बुधवार, 13 जुलाई 2011

भ्रष्टाचार विरोध, विभ्रम और यथार्थ भाग-10

राजनैतिक मानस का निर्माण

नागरिक समाज एक्टिविज्म के बरक्स राजनैतिक समूह, संगठन अथवा पार्टी का एक स्पष्ट विचारात्मक आधार, संगठन और काम करने का तरीका होता है। उसीके आधार पर उनसे अपेक्षाएँ की जाती हैं और पूरा न होने पर उनकी आलोचना और विरोध किया जाता है। सीमाएँ और अंतर्विरोध राजनैतिक पार्टियों के भी होते हैं, जिन्हें वे निरंतर सुलझाने और समायोजित करने का प्रयास करती हैं। राजनैतिक विपक्ष का निरंतर दबाव सत्तारूढ़ पार्टी को संविधान-विरोधी और जनविरोधी होने से रोकता है। विपक्ष की राजनीति एक बेहतर विचारधारा और उस आधारित व्यवस्था का दावा पेश करती रहती है। लेकिन जब किसी देश की सभी पार्टियाँ एक जैसी राजनीति करने लगती हैं तो विपक्षी पार्टियों की औपचारिक मौजूदगी के बावजूद राजनैतिक प्रतिपक्ष नहीं बचता। तब वैकल्पिक राजनीति खड़ा करने की जरूरत होती है। वह जरूरत नहीं पूरी हो पा रही है, तभी नागरिक समाज एक्टिविज्म की जगह बढ़ रही है। लेकिन, जैसा कि हमने ऊपर के विवेचन में देखा, उससे काम सरने वाला नहीं है। इस टीम के बदले कोई और टीम होती तो अभियान कुछ अलग ढंग का होता। उसकी सीमाएँ और अंतर्विरोध भी इसी तरह सामने आते। कुल मिला कर इस रास्ते पर संकट का समाधान नहीं मिलना है।
व्यापक आंदोलन राजनैतिक ही हो सकता है और नागरिक समाज के प्रयास कभी राजनीति की जगह नहीं ले सकते। नागरिक समाज राजनीति को ठीक नहीं कर सकता, ठीक राजनीति जरूर कर सकता है। नागरिक समाज एक्टिविस्टों के इरादे कितने भी नेक हों, राजनैतिक नहीं होने के कारण, वे राजनीति को प्रभावित नहीं कर पाते। उल्टा राजनीति उन्हें अपने पक्ष में प्रभावित कर लेती है। उनका राजनीति को पाठ, सबक सिखाने का हासिल अंततः प्रचलित राजनीति के समर्थन में निकलता है। कई बार इसके लिए नागरिक समाज एक्टिविस्टों में आपसी होड़ भी होती है। किशन पटनायक ने इस परिघटना की पहचान कर अराजनैतिक जनांदोलनों की जगह वैकल्पिक राजनैतिक आंदोलन का सूत्र सुझाया था। इस उद्देश्य से 1995 में कई वरिष्ठ और युवा समाजवादी नेताओं द्वारा समाजवादी जन परिषद (सजप) की स्थापना की गई। लेकिन अराजनैतिक जनांदोलनों का दबाव ऐसा है कि सजप का राजनैतिक चरित्र खड़ा होना उत्तरोत्तर मुश्किल होता चला गया है। अब उसकी स्थापना में शामिल रहे कई नेता, नवउदारवाद के शिकंजे को मुकम्मल राजनैतिक चुनौती देने के लक्ष्य से 1948 की सोशलिस्ट पार्टी की पुनस्र्थापना करने जा रहे हैं।
राजनैतिक मानस बनाने का काम मुख्यधारा राजनीति के हवाले है, जिसे वह अपनी ताकत मजबूत करने के लिए अंजाम देती है। उनमें जो भी विचाराधारात्मक भिन्नताएँ हों, एक बात में एका होता है कि वे हाशिए के समाज को बाहर धकेल कर रखती हैं। हालाँकि लोकतंत्र की मजबूरियों के चलते उन्हें दावा सभी के कल्याण और उत्थान का करना होता है। उसके लिए वे हाशिए के समाज से नेतृत्व भी चुनते हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हाशिए के समाज से स्वतंत्र नेतृत्व भी उभर कर आया है। लेकिन वह शासकवर्ग के दायरे में ही काम करता है। इस सबके बावजूद राजनैतिक पार्टियों की गतिविधियों से कुछ न कुछ राजनैतिक मानस निर्माण का काम होता है। लेकिन नागरिक समाज एक्टिविज्म और उसके अभियान अथवा आंदोलन, समाज का राजनैतिक मानस ही नहीं बनने देते। वे राजनैतिक मानस निर्माण की प्रक्रिया में रुकावट बन गए हैं।
समीक्षा लंबी हो गई है। अब समाप्त करें। शुरू में उद्धृत लोहिया के कथन की बाद के तीन वाक्य हैं, ‘‘वस्तुतः स्वतंत्रता संग्राम के तात्कालिक अनुभव ने उसे एक नई दिशा दी है। लेकिन साथ-साथ निष्ठा का अभाव भी बड़ी तेजी से आया है। लोगों के मस्तिष्क में राजनीति एवं स्वार्थ-साधन समानार्थक बनते जा रहे हैं।’’ गांधी ने समाज सुधार आंदोलनों की परंपरा को राजनीति के साथ जोड़ा और भारतीय समाज और मनुष्य की सभी वास्तविकताओं और समस्याओं की एक राजनैतिक समझदारी वकसित करने की कोशिश की। उनका राजनैतिक चिंतन यूरोप के पूँजीवादी-उदारवादी और समाजवादी साम्यवादी राजनैतिक चिंतन के बरक्स और आगे का है। हालाँकि उनके राजनैतिक चिंतन की निर्मिती में यूरोपीय चिंतन की पूँजीवाद विरोधी धाराओं का खुला स्वीकार और समावेश है। ‘हिंद स्वराज’ की संदर्भ-ग्रंथ सूची से यह स्पष्ट पता चलता है। उन्होंने तीसरी दुनिया की स्वतंत्र राजनैतिक पहल की एक मजबूत शुरुआत की। गांधी के मुताबिक राजनीति प्रकृति और समस्त जीवधारियों के साथ परस्परता के रिश्ते में मनुष्य के भौतिक कल्याण और आत्मोन्नयन का शास्त्र है। व्यक्ति, समुदाय, समाज, राष्ट्र, विचारधारा अथवा पार्टी विशेष की स्वार्थ-सिद्धि का जरिया नहीं। स्वतंत्र राजनैतिक चिंतन का कार्यभार उठाने में भारत का बौद्धिक नागरिक समाज अशक्त साबित हुआ है। नतीजतन, स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में शुरू हुआ राजनैतिक मानस की निर्मिती का कार्यभार भी पूरा नहीं हो पाया है।
यूरोपीय राजनैतिक चिंतन और व्यवहार के अनुकरण से शुरू होने वाली आजाद भारत की राजनीति की सभी धाराओं का संगम नवउदारवाद के महासागर में होना ही था। पूँजीवाद के इस नए अवतार में राजनीति की जरूरत ही नहीं बताई जाती है। तब राजनैतिक मानस की निर्मिती का अधूरा छूटा काम कैसे पूरा होगा? वह नहीं होगा तो मनमोहन सिंह का एजेंडा ही पूरा होगा। मनमेाहन सिंह एक व्यक्ति नहीं प्रवृत्ति हैं। कल को यह एजेंडा आगे बढ़ाने वाले नरेंद्र मोदी हो सकते हैं। पीछे 6 साल अटल बिहारी वाजपेयी रह ही चुके हैं। पूँजीवाद ऊँचे दाँव खेल रहा है। आप देखते हैं वह अमेरिका और यूरोप में लड़खड़ा रहा है। लेकिन यह भी तो देखिए उसने तीसरी दुनिया के नागरिक समाज में पुनर्जीवन प्राप्त कर लिया है। भारत का नागरिक समाज भ्रष्टाचार को लेकर उद्वेलित है, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है? साथी यह क्यों नहीं देख पा रहे हैं कि सारा उद्वेलन, पहले से ही तय करके, मनमोहन सिंह को वोट देने के लिए है। ताकि हांगकांग जैसी भ्रष्टाचार रहित व्यवस्था भारत में भी हो जाए! जब नेताओं और नागरिक समाज दोनों में सहमति बन चुकी है कि राजनीति स्वार्थ-सिद्धि का दूसरा नाम है तो भ्रष्टाचार कैसे मिट सकता है? यह वैकल्पिक राजनीति के कर्ताओं को भी सोचना है और अराजनैतिक नागरिक समाज एक्टिविस्टों को भी।

प्रेम सिंह
समाप्त

1 टिप्पणी:

Vijai Mathur ने कहा…

कोई नहीं सोचेगा.पूंजीवाद खुद ही भ्रष्टाचार का पोषक है.जब तक पूंजीवाद समाप्त नहीं होगा भ्रष्टाचार कैसे मिटेगा?है कोई पूंजीवाद समाप्त करने को तैयार?