवाद के ख़िलाफ लड़ने के लिए संविधान में परिवर्तन की जरूरत है.

आजादी को झूठा कहना तो बहाना है। सच तो यह है कि ऐसा कहने वाले सच में आगे नहीं बढ़ना चाहते। समस्यायें हर कहीं हैं। उनको कोसनें से वे दूर नहीं होंगी। उनका सामना करो। अपनी नियति खुद बनो। अगर किसी को लगता है आजादी झूठी है तो आज ही के दिन इसे रिटायर कर दो। ले आओ नयी आजादी। गारण्टी कार्ड सहित। इससे शानदार, जानदार। जिसे पी सको सर उठाकर। लेकिन मुझे पता है कि कोई कुछ करेगा , करना भी नहीं चाहता, नहीं सिवाय यह रोने के कि दृ ये आजादी झूठी है।

सबको अधिकार
भारतीय गणतंत्र सत्ता के केंद्र दिल्ली में बैठे व्यक्ति को भी वही अधिकार देता है अधिकार अबूझमाड़ में रहने वाले व्यक्ति के पास हैं..एक बेहद साधारण नागरिक भी समझता है कि उसके वोट की क़ीमत है और सत्ता के बनने या गिरने में उसका वोट मायने रखता है..
इसी गणतंत्र में गरीब किसान का बेटा प्रधानमंत्री बनता है और एक वैज्ञानिक राष्ट्रपति बनता है..धर्मनिरपेक्ष भारत में प्रधानमंत्री अल्पसंख्यक समुदाय से है, सुप्रीम कोर्ट का जज दलित बनता है तो सबसे बड़ी पार्टी की नेता ईसाई हैं..

यह मत पूछो कि “ देश तुम्हारे लिये क्या कर सकता है बल्कि यह देखो तुम देश के लिये क्या कर सकते हो” कलाम साहब वाला सवाल दोहरा रहे हैं? क्या आपके पास देश के लिये पन्द्रह मिनट हैं? क्या अभी भी आप कहोगे -ये आजादी झूठी है। इस मौक़े पर भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों भारकी क़ुर्बानियों को याद करते हुए इन 2 पंक्तियों के साथ हम सलामी देते हैं.

कर गए आजाद भारत जो हमेशा के लिए,
देश पर जान देने वाले उन शहीदों को सलाम.




-मुकेश चन्द्र

2 टिप्‍पणियां:

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

बेनामी ने कहा…

MUKESH JI APNE BHARAT JAISE lOKTANTRIK DESH KE SACHAYEEYOIN KO UJAGAR KAR LOGOIN KO DESH KE PRATI APNI JIMMEDARIOIN KE LIYE AHWAHAN KIYA HAI.APKA BAHUT-BAHUT DHANIYAWAD.