गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

वैकल्पिक आर्थिक वार्षिकी भारत, 2009-2010 भाग 2

ग्यारहवीं योजना में रोजगार
फिर भी सच्चाई के कुछ पहलू छिपाए नहीं जा सकते हैं। नवउदारवादियों को यह मानना पड़ता है 90 प्रतिशत से ज्यादा श्रमिक अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्रा में काम करते हैं। यही नहीं, संगठित क्षेत्रा में, जहां नियमित रूप से मजदूरी और वेतन मिलता है (चाहे वह जिंदा रहने के लिए अपर्याप्त ही क्यों न हो), उसमें पूरी श्रमिकों की संख्या का एक छोटा-सा भाग लगा हुआ है और बाकी या तो अपने स्वयं के किसी कारोबार में लगे हैं अथवा अनियमित दिहाड़ी मजदूर हैं। यदि हम राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) के आंकड़ों को ज्यादा उपयुक्त मानें, तब भी 2004-05 में संगठित क्षेत्रा में नियमित मजदूरी अथवा वेतन पाने वाले लोगों की संख्या 3.185 करोड़ थी। इनमें से 88 प्रतिशत श्रमिक संगठित गैर-कृषि कामों में लगे थे। यह भी गौर करने की बात है कि इन सब श्रमिकों में से 10 प्रतिशत से कम माध्यमिक शिक्षा प्राप्त कर पाए थे। इस तरह विश्व बैंक और भारतीय योजना आयोग की रोजगार संबंधी समझ काफी हद तक मनोगत विचारों पर टिकी हुई है जो अर्थव्यवस्था के सर्वमान्य मकसदों के अनुकूल न होकर नवउदारीकरण की इस गंभीरतम सामाजिक असफलता को कम करके दिखाने के लिए उस पर एक वैज्ञानिक मुलम्मा चस्पा करती है। सीधी बात यह है कि देश में 77 प्रतिशत लोग रोजाना सिर्फ 20 रुपए खर्च करने की क्षमता प्राप्त कर पाए हैं। वर्तमान नीतियों के तहत राष्ट्रीय आय बढ़ाने और उद्योगों तथा सेवाओं के क्षेत्रा को सभी सामाजिक नियंत्राणों से मुक्त करके और भारत को देशी-विदेशी पूंजी के लिए अभयारण्य बना कर तेजी से पूंजी संचय और उत्पादन वृद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ने के सारे प्रयास न तो रोजगार बढ़ा पाते हैं, न मजदूरी की दर और न ही रोजगार की गारंटी या सुरक्षा। वास्तव में, उत्पादन के मुकाबले रोजगार में बढ़ोतरी के पिछड़ जाने के कारण उत्पादकता में बढ़त का दावा सांख्यकीय तिकड़म भर है। बढ़त कोई वास्तविक या जमीनी सच्चाई यानी खेती या कारखाने में वास्तविक रूप से होने वाला कोई सुधार का नतीजा नहीं, बल्कि उत्पादकता की आकलन पद्धति और परिभाषा में फेरबदल का नतीजा है। विद्यमान उद्योगों आदि काम करनेवालों की संख्या पहले से कम हो जाने के कारण प्रति व्यक्ति उत्पादन ज्यादा नजर आता है।
यहां एक गंभीर बात की तरफ इशारा करना जरूरी है। नवउदारवादी नीतियों का एक मुख्य बिंदु कल-कारखानों यानी विनिर्माण क्षेत्रा और वित्तीय क्षेत्रा और आधुनिक सूचना तकनीकों पर आधारित सेवाओं को नियत्रांण-मुक्त कर और प्रोत्साहन दे कर विकास प्रक्रिया का अग्रिम दस्ता बनाना है। किंतु कल-कारखानों का योगदान न तो राष्ट्रीय आय में और न ही हमारी सारी श्रमशक्ति में इस क्षेत्रा का अनुपात 15-16 प्रतिशत से ज्यादा हो पाया है। सच है कि खेती में श्रमशक्ति का अनुपात घट कर 55 प्रतिशत के करीब आ गया है। बहुत गतिमय मानी जानेवाली सूचना प्रद्योगिकी और तेजी से बढ़ते वित्तीय क्षेत्रा ने हमारी 40 करोड़ से ज्यादा की श्रमशक्ति में महज 60 लाख लोगांे को रोजगार मुहैया कराया है। विनिर्माण क्षेत्रा की तो हालत यह है कि इसके कुल 4.50 करोड़ कर्मचारियों में से 3.34 करोड़ लोग असंगठित/अनौपचारिक काम में ही लगे हुए हैं। संगठित क्षेत्रा में रोजगार को कितना कम महत्त्व दिया जाता है इसका एक उदाहरण यह है कि संगठित क्षेत्रा की कंपनियों की कुल लागत का महज 8 प्रतिशत मजदूरी और वेतन के रूप में खर्च होता है। देश में ब्याज की दर नीची रख कर और टैक्स कानूनों में कंपनियों को पूंजी की घिसावट के लिए 25 प्रतिशत की दर से छूट देकर पूंजी-प्रधान तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। आयातित तकनीकें, मशीनरी और उपभोग वस्तुएं मुख्यतः धनी देशों से खरीदी जाती हैं। वहां एक ओर श्रम की जरूरत को कम करने पर जोर दिया जाता है, दूसरी ओर उच्च आय जमातों के लिए मंहगे साजा-सामान को ज्यादा तरजीह दी जाती है। अतः उत्पादन वृद्धि का नतीजा काफी कम अनुपात में रोजगार बढ़ोतरी के रूप में प्रकट होता है। एक वाक्य में कहें तो जहां उत्पादन और मुनाफे की वृद्धि को विकास का मुख्य उद्देश्य और संकेतक माना जाता है और रोजगार को इन प्रधान उद्देश्यों की प्राप्ति की जरूरी मजबूरी तथा प्रसंगवश प्राप्त नतीजा, वहां रोजगार की स्थिति का लगातार बदतर होते जाना एक अनिवार्य नतीजा ही होगा।
फिर भी उत्पादन वृद्धि को टिकाऊ और सतत बनाए रखने के लिए रोजगार की स्थिति को लगातार सुधारते रहना नवउदारवादियों की एक बड़ी मजबूरी है। बिना रोजगार के, यानी मजदूरी और वेतन लोगों के हाथ में दिए उत्पादक अपना माल बेचने के लिए पर्याप्त बाजार कहां से लाएंगे? इसीलिए कहा गया है कि बिना रोजगार बढ़ाए उत्पादन प्रक्रिया मांग की कमी से बाधित हो जाती है। अनेक लोग आर्थिक जीवन में हाशिए पर आ जाते हैं और सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी और गहरा जाती है। यह विश्लेषण दिखाता है कि बेरोजगारी, गरीबी और असमानता का आपस में नजदीकी रिश्ता है। इन तीनों सामाजिक त्रासदियों से लोगों को बचाना आर्थिक-व्यावसायिक आवश्यकता के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक जरूरत भी है, खास कर एक लोकतांत्रिक देश में। कट्टर अनुदारवादी शासकों ने भी रोजगार और समाजिक सुरक्षा बढ़ाने के उपाय यूरोप के कई देशों में शुरू किए थे। इन्हीं कारणों से भारत में भी आर्थिक नीतियों की रोजगार के मामले में असफलता की आंशिक भरपाई के लिए कई नीतियां और कार्यक्रम बनाए गए हैं। पिछले तीन-चार साल से महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम चलाया जा रहा है। औद्योगिक, वित्तीय और प्रादेशिक असंतुलन घटाने और दलित जमातों आदि को विशेष रूप से कष्टकर स्थिति से निजात दिलाने के लिए कई छोटे-मोटे प्रयास किए जा रहे हैं। पर इनके लिए न तो पर्याप्त धनराशि का अबंटन किया जाता है और न ही भ्रष्टाचार-मुक्त प्रभावी क्रियान्वयन नीति लागू की गई है। अतः कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि रोजगार सृजन के ये राजनीतिक-प्रशासनिक प्रयास वास्तव में रोजगार सृजन नहीं कर पाते, बल्कि बेरोजगारों को छोटी-मोटी तात्कालिक राहत भर दे पाते हैं। वह भी खर्च की गई राशि और इन रोजगारकारी योजनाओं के पक्ष में पीटे गए ढिंढोरे के मुकाबले बहुत कम।
आमतौर पर इन रोजगारकारी कार्यक्रमों के बेअसर होने का कारण प्रशासन व्यवस्था की खामियों μ नौकरशाही की निष्ठुरता, भ्रष्टाचार, अतिकेंद्रीकरण आदि को बताया जाता है। इस कटु सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि यह एक मूलतः सतही, प्रत्यक्ष दृष्टिमान कारण है। असल बात है कि नवउदारीकरण की मूल नीतियों और जन-सशक्तिकारक, लोकतांत्रिक मूल्यों से ओत-प्रोत रोजगार सृजन की टिकाऊ नीतियों में जन्मजात घोर अंतरविरोध है। नवउदारवाद आर्थिक मामलों में आपूर्ति-वृद्धि को सर्वोच्च अहमियत देता है। इसका ठोस अर्थ है बचत, निवेश, मुक्त या नियंत्राण-नियमन विहीन, निजी मुनाफे को बढ़ाते रहने वाली मौद्रिक, राजकोषीय, उत्पादन और विदेशी लेनदेन संबधी राजकीय नीतियों और कार्यक्रमों का प्रचलन और अनुपालन। यदि निवेश, उत्पादन और मुनाफे बढ़ते हैं तो नवउदारवादियों को पक्का भरोसा है कि इन प्रक्रियाओं के असर सेे बाजार में मांग अवश्य बढ़ेगी। रोजगार बढ़ना मुख्यतः श्रम की मांग बढ़ने का ही दूसरा नाम है। अतः यदि श्रम बाजार में पूंजीपतियों और निवेशकों पर श्रम को लेकर बंदिशें लगाई जाती हैं तो रोजगार-सृजन में रुकावटें आएंगी। श्रमिकों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति की अनदेखी करके हमारे देश के मुख्यधारा के अर्थशास्त्राी पूंजीपतियों द्वारा संचालित संगठनों के विचारों के सुर-में-सुर मिलाते हुए कहते हैं कि श्रम-संबंधों का निपटारा कानूनों द्वारा नहीं करके बाजार की शक्तियों को करने देना चाहिए। इससे पूंजीधारक अधिकाधिक श्रमशक्ति का इस्तेमाल करने को प्रेरित होंगे। इन पर नियंत्राण उनकी पहलों पर लगाम लगाएंगे। वे निवेश करने से हिचकिचाएंगे। अतः वे मजदूरों की मांग बढ़ाने वाली नीतियों की जगह आपूर्ति-पक्षीय नीतियों के पक्षधर हैं। उनके अनुसार रोजगार के मामले में राज्य की भूमिका मजदूरों के शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था, एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर काम करने की सुविधाएं बढ़ाने, रोजगार के अवसरों और स्थिति के बारे में सूचना तंत्रा को सुधारने-जैसे आपूर्तिपक्षीय कदमों तक सीमित होनी चाहिए। यही नवउदारीकरण का मूल-मंत्रा है। वे श्रम की मांग को पूरी तरह बाजार की ताकतों और प्रक्रियाओं के हवाले छोड़ देते हैं। हां, यदि आपूर्ति पक्ष के रास्ते में कोई श्रम कानून संबंधी रुकावटें हैं, तो नवउदारवादी संगठित क्षेत्रा में रोजगार वृद्धि की मंद चाल का सारा दोष उनके सिर पर मढ़ने में नहीं हिचकिचाते। यहां यह ध्यान देने की बात है कि मौद्रिक और कर्जनीति, कराधान और राजकीय खर्चनीति, विदेशी व्यापार और विदेशी पूंजी संबंधी नीति, वित्तीय क्षेत्रा की अन्य नीतियों आदि के कारण यदि राजकीय खर्च बढ़ता है या राजकीय आमदनी (राजस्व) घटती है, या दोनों नतीजे निकलते हैं, तो इन नीतियों की भारी लागत को आर्थिक क्रियाओं, खासकर आमदनी वृद्धि के लिए उचित माना जाता है। यहां तक कि इन नीतियों का भारी बोझ बेरोजगारों को छोटी-मोटी राहत या रोजगारनुमा कोई झुनझुना पकड़ाने के रास्ते में भी धन की कमी पैदा करता है तो वे इसे किसी परेशानी का सबब नहीं मानते हैं।
भारत में पिछले बीस सालों में रोजगार के मामले में इसी नवउदारवादी सोच की दुंदुभि बजती रही है। राजकीय खर्च और राजस्व की नीतियां पूंजीधारकों-निवेशकों, यहां तक कि कर-चोरों, विदेशों में काला धन जमा कराने वाले सटोरियों और वायदा बाजारों के जुआरियों के हितों, यानी उनकी निद्र्वंद्व मोटी आमदनी का पूरा ध्यान रखती रही हैं। दो-तीन साल पहले राजकोषीय नीतियों में पूंजीपतियों, बड़ी कंपनियों और मोटे आयकरदाताओं को दो लाख करोड़ रुपयों की कर छूट या प्रोत्साहन दिया जाता था, वह अब बढ़कर पांच लाख करोड़ रुपयों का अंक पार कर चुका है, अर्थात् पूरे बजट का लगभग आधा हिस्सा। इस राशि के मुकाबले महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना-जैसे बहु-प्रतीक्षित कार्यक्रम और उसपर अपनी उम्मीद टिकाए 70 करोड़ ग्रामीणों के लिए 2010-11 के बजट में मात्रा 40 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान खुल्लमखुल्ला अन्याय और अलोकतांत्रिक मूल्यों की कहानी कहते हैं। ये तथ्य दिखाते हैं कि नवउदारीकरण राज्य की भूमिका घटाता नहीं है, बल्कि उसे बदलता है। ग्रोथ यानी आर्थिक वृद्धि के अतिभोलेपन भरे लगने वाले उद्देश्य के लिए राज्य सक्रिय, खर्चीली और एकांगी कामकाज पद्धतियां और नीतियां अपनाता है। हर राज्य अपने मुख्य स्तंभों, नेताओं और कर्ताधर्ता लोगों और जमातों की हित-साधना तो करता है किंतु उस पर सामाजिक वैधता और आम स्वीकृति की मोहर लगाने के लिए गरीबों, बेरोजगारों, हाशिए के लोगों के लिए कुछ बहु-प्रचारित किंतु कृपण हाथों से खर्च भी करता है। नवउदारवादी राज्य की ”आम आदमी“ हितैषी नीतियां भी ऐसे ही प्रयासों का प्रमाण हैं।
अतः इन दो दशकों में नवउदारवादी नीतिगत माॅडल ने रोजगार के आंशिक स्वरूप और बढ़ती जरूरत के सामने कुछ दिखावटी, अल्पकालिक, राहतकारी उपाय अपनाए हैं। ये प्रयास आजीविका की अपर्याप्तता और अनिश्चितता की समस्या के गुणात्मक और मात्रात्मक मूल पक्षों को अनुछुआ छोड़ देते हैं। इसी प्रक्रिया को एक कम कष्टकारी या थोड़ा खुशनुमा रंग देने के लिए मुख्यधारा से बाहर के ये लोग अपने तन-मन के जोड़े को संभाले रखने के लिए निजी और पारिवारिक प्रयास करते हैं। तरह-तरह के पापड़ बेल कर अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं। नीतिकार उन्हें असंगठित-अनौपचारिक ”रोजगार“ के रूप में चिद्दित करके शायद अपने मानस के किसी कोने में छिपे बैठे अपराध बोध को घटाने की कोशिश कर रहे हैं। कल्पना करें कि यदि भारत की इस विशाल और अस्फुटित-प्रच्छन्न क्षमता और प्रतिभावान श्रमशक्ति के पास वास्तव में काम मिले तो भारत समावेशी समृद्धि और मानव विकास की किस स्तर प्राप्त कर सकता है!
सन् 1950 से 1980 तक का अघोषित उदारवाद और पूंजी की चैधराहट वाली, एक सीमा तक अंतर्मुखी नीतियों और सन् 1990 के बाद की डंके की चोट पर अपनाई गई नवउदारीकरण और देशी-परदेशी विभेद के बिना नियंत्राण-नियमन मुक्त नीतियों, दोनों में रोजगार पक्ष यानी आम आदमी और श्रम की दोयम और गौण भूमिका ध्यान देने योग्य है। इससे उत्पन्न सवालों पर गंभीर, जनपक्षीय विवेचना की जरूरत है।
विकास अर्थशास्त्रा की मुख्यधारा का अब तक का विवेचन नवउदारवादीकरण और सबके लिए पर्याप्त और सुरक्षित रोटी-रोजी की व्यवस्था के बीच मौजूद अंतरविरोध को दर्शाता है। इस कारण से आज के भारत में सत्तासीन नवउदारवादी शासन सबके लिए रोजगार के, यानी आर्थिक प्रक्रियाओं में हर नागरिक की प्रभावी और पुख्ता भागीदारी के उद्देश्य और नीतियों से कन्नी काटते हैं। इसलिए सबके लिए प्रभावी रोजगार का रास्ता नहीं पकड़ कर वे सारा जोर गरीबी घटाने के कार्यक्रमों पर लगा देते हैं। इस तरह की नीतियां नरेगा-जैसी असाधारण नीतियों तक को प्रभावी रोजगार का साधन नहीं बनने देती हैं। साथ ही, वे प्रच्छन्न रूप से एकाधिकारी रूप से पूंजी संचयन को बढ़ावा देने और सामाजिक संसाधनों की बर्बादी या उनके अनुपयुक्त इस्तेमाल बढ़ाने वाले अन्य कई कार्यक्रमों को अपनाते हैं। जैसे कि आजकल शिक्षा पर पहले से ज्यादा जोर दिया जा रहा है, किंतु साथ में रोजगार को उपयुक्त और संगत प्राथमिकता नहीं देने के कारण न केवल शिक्षा के मामले में आगे बढ़ाना दुष्कर रहेगा बल्कि शिक्षित बेरोजगारों की फौज में और ज्यादा इजाफा होगा। सामाजिक समावेशन के लिए असली जनोन्मुख विकास जरूरी है। प्रभावी सतत रोजगार इस प्रक्रिया की पहली सीढ़ी है। अन्यथा गरीबी हटाने को रोजगार का चोगा पहनाकर सच्चे विकास से लगातार दूर छिटकाने की प्रक्रिया का कोई ओर-छोर तक नजर नहीं आएगा।

कमल नयन काबरा
(समाप्त)

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