सोमवार, 4 जुलाई 2011

भ्रष्टाचार विरोध, विभ्रम और यथार्थ भाग-1

नागरिक समाज की चिंता ?
‘‘भारतीय समाज के पास अभी तक कोई राजनैतिक मानस नहीं है। जातियों, राजनैतिक परिवर्तनों से अक्षुण्ण जीवनयापन आदि का लंबा अतीत उस पर मजबूती से हावी है।’’ राममनोहर लोहिया, ‘एंड पावर्टी’, 1950।
देश में बेकाबू हो चुके भ्रष्टाचार से चिंतित नागरिक समाज, (सिविल सोसायटी) के कुछ नुमाइंदों, जिन्हें नागरिक समाज एक्टिविस्ट कहा जाता है, ने मिलकर इंडिया अगेंस्ट करप्शन, (आई0ए0सी0) की स्थापना की हैं। उसमंे शामिल नामों की सूची देख कर सामान्य नागरिक को आश्चर्य हो सकता है कि नागरिक समाज की भ्रष्टाचार को लेकर गहरी चिंता परस्पर उलट हस्तियों को एक मंच पर ले लाई है। दिल्ली में जंतर-मंतर पर 5 अप्रैल 2011 को इंडिया अगेंस्ट करप्शन के तत्वावधान में उसके वरिष्ठ सदस्य सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने आमरण अनशन शुरू किया, जिसे अगले ही दिन से मध्यवर्ग का अच्छा-खासा समर्थन मिलना शुरू हो गया। माँग थी कि सरकार, सरकारी लोकपाल विधेयक की जगह, आई0ए0सी0 के चुनींदा नागरिक समाज एक्टिविस्टों द्वारा तैयार जन लोकपाल विधेयक को स्वीकार करे और उसके आधार पर संसद के आगामी मानसून सत्र में कानून बनाए। तत्काल एक संयुक्त समिति बनाने, जिसमें अध्यक्ष समेत आधे सदस्य नागरिक समाज के हों, की माँग भी रखी गई।
भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के उद्देश्य से तैयार किया गया लोकपाल
विधेयक पिछले चार दशक से ज्यादा समय से लंबित चला आ रहा था। उस दिशा में जल्दी और प्रभावी कार्रवाई करने के लिए आई0ए0सी0 के नुमांइदे पिछले करीब साल भर से सरकार पर दबाव बना रहे थे और जनमत जुटा रहे थे। इसी साल गांधी के शहादत दिवस 30 जनवरी को उन्होंने दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली का आयोजन किया था और वहाँ से जंतर-मंतर तक जुलूस निकाला था। हालाँकि आयोजक और वक्ता वही सब लोग थे, जिन्होंने 5 अप्रैल को जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे का कार्यक्रम रखा, समर्थन और मीडिया कवरेज के हिसाब से रैली प्रभावशाली नहीं रही। 7 मार्च को अन्ना हजारे जन लोकपाल विधेयक तत्काल स्वीकार करने के तकाजे के साथ प्रधानमंत्री से मिले और माँग पूरी न होने की स्थिति में आमरण अनशन करने का अपना निर्णय उन्हें बताया। जाहिर है, उनकी और उनके साथियों की उसके बाद भी प्रधानमंत्री कार्यालय से बातचीत चलती रही होगी।
प्रधानमंत्री से मिलने और अनशन पर जाने के बीच दोनों पक्षों के बीच हुई बातचीत का ब्यौरा हमें नहीं मिल पाया। प्रधानमंत्री ने इस मामले में कांग्रेस के किन नेताओं से क्या बातचीत की, इसका ब्यौरा भी हमें नहीं मिला।
हजारे ने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपना कैरियर आपातकाल के दौरान अपने गाँव रालेगाँव सिद्धी में शराब-विरोधी अभियान चला कर शुरू किया था। उनका ‘तरुण मंडल’ पियक्कड़ों और शराब बेचने वालों को पेड़ से बाँधने और पीटने की सजा भी देता था, जिसके बारे में हजारे कहते हैं कि माँ भी अपने बच्चों की भलाई के लिए उन्हें जबरदस्ती कड़ुवी दवाई पिलाती है। गाँव वालों को साथ लेकर उन्होंने रालेगाँव सिद्धी को आदर्श हरित गाँव के रूप में विकसित किया। उनके प्रयोग की तरफ शोधकर्ताओं और विदेशी विद्वानों का ध्यान गया और उन्हें काफी प्रशंसा मिली। हमें उनके काम के बारे में ज्यादा विस्तार से डा0 राजीव लोचन शाह ने बताया जो 1991-94 में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में हमारे साथ फेलो थे। उन्होंने अपनी शोध परियोजना में अन्ना हजारे के काम को शामिल किया था और अध्येताओं की संगोष्ठी में अपना पत्र पढ़ा था। वे रालेगाँव सिद्धी में अन्ना हजारे से मिल कर आए थे। हमने उस समय हजारे के प्रयोग और उसकी विधि के बारे में थोड़ा पता करने की कोशिश की थी।
प्राप्त जानकारी के बाद हजारे और उनके कामों में हमारा आकर्षण नहीं बन पाया। हमें लगा था कि फौजी अनुशासन से एक गाँव को तो ‘ठीक’ किया जा सकता है, उस विधि से पूरे देश को ठीक करने के लिए तानाशाही की जरूरत होगी, जो आमतौर पर फौजी ही होती है। हमने थोड़ी कोशिश उनकी समाज, धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, शिक्षा, स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक संबंधी धारणाओं पर नजर डालने की भी की थी। हमें लगा कि ‘सबकी सहमति’ से बनाए जाने वाले ‘सर्वमान्य नियम व कानून’ लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय जैसी आधुनिक धारणाओं से प्रेरित नहीं हैं न ही गांधी से, जिन्होंने आधुनिकता की एक देसी समझ बनाने की केाशिश की थी। हमें उनके आदर्श गाँव का माॅडल
विचारधारात्मक रूप से, लोहिया का शब्द लें तो, ‘पीछे देखँू’ लगा था। इधर नेट, (एच0टी0टी0पी0 कम्युनलिज्म डाट ब्लागस्पाट डाट काम) पर मुकुल शर्मा का एक अच्छा लेख ‘अन्ना हजारे एंड हिज पालिटिक्स: अथारिटेरियन, हायरारकिकल एंड लेडन विद डामीनेंट आईडियालोजी’ पढ़ने को मिला, जिसमें बताया गया है कि हजारे के प्रयोग में प्राधिकार, (अथारिटी) की मान्यता मूलभूत है। शायद तभी वे प्राधिकारवादी लोकपाल चाहते हैं।
जब हमने हजारे के बारे में जाना तो वे भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन, (बी0वी0जे0ए0) की शुरुआत कर चुके थे। महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने दो बार आमरण अनशन भी किया था। इसके अलावा उन्होंने महाराष्ट्र में प्रभावी सूचना अधिकार कानून बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके सामाजिक महत्व के कामों के लिए उन्हें पद्मश्री (1990) और पद्मभूषण (1992) सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं। उनमें मेगसेसे पुरस्कार और विश्व बैंक का जिट गिल मेमोरियल अवार्ड भी शामिल है। हालाँकि एक बार उनका ‘होम करते हाथ जल’ चुका है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पी0बी0 सावंत ने एक न्यायिक जाँच में हजारे को अपने ट्रस्ट में 2 लाख रुपयों की हेरा-फेरी का दोषी पाया था। हाल में उनके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका में वही आरोप दोहराया गया है। याचिकाकर्ता को शायद नहीं मालूम कि आई0ए0सी0 दो-चार लाख के भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं, करोड़ों-अरबों के स्कैमों के खिलाफ आंदोलनरत है!
हजारे ने अपनी छवि अराजनैतिक और सादगी पसंद गांधीवादी कार्यकर्ता की बनाई है। वह छवि जंतर-मंतर पर उनके काम आई। आयोजकों ने यह भलीभाँति समझ लिया कि सादगी और अस्तेय जैसे गुणों की छवि वाले व्यक्ति को आगे करके ही भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान की विश्वसनीयता बनाई जा सकती है। अब जिस तरह से ‘भ्रष्ट तत्वों’ द्वारा ‘बदनीयती’ और ‘दुष्प्रचार’ के तहत शान्ति भूषण और प्रशांत भूषण पर सीडी और संपत्ति के आरोप लगाए हैं, उसे देख कर पता चलता है कि आमरण अनशन के लिए अन्ना हजारे का चुनाव कितना जरूरी था। उन्होंने अनशन के पहले दिन से ही मंच से बताना शुरू कर दिया था कि वे एक मंदिर की कोठरी में रहते हैं और उन्होंने कोई संपत्ति-संग्रह नहीं किया है। वे गर्व से कहते हैं कि उन्होंने समाज की भलाई के कामों के लिए करोड़ों रुपयों का इंतजाम और खर्च किया है, लेकिन उनका कोई बैंक बैलेंस नहीं है। दिन-रात संपत्ति संग्रह की हविस से परिचालित समाज में हजारे जैसे लोग गरीब नहीं, महात्मा कहलाते हैं। उस दौर में और भी, जहाँ संपत्ति-संग्रह की दौड़ में निवृत्तिमार्गी माने जाने वाले महात्माओं ने प्रवृत्तिमार्गी दुनियादारों से आगे निकलने की होड़ लगा रखी है। ऐसे में लोगों की नजर से यह सच्चाई ओझल रह जाना आश्चर्यजनक नहीं है कि ऐसे ‘महात्माओं’ के बैंक, वल्र्ड बैंक से लेकर भारत की सरकारों के खजाने तक व्याप्त होते हैं। जब चाहो, तब रकम निकाल लो।

-प्रेम सिंह
मो.09873276726

1 टिप्पणी:

Vijai Mathur ने कहा…

'अन्ना का माया जाल'उजागर करने के लिए मुबारकवाद.