मंगलवार, 18 जनवरी 2011

महबूब के आगोश में सभी को जाना है

तकदीर ने लिखा जिन्दगी का तराना है
महबूब के आगोश में सभी को जाना है

करते रहते हैं इंतज़ार ख़ुशी के ख़त का
खुले खतों में हर्फों सेही दिल बहलाना है

जो करते हैं बातें आसमां तक जाने की
लौट वापस उनको भी जमीं पे आना है

करते हैं मुहब्बत जरुरतमंदों की तरह
क्या दुनिया भी किसी का आशियाना है

जो तूने लिखा दिया इतिहास हो गया
लकीरों में लिखा भी कैसे मिटाना है

जीने का सहारा बन ढूढ़ते हैं ताजिंदगी
तन्हा ही तो एक दिन सबको जाना है

खुद का लिखा न पढ़ पाए "ए जिन्दगी"
क्या लेकर आये क्या ले कर जाना है

जलाते सभी हैं चरागों को शाम ढले ही
''ज्योति'' एक दिन सबको बुझ जाना है
-ज्योति डांग

4 टिप्‍पणियां:

अनाम ने कहा…

ज्योति डांग जी की रचना बहुत सुन्दर है!

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

आज रिश्तों की अज़्मत रोज़ कम से कमतर होती जा रही है। रिश्तों की अज़्मत और
उसकी पाकीज़गी को बरक़रार रखने के लिए उनका ज़िक्र निहायत ज़रूरी है। मां का रिश्ता
एक सबसे पाक रिश्ता है। शायद ही कोई लेखक ऐसा हुआ हो जिसने मां के बारे में कुछ
न लिखा हो। शायद ही कोई आदमी ऐसा हुआ हो जिसने अपनी मां के लिए कुछ अच्छा न कहा
हो। तब भी देश-विदेश में अक्सर मुहब्बत की जो यादगारें पाई जाती हैं वे आशिक़ों
ने अपनी महबूबाओं और बीवियों के लिए तो बनाई हैं लेकिन ‘प्यारी मां के लिए‘
कहीं कोई ताजमहल नज़र नहीं आता।
ऐसा क्यों हुआ ?
इस तरह के हरेक सवाल पर आज विचार करना होगा।
‘प्यारी
मां‘
के नाम से ब्लाग शुरू करने का मक़सद यही है।
इस प्यारे से ब्लाग को एक टिनी-मिनी एग्रीगेटर की शक्ल भी दी गई है ताकि
ज़्यादा से ज़्यादा मांओं और बहनों के ब्लाग्स को ब्लाग रीडर्स के लिए उपलब्ध
कराया जा सके। जो मां-बहनें इस ब्लाग से एक लेखिका के तौर पर जुड़ने की
ख्वाहिशमंद हों वे अपनी ईमेल आईडी भेजने की मेहरबानी फ़रमाएं। मेरी ईमेल आईडी है -
eshvani@gmail.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति

vandan gupta ने कहा…

गज़ब कर दिया ज्योति जी …………हर शेर यथार्थ बोध कराता हुआ……………शानदार गज़ल्।