शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

समाज में किस पहचान को प्रमुखता दी जानी चाहिए ?


( विडम्बनापूर्ण स्थिति यह है कि मजदूर के रूप में , किसान के रूप में , दस्तकार , दुकानदार आदि के रूप में आम लोगो का जीवन संकटमय होता जा रहा है | लेकिन वे इन पहचानो को प्रमुखता देकर एकजुट होने के स्थान पर एक दुसरे से अलगाव व विरोध में अपने धार्मिक , साम्प्रदायिक , जातीय व इलाकाई पहचानो व गोलबंदियो के साथ खड़े होते जा रहे है | )

समाज में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक जानी मानी पहचान है | किसी का भाई - बहन, पुत्र - पुत्री , माता - पिता , रिश्तेदार , नातेदार होने के की पहचान के साथ उसकी एक सामाजिक व सामुदायिक पहचान भी जरूरी है | यह सामाजिक , सामुदायिक पहचान उसे उसके माँ - बाप से , कुल खानदान से विरासत में मिली हुई है | वह हिन्दू , मुसलमान , सिक्ख, इसाई की धार्मिक , सामुदायिक पहचान भी है तथा इस देश में उसकी विशिष्ट जातीय सामुदायिक पहचान भी है | इसके अलावा उसका विशिष्ट इलाका व भाषा आदि की सामुदायिक पहचान भी है |
भारत जैसे पिछड़े देशो में सदियों से चली आ रही इन सामाजिक , सामुदायिक पहचानो का आधार समाज के पिछड़ेपन में पिछड़े युग के कामो , पेशो में और वैसी ही मानसिकताओं , प्रवृत्तियों में मौजूद है | आज भी धार्मिक , जातीय , इलाकाई व भाषाई पहचानो के आधार पर लोगो के सम्बन्ध , शादी - व्याह के पारिवारिक संबंधो के रूप में तथा अन्य सामाजिक , सामुदायिक संबंधो लगावो के रूप में बिद्यमान है |
लेकिन आधुनिक युग में , पुराने युग से चले आ रहे सामाजिक , सामुदायिक पहचानो , संबंधो की जगह अब नये सम्बन्ध व पहचान भी बनते , बढ़ते जा रहे है | चाहे पुरानी , पहचानो को कितना भी महत्व क्यों न दिया जाए परन्तु वास्तविकता यह है की आधुनिक युग की पहचानो संबंधो के आगे युगों पुराने सामाजिक , सामुदायिक सम्बन्ध टूटते जा रहे है | लगातार कमतर महत्व के सम्बन्ध बनते जा रहे है | यह आधुनिक युग - नई शिक्षा , विज्ञान व तकनिकी का युग है | आधुनिक बाज़ार व्यवस्था का युग है | इसने लोगो को आधुनिक युग के नये - नये पेशो को अपनाने के लिए बाध्य कर दिया है | अपने गाव - गंवाई के या स्थानीय व इलाकाई संबंधो से दूर हटकर नये कामो को अपनाने नई जगहों पर जाने , बसने और नये संबंधो को बनाने के लिए बाध्य कर दिया है |नये ढंग का जीवन जीने के के लिए विवश के दिया है | ब्रिटिश शासन काल से शुरू हुयी यह प्रक्रिया निरंतर बढती जा रही है | इसके फलस्वरूप सदियों से चले आ रहे अपनों के साथ लोगो के सम्बन्ध भी कमजोर पड़ते जा रहे है | नये कामो , पेशो के परस्पर सहयोग लें - दें के साथ नये - नये ढंग के सम्बन्ध बनते - बढ़ते विकसित हो रहे है |संबंधो का यह बदलाव युग का बदलाव है | पुराने युग के साधनों के बदलाव का है | इसी ने लोगो को अपने जीवन - यापन के लिए और आगे बढने के लिए पुराने पेशो को त्यागने या उसका नये व आधुनिक रूप में बदलाव के लिए प्रेरित किया है और कर रहा है |यह बदलाव आधुनिक बाजारवादी युग में सभी के प्रति बाज़ार के अनुरूप खरीद बिक्री का , लेन- देन का नजरिया अपनाने का बदलाव है | आज का मजदूर न ही किसी जमीदार का रियाया है न ही किसी का बंधुआ मजदूर | बल्कि वह अपना श्रम बेचकर जीविकोपार्जन करने वाला एक मजदूर है |अब वह जाति विशेष का ही सदस्य नही रह गया | बल्कि उसमे सभी जातियों व धर्मो के लोग शामिल है | यह स्थिति आधुनिक युग के हर काम पेशे व उसकी पहचान के साथ खड़ी है | इन पहचानो व संबंधो ने पुराने युग के धर्म , जाती , इलाका भाषा के रूप में बने रहे सामाजिक ताना - बाना को तोड़ने का काम भी किया है | इसीलिए वर्तमान युग के आदमी की सामाजिक पहचान बहुआयामी है | वह विशिष्ठ धर्म , जाती इलाका , भाषा , समुदाय का सदस्य भी है | साथ ही वह आधुनिक युग के कामो , पेशो से जुड़े सामाजिक समुदाय का सदस्य भी है | वह मजदूर समुदाय का , किसान समुदाय का , दुकानदार समुदाय का , डाक्टर , इंजीनियर , वकील व्यापारी उद्योगपति तथा शासकीय , प्रशासकीय समुदाय का भी सदस्य है | सच्चाई यह भी है कि उसके काम , कारोबार व पेशो के आधार पर बन रहे सम्बन्ध व पहचान उसके जीवन के दूसरे संबंधो पर पारिक्वारिक या पुराने युग से चले आ रहे धार्मिक , जातीय संबंधो से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बनते जा रहे है |क्योंकि इन्ही कामो , पेशो से ही उसका जीवन अस्तित्व जुडा हुआ है | येही पेशे व पहचान उसके जीवन का प्रमुख पहचान बनते जा रहे है | बाकी पारिवारिक या सामुदायिक पहचान उसकी उपरी पहचान के रूप में ही विद्यमान है |इस बात से कोई बड़ा फर्क नही पड़ता कि उसके अपने गहरे लगाव , अपनी धार्मिक , जातीय , इलाकाई पहचानो के साथ अभी भी ज्यादा है | क्योंकि ये पहचान न केवल सदियों से चले आ रहे बल्कि देश के पिछड़े पण में उसके बने रहने के आधार आज भी विद्यमान है | शहरों के मुकाबले गावो में जातीय पहचानो का आधार किसी हद तक आज भी सदियों पुराने पुश्तैनी कामो , पेशो के रूप में मौजूद है |
पर आधुनिक युग के वर्तमान दौर में टूटते जा रहे पुराने संबंधो , पहचानो को बनाये रखने का एक दुसरा काम भी किया जा रहा है | पिछले 30 सालो से देश - दुनिया के हुक्मती हिस्सों द्वारा राष्ट्र के जनसाधारण को अपनी पुरानी पहचानो को ही महत्त्व देने , उसी आधार पर एक जुट होने के पाठ - प्रचार चलाए जा रहे है | ताकि आम जनता में उन्ही पुरानी धार्मिक , जातीय , भाषाई व इलाकाई पहचानो के साथ उनके बीच सदियों पुराने अलगाव को आधुनिक युग में भी बढाया जा सके | उन्हें एक दूसरे के विरोध में खड़ा किया जा सके और फिर उनका धन सत्ता का स्वार्थ पूर्ति के लिए इस्तेमाल किया जा सके | इन्ही लक्ष्यों , उद्देश्यों के लिए जनसाधारण में धार्मिक , भाषाई , इल;आके पहचानो को बढावा देने के साथ उनसे जुड़े मुद्दों को उठाया व प्रचारित किया जाता रहा है | मन्दिर -मस्जिद आरक्षण समर्थन , आरक्षण विरोध आदि जैसे धार्मिक व जातीय मुद्दों को भी 20 - 25 से देश में चलाई जा रही धर्मवादी , सम्प्रदायवादी , जातिवादी , इलाकावादी राजनीति के जरिये बढाया जा रहा है | इन्ही मुद्दों व पहचानो पर धार्मिक जातीय व इलाकाई संगठनों को खड़ा किया व बढाया जाता रहा है | आधुनिक पेशो व पहचानो पर बनी ट्रेड यूनियनों तक के विखंडन के लिए इसे हथियार बनाया जाता रहा है | विडम्बनापूर्ण स्थिति यह है की मजदूर के रूप में , किसान के रूप में दस्तकार , दुकानदार आदि के रूप में आम लोगो का जीवन संकट ग्रस्त होता जा रहा है | लेकिन वे इन पहचानो को प्रमुखता देकर एकजुट होने के स्थान पर एक दूसरे से अलगाव व विरोध में अपने धार्मिक , साम्प्रदायिक , जातीय व इलाकाई पहचानो व गोलबंदियो के साथ खड़े होते जा रहे है | आम आदमी के लिए यह स्थिति वर्तमान दौर की उसकी अपनी बुनियादी हितो के विरोध में खड़ी होती व बढती जा रही है | इसलिए आवश्यकता है की लोग आधुनिक युग के सम्बन्धों व पहचानो को प्रमुखता दे | उसे केवल कारोबारी सम्बन्ध मानकर उपेक्षित न करे | फिर किसी भी सामाजिक समस्या पर सोचने व समाधान निकालने के लिए भी अपने अपने आधुनिक युग के सम्बन्धों - पहचानो को प्रमुखता दे |अपने धर्म , जाति व इलाकाई सम्बन्धों को अपने निजी स्तर तक अपने पारिवारिक , रिश्ते - नाते के सम्बन्धों तक तथा आधुनिक युग में धार्मिक जातीय व इलाकाई भाषाई मुद्दों पर भी अपने न्यायसंगत अधिकारों को पाने तक ही सिमित करे |यह एक सामाजिक जनतंत्र की बुनियादी माँग है |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज शनिवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

Vijai Mathur ने कहा…

पीड़ित को उलझा कर उसे जातीय,धार्मिक ,सांप्रदायिक वर्गों मे विभक्त करके ही तो शोषण को पुख्ता किया जा सकता है वही हो रहा है। पीड़ित को जागरूक किए बगैर सफलता कैसे मिले?

Arvind Pande Wardha ने कहा…

mai aap k vichaar se puri tarah sahmat hu. kuch nayee baate saamne aaye. jo maine sochi hi nahi thi.
aapka Dhanywad.