रविवार, 4 सितंबर 2011

प्रधानमंत्री का सन्देश लोकतंत्र में विश्वास नहीं पैदा करता है भाग 1

अन्ना की गिरफ्तारी और रिहाई तथा अनशन से उत्पन्न परिस्तिथि पर संसद के दोनों सदनों में बयान देते हुए डॉ मनमोहन सिंह ने संसद की सर्वोच्चता पर रही आंच पर चिंता जताई हैये वही प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने 'वोट के बदले नोट' देकर संसद में बहुमत जुटाया थावह मामला आज भी न्यायालय के विचाराधीन हैउस वक्त उन्हें संसदीय मूल्यों के हस्र की सर्वसम्मति से पारित औद्योगिक नीति को जब 1991 में महज सरकारी घोषणा से ख़ारिज करके नयी आर्थिक नीति को लागू किया था तो उस समय डॉ मनमोहन सिंह को संसद की सर्वोच्चता ख़त्म होने की चिंता नहीं सताई थीउस समय डॉ मनमोहन सिंह वित्तमंत्री के रूप में नयी आर्थिक नीति के स्रष्टा थेआज जब वह नयी आर्थिक नीति अपनी जवानी का जलवा देखा रही है, सर्वत्र भ्रष्टाचार का बोलबाला है, उनका स्वयं का मंत्रिमंडल भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबा है और सिंहासन डगमगा रहा है तो उन्हें यकायक संसद की सर्वोच्चता की चिंता हो गयी
प्रधानमंत्री को उस संसद की सर्वोच्चता सता रही है, जो संसद देश के बहुमत मतदाताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैवर्तमान संसद के तीन चौथाई सांसदों को चुनाव आयोग की गाड़ना के मुताबिक अपने क्षेत्र के बहुमत मतदाताओं का विश्वास प्राप्त नहीं हैवर्तमान संसद का बहुतमत (कोई साढ़े तीन सौ सांसद) करोडपति हैं और वे अवैध धन रखने तथा अनेक अपराधिक मुकदमों के आरोपी हैंगरीब देश की संसद का बहुमत सांसद करोडपति है ?
जिस देश में करोडो खेत मजदूरों और असंगठित मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती है और आम मेहनतकश अवाम जीवनोपयोगी आवश्यक वस्तुवों की बढती कीमत से परेशान है, उस देश के सांसद बड़ी कंपनियों के सी.. जैसा मोटा वेतन और पार्क पाते हैं और फिर भी संसद की कैंटीन में बिलकुल सस्ता, किन्तु उत्तमोत्तम भोजन करते हैं, जो आम लोगों को कभी नसीब नहीं हो सकता है

सत्य नारायण ठाकुर

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