शनिवार, 24 सितंबर 2011

भारत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता के स्वप्न द्रष्टा - रास बिहारी बोस

( रासबिहारी बोस आजीवन क्रांतिकारी बने रहे | ब्रिटिश हुकूमत में सैन्य विद्रोह के जरिये और फिर विदेश में भारतीय सेना को गठित करके सीधे युद्ध के जरिये देश की पूर्ण आज़ादी के लिए प्रयासरत रहे | रासबिहारी बोस देश के उस द्वितीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक थे जो गदर पार्टी के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना के भीतर बगावत खड़ी करने के साथ लडा जाना था | यह विद्रोह सन 1857 के विद्रोह की तरह का विद्रोह था | पर इसके अगुवा राजे , नबाब नही थे , बल्कि प्रचण्ड देशभक्त क्रांतिकारी थे | पहले 21 फरवरी और बाद में 19 फरवरी 1915 का दिन द्वितीय स्वतंत्रता संघर्ष के प्रारम्भ के लिए तय किया गया था | गदर पार्टी के लोगो ने कई मिलट्री छावनियो में हिन्दुस्तानी सिपाहियों को इसके लिए तैयार कर लिया था | पर विद्रोह संचालन कमेटी के ही एक सदस्य की गद्दारी से यह स्वतंत्रता संग्राम छिड़ने से पहले ही समाप्त हो गया | गदर पार्टी के ज्यातर लोग गिरफ्तार कर लिए गये | पर रासबिहारी बोस ब्रिटिश सरकार के भारी दमन व गिरफ्तारी से बचकर जापान पहुंच गये और वहा जीवन पर्यंत देश के सशस्त्र स्वतंत्रता संघर्ष के प्रयास में जुटे रहे | बहुत कम लोग इस तथ्य को जानते है कि " इन्डियन इन्डीपेडेंट लीग " के साथ " इन्डियन नेशनल आर्मी "( आज़ाद हिन्द फ़ौज ) के गठन का काम रासबिहारी बोस और मोहन सिंह ने किया था | द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सुभाष चन्द्र बोस के जर्मनी से जापान पहुचने पर रासबिहारी बोस ने उसकी कमान सुभाष बाबू को सौप दी | रासबिहारी बोस और सुभाष चन्द्र बोस के लिए देश कि स्वतंत्रता , ब्रिटिश हुकूमत से समझौता नही था | बल्कि वह एक निर्मम युद्ध था | गदर पार्टी द्वारा तथा भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों द्वारा और फिर आज़ाद हिन्द फ़ौज द्वारा उठाया गया राष्ट्र मुक्ति का संघर्ष आज भी देश के जनसाधारण को उसे जाने , अपनाने और आगे बढाने का आह्वान कर रहा है | रासबिहारी बोस को उसी संघर्ष के एक महान नायक के रूप में जानना चाहिए )

क्रांतिकारी आन्दोलन को बंगाल से बाहर सारे पूर्वोत्तर भारत में और फिर दक्षिण एवं पूर्व एशियाई देशो में प्रसारित करने का श्रेय रासबिहारी बोस को है | भारत की स्वतंत्रता के लिए 1911 से लेकर 1945 तक सतत संघर्षरत रहने वाले वे एकमात्र क्रांतिकारी है | उनके इस दीर्घकालीन प्रयत्न का कोई मुकाबला नही है | उनका जन्म 25 मई 1886 को पश्चिमी बंगाल के वर्दमान जिले के सुवालदाह गाव में हुआ था | बाद में उनके पिता श्री विनोद बिहारी बोस चन्दन नगर में बस गये थे | रासबिहारी बोस की शिक्षा - दीक्षा येही पूरी हुई |उन दिनों बंगाल क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बनता जा रहा था | रासबिहारी बोस पर इसका बहुत गहरा प्रभाव पडा | उनका उद्देश्य ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर युद्ध कला में पारंगत होना और ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध सैन्य विद्रोह खड़ा करना था | उन्होंने अपने पिटा को भारतीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का अपना मन्तव्य बता कर घर से बिदा ले ली | रासबिहारी बोस ने सबसे पहले शिमला के एक छापेखाने में नौकरी की |तुरंत ही देहरादून के वन विभाग के शोध- संस्थान में रसायन विज्ञान के शोधन सहायक नियुक्त हो गये | इस नौकरी का उनका प्रमुख उद्देश्य बम निर्माण के लिए आवश्यक रासायनिक प्रदार्थ सहजता से प्राप्त करना था | इसके पूर्व वे चन्दन नगर में रहकर बम बनाने का प्रशिक्ष्ण ले चुके थे | देहरादून में ही उनकी भेट जितेन्द्र मोहन चटर्जी से हुयी |चटर्जी का पंजाब के क्रान्तिकारियो से सम्बन्ध था | लाहौर के लालचंद फलक , सूफी अम्बा प्रसाद , सरदार अजित सिंह , सरदार किसान सिंह ( भगत सिंह के पिता ) लाला हरदयाल से चटर्जी का घनिष्ट सम्बन्ध था | जितेन्द्र मोहन चटर्जी ने रासबिहारी से पंजाब के क्रांतिकारी आन्दोलन को तेज़ करने का अनुरोध किया | रासबिहारी ने पंजाब के साथ - साथ संयुक्त प्रान्त के क्रांतिकारियों से सम्पर्क कर आन्दोलन को आगे बढाने का निरन्तर प्रयास किया |
उसी समय अंग्रेजो ने कलकत्ता से राजधानी दिल्ली स्थानान्तरितकर देने के उपलक्ष्य में दिल्ली में एक समारोह आयोजित किया था , जिसमे भारतीय रियासतों के राजाओं को भी बुलाया गया था | रासबिहारी बोस ने वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेकने के लिए इसी दिन को चुना था | वे इसके लिए बहुत दिन पहले ही चन्दन नगर से बसन्त कुमार विश्वास लेकर वहा आ गये थे | बसन्त कुमार विश्वास उनके रसोइये और नौकर के रूप में रहते थे | बाद में लाहौर में क्रांतिकारी भाई बालमुकुन्द ने बसन्त कुमार को एक प्राइवेट अस्पताल में नौकरी दिलवा दी | यहा उसने दिल्ली में की जाने वाली बम फेकने की योजना का खूब रिहर्सल किया | योजना के अनुसार 21 सितम्बर 1912 को बसन्त कुमार विश्वास और 22 सितम्बर को रास बिहारी दिल्ली आ पहुचे | 23 दिसम्बर को शाही शोभा यात्रा आयोजित थी \ वायसराय हार्डिंग का जलूस चांदनी चौक के बीच पंजाब नेशनल बैंक के सामने पहुचा की एकाएक भयंकर आवाज़ आई | शोभा यात्रा रुक गयी | लोगो ने देखा की महावीर सिंह का शव हाथी पर लटक रहा है वाइसराय को थोड़ी चोट पहुची थी | उनकी उनकी पत्नी व महावत सकुशल थे | यद्यपि हार्डिंग को मारने के प्रत्यन में रासबिहारी असफल हो गये | किन्तु अंग्रेज सरकार के मन में भय उत्पन्न करने में वे सफल रहे | इस बम काण्ड के बाद रासबिहारी देहरादून व बसन्त कुमार लाहौर लौट गये | देहरादून पहुचकर रासबिहारी बोस ने वन विभाग के शोध संस्थान में एक सभा आयोजित कर बम विस्फोट के विरुद्ध निन्दा प्रस्ताव पारित किया | वाइसराय के स्वस्थ जीवन की कामनाओं के साथ प्रस्ताव को उनतक भेज दिया गया | अनेक स्थानों पर ऐसी सभाए आयोजित कर श्री बोस ने पुलिस की और से राजभक्त होने का समान भी प्राप्त कर लिया | कुछ दिनों बाद लाहौर के बदनाम कमिश्नर गोर्डन पर आक्रमण की योजना बनाई गयी | इस कार्य के लिए पुन:बसन्त कुमार का चयन किया गया 17 मई 1913 को मिंटगुमरी भवन में गोर्डन के सम्मान में आयोजित सभा में हुए बम विस्फोट में गोर्डन बच गया , चरासी की मृत्यु हो गयी | उस समय भी पुलिस अपराधियों को पकड़ने में असफल रही | क्रान्तिकारियो ने जनता में सरकार के विरुद्ध घृणा फैलाने और स्वतंत्रता की भावना को उपर उठाने के लिए " लिबर्टी " नामक पर्चे छापे और सारे भारत में वितरित किए | 1857 की तरह का स्वतंत्रता संघर्ष राष्ट्र पैमाने पर करना चाहते थे | इस योजना में ज्योतिन्द्र नाथ मुखर्जी को बंगाल , शचीन्द्र नाथ सान्याल को संयुक्त प्रांत व रासबिहारी बोस को पंजाब में सेना और सामान्य जनता में विद्रोह की आग को सुलगाने का काम सौपा गया | बाद में भेदियो के विश्वासघात के चलते अवधबिहारी , अमीरचंद , बालमुकुन्द को गिरफ्तार कर लिया गया | उनके पास आपत्तिजनक साहित्य व हथियार भी थे | बसन्त विश्वास भी अपने गाव में पकड़े गये |रासबिहारी बोस को पकड़ने के लिए इनाम घोषित किया गया |पर उससे अप्रभावित रहकर रासबिहारी बोस के मस्तिष्क में भावी योजनाये आकार ले रही थी | वे हर कीमत पर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पुनरावृति चाहते थे | अत: बनारस पहुचकर क्रान्तिकारियो से भेट कर यौजना को क्रियान्वित करने का प्रत्यं करने लगे | इधर पुलिस विभाग रासबिहारी को ढूढने के काम में लगा हुआ था | उधर वे चतुराई से पुलिस को झासा दे रहे थे | तीन - तीन अपराध में वे आरोपित थे | फिर भी वे लाहौर , बनारस व चन्दन नगर के साथ सारे भारत में एक साथ विद्रोह प्रारम्भ करने के लिए कार्य कर रहे थे | एक वर्ष बनारस में रहे , पर पुलिस उनकी छाया को छू नही सकी | वे सतत अपना निवास बदलते रहते थे | दिन भर घर में रहते थे और रात में क्रान्तिकारियो से मिलकर तैयारियों को तेज़ करते थे | बनारस में शचीन्द्रनाथ उनके दाहिने हाथ थे | उसी समय विष्णु गणेश पिंगले उनसे मिलने के लिए आये | वे अमेरिका से लौटे थे |वे वह गदर पार्टी के सदस्य थे | उन्होंने बोस को सुचना की की गदर पार्टी के लगभग 6 हजार लोग अमेरिका व कनाडा से भारत लौट रहे है | कुछ हजार बाद में आने वाले है | पिंगले को गदर पार्टी ने रासबिहारी बोस को पंजाब लाने के लिए भेजा था | 31 दिसम्बर 1914 को अमृतसर की पिर्वाली धर्मशाला में क्रान्तिकारियो की गुप्त बैठक हुयी | पिंगले व स्नायाल के अतिरिक्त करतार सिंह , पंडित परमानंद , बलवंत सिंह हरिनाम सिंह विधान सिंह , भोला सिंह इत्यादि लोग बैठक में शामिल थे | शचीन्द्रनाथ सान्याल ने उन्हें बोस के आने के पूर्व कुछ काम करने के निर्देश दिए |बोस जनवरी 1915 में अमृतसर पहुचे उन्होंने पंजाब में अनेक स्थानों पर बम बनाने काम शुरू किया | लाहौर को अपना मुख्यालय बनाया | जालन्धर , बन्नू , पेशावर , रावलपिंडी , फिरोजपुर कपूरथला । झेलम , मेरठ व अम्बाला आदि विभिन्न फौजी छावनियो में उन्होंने अपने दूत छोड़ दिए | बंगाल में यह कार्य ज्योतिन्द्र्नाथ मुखर्जी कर रहे थे | रासबिहारी बोस व अन्य क्रान्तिकारियो द्वारा बंगाल , संयुक्त प्रांत व पंजाब में एक साथ ही विद्रोह करने के लिए 21 फरवरी 1915 का दिन चुना | योजना यह थी की मियामिर नामक छावनी में विद्रोह शुरू होते ही सारी छावनियो में विद्रोह शुरू हो जाएगा
इसी बीच जापान और इंग्लैण्ड के मैत्री सम्बन्ध बिगड़ गये | 8 दिसम्बर 1941 को जापान ने इंग्लैण्ड व अमेरिका के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया | रासबिहारी बोस को भारत के लिए यह स्वर्ण अवसर प्रतीत हुआ | उन्होंने एक सभा आयोजित की और जापान के प्रधानमन्त्री जनरल तोजो को भारत के स्वतंत्रता - संग्राम में सहायता करने के लिए राज़ी किया | प्रधानमन्त्री तोजो ने जापानी संसद में घोषणा की कि यदि जापान विजयी हुआ तो भारत को स्वतंत्र कर दिया जाएगा | इसका एक लाभ यह भी हुआ कि दक्षिण - पूर्व एशिया में भारतीय लोग जापानी सैनिको के दुर्व्यवहार से बच गये |
युद्ध में अंग्रेजो कि निरंतर पराजय हो रही थी | सिंगापुर जीतकर जापान ने भारतीय सेना के लगभग एक लाख लोगो को बंदी बना लिया | जापान के सम्पर्क अधिकारी मेजर फुजिवारा ने रासबिहारी बोस के कहने पर भारतीय स्वाधीनता परिषद के साथ आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया | इस प्रथम स्थापित आज़ाद हिन्द फ़ौज के कमांडर थे मोहन सिंह | इसके बाद उन्हें जनरल का पद प्रदान किया गया | एक युद्ध परिषद की स्थापना की गयी | उसके अध्यक्ष रासबिहारी बोस थे | बैकाक सम्मेलन 15 जून 1942 को आयोजित किया गया | इसमें दक्षिण एशिया के अनेक देशो से बहुत - से प्रतिनिधि सम्मिलित हुए | इस सम्मलेन में जो अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए गये , उनमे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को दक्षिण - पूर्व एशिया के राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्त्व के लिए आमंत्रित करना भी था | बाद में कमांडर जनरल मोहन सिंह और जापानी सैन्य - प्रशासन में कलह उत्पन्न हो गया | मोहन सिंह ने आज़ाद हिन्द फ़ौज भंग कर दी | उनको गिरफ्तार कर लिया गया | मोहन सिंह को जापान पर विश्वास नही था | उन्हें लगता था कि आज़ाद हिन्द फ़ौज का निर्माण जापानी सरकार ने अपने स्वार्थ के लिए किया है | इस स्तिथि में रासबिहारी बोस ने एक अंतरिम व्यवस्था क़ी और ले0 कर्नल ऐ0 ड़ी0 लोकनाथन , लेओ कर्नल जे0 के0 भोसले , ले कर्नल एम् ० जेड ० कियानी व कैप्टन एहसान कादिर क़ी एक समिति बनाई और उन्हें आज़ाद हिन्द फ़ौज के संचालन का कार्य सौपा | बीच क़ी अवधि में जापान सरकार को जर्मनी से सुभाष बाबू को जापान बुलाने के लिए प्रेरित करते रहे | अन्त में सुभाष बाबू पनडुब्बी क़ी लम्बी व जोखिम भरी यात्रा करके 16 मई 1943 को जापान पहुचे | भेट के पश्चात रासबिहारी बोस ने कर्नल यामामोही से कहा - " मेरे कन्धो का बोझ अब कम हो गया है " 4 जुलाई का दिन भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन है | उसी दिन सिंगापुर के कैथे भवन के एक समारोह में रासबिहारी बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज के सूत्र सुभाष चन्द्र बोस को सौपे थे और सुभाष बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज के सर्वोच्च सलाहकार पद पर रास बिहारी बोस क़ी नियुक्ति क़ी | निरन्तर भागदौड़ व कठोर श्रम के कारण उनका स्वास्थ बिगड़ने लगा था | इसी बीच उनकी जीवन -सहचरी तोषिको और पुत्र माशेहिदे का निधन हो चुका था | इसका उनके शरीर के साथ मन पर भी बुरा परिणाम हुआ था | नवम्बर 1944 में जब सुभाष बाबू उनसे मिलने पहुचे , वे दूसरी दुनिया के प्रवास क़ी तैयारी में थे | जनवरी 1945 में उन्हें उपचार के लिए टोकियो के सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया | इस अवस्था में ही जापान के सम्राट ने उन्हें राष्ट्रीय सम्मान से विभूषित किया | उन्हें उगते सूर्य के देश का दो किरणों वाला दितीय राष्ट्रीय सर्वोच्च पद का सम्मान दिया गया | जापानी भाषा में उन्होंने 16 पुस्तके लिखी | उनमे 15 अभी भी उपलब्ध है | 21 जनवरी 1945 को रासबिहारी बोस क़ी संघर्ष क़ी ज्योति बुझ गयी .....

उनको शत - शत नमन

नोट: लेख का बड़ा हिस्सा राजेन्द्र कटोरिया द्वारा संपादित " पचास क्रांतिकारी " पुस्तक से लिया गया है।

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

2 टिप्‍पणियां:

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

पढ़वाने के लिए धन्यवाद। हालांकि कई जगह अतिशयोक्ति लगी। लेकिन रासबिहारी बोस जैसे लोगों की बात ही अलग है।

रविकर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई ||