रविवार, 25 सितंबर 2011

महान क्रांतिकारी ------ भगवती चरण वोहरा


राष्ट्र व समाज के लिए क्रांतिकारियों का त्याग व बलिदान अभूतपूर्व है | अभूतपूर्व इसलिए भी है कि ,उनका संघर्ष और त्याग - बलिदान नि:स्वार्थ था | उनमे समाज व राष्ट्र का अगुवा बनने की , नाम कमाने और शोहरत - इज्जत पाने की कही कोइभुख नही थी | इसलिए क्रांतिकारियों द्वारा कांग्रेस के बड़े लीडरो की तरह अपनी आत्म कथा भी नही लिखी गयी | उनका निजी जीवन नही , बल्कि सामाजिक जीवन , राष्ट्र व समाज के लिए संघर्ष और बलिदान का जीवन ही उनकी जीवन गाथा बनी |
इसलिए निजी जीवन की ललक और चढत - बढत की भूख पाले वर्तमान दौर के शिक्षित वर्ग के व्यापक हिस्से द्वारा उनकी जीवन कथा को भी महत्व नही दिया गया | भगत सिंह ,जैसे चन्द क्रांतिकारियों का नाम ही ब्रिटिश काल से ही जनसाधारण की जबान पर चढ़ गया था | इसलिए उनको आज भी भुलाया नही जा सका | लेकिन उनके काम , लक्ष्य , और आदर्श ................... आज भी जनसाधारण के लिए अज्ञात है |
फिर भगवती चरण वोहरा जैसे क्रांतिकारियों के नाम तो कम ही लोग जानते है | इसकी एक प्रमुख वजह यह भी है कि वे हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य और भगत सिंह के साथ ही एक प्रमुख सिद्धांतकार होते हुए भी गिरफ्तार नही किए जा सके और ही वे फांसी पर चढ़े | उनकी मौत बम परिक्षण के दौरान दुर्घटना में हुई | क्रांतिकारी साथियो ने उन्हें चुपचाप जंगल में ही दफन कर दिया | यह क्रांतिकारियों की मजबूरी थी | ............... लेकिन उन्हें और उनके जैसे अन्य क्रान्तिकारियो को इतिहास में दफन कर देना , उन्हें याद याद करना , जन विरोधी देश के सत्तासीन वर्गो का कुचक्र है | साथ ही निजी स्वार्थो में डूबे शिक्षित वर्ग की कृतघ्नता है | वर्तमान राष्ट्रीय सामाजिक जीवन की उपेक्षा है | वर्तमान दौर में अमेरिका ,इंग्लैण्ड जैसे साम्राजी राष्ट्रों द्वारा वैश्वीकरणवादी नीतियों संबंधो के जरिये देश के जनसाधारण की बढती समस्याए और संकट एक बार फिर राष्ट्र मुक्ति - संघर्ष की प्रासंगिकता खड़ी कर रही है | इस संघर्ष के लिए भगवती चरण वोहरा जैसे क्रांतिकारी जनसाधारण के लिए प्रासंगिक है |
प्रस्तुत लेख का ज्यादा हिस्सा भगत सिंह व भगवती चरण के साथी क्रांतिकारी शिव वर्मा की संस्मृतियो से लिया गया है ...


भगवती चरण वोहरा का जन्म जुलाई 1903 में आगरा में हुआ था | उनके पिता शिव चरण वोहरा रेलवे के एक उच्च अधिकारी थे | बाद में वे आगरा से लाहौर चले आये | उनका परिवार आर्थिक रूप से सम्पन्न था | भगवती चरण की शिक्षा - दीक्षा लाहौर में हुई उनका विवाह भी कम उम्र में कर दिया गया | पत्नी का नाम दुर्गा था | बाद के दौर में उनकी पत्नी भी क्रांतिकारी कार्यो की सक्रिय सहयोगी बनी | क्रान्तिकारियो द्वारा दिया गया " दुर्गा भाभी " सन्बोधन एक आम सन्बोधन बन गया | लाहौर नेशनल कालेग में शिक्षा के दौरान भगवती चरण ने रुसी क्रान्तिकारियो से प्रेरणा लेकर छात्रो की एक अध्ययन मण्डली का गठन किया था | राष्ट्र की परतंत्रता और उससे मुक्ति के प्रश्न पर केन्द्रित इस अध्ययन मण्डली में नियमित रूप से शामिल होने वालो में भगत सिंह , सुखदेव आदि प्रमुख थे | बाद में चलकर इन्ही लोगो ने नौजवान भारत सभा की स्थापना की | पढाई के दौरान 1921 में ही भगवती चरण गांधी जी की आह्वान पर पढाई छोडकर असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े थे | बाद में आन्दोलन वापस होने पर इन्होने कालेज की पढाई पूरी की | बी 0 कि परीक्षा पास की साथ ही नौजवान भारत सभा के गठन और कार्य को आगे बढाया | इस सभा के जनरल सेक्रेटी भगत सिंह और प्रोपेगंडा ( प्रचार ) सेक्रेटी भगवती चरण थे | अप्रैल 1928 में नौजवान भारत सभा का घोषणा पत्र प्रकाशित हुआ | भगत सिंह अन्य साथियो से सलाह - मशविरे से मसविदे को तैयार करने का काम भगवती चरण वोहरा का था | नौजवान भारत सभा के उत्कर्ष में भगवती चरण और भगत सिंह का ही प्रमुख हाथ था | भगत सिंह के अलावा वे ही संगठन के प्रमुख सिद्धांतकार थे | क्रांतिकारी विचारक , संगठनकर्ता , वक्ता ,प्रचारकर्ता , आदर्श के प्रति निष्ठा प्रतिबधता तथा उसके लिए अपराजेय हिम्मत - हौसला आदि सारे गुण भगवती चरण में विद्यमान थे | किसी काम को पूरे मनोयोग के साथ पूरा करने में भगवती चरण बेजोड़ थे | 1924 में सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा " हिन्दुस्तान- प्रजातांत्रिक संघ के घोषणा पत्र - दि रिवोल्यूशनरी को जनवरी 1925 को व्यापक से वितरित करने की प्रमुख जिम्मेदारी भगवती चरण पर ही थी | जिसे उन्होंने बखूबी पूरा किया | बाद के दौर में संगठन के साथियो में भगवती चरण के बारे में यह संदेह फैलाया गया की वे सी0 आई डी0 के आदमी है और उससे तनख्वाह पाते है | इन आरोपों को लगाने के पीछे उस समय संगठन में आये वे लोग थे जिन्हें किसी काम का जोखिम नही उठाना था | इसलिए भी वे लोग बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी भगवती चरण पर आरोप लगाकर केवल खुद नेतृत्त्व में आना चाहते थे | बल्कि क्रांतिकारी कार्यवाहियों पर रोक भी लगाना चाहते थे | ऐसे लोगो का यह उद्देश्य भी था कि संगठन के काम को आपसी बहस , मुबाहिसा , प्रचार और पैसा जमा करने के काम तक सीमित कर दिया जाए | भगवती चरण पर सी आई ड़ी0 का आरोप लगाने वालो में प्रमुख सज्जन जयचन्द्र विद्यालंकार थे | वे उन दिनों नेशनल कालेज के अध्यापक भी थे | नौजवान क्रांतिकारी टोली पर उनके पद , ज्ञान विद्वता कि धाक भी थी | भगवती चरण ऐसे आरोपों से बेपरवाह रहते हुए क्रांतिकारी कार्यो को आगे बढाने में लगे रहते थे | उनका कहना था कि " जो उचित है उसे करते जाना उनका काम है | सफाई देना और नाम कमाना उनका काम नही है | " भगवती चरण लखनऊ के काकोरी केस , लाहौर षड्यंत्र केस , और फिर लाला लाजपत राय को मारने वाले अंग्रेज सार्जेंट - सांडर्स की हत्या में भी आरोपित थे | पर तो कभी पकड़े गये और ही क्रांतिकारी कार्यो को करने से अपना पैर पीछे खीचा | इस बात का सबूत यह है कि इतने आरोपों से घिरे होने के बाद भी भगवती चरण ने स्पेशल ट्रेन में बैठे वायसराय को चलती ट्रेन में ही उड़ा देने का भरपूर प्रयास किया | इस काम में यशपाल , इन्द्रपाल , भागाराम उनके सहयोगी थे | महीने भर की तैयारी के बाद नियत तिथि पर गुजरती स्पेशल ट्रेन के नीचे बम - बिस्फोट करने में लोग कामयाब भी हो गये | परन्तु वायसराय बच गया | ट्रेन में खाना बनाने और खाना खाने वाला डिब्बा क्षतिग्रस्त हो गया और उसमे एक आदमी कि मौत हो गयी।
कोई नही जानता था कि इन पक्तियों में भगवती चरण के अपने जीवन का सार निहित था | .................
इस प्रकार क्रान्ति मार्ग का प्रकाश पुंज , एक जगमगाता सितारा हमेशा ले लिए डूब गया | न कोई शोक ना कोई शोक सभा न जनाजा न विदाई की धुन बस एक खामोशी सी विदाई एक ऐसे क्रान्ति कारी की जिसने अपना सम्पूर्ण जीवन क्रांति के लिए समर्पित कर दिया

उसको सत - सत नमन ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672


4 टिप्‍पणियां:

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

आभार।

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आप चलेंगे इस महाकुंभ में...?
...खींच लो जुबान उसकी।

DESH VIDESH ने कहा…

बहुत ही जानकारी भरा और रोचक है.

संध्या आर्य ने कहा…

ek vir ki virrgatha padhawane ke liye bahut bahut shukriya aur aabhar.

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

संयोग से आज ही पढ़ा था इनके ऊपर। पहले से भी जानता हूँ इन्हें। मार्क्स और ऐंगल्स की दोस्ती जैसी दोस्ती भगतसिंह और वोहरा की मानी जाती थी। इनकी मृत्यु तो अजीब तरीके हो गई। लेकिन इनका नाम कितनों को याद है… बटुकेश्वर दत्त का नाम भी कितनों को याद है… यह देश मुर्दों का बन गया है…