सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

बाबरी मस्जिद से पहले भी वहां मस्जिद ही थी - डा. सूरजभान


रामजन्मभूमि -बाबरी मस्जिद विवाद, काफी समय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) के सामने विचाराधीन है। उच्च न्यायालय फिलहाल इस प्रश्न पर साक्ष्यों की सुनवाई कर रहा है कि 1528 में बाबरी मस्जिद के बनाए जाने से पहले, वहां कोई हिंदू मंदिर था या नहीं? हालांकि दोनों पक्षों के गवाहों से काफी मात्रा में साक्ष्य दर्ज कराए जा चुके थे, उच्च न्यायालय ने यह तय किया कि विवादित स्थल पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से खुदाई कराई जाए। इस खुदाई के लिए आदेश जारी करने से पहले अदालत ने, संबंधित स्थल का भू-भौतिकी सर्वेक्षण भी कराया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के ही आमंत्रण पर, तोजो विकास इंटरनेशनल प्राइवेट लि. नामक कंपनी ने, जिसका कार्यालय नई दिल्ली में कालकाजी में है, रिमोट सेसिंग की पद्धति से भूगर्भ सर्वेक्षण किया था। उक्त सर्वेक्षण की रिपोर्ट में संबंधित स्थल पर सतह के नीचे भूमिगत असंगतियां दर्ज की गयीं थीं। इस रिपोर्ट के ही अंशों में से असंगंतियां, ``प्राचीन या समकालीन निर्माणों जैसे खंभों, नींव की दीवारों, संबंधित स्थल के बड़े हिस्स् में फैले पत्थर के फर्श से संबंद्ध`` हो सकती थीं।
इस तरह, तोजो विकास कंपनी के भूगर्भ सर्वेक्षण की रिपोर्ट के ही आधार पर, उच्च न्यायालय ने 5 मार्च 2003 के अपने आदेश जारी किए थे, जिनमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से कहा गया था कि विवादित स्थल पर खुदाई करे और इसका पता लगाए कि वहां कोई मंदिर बना हुआ था या नहीं? भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के दल ने 12 मार्च 2003 से वहां खुदाई का काम शुरू किया। मैं 10 से 12 जून तक खुदाई स्थल पर था। टीले के एक छोटे से हिस्से को छोड़कर जिस पर रामलला का अस्थायी मंदिर बना हुआ है, 80 मीटर गुणा 60 मीटर के विवादित क्षेत्र में भारतीय पुरातत्व सर्वे के विशेषज्ञों ने विस्तृत रूप से खुदाई की है। जे-3 खाई में 10 मीटर से भी ज्यादा गहराई तक गहरी खुदाई की गई है। इससे पहले 1969-70 में ए. के. नारायण (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) द्वारा और बी. बी. लाल (इंडियन इंस्टिट्यूट आफ एडवांस्ट स्टडीज़, शिमला) तथा के. वी. सुंदरराजन (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा की गई खुदाइयों में उजागर किए गए स्स्कृतियों के क्रम की ही, मौजूदा खुदाई ने पुष्टि है। इसके हिसाब से अयोध्या में रामजन्मभूमि कहलाने वाले स्थल को सबसे पहले 600 ईस्वीपूर्व आबाद किया गया था। लेकिन, इसके बाद, कुषाण काल के आखिरी दौर में या गुप्त काल में, पांचवी सदी ईस्वी तक यह इलाका उजड़ चुका था। आरंभिक मध्य काल में आबादी के साक्ष्य नहीं मौजूदा खुदाई में आरंभिक मध्यकाल (600 ईस्वीपूर्व से 1200 ईस्वी) से संबद्ध बसावट का कोई संस्तर नहीं मिला है। मस्जिद की बाउंड्री वाल के नजदीक खुदाई में बी. बी. लाल ने जो चूने के फर्श ताथा `स्तंभ आधार` खोजे थे (इंडियन आर्कियोलजी - एक रिव्यू, 1976-77) और ग्यारहवीं सदी के बिताए थे, अब स्पष्ट हो गया है कि सल्तनत काल (13 वीं सदी ईस्वी) पहले के नहीं हो सकते हैं। जो भी नक्काशीदार काले पत्थर के खंभों, दरवाजे के कब्जे व अन्य नक्काशीदार पत्थर, विवादित स्थल पर या उसके निकट मिले थे, जिसके संबंध में हिस्टोरियन्स फोरम ने न्यू आर्कियोलोजिकल डिस्कवरीज (1992) में बताया था या जिनके मस्जिद के मलबे से मिलने के बारे में बताया गया था, उनका बाबरी मस्जिद के नीचे के संस्तरों से कोई भूसंस्तरीय संबंध नहीं बनता है। मौजूदा खुदाई में एफ-3 खाई में मिला काले पत्थर का खंभा, मस्जिद के मलबे से आया है। जे-3 खाई में मिला आलेखदार पत्थर, गढ़े के भरत में कंकड़ियों के साथ औंधा पड़ा पाया गया है। उसकी लिपि भी उन्नीसवीं सदी से पुरानी नहीं है। खुदाई में सामने आए सबसे महत्वपूर्ण मध्ययुगीन निर्माण, वास्तव में विभिन्न कालखंडों की दो मस्जिदों के अवशेष हैं। ये अवशेष टीले के तो उपरले संस्तरों पर हैं, लेकिन बाबरी मस्जिद के मलबे के नीचे हैं, जबकि मलबे के ऊपर अस्थायी मंदिर खड़ा हुआ है। सल्तनत काल की मस्जिद बाबरी मस्जिद से पहले की मस्जिद के सबसे अच्छे साक्ष्य खाई संख्याः डी-6, ई-6, एफ-6 तथा उत्तर व दक्षिण की कुछ और खाइयों में मिले हैं। उसकी पश्चिमी दीवार, बाहरी दीवार (बाउंड्री वाल) का भी काम करती होंगी। उसकी नींव में कुछ नक्काशीदार पत्थर लगे थे, जो कहीं अन्य पुराने निर्माणों से रहे होंगे। इसकी ऊपर की दीवारें सांचे की (मोल्टेड) ईंटों से बनी हैं, जो आस-पास में किन्हीं पुराने मध्यकालीन निर्माणों के मलबे से आयी होंगी। उपरोक्त खाइयों में एक हाल की दक्षिणी, पूर्वी तथा उत्तरी दीवारें देखी जा सकती हैं। दीवारों की अंदरूनी सतह पर चूने का पलस्तर है और ये दीवारें चूने और सुर्खी के फर्श से जुड़ती हैं, जो उत्खनन के करीब-करीब पूरे ही क्षेत्र में फैला हुआ है। इस फर्श के नीचे मिट्टी का भरत किया हुआ है, ताकि मस्जिद के फर्श को ऊपर उठाया जा सके। फर्श बनाने में चूने और सुर्खी के प्रयोग, दीवारों पर पलास्तर किया जाना और इन दीवारों पर बाबरी मस्जिद (निर्माण 1528 ईस्वी) की दीवारों का बनाया जाना, यह सब बाबरी मस्जिद से पहले के इस निर्माण के सल्तनत काल का होने को साबित करता है। बाबरी मस्जिद संबंधित मस्जिद पर जिस दूसरी मस्जिद के साक्ष्य मिले हैं, निर्विवाद रूप से बाबरी मस्जिद थी, जो पत्थरों से बनायी गई थी। इसेक दक्षिणी गुंबद की दीवारें, सत्लतनत काल की मस्जिद की ही निर्माण योजना का अनुसरण करती हैं। बाबरी मस्जिद की दीवारें, जहां-कहीं भी बची रह गयी हैं, चूने के पलस्तर के साक्ष्य पेश करती हैं। इस मस्जिद का फर्श भी, चूने तथा सुर्खी का बना है। पहले वाला यानी सल्तनत काल की मस्जिद का फर्श, अब मिट्टी के भराव के नीचे दब गया है, जो शायद मुगलकालीन मस्जिद को ऊपर उठाने के लिए किया गया होगा। मुगलकालीन मस्जिद का फर्श भी खूब लंबा-चौड़ा है, करीब-करीब सल्तनत काल की मस्जिद जितना ही। बाबरी मस्जिद से जुड़ा एक ओर महत्वपूर्ण निर्माण है, मस्जिद के दक्षिण-पूर्व में बना कंकड़-पत्थर का (पानी का) हौज। नौ-दस फुट की ऊंचाई तक, पत्थर के हरेक रद्दे पर चूने तथा सुर्खी का गारा फैलाया गया था। हौज की तली और दीवारों पर भी खूब मोटा पलस्तर किया गया है ताकि उससे पानी का रिसाव न हो। हौज की ऊपरी सतह के बाबरी मस्जिद के फर्श से जुड़े होने से, बाबरी मस्जिद (प्रथम चरण) के साथ इसके संबद्ध होने का पता चलता है। राम चबूतरा अट्ठारहवीं-उन्नीसवीं सदियों से जुड़ा एक विचित्र साक्ष्य सामने आया है। हौज को कंकड़-पत्थर से और चूने के मसाले से भर दिया जाता है। उसके ऊपर उसी सामग्री से छोटा सा चबूतरा बना दिया जाता है। चबूतरा पौने पांच मीटर गुणा पौने पांच मीटर का है। पहले चबूतर को घेरते हुए और बड़ा चबूतरा बनता है। अब चबूतरा 22 मीटर गुणा 22 मीटर का हो जाता है। इसी के ऊपर राम चबूतरा बनाया गया था। राम चबूतरा बाबरी मस्जिद के पहले फर्श में धंसा हुआ था, जिससे यह संकेत मिलता है कि चबूतरों का निर्माण बाबरी मस्जिद के निर्माण के काफी बाद का होगा। एक और निर्माण भी बाबरी मस्जिद के परिसर में धंसता नजर आता है। इसमें `स्तंभ आधार` शामिल हैं। ये स्तंभ आधार, जो गोल से या चौकोर से हैं, बीच में ईंट के टुकड़ों के बने हैं, जिनके बीच में कंकड़-पत्थर लगा है और इनमें मिट्टी के गारे की चिनाई है। ये सभी निर्माण किसी एक ही बड़े निर्माण के हिस्से नहीं हैं, जैसाकि बी. बी. लाल तथा एस. पी. गुप्ता मान बैठे थे। ऐसा लगता है कि ऐसे स्तंभ आधारों के समूह हैं और ये स्वतंत्र, साधारण छप्परों, छाजनों के हिस्से होंगे, जिनका अयोध्या में और उसके आस-पास दूकानों, झोंपड़ियों आदि के लिए उपयोग आम है। मस्जिद के उत्तर की ओर कुछ स्तंभ आधार सेंट स्टोन के भी बने हैं। ईंट के टुकड़ों के बने स्तंभ आधारों की रचना, बी. बी. लाल को इससे पहले की अपनी खुदाई में मिले स्तंभ आधारों से भिन्न नहीं है। उन्होंने इनका समय 11वीं सदी आंकने में गलती की है। बाबरी मस्जद परिसर में मिला तीसरा निर्माण, बहुत सारी कब्रें हैं जो बाबरी मस्जिद के उत्तर में भी पायी गई हैं और दक्षिण में भी। ये कब्रें बाबरी मस्जिद के पहले वाले फर्श में धंसी हैं। इससे पता चलता है कि ये कब्रें बाबरी मस्जिद के अपेक्षाक़त बाद के दौर में बनी होंगी। कब्रें उत्तर-दक्षिण दिशा में हैं। कब्रों में अस्थि-पिंजरों का चेहरा पश्चिम की ओर मुड़ा हुआ है, जैसाकि मुसलमानों में रिवाज है। इस खुदाई में बारी मस्जिद के बाद वाले चरण के साक्ष्य दूसरा फर्श फैलाये जाने के रूप में मिलते हैं। यह फर्श स्तंभ आधारों, कब्रों तथा चबूतरों को ढ़ांपने के बाद, यह फर्श चूना और सुर्खी का बना है। यह मस्जिद के आखिरी ढ़ांचागत चरण का संकेतक है। चूंकि 18वीं सदी के मध्य भाग से पहले राम चबूतरों की मौजूदगी का कोई साहित्यिक या ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है, चबूतरों स्तंभ आधारों तथा कब्रों का फर्श में धंसता हुआ निर्माण, 18वीं-19वीं सदियों का माना जा सकता है। यह ज्ञात ही है कि 1857 से पहले अयोध्या में दंगे हुए थे और इनमें कुछ खून-खराबा हुआ था। बहरहाल, अवध के नवाब के हस्तक्षेप से, दोनों समुदायों के बीच के टकराव को हल कर लिया गया था। इसके बाद सद्भाव बहाल हो गया था और इसके कुछ ही समय बाद, 1857 में हिदुओं और मुसलमानों ने मिलकर सामराजी सत्ता के खिलाफ मोर्चा लिया था। आगे चलकर, 1948 में बाबरी मस्जिद पर जबरन कब्जा किए जाने के बावजूद, 6 दिसंबर 1992 को संघ परिवार की उपद्रवी भीड़ों द्वारा ध्वस्त किए जाने तक, मस्जिद वहां कायम थी। अंत में हम निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं: 1. रामजन्मभूमि कहलाने वाली जगह पर ताजा खुदाई से यह पता चलता है कि भगवान राम के अयोध्या में जन्मा होने के परंपरागत विश्वास को इतिहास में अनंतकाल तक पीछे नहीं ले जाया जा सकता है क्योंकि यहां तो पहली बार आबादी ही 600 ईस्वीपूर्व में आयी थी। 2. ताजा खुदाई से इसकी और पुष्टि होती है कि बाबरी मस्जिद के नीचे कोई हिंदू मंदिर नहीं था। वास्तव में इसके नीचे (यानी उसी स्थान पर इससे पहले) सल्तनत काल की एक मस्जिद थी। इसलिए, 1528 में मस्जिद बनाने के लिए बाबर के ऐसे किसी कल्पित मंदिर को तोड़े जाने का सवाल ही नहीं उठता है। 3. खुदाई में यह भी पता चला है कि बाबरी मस्जिद से जुड़े पानी के हौज के ऊपर राम चबूतरा बनाया गया था। इसके साथ ही ईंट के टुकड़ों तथा सेंड स्टोन के स्तंभ आधारों का निर्माण और बाबरी मस्जिद परिसर में बनी कब्रें, सभी बाद में जोड़े गए निर्माण हैं और ये 18वीं-19वीं सदियों से पहले के नहीं लगते। उन्नीसवीं सदी में बाबरी मस्जिद का जीर्णोद्धार हुआ था और उसका दूसरा फर्श सभी बाद के निर्माणों को ढ़ांपे हुए था। यह विचित्र बात है कि विश्व हिंदू परिषद ने, संघ परिवार तथा भाजपा के समर्थन से, अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ घृणा तथा हिंसा का आंदोलन छेड़ा है। इसमें न तो मुस्लिम अल्पसंख्यकों का कोई कसूर है और न ही इसके पीछे कोई जायज कारण है। यह मुहिम मानवता, जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता तथा सामाजिक न्याय के उन सभी मूल्यों की धज्जियां उड़ाते हुए छेड़ी गयी है, जिनकी सभी आधुनिक सभ्य समाज इतनी कद्र करते हैं।
जाने-माने पुरातत्वविद, इतिहासकार और सोशल एक्टिविस्ट डॉ. सूरजभान का 14 जुलाई 2010 को रोहतक (हरियाणा) में निधन हुआ। उनका जन्म 1 मार्च 1931 को मिंटगुमरी (फ़िलहाल पाकिस्तान में) हुआ था। वे इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, अर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के केन्द्रीय सलाहकार मंडल और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् की कार्यकारिणी केसदस्य रहे। 1992 में बाबरी मस्जिद गिरा दिए जाने के बाद उसके मलबे में से मंदिर के तथाकथित अवशेष ढूंढ़ने का दावा कर रहे आरएसएस प्रायोजित कथित पुरातात्विकों से उन्होंने लोहा लिया और वे इस मसले में लखनऊ की अदालत में बतौर विशेषज्ञ गवाह के रूप में पेश होते रहे। यह बात दीगर है कि अयोध्या पर आए यूपी हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के विवादास्पद फैसले में एक न्यायाधीश ने यहां तक कहा कि चूंकि वे इतिहासकार नहीं है इसलिए उन्होंने ऐतिहासिक पहलू की छानबीन नहीं की पर उन्होंने यह भी कह दिया कि इन मुकदमों पर फैसला देने के लिए इतिहास और पुरातत्वशास्त्र अत्यावश्यक नहीं थे! डा. सूरजभान का यह लेख सहमत मुक्तनाद, अप्रैल-जून 2003 अंक में छपा था
(एक ज़ि‍द्दी धुन से साभार)

9 टिप्‍पणियां:

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

सुमन जी, अब तो आपको अपना नाम बदल ही लेना चाहिए....वैसे नमाज वगैरह पढना तो अब तक सीख ही चुके होंगें :)

Anupam karn ने कहा…

. Mr. Surajbhan , May be you right in your logic but ever thought that whether god lives in logic or not , sure the judgement is based more on faith less logical ....that's how They (judges) could be wise Because God lives in our faith our perception , That's all they could think about the termination of the problem but now ...why are we fueling it more saying it unwiseful .It's not that they didn't leave the land for Masjid May be it support the demolition May be it hurt a few muslim . but same time it's with the sentiments of crores of hindus(which can't be neglected) and we will have to think what the mass want (they want peace) everybody can't be satisfied on this issue . I'll will urge all the people to accept it to terminate it as we all know God don't live in mandir/masjids but in something else . plz don't be logical but be thoughtful here as they did ..... it's now because of media that they (Muslim) are going to SC just nothing except promoting the problem more .

पद्म सिंह ने कहा…

हाईकोर्ट का फैसला आर एस एस या विश्व हिंदू परिषद द्वारा प्रायोजित पुरातत्वविदों की रिपोर्ट के आधार पर किया गया ... कमी ये रही कि आप या सूरजभान पिछले साठ वर्षों से जाने कहाँ खोये रहे ... वरना जजों को कुछ तो अक्ल आ जाती ...
कृपया यह बताएँगे कि ये पोस्ट किस के द्वारा प्रायोजित है ?

पद्म सिंह ने कहा…

कृपया एक पोस्ट मथुरा, वाराणसी के मंदिरों के बारे में लिखें कि वहाँ की मस्जिदों से पहले वहाँ क्या था ?
दिल्ली की कुतुबमीनार के बारे में भी लिखें कि इसे कैसे बनाया गया है ... क्या ये आपके एजेंडे में नहीं है ?

सुमित प्रताप सिंह ने कहा…

आप अपनी पत्रिका का नाम "लोकसंघर्ष पत्रिका" की बजाय "मुस्लिम संघर्ष पत्रिका" रख तो ज्यादा बेहतर रहेगा...

timeforchange ने कहा…
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timeforchange ने कहा…

bhai sahab chaliye maan bhi lete hai ki vahan babri masjid thi , lekin aapko ye bhi maloom hoga ki ram hinduon mein ishwar ka avatar mane jate hain aur kitne poojya hain ,agar 90 karor hindu mante hain ki vo ram ka janma sthan hai , to muslim samuday ko samsya kya hai , ye muslim samudai ka ativadi nature nahi batata ,babri masjid ek samanya masjid hai , aur agar muslim samuday mandir banane mein help karta hai to hindu bhi aapki babri masjid fir se banvane ko taiyar hain .

timeforchange ने कहा…

ek aur baat itihaas mein muslim aatatiyon dwara kitne hi mandir thode jane ke pramaan hain , somnath se lekar kashi tak , babri masjid girne par itna gusaa to sochiye hinduon ko kitna gussa aata hoga muslim samuday par jo ye baat maane se hi inkaar karta hai , hindu samaj ka hi daaitva nahi prem bhav bana kar rakhna , muslim samuday ki hi bhavnayein nahi hinduon ka bhi dil toothta hai .

बेनामी ने कहा…

babri masjid mamuli masjid nhi ...