मंगलवार, 28 सितंबर 2010

उत्तर प्रदेश में पंचायती चुनाव ने प्रत्याशियों की हत्याओं का दौर शुरू

प्रदेश में पंचायत चुनाव प्रारंभ होते ही हिंसा का दौर शुरू हो गयाबाराबंकी शहर से सटी हुई ग्राम पंचायत बडेल में क्षेत्र पंचायत सदस्य के प्रत्याशी जयवीर भदौरिया तथा प्रधान पद के प्रत्याशी जितेन्द्र मिश्रा की गोली मार कर हत्या कर दी गयीपुलिस ने इन पदों पर लड़ रहे प्रत्याशी सरोज सिंह राजेश उर्फ़ राजू प्रधान की नामजदगी आने के पश्चात आनन-फानन में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया
इस घटना का विवरण इस प्रकार है कि दोनों मृतक प्रत्याशी सदस्य क्षेत्र पंचायत के प्रत्याशी सरोज सिंह के घर रात को 11 बजे बातचीत के लिए गए थे लगभग रात्रि 12 बजे के बाद घर से निकलते ही प्रत्याशियों की ताबड़तोड़ गोलियां चला कर हत्या कर दी जाती हैइस हत्याकांड के चलते एक पक्ष की मृत्यु हो गयी और दूसरा पक्ष कारागार पहुँच गयासरोज सिंह क्षेत्र समीति बंकी के भी प्रमुख पद के दावेदार थे और इस हत्याकांड से प्रमुख पद के कई प्रत्याशियों को भी लाभ था जिसकी तरफ पुलिस ने ध्यान देने की जरूरत नहीं महसूस कीअपराधिक मनोविज्ञान के हिसाब से कोई भी आदमी अपने घर के सामने हत्या जैसे जघन्य अपराध को करने से बचता है जबकि वह चुनाव में प्रत्याशी हो
इसके पूर्व भी जिला पंचायत के चुनाव में हरदेव रावत पूर्व विधायक की हत्या कर दी गयी थी और हत्या का उद्देश्य भी राजनीतिक थाचुनाव में सरकारी तंत्र निष्पक्ष चुनाव करने के नाम पर विभिन्न प्रकार से भय का वातावरण पैदा करता है और आदेश इस तरह से जारी होते हैं कि मतदान के समय यदि किसी ने हिंसा करने की कोशिश की तो देखते ही गोली मार देने का आदेश, वाहन चेकिंग के नाम पर विरोधी प्रत्याशियों के वाहन को बंद करना भी मुख्य कार्य होता हैप्रशाशन के कृपापात्र प्रत्याशी चाहे जो कुछ करें उनके लिए कोई चुनाव आयोग के नियम कानून लागू नहीं होते हैं लेकिन कुछ प्रत्याशियों को हराने के लिए सभी नियम कानून पालन कराये जाते हैं जिससे मजबूर होकर भी हिंसा पनपती है
जिला पंचायतों के चुनाव में सत्तारूढ़ दल का ही मुख्य मामला होता है उसी के इशारे पर प्रत्याशियों की हार और जीत होती हैसमाजवादी पार्टी के समय में हारे हुए प्रत्याशी को जिला पंचायत सदस्य के जीतने का प्रमाण पत्र जारी किया गया थाप्रमुख जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में पकड़-धकड़, खरीद-फरोख्त का बाजार लगता ही रहता हैलोकतंत्र में इसको रोकने की कोई व्यवस्था नहीं है
जनपद में चुनाव चल रहे हैं वहीँ पर जिला पंचायत अध्यक्ष के निर्वाचन क्षेत्र में जगह-जगह निर्माण कार्य जिला पंचायत द्वारा कराये जा रहे हैंउत्तर प्रदेश निर्वाचन आयोग (पंचायत) तथा जिले के अधिकारीयों में यह दम नहीं है कि जिला पंचायत द्वारा चुनाव के दौरान कराये जा रहे कार्यों को रोक सके अधिकारी और विशेष कर पुलिस विभाग सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशियों को तरह-तरह के हथकंडे अपना कर लाभ पहुंचता हैजनपद में राम नगर के कुछ प्रत्याशियों को सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं के इशारे पर अज्ञात चोरी के मुकदमें में गिरफ्तार कर पिटाई की जाती है और फिर मैनेजमेंट के अनुसार जब उनका चालान न्यायलय आता है तो उनको मार डालने के लिए अधिवक्ताओं का एक उग्र समूह न्यायलय परिसर में जमकर पुन: पिटाई की जाती है। एक खास बात यह भी है पंचायत चुनाव में कोई भी राजनीतिक दल खुल कर हिस्सा भी नहीं ले रहा है लेकिन सत्ता रूढ़ दल द्वारा गाँव-गाँव चयनित प्रत्याशियों को शासन-प्रशासन मदद कर रहा है मुख्य समस्या यह भी है कि निष्पक्ष चुनाव कैसे हों और हिंसा पक्षपातपूर्ण रवैये के कारण ही पैदा होती है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

3 टिप्‍पणियां:

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

ये कैसे संभव है कि चुनाव और प्रत्याशी मारे न जाएँ ? इस हिंसा का कुछ तो हल होना ही चाहिए ये चुनावी खुनी खेल का अंत होना जरूरी है नहीं तो ये लोकतंत्र के नाम पर कलंक बन जायेंगे. वैसे भी सत्तारूढ़ दल का कुत्ता भी शेर होता है.

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
शौख!, सत्येन्द्र झा की लघुकथा, “मनोज” पर, पढिए!

निर्मला कपिला ने कहा…

ाच्छी जानकारी है। धन्यवाद।