गुरुवार, 29 सितंबर 2011

9/11 के दस साल भाग 1

9/11 के आतंकी हमले को 10 वर्ष हो चुके हैं। इस हमले की योजना बनाने वाले और उसे अंजाम देने वाले ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने मौत के घाट उतार दिया है। 9/11 के षड़यंत्र के पीछे क्या उद्देश्य थे और हमारी दुनिया पर उसका क्या असर पड़ा?
सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहूंगा कि 9/11 का आतंकी हमला, न तो अपनी तरह का पहला था और न ही आखिरी है। परंतु इस हमले ने चूंकि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश को नीचा दिखाया था इसलिए उसका बदला भी पूरी ताकत से लिया गया।
इस हमले के बाद, अमरीकी मीडिया अतिसक्रिय हो गया और यह साबित करने में जुट गया कि इस हमले के पीछे इस्लामिक कट्टरता थी और अमरीका, इस्लामिक जिहाद और कट्टरता का निशाना बना था। यह भी कहा गया कि अमरीका इस मामले में पूरी तरह निर्दोष था व हमलावर मुसलमान, अमरीकी प्रजातंत्र और वहां आमजनों को प्राप्त अधिकारों व स्वतंत्रताओं से जलते व चिते थे। इसके कुछ ही वर्ष पहले, अमरीकी चिंतक सैम्युल हटिंगटन ने यह साबित करने की पुरजोर कोशिश की थी कि इस्लाम व पिश्चमी सभ्यता में संघर्ष अवश्यंभावी है व दोनों का सहअस्तित्व संभव नहीं है।
एक तरह से, इस हमले ने हटिंगटन के सिद्घांत को मान्यता प्रदान की। आम अमरीकी को न केवल हटिंगटन की बातें सही लगने लगीं वरन वह अमरीकी प्रचारतंत्र के प्रभाव में भी आ गया। अमरीकी मीडिया, विशेषकर टी़व्ही चैनल, इस्लाम और मुसलमानों के बारे में विषवमन करने लगे। अमरीका के कई मुस्लिम नागरिकों ने मुझे लिखा कि वे डर के साए में जी रहे हैं और उन्हें यह साबित करने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है कि वे अमरीका के प्रति वफादार हैं और इस्लाम, शाऋंति का धर्म है।
हमें अमरीकी प्रजातंत्र से इस तरह की प्रतिक्रिया की अपेक्षा नहीं थी। बुश ने तो यहां तक कह दिया कि जो हमारे साथ नहीं है वह हमारे खिलाफ है। अगर अमरीकी मीडिया, केवल अल कायदा और ओसामा बिन लादेन की खिलाफत करता तो वह पूरी तरह जायज होता परंतु इस्लाम और सभी मुसलमानों को कटघरे में खड़ा करना, अमरीकी प्रजातंत्र को शोभा नहीं देता। विशेषकर इसलिए क्योंकि अमरीका यह दावा करता आया है कि स्वतंत्रता व निष्पक्षता में उसकी संपूर्ण आस्था है।
इस्लाम और मुसलमानों का दानवीकरण कर, अमरीका ने दो लक्ष्य हासिल किए। पहला, जो कुछ हुआ, उसकी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ना व दूसरा, अरब देशों के कच्चे तेल के खजाने पर कब्जा करने के अपने अभियान को औचित्यपूर्ण सिद्ध करना। अंततः अमरीका इन दोनों ही लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल हो गया। यह सही है कि आक्रोशित अमरीकी जनता ने शुरूशुरू में सरकारी प्रचार पर विश्वास किया पंरतु धीरेधीरे उसे सच का अहसास हो गया।
अमरीका में हाल में हुए सर्वेक्षण से पता चलता है कि 46 प्रतिशत अमरीकी यह मानते हैं कि 9/11 के हमले के मूल में इस्लामिक जिहाद नहीं वरन अमरीका की विदेश नीति थी। अमरीकी सरकार जो तथ्य जनता से छुपाना चाहती थी वे उसके सामने आ गए अर्थात अमरीका, इजराईल का अंधसमर्थक है व अरब देशों के तेल भंडार पर काबिज होना चाहता है। और यह भी कि इस सबसे ओसामा बिन लादेनजो एक समय अमरीका के प्रति जबर्दस्त वफादार था अमरीका का कट्टर दुश्मन बन बैठा।
मुसलमान न तो अमरीका के विरोधी थे और न ही अमरीकियों को प्राप्त स्वतंत्रताओं व वहां के प्रजातंत्र से जलते थे। सच तो यह है कि बड़ी संख्या में मुसलमान, विशेषकर वे जो तानाशाहों (जिन्हें, दुर्भाग्यवश, अमरीका का पूरा समर्थन हासिल था) द्वारा शासित देशों में रहते थे, वे अमरीकी प्रजातंत्र के प्रशंसक थे व चाहते थे कि उनके देशों में भी वैसा ही प्रजातंत्र व नागरिक स्वतंत्रताएं हों। मिस्त्र जैसे कुछ देशों के नागरिकों ने तो तानाशाहों को उखाड़ फंेंका और वे अपनेअपने देशों में तानाशाही की जगह प्रजातांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।
मध्यपूर्व के तानाशाह, अपनेअपने देशों में प्रजातांत्रिक आंदोलनों को कुचलते रहे हैं और अमरीका ने कभी उनकी निंदा तक नहीं की। जब हुस्नी मुबारक अपने विरोधियों को भयावह यंत्रणाएं दे रहा था तब अमरीका ने दूसरी तरफ देखना मुनासिब समझा। अमरीका की बुश सरकार ने भी निर्दोष कैदियों को अमानवीय शारीरिक यंत्रणाएं दीं और इसके लिए "वाटर बोर्डिंग" जैसी नई तकनीकों का अविष्कार किया गया। जब ये तरीके उजागर होने लगे तब कैदियों को पूर्वी यूरोप की जेलों में भेज दिया गया ताकि अमरीका से दूर रखकर उन्हें प्रताड़ित करने का सिलसिला जारी रखा जा सके। यह थी बुश की प्रजातंत्र व नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति प्रतिबद्धता, जिससे मुसलमान कथित रूप से जलतेचिते थे!
9/11 का बदला लेने के लिए, बुश सरकार ने अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया। बहाना यह था कि अमरीका, ओसामा को पकड़ना चाहता है। यह तब, जबकि प्रो़ नोएम चोमोस्की के अनुसार, तालिबान सरकार ने अमरीका को यह स्पष्ट आश्वासन दिया था कि अगर अमरीका, 9/11 के पीछे ओसामा का हाथ होने के विश्वसनीय सुबूत दे देगा तो ओसामा को उसे सौंप दिया जावेगा। फिर भी अमरीका ने अफगानिस्तान पर हमला किया। ओसामा तो पकड़ा नहीं गया परंतु तालिबान सरकार का पतन हो गया और शायद यही अमरीका का असली उद्देश्य भी था।
अमरीकी विदेश नीति के कुछ आलोचको का कहना है कि अमरीका, तालिबान सरकार को मान्यता प्रदान करने वाला था परंतु तालिबान सरकार ने मध्य एशिया से बलूचिस्तान के गवाडार बंदरगाह तक कच्चा तेल पहॅुचाने के लिए, अफगानिस्तान से होकर पाईपलाईन डालने की इजाजत नहीं दी और इस कारण, अमरीका नाराज हो गया। सच चाहे जो हो, परंतु यह जरूर है कि अफगानिस्तान को तालिबान से मुक्ति मिल गई और वहां प्रजातंत्र आ गया।
अमरीका ने ईराक पर आक्रमण कर वहां की सद्दाम सरकार को अपदस्थ कर दिया। सद्दाम लगातार अमरीका के निर्देशों की अवहेलना कर रहा था और उसने यूरोपीय देशों को इस बात के लिए भी राजी कर लिया था कि पेट्रोल की कीमत का भुगतान अमरीकी डालर की जगह यूरो में किया जाए। ईराक पर अमरीकी हमले के पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं परंतु उसका असली और मुख्य लक्ष्य था अमरीका की अवहेलना करने के लिए सद्दाम को सजा देना और ईराक के तेल भंडारों पर अपना नियंत्रण और कड़ा करना। ईराक का तेल भंडार, सऊदी अरब और कुवैत के बाद सबसे बड़ा है। इसके अलावा, ईराक लगातार इजराईल का विरोध करता आ रहा था और इजराईल चाहता था कि अमरीका, सद्दाम को गद्दी से उतार दे। यह है अमरीकी प्रजातंत्र और यह है नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति उसकी प्रतिबद्धता!

डॉ़ असगर अली इंजीनियर
क्रमश:

2 टिप्‍पणियां:

Arvind Pande Wardha ने कहा…

yah puri tarah amerika ne duniya par apni hukumat sthapit karne k liye khud ne hi kiya huva hamla hai.bahot si baate hai jo saabit karti hai k amerika ne khud hi ye hamla kiya hai.
aakhir ye hamla subah hi kyu huva.agar aatankwadi sochte to dopahar me jab 50000 se bhi jyada log office me rahte hai tab kar sakte the. our bhi bahot si baate hai jo eshara karti hai ye khud ne hi khud par kiya huva hamla hai taaki us bahane se duniya par hukumat kar sake.

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

अमेरिका पर अच्छा लेख। आगे भी पढ़ेंगे।