मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय भाग 7


यह ध्यान देने योग्य बात है कि न तो धारा 9 (1) न धारा 9 (2) के अंतर्गत ऐसी परिस्थितियों का उल्लेख है जिसके द्वारा पुलिस कप्तान किसी व्यक्ति को एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त कर सकें। बिना किसी सीमा निर्धारण के ऐसा करना उनको विवेक प्रदान करना है जैसे कि एस0पी0ओ0 की संख्या कितनी होगी एवं उनकी नियुक्ति, उनका प्रशिक्षण किस प्रकार का होगा आदि। इस प्रकार की शक्ति का प्रदान करना संविधान की धारा 24 का उल्लघंन होगा। दण्ड संहिता 2007 की
धारा 9 (1) एवं धारा 9 (2) की तुलना भारतीय पुलिस एक्ट की धारा 17 जो कि अंग्रेजी युग का कानून है, से की जा सकती है। इस धारा के अंतर्गत ऐसी परिस्थितियों का वर्णन है जिसमें इस प्रकार की नियुक्तियों के लिए अनुमति दी जा सकती है, अगर शर्तें पूरी हो रही हों। भारतीय दण्ड संहिता 2007 की धारा 9 (2) में इस प्रकार की परिस्थितियों का उल्लेख नहीं किया गया है। इसी प्रकार दण्ड संहिता 2007 की धारा 23 में वर्णित कार्य एवं उत्तरदायित्व जैसा कि एक एस0पी0ओ0 को दिया जा सकता है, धारा 23 (ए0)(एच0) एवं धारा 23 (1) (आई)(ए0) को छोड़कर सभी में समाप्त कर दिया गया है।
39. हालाँकि छत्तीसगढ़ राज्य ने इस अदालत द्वारा इस मामले की विस्तार पूर्वक सुनवाई करने के उपरान्त नवीन विनियमतीकरण प्रक्रियाआंे की सूची दाखिल कर दी है, फिर भी हमने उसका पुनरावलोकन किया है। हम नवीन नियमावली से न ही प्रभावित हैं और न ही यह नियमावली ऐसा विश्वास जागृत करती है जिससे की स्थिति पहले से बेहतर हो सके।
40 इस नवीन नियमावली के कुछ अंश यहाँ पर साक्ष्य के रूप में वर्णित किए जाते हैं। एस0पी0ओ0 की नियुक्ति हेतु जिन परिस्थितियों का उल्लेख है उनमें वह परिस्थिति भी शामिल है जिसमें आंतकवादी या उग्रवादी घटनाएँ अथवा इन घटनाओं का भय शामिल हो। अर्हता के सम्बन्ध में नियम यह कहते हैं कि अगर दूसरी अन्य योग्यताएँ पूरी हों तो वह व्यक्ति जो 5वीं पास हैं उसको वरीयता दी जाएगी। इसके अतिरिक्त नियमों में यह भी कहा गया है कि क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं को रोकने एवं नियंत्रित करने में एस0पी0ओ0 पुलिस की सहायता करेंगे, क्योंकि आतंकवादी एवं उग्रवादी घटनाएँ इन परिस्थितियों में शामिल हैं। क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं से यह स्पष्ट है कि एस0पी0ओ0 की नियुक्ति सशस्त्र विद्रोह दमन करने के लिए की गई है। नियमावली की भाषा से यह स्पष्ट है कि उनकी भूमिका केवल मार्गदर्शक एवं पथ प्रदर्शक तक नहीं सीमित है। वहाँ उन्हें उग्रवादियों तथा आतंकवादियों से सीधे लड़ना भी है। इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त व्यक्तियों को दिया जाना है, यदि पुलिस कप्तान के विचार में उनके लिए प्रशिक्षण आवश्यक है। किसी भी दशा में प्रशिक्षण तभी दिया जाएगा जबकि नियुक्त व्यक्ति को कम से कम एक वर्ष के लिए नियुक्त किया गया हो एवं उसको सुरक्षा के लिए हथियार प्रदान किए गए हों। ऐसा प्रशिक्षण कम से कम 3 महीने के लिए होगा। यह नियुक्ति पूरी तरह से अस्थायी होगी एवं पुलिस कप्तान के द्वारा बिना कारण बताए ही ये सेवाएँ समाप्त की जा सकती हैं। एस0पी0ओ0 को वही वेतन एवं दूसरे लाभ प्राप्त होंगे जो राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर स्वीकृत किए जाएँगे।
41. यहाँ पर हमें इन मामलों में भारत सरकार की भूमिका पर सर्वाधिक आश्चर्य है। वास्तव में यह सत्य है कि पुलिस एवं कानून व्यवस्था राज्य का विषय है फिर भी भारत सरकार को अपनी भूमिका पर और बल देना चाहिए। एस0पी0ओ0 की नियुक्ति छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा की जाएगी एवं केन्द्र सरकार की भूमिका एस0पी0ओ0 की कुल संख्या के निर्धारण में सहमति प्रदान करना एवं उनको दिए गए वेतन की वापसी करना है। केन्द्र सरकार ने कोई निर्देश नहीं दिए कि एस0पी0ओ0 की नियुक्ति कैसे की जाएगी, उनका प्रशिक्षण किस प्रकार होगा एवं उनको किस उद्देश्य के लिए लगाया जाएगा। इस सम्बन्ध में केन्द्र सरकार ने अपने संवैधानिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन ठीक प्रकार से नहीं किया है। संविधान के अनुच्छेद 355 में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि केन्द्र सरकार का यह दायित्व होगा कि वह प्रत्येक राज्य को बाह्य आक्रमण एवं आंतरिक अव्यवस्था से सुरक्षा प्रदान करे। वह यह भी सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य संविधान के उपबंधों के अनुसार अपना कार्य सम्पादित कर रहा है। संविधान राज्य पर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए एवं कुछ दशाओं में जो नागरिक नहीं हैं उनकी भी सुरक्षा के दायित्व को पूरा करे एवं भारत के लोगों के लिए ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करे जिससे कि उनकी मानवीय गरिमा अक्षुण्य बनी रहे एवं भाईचारे की परिधि में वे जीवन व्यतीत करें। यह अत्यन्त आश्चर्य जनक है कि केन्द्रीय सरकार ने इस निर्देश के उपरान्त छत्तीसगढ़ राज्य में एस0पी0ओ0 के सम्बन्ध में अपनी भूमिका को रेखांकित किया। उसका यह दावा कि उसकी भूमिका सीमित है, उचित नहीं है। केन्द्र सरकार के हलफनामे पर एक सरसरी नजर भी यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि यह इसलिए दाखिल किया गया है ताकि सरकार कम उत्तरदायित्व का बहाना बनाकर कानूनी शरण ले सके। सरकार को चाहिए था कि वह गम्भीर संवैधानिक मुद्दों पर अपनी चिन्ता व्यक्त करती।
42. मामले की सच्चाई यह है कि केन्द्र सरकार द्वारा दी जा रही आर्थिक सहायता ही छत्तीसगढ़ राज्य को इस योग्य बना रही है कि वह अर्द्ध साक्षर आदिवासी नौजवानों को एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त करे। उनको हथियार प्रदान किए जा रहे हैं ताकि वे उन कार्यों को पूरा कर सकें जिसको पूरा करने का दायित्व नियमित एवं औपचारिक रूप से गठित पुलिस बलांे पर है। इस प्रकार के हजारों एस0पी0ओ0 की नियुक्ति की जा चुकी है एवं उनको तीन हजार प्रतिमाह वेतन भी दिया जा रहा है। केन्द्र सरकार उसकी भरपाई भी कर रही है। केन्द्र सरकार ने यह उचित नहीं समझा कि वह आदिवासी नवयुवकों, की माओवादियों के सशस्त्र विद्रोह को दमन करने में उनकी क्षमता का मूल्यांकन करे। केन्द्र सरकार विश्वास करती है कि उसका संवैधानिक उत्तरदायित्व केवल इतना है कि वह एस0पी0ओ0 की अधिकतम संख्या का
निर्धारण करे। राज्य द्वारा, दिए गए धन का प्रयोग किस प्रकार किया जाएगा, यह उसकी चिन्ता का विषय नहीं है। अपने सितम्बर में दिए हुए हलफनामे में, केन्द्र सरकार ने बल दिया है कि वह केवल राज्य सरकार को निर्देश प्रदान करती है कि वे किस प्रकार कान्सटेबिल एवं एस0पी0ओ0 की गूढ़ जाँच के उपरान्त नियुक्त करे। उनके प्रशिक्षण का स्तर सुधारे तथा उन्हें मानवाधिकार के बारे में शिक्षित करे। यह सब हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए विवश कर देता है कि केन्द्र सरकार ने अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन ठीक प्रकार से नहीं किया है। यह सच्चाई कि अब भी केन्द्र सरकार यह समझती है कि उसका उत्तरदायित्व केवल राज्य सरकार को निर्देश देने तक सीमित है, हमें यह कहने पर विवश कर देती है कि क्या केन्द्र सरकार उस खराब स्थिति को सुधारने में आवश्यक कदम उठाएगी जिसकी उत्पत्ति के लिए जाने अनजाने में वह स्वयं जिम्मेदार है।
43. अब यह स्पष्ट है, जैसा कि वादियों के द्वारा कहा गया है, कि हजारों आदिवासी नौजवान, केन्द्र सरकार की सहमति से राज्य सरकार द्वारा माओवादियों से लड़ने के लिए नियुक्त किए जा रहे हैं। आँकडे़, जैसा कि छत्तीसगढ़ राज्य एवं केन्द्र सरकार के हलफनामे में कहा गया है, यह स्पष्ट करते हैं कि दावे के विपरीत आदिवासी नवयुवकों को लड़ाई विहीन भूमिका के लिए जैसे पथ प्रदर्शक, मार्गदर्शक, गुप्तचर एवं कानून व्यवस्था को बनाए रखने के स्थान पर उनका प्रयोग माओवादी एवं नक्सलियों से लड़ने के लिए किया जा रहा है। राज्य सरकार एवं केन्द्र सरकार दोनों यह स्वीकार करती हैं कि राहत शिविर एवं सुदूर गाँव, जिनमें कि एस0पी0ओ0 की भर्ती की जाती है एवं जहाँ उन्हें कार्य करने के लिए निर्देशित किया जाता है उन टावरों पर हजारांे आक्रमण किए गए हैं। इससे यह स्पष्ट है प्रत्येक हमले में एस0पी0ओ0 को माओवादियों से खुली लड़ाई लड़नी पड़ी होगी। छत्तीसगढ़ राज्य ने यह स्पष्ट किया है कि हजारों आम नागरिकों को नक्सलवादियों द्वारा उन्हें पुलिस का मुखबिर कहकर मार दिया गया है। इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि एस0पी0ओ0, माओवादी एवं नक्सलवादियों के द्वारा किए गए हमलों का सीधा एवं प्रथम निशाना हैं न कि यदा कदा किए गए आकस्मिक हमलों का शिकार। नए नियम से स्थिति और बदतर हो जाती है क्योंकि उसमें कहा गया है कि जिन व्यक्तियों को एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त किया गया, वे पुलिस की विशिष्ट समस्याओं को रोकने एवं नियंत्रित करने में मदद करेंगे, जिसमें आतंकवादी एवं उग्रवादी गतिविधियाँ भी शामिल हैं।
ऐसा कोई निर्देश नहीं है कि वे लड़ाईविहीन भूमिका में प्रयोग किए जाएँगे या ऐसी भूमिका के लिए प्रयोग किए जाएँगे जहाँ उन्हें उग्रवादी एवं आतंकवादी आक्रमण का भय न हो।
43. यह पूरी तरह से स्पष्ट है जैसा कि वादियों ने भी कहा है, हजारों आदिवासी नवयुवकों का जीवन जिन्हें एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त किया गया है गंभीर खतरे में है क्योंकि वे छत्तीसगढ़ में माओवादी/ नक्सलियों के सशस्त्र विद्रोह को दमन करने में लगे हुए हैं। 173 एस0पी0ओ0 ने एक खूँखार लड़ाई में अपने जीवन का बलिदान दे दिया जैसा कि छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने हलफनामे में स्वीकार किया है। यह इस बात का स्पष्ट सुबूत है। यहाँ पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि 538 पुलिस एवं सी0ए0पी0एफ0 कर्मचारी भी मारे गए हैं। 2004 से 2011 के मध्य में छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ गतिविधियों में नियमित सुरक्षा बलों की 40 बटालियनें तैनात की गईं। यदि प्रत्येक बटालियन की औसत तादाद 1000 से 1200 के बीच लगाई जाए तो औपचारिक सुरक्षा कर्मियों की मृत्यु का औसत, कुल सुरक्षाकर्मियों की तुलना में मोटे तौर पर 538 और 45 से 50 हजार के मध्य औसत है। यह अपने आप में स्वयं एक चिंता का विषय है। एस0पी0ओ0 की संख्या पिछले वर्ष 3000 थी एवं अब वह 6500 हो गई हैं। मारे गए एस0पी0ओ0 की संख्या लगभग 3 हजार है। इस संख्या का अनुपात एस0पी0ओ0 की कुल संख्या के अनुपात में बहुत अधिक है। सामान्य सुरक्षा बलों की तुलना में एस0पी0ओ0 की मृत्यु की उच्च दर इस बात को सूचित करती है कि एस0पी0ओ0 प्रथम पंक्ति की लड़ाई में लगे हुए हैं अथवा अपनी भूमिका के कारण अत्यधिक खतरनाक परिस्थितियों में रखे जा रहे हैं एवं उनकी सुरक्षा की सामान्य पुलिस बलों की तुलना मंे पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई है।
44. यह बात भी हमें स्पष्ट है कि स्थानीय नवजवानों को माओवादी सशस्त्र विद्रोह के विरुद्ध प्रयोग करने की नीति के कारण नवजवान आदिवासी दांतेवाड़ा और छत्तीसगढ़ के दूसरे जिलों में एक प्रकार से मौत के कुओं में सबसे आसान शिकार बन गए हैं। इन नवयुवकों को दिया हुआ प्रशिक्षण भी अपर्याप्त है। आधुनिक सशस्त्र विद्रोह से निपटने के लिए अत्याधुनिक हथियारों, आँकड़ों के विश्लेषण निरीक्षण आदि की आवश्यकता है। विभिन्न रिपोर्टों के आधार पर एवं जैसा कि राज्य स्वयं दावा करता है क माओवादी अपने आपको अधिक वैज्ञानिक तरीके से लैस कर रहे हैं एवं उनके पास आधुनिकतम् किस्म के हथियार मौजूद हैं। छत्तीसगढ़ राज्य दावा करता है कि नवयुवकों के पास किसी प्रकार की औपचारिक शिक्षा नहीं है। दो महीने के अंदर विश्लेषणात्मक क्षमता, कानूनी दाँव पेंच एवं इस क्षेत्र में अन्य पहलुओं को कैसे सीख लेंगे। उनका यह भी दावा है कि यह प्रशिक्षण माओवादियों के सशस्त्र विद्रोह को दमन करने के लिए पर्याप्त है। यह दावा अत्यन्त आश्चर्यजनक है।
45. छत्तीसगढ़ राज्य ने स्वयं कहा है कि इन आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त करते समय उन लोगों को अधिक वरीयता दी जाएगी जो कक्षा 5 उत्तीर्ण हंै। इससे यह बात पूरी तरह से स्पष्ट है कि अधिकतर भर्ती किए गए एस0पी0ओ0 कक्षा 5 भी उत्तीर्ण नहीं है। नए नियमों से स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ राज्य इन कम पढ़े लिखे नवयुवकों को एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त करता रहेगा। यह
अत्यधिक आश्चर्यजनक है कि छत्तीसगढ़ राज्य यह आशा करता है कि ये नवजवान आई0पी0सी0 एवं इण्डियन पुलिस कोड एवं भारतीय दण्ड संहिता जैसे जटिल विषयों को आसानी से सीख सकेंगे। इससे भी ज्यादा आश्चर्य जनक बात यह है कि छत्तीसगढ़ राज्य दावा करता है कि इस प्रकार का प्रशिक्षण एक घण्टे प्रतिदिन के हिसाब से 24 वादनों में उन्हें प्राप्त करा दिया गया है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ राज्य यह भी दावा करता है कि 12 अतिरिक्त वादनों में मानवाधिकार एवं भारतीय
संविधान के अन्य अनुबन्ध का भी प्रशिक्षण दिया गया है। इससे भी आश्चर्यजनक बात यह है कि सरकार दावा करती है कि उसने 6 वादनों में उन्हें पुलिस प्रक्रिया की वैज्ञानिक एवं विस्फोट सम्बंधी जानकारी प्रदान कर दी है। ये सारी चीजें एक महीने की अलग से टेªनिंग प्रदान करके ऐसे नवयुवकों को दी गई है जो 5वीं भी नहीं पास हैं।
46. हमारा विचार है कि ये दावे विश्वसनीय नहीं हंै। यदि कोई व्यक्ति यह भी मान ले कि इस प्रकार के पाठ वास्तव में पढ़ाए गए, तो भी किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति के लिए यह स्वीकार करना संभव नहीं है कि आदिवासी नवयुवक जो कक्षा 5 भी उत्तीर्ण नहीं हैं वे पढ़ाए जाने वाले विषयों को बारीकी से समझ सकेंगे एवं माओवादियों के द्वारा जारी सशस्त्र विद्रोह का मुकाबला करने की क्षमता प्राप्त कर सकेंगे।
47. छत्तीसगढ़ राज्य स्वीकार करता है कि इन आदिवासी नवजवानों में
अधिकतर नवयुवकों को, जिनको कि एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त किया गया है, हथियार और दूसरी आवश्यक वस्तुएँ प्रदान की गई हैं एवं नए नियमों के तहत भविष्य में भी प्रदान की जाती रहेंगी। छत्तीसगढ़ राज्य ये दावा करता है कि यह हथियार उन्हें आत्म सुरक्षा हेतु दिए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि आदिवासियों की शिक्षा एवं प्रशिक्षण को मद्देनजर रखते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनके पास आवश्यक विश्लेषणात्मक एवं बौद्धिक क्षमता नहीं होगी, कि वे आत्म सुरक्षा जैसे विधिक शब्द की परिभाषा को समझ सकें। यदि इसका गलत प्रयोग किया गया तो उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक चार्ज लगाए जाएँगे। यदि हम कुछ क्षण के लिए यह स्वीकार कर लंे कि नवजवानों को गुप्त सूचना एकत्रित करने के लिए प्रयोग किया जा रहा है, तब भी इस प्रकार की भूमिका अत्यधिक खतरनाक है। उनको ऐसी परिस्थितियों में रखा जा रहा है जिसमें कि आत्म सुरक्षा एवं अनचाही फाइटिंग की विभाजन रेखा बहुत बारीक हो जाती है। इस कार्य के लिए उच्च श्रेणी के विवेक की आवश्यकता होती है। उनके शैक्षिक स्तर को देखकर यह स्पष्ट है कि उनके अन्दर इस प्रकार के निर्णय लेने की क्षमता नहीं होगी एवं निम्न शैक्षिक स्तर के कारण यदि उन्हंे प्रशिक्षण दिया गया तो भी उनके अंदर यह क्षमता विकसित नहीं होगी।
48. छत्तीसगढ़ राज्य दावा करता है कि वह ऐसे आदिवासी नवयुवकों की भर्ती कर रहा है जो इस सम्बन्ध में स्वयं सेवक के रूप में तैयार हंै। यह भी दावा किया गया है कि अधिकतर नवजवान जो इस प्रकार के कार्य के लिए आगे आ रहे हैं उनको ऐसा करने के लिए प्रेरित किया गया है क्योंकि वे अथवा उनका परिवार नक्सली हिंसा के शिकार हो चुके हैं एवं वे अपने परिवार को नक्सलियों के हमले से सुरक्षित करना चाहते हैं। हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अगर छत्तीसगढ़ सरकार के इन दावों को सही भी मान लिया जाए तब भी इससे छत्तीसगढ़ राज्य का नैतिक अपराध कम नहीं होता तथा इससे मानव अधिकारों के उल्लंघन की समस्या का समाधान नहीं हो जाता।
49. उनके निम्न शैक्षिक स्तर को
ध्यान में रखते हुए हम यह नहीं कह सकते कि वे सशस्त्र विद्रोह की कार्यवाहियों को, चाहंे वे आत्म सुरक्षा में ही क्यों न हों, समझ सकते हैं एवं अपने कार्य के कारण जिन अनुशासनात्मक एवं अपराध सम्बंधी धाराओं के वे भागीदार हो जाते हैं उनको भी वे नहीं समझ सकते हैं। आधुनिक न्याय शास्त्र के अनुसार हमें स्वतंत्र इच्छा एवं अभिलाषा की जटिल अवधारणा की मात्रा का मापन करना होगा। हमारे पास कोई ऐसी कसौटी नहीं है जिसके द्वारा हम उन एस0पी0ओ0 के रूप मंे नियुक्त नवजवानों की सहमति का मापन कर सकें। अतएवं हम यह नहीं कह सकते कि इन नवजवानों ने अपनी इच्छा से एस0पी0ओ0 बनने की सहमति प्रदान की।

क्रमश:

अनुवादक : मो0 एहरार
मो 08009513858

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