बुधवार, 29 सितंबर 2010

सांप सांप्रदायिक भी नहीं होता प्रभात- और हम धर्म के नाम पर नीले हो गए हैं - रवीन्द्र प्रभात

परिंदों में फिरकापरस्ती क्यों नहीं होती-
कभी मंदिर पर जा बैठे कभी मस्जिद पर जा बैठे
माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ का फैसला बाबरी मस्जिद प्रकरण पर आगामी 30 सितम्बर को आने जा रहा है। समाज में कुछ तत्वों द्वारा तरह-तरह की अफवाहें उड़ा कर धर्म के नाम पर जहर फैलाया जा रहा है। कोई भी धर्म हिंसा करने की बात नहीं करता है किन्तु उसके प्रचारकगण तरह-तरह से अपने बाहुबल प्रदर्शन करने का प्रयोग धर्म के नाम पर करने लगते हैं। माननीय उच्च न्यायलय का फैसला अन्य फैसलों की तरह एक फैसला ही है, लेकिन जिस तरह से तैयारियां की जा रही हैं। उससे यह लगता है कि न्यायलय का यह फैसला सामान्य प्रक्रिया का अंग नहीं है। दोनों पक्षों को चाहिए की न्यायलय के फैसले का सम्मान करें। असहमत होने पर न्यायिक प्रक्रिया को अपनाये अन्यथा जरा सा भी हो-हंगामा धर्म को बदनाम ही करेगा।
धर्म का अर्थ है धारण करने योग्य। काल और परिस्तिथियों के अनुसार जो भी चीजें मानव जाति या सम्पूर्ण जगत को बचाए बनाये रखने में सहायक होती हैं, वही धर्म है। धर्म के प्रचारकों ने अगर धर्म के आधार पर लोगों के मन में घृणा, राग, द्वेष पैदा करते हैं, वह धर्म नहीं हो सकता है। हमने जाति, लिंग, नस्ल, धर्म के आधार पर इंसानी रिश्तों को मानवीय संवेदनाओ को कलंकित करने का कार्य करते हैं तो वहीँ से हम पूरी मानव सभ्यता के साथ खिलवाड़ करते हैं।
आइये हम सब मिलकर और उन्नति शील भारत के निर्माण के लिए सभी जातियों, सभी धर्मों को एकता के सूत्र में बाँधते हुए माननीय उच्च न्यायलय के फैसले का स्वागत करें, सम्मान करें
आज जरूरत इस बात की है कि रवीन्द्र प्रभात जी की इन पंक्तियों को सार्थक होने दें


सुमन
लो क सं घ र्ष !

9 टिप्‍पणियां:

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

सुमन जी,
यदि मेरी इन पंक्तियों को सार्थक होने से रोक दिया गया, तो मेरा दावा है की हमारा मुल्क सांप्रदायिक सद्भाभावना का एक सुनहरा अध्याय लिखने में सफल होगा और हम गर्व के साथ कह सकेंगे की मेरा भारत महान है !

Surendra ने कहा…

Sir I'm agree with you point. We are human being, we should not quarrel for Temple or morque. This is th etime to show our unity.

गीतेश ने कहा…

रवीन्द्र प्रभात जी उच्चकोटि के रचनाकार हैं और सांप्रदायिक सद्भावना की जीबंत प्रतिमूर्ति भी, उनकी सृजनात्मकता को नमन !सुमन जी आपकी अभिव्यक्ति भी सुन्दर और सार्थक है , आभार !

निर्मला कपिला ने कहा…

प्रभात जी जैसे विवेकशील इन्सान कभी समाज को गलत राय नही देते। बहुत समसामयिक सार्थक आलेख है। धन्यवाद।

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
देसिल बयना-नदी में नदी एक सुरसरी और सब डबरे, करण समस्तीपुरी की लेखनी से, “मनोज” पर, पढिए!

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है!
मध्यकालीन भारत धार्मिक सहनशीलता का काल, मनोज कुमार,द्वारा राजभाषा पर पधारें

पूर्णिमा ने कहा…

aman aur bhaayichaaraa aaz kee jaroorat hai, bahut achchhee abhivyakti

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीय सुमन जी
और
आदरणीय रवीन्द्र प्रभात जी

आपकी भावनाएं स्तुत्य हैं । आज सभी को इन्हीं विचारों की आवश्यकता है ।
मैं भी अपने दोहों के माध्यम से कहता हूं -

चाहे अल्लाहू कहो , चाहे जय श्री राम !
प्यार फैलना चाहिए , जब लें रब का नाम !!

मस्जिद - मंदिर तो हुए , पत्थर से ता'मीर !
इंसां का दिल : राम की , अल्लाह् की जागीर !!


- राजेन्द्र स्वर्णकार

ज्योति सिंह ने कहा…

सांप सांप्रदायिक भी नहीं होता प्रभात-
और हम धर्म के नाम पर नीले हो गए हैं ।
bahut sundar .