शुक्रवार, 11 मार्च 2011

पुस्तक समीक्षा: आधुनिक परिवेश का बालमन है ‘‘नन्हें सुमन’’


यह डॉक्टर रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ की कविता का दूसरा पक्ष है, जो आज के बदलते परिवेश में पल रहे नन्हें मुन्ने, प्यारे-प्यारे बच्चों के मन की बात को सरल और बेहद सरल तरीके से अभिव्यक्ति देते हैं। जो बच्चों को एक ही पाठ में याद हो जाती हैं। उनकी यह सरल, निश्छलता और हृदय की पवित्रता उनकी इन बाल कविताओं में पग-पग पर छलकता है।
‘नन्हें सुमन’ संग्रह का मुख पृष्ठ ही भीतर की बात खोलने में समर्थ है। यह आकर्षक होने के साथ इस गुणवत्ता से पूरित है। कुत्ता, भालू, बन्दर व बिल्ली, तितली तथा सुरम्य प्रकृति आदि बच्चों के पुराने प्रिय विषय रहे हैं और आज भी हैं। इनका बदलते परिवेश में चित्रण किया गया है। किन्तु आधुनिक परिवेश जिसको लेकर ये कविताएँ बच्चों के ज्यादा निकट पहुँचती हैं उनका एक भी चित्र मुख पृष्ठ पर नहीं है। यथा लैपटाप, मोबाइल, स्कूली बस आदि, यद्धपि इन पर उनकी कविताएँ भी हैं।

बिना सहारे औ सीढ़ी के, झटपट पेड़ों पर चढ़ जाता। गली मुहल्लों और छतों पर, खों-खों करके बहुत डराता। लैपटॉप को लेकर वे कहते हैं:- इस बस्ते में क्या है भइया, हमें खोलकर दिखलाओ। कहाँ चले तुम इसको लेकर, कुछ हमको भी बतलाओ।।
उल्लू, बगुला, चंदामामा और फलों का राजा आम, लीची, जैसे फलों पर भी उनकी कविताएँ हैं और बच्चों की प्यारी-प्यारी दुनिया इन्हीं चीजों से बनी है।
जाहिर है ‘मयंक’ जी ने अपनी 65 कविताओं के माध्यम से उतने तो नहीं किन्तु 40 नये कोनों में जरूर झाँका है। इस संग्रह को नये और आधुनिक परिवेश में आ रही नित्य नई वस्तुओं के कौतुकपूर्ण मनोहारी वर्णन के लिए अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।


-विनयदास
(समीक्षक)
मो0: 9935323168

4 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

बहुत बढिया और शानदार समीक्षा ……

Kajal Kumar ने कहा…

किताब से मिलवाने के लिए धन्यवाद.

निर्मला कपिला ने कहा…

बढिया समीक्षा। धन्यवाद।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

विनय दास जी का आभारी हूँ!