बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय भाग 8


इसके अतिरिक्त बहुत से नवयुवक बदले की भावना से प्रेरित हैं एवं उनके अन्दर क्रोध की भवना विद्यमान है। अतएव इस प्रकार के नवयुवकों को सशस्त्र विद्रोह को दमन करने की गतिविधियों में लगाने से परिणाम उल्टा हो सकता है। प्रथम यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि माओवादियों के द्वारा नए-नए तरीके प्रयोग किए जाने के कारण सशस्त्र विद्रोह की गतिविधियों को दमन करने के लिए एक शान्त एवं बुद्धिमान व्यक्ति की आवश्यकता है ताकि वह वर्तमान तथा भविष्य की
गतिविधियों का ठीक से विश्लेषण करे। क्रोध एवं घृणा की भावना इस प्रकार के विश्लेषण को अवरुद्ध कर देगी। द्वितीय क्रोध एवं घृणा की भावना दूसरे व्यक्ति के अन्दर शक की भावना उत्पन्न करेगी। यदि एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त आदिवासी नवयुवकों के प्रमुख कार्यों में से एक कार्य माओवादियों अथवा उनके शुभचिंतकों की पहचान करना है तो इसकी पूरी संभावना है कि उनकी पहचान करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है अथवा प्रभावित होगी। स्थानीय शत्रुता, सामान्य सामाजिक संघर्ष एवं एस0पी0ओ0 के दमनकारी रवैय्ये के कारण पूरी संभावना है कि वे व्यक्ति जो माओवादी गतिविधियों से जुड़े हुए नहीं हैं उनको माओवादी अथवा माओवादी शुभचिंतक के रूप में चिह्नित किया जा सकता है। इसके परिणाम स्वरूप गाँव का वातावरण प्रदूषित होगा एवं ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी जिसमें निर्दोष व्यक्तियों के मानवाधिकारों का हनन किया जाएगा एवं कुछ और लोग भी राज्य के विरुद्ध हथियार लेकर खड़े हो जाएँगे।
51. बहुत से आदिवासी नवयुवक जिनके परिवारों के खिलाफ माओवादियों ने हिंसा की वारदातें की हैं वे पूरी तरह से हतोत्साहित हो चुके हैं। निरन्तर क्रोध एवं घृणा की भावना रखने एवं उससे ग्रसित रहने के कारण वे अमानुषिकता के स्तर तक पहुँच चुके हैं। एक सभ्य एवं उत्तरदायी समाज की भूमिका द्वारा ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करना है जिससे कि वे खराब अवस्था से वापस लौट सकें अथवा सामान्य मार्ग पर फिर से वापस आ सकें एवं उनका क्रोध एवं बदले की भावना शांत हो सके। ऐसी भावनाओं को उद्वेलित करना एवं राज्य के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के लिए उनको प्रयोग करना एक सभ्य समाज के नियमों के विपरीत है। कुछ भटके हुए नीति
निर्धारिकों के द्वारा इस प्रकार की स्थिति का नाजायज फायदा उठाना सबसे गंभीर संवैधानिक चिंता का विषय है।
52. छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा दाखिल इन हलफनामों से यह बात पूरी तरह स्पष्ट है कि आदिवासी नवयुवकों को एस0पी0ओ0 के रूप में भर्ती करने का मुख्य प्रयोजन सामान्य सुरक्षा बलों की कमी को दूर करना है। यह परिस्थिति राज्य के सामाजिक और आर्थिक नीतियों की देन है। निजीकरण की नीति के कारण राज्य ने अपने आप को कमजोर कर लिया है एवं वह पर्याप्त आर्थिक संसाधन, सामाजिक गड़बड़ी को नियंत्रित करने के लिए नहीं लगा पा रहा है। इन आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति जबकि उनके अंदर आवश्यक शिक्षा एवं क्षमता विद्यमान नहीं है, सीधा अर्थ यही है कि सरकार एस0पी0ओ0 की कार्य क्षमता के बारे में उतना चिंतित नहीं है जितना कि वह धन के बारे में चिंतित है।
53. छत्तीसगढ़ राज्य का दावा है कि इस प्रकार का रोजगार प्रदान करके वह नए लोगों को रोजी दे रहा है एवं परिणाम स्वरूप संविधान की धारा-2 में वर्णित मूल्यों को प्रोत्साहित कर रहा है। अतः अदालत यह समझ पाने में असफल है कि मात्र साक्षर नवजवानों को सशस्त्र विद्रोह की गतिविधियों में लगाना, जहाँ कि उनके जीवन को ही गंभीर खतरा है, रोजगार किस प्रकार समझा जा सकता है। इस प्रकार की
अवधारणा आवश्यक रूप से आदिवासी नवयुवकों के जीवन का अपमान है एवं मानव की गरिमा को नष्ट करना है।
54. हमें यह स्पष्ट है एवं छत्तीसगढ़ राज्य ने यह कहा भी है कि आदिवासी नवयुवक जो एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त किए जाते हंै, को हथियार इस आधार पर दिया जा रहा है कि उन्हें वैधानिक रूप से पुलिस बल का सम्पूर्ण सदस्य समझा जाता है एवं उनको वही जिम्मेदारियाँ एवं उत्तरदायित्व दिए जा रहे हैं एवं उन पर भी वही अनुशासन संहिता लगाई जाती है जो सामान्य पुलिस बल पर। इन उत्तरदायित्वों एवं कर्तव्यों में अपने जीवन को जोखिम में भी डालना है, फिर भी केन्द्र सरकार एवं छत्तीसगढ़ सरकार का विश्वास है कि इस दुरूह कार्य को करने के लिए उन्हें केवल 3000 रूपये का मानदेय प्रदान किया जाए।
55. आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति प्रकृति से अस्थाई है। वास्तव में उनको एक साल के लिए नियुक्त किया जाता है एवं अन्य एक साल के लिए इन्क्रीमेंट दिया जा सकता है। यह अत्यन्त संक्षिप्त समय है। नए नियमों के अन्तर्गत बिना किसी कारण के पुलिस अधीक्षक के द्वारा उनकी सेवाएँ समाप्त की जा सकती हैं। संक्षिप्त समय की यह नियुक्ति अनेक गंभीर प्रश्नों को जन्म देती है जैसा कि छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा एवं केन्द्र सरकार के द्वारा स्वीकार किया गया है। छत्तीसगढ़ राज्य में माओवादी गतिविधियाँ 1980 के दशक से चल रही हैं एवं पिछले एक दशक में यह और भी अधिक शक्तिशाली हो गई है। छत्तीसगढ़ राज्य यह भी स्वीकार करता है कि उन्हें इन एस0पी0ओ0 को हथियार प्रदान करना है क्योंकि माओवादियों से उनके जीवन को गंभीर खतरा है। वास्तव में माओवादी, सामान्य नागरिकों को भी, पुलिस का मुखबिर कहकर मार देते हैं। स्पष्ट रूप से इन परिस्थितियों में यह कहना तर्कसंगत होगा कि आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति उन्हें माओवादियों का स्पेशल निशाना बनने पर मजबूर कर देती है। छत्तीसगढ़ राज्य के पास कोई ऐसी योजना नहीं है जिसके द्वारा वह इन नवयुवकों की रक्षा कर सके। सेवा समाप्ति के पश्चात इन नवयुवकों को अपने हथियारों को जमा करना पड़ता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जहाँ कही भी माओवादी उन्हें पाएँगे, सीधा निशाना बना लेंगे। छत्तीसगढ़ राज्य ने यह भी बताया है कि नियुक्त किए गए एस0पी0ओ0 में से 1200 को अनुशासन हीनता एवं कर्तव्य की अवहेलना के कारण सेवा से निकाला जा चुका है। यह असाधारण रूप से एक बड़ी संख्या है। पिछले वर्ष तक नियुक्त किए गए एस0पी0ओ0 की संख्या केवल 3000 थी। अब यह संख्या 6500 है। यह तथ्य कि भर्ती किए गए एस0पी0ओ0 की संख्या में से 40 प्रतिशत को अनुशासन हीनता के लिए सेवा से निकाला गया है-इससे यह साबित होता है कि सम्पूर्ण भर्ती प्रक्रिया ही दोषपूर्ण है। इस प्रकार की नीतियों को जारी रखने का परिणाम यह होगा कि आदिवासी नवयुवकों की एक बड़ी संख्या, जब एस0पी0ओ0 के रूप में उनकी संक्षिप्त नियुक्ति समाप्त हो जाएगी तो वे एक बड़े खतरे में पड़ जाएँगे।
56. उपर्युक्त को केवल कोरी कल्पना नहीं समझा जा सकता है। छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा दिए गए आँकड़ों एवं परिस्थितियों से उपर्युक्त नतीजा स्पष्ट है। फिर भी यह समस्या यहीं समाप्त नहीं होती। समस्या और भी खराब हो जाती है क्योंकि जिन क्षेत्रों में एस0पी0ओ0 की नियुक्ति हुई है वहाँ के सामाजिक ढाँचे के नष्ट होने की प्रबल संभावना है।
57. हम बार-बार छत्तीसगढ़ राज्य एवं भारत सरकार से पूछ चुके हैं कि वे इन नवयुवकों को दिए हुए हथियारों को क्यों वापस ले लेंगे। अभी तक हमें कोई जवाब नहीं मिला है। यदि इन हथियारों की वापसी के लिए बल का प्रयोग किया जाता है, बिना यह आश्वासन दिए कि वे अपने जीवन की सुरक्षा, सेवा समाप्त के उपरान्त, किस प्रकार करेंगे तो यह संभावना बलवती है कि ये नवजवान हथियारों को वापस करने से इंकार कर सकते हैं। परिणाम स्वरूप हमारे पास सशस्त्र नवयुवकों की एक बड़ी संख्या होगी जो अपने जीवन को बचाने के लिए भयभीत इधर उधर दौड़ रहे होंगे और कानून का उल्लंघन कर रहे होंगे। ऐसी परिस्थिति में यह भी संभव है कि वे राज्य के खिलाफ खड़े हो जाएँ या कम से कम सुरक्षा बलों के खिलाफ भी हथियारों का प्रयोग कर सकते हैं अथवा अपने जीविकोपार्जन के लिए हथियारों का प्रयोग समूह बनाकर समाज के विरुद्ध स्वयं कर सकते हैं।
58. मानवाधिकार संगठनों द्वारा यह बात बार-बार कही जा रही है कि आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति के कारण, जिनको कोया कमाण्डो अथवा सलवा जुडूम भी कहा जाता है,
मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो रही है। इसके अतिरिक्त बहुत सी लूट, हिंसा एवं आगजनी की घटनाओं के पीछे इन्हीं एस0पी0ओ0 का हाथ बताया जा रहा है। अदालत की राय में ऐसी घटनाएँ एस0पी0ओ0 के ऊपर उचित नियंत्रण के अभाव में घटित हो रही हैं। एस0पी0ओ0 के कारण समाज के दूसरे वर्गों के
मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
59. उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर अदालत का यह विचार है कि भारतीय संविधान की धारा 21 एवं धारा 14 का उल्लंघन किया गया है एवं यदि इन्हीं कम पढ़े लिखे आदिवासी नवयुवकों की नियुक्ति एस0पी0ओ0 के रूप में जारी रखी गई तो मानवाधिकारों का हनन भविष्य में भी जारी रहेगा।
60. धारा 14 का उल्लंघन किया गया है क्योंकि नवयुवकों को उसी स्तर के खतरें में डालना जिस स्तर में विकसित पुलिस बल के सदस्य डाले जाते हैं, जिनका शैक्षिक स्तर बेहतर होता है, जिनको बेहतर प्रशिक्षण दिया जाता है एवं जिनके अन्दर इस प्रशिक्षण से लाभ उठाने की बेहतर क्षमता होती है, ऐसा करना दो असमान व्यक्तियों को समान मानने के बराबर है। इसके अतिरिक्त ये नवयुवक निम्न शैक्षिक स्तर, निम्न बौद्धिक स्तर के कारण माओवादियों से लड़ने में इतने प्रभावकारी नहीं सिद्ध हो सकते जितना कि नियमित पुलिस बल के सदस्य। अतएव एस0पी0ओ0 के रूप में इनकी नियुक्ति अतर्कसंगत, स्वैच्छिक एवं पागलपन है।
61. धारा 21 का उल्लंघन किया गया है क्योंकि एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त इन नवयुवकों की सहमति प्राप्त होने के बावजूद ये नवयुवक निम्न शैक्षिक स्तर के कारण उन खतरों को नही समझ सकते हैं जो उनके सामने आने वाले हैं। न तो उनके पास वह क्षमता है जो इस प्रकार के खतरों से निपटने के लिए होनी चाहिए और न ही उनके पास वह विवेक है जो इस प्रकार का कर्तव्य निर्वहन करते समय किसी व्यक्ति के पास होना चाहिए। अपनी निम्न शैक्षिक उपलब्धियों के कारण, वे वह लाभ प्राप्त न कर सकेंगे जो इस प्रकार के प्रशिक्षण से होना चाहिए। परिणाम स्वरूप ऐसे नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति जिनके कर्तव्य में सशस्त्र विद्रोह से लड़ना सम्मिलित है, यदि यह मान भी लिया जाए कि उन्हें कठोर प्रशिक्षण प्रदान कर दिया गया है तब भी इन नवयुवकों के जीवन को जानबूझकर दाँव पर लगाना है।
62. निश्चित रूप से उन सीमाओं एवं क्षमताओं के अंदर, जिसके द्वारा जीवन का आनंद उठाया जाता है, मानव की गरिमा का सम्मान भी सम्मिलित है, चाहें वह व्यक्ति निर्धन हो, अशिक्षित हो अथवा कम पढ़ा लिखा हुआ हो, अथवा उसके अन्दर अपने विवेक को प्रयोग करने की क्षमता कम हो। हमारे संविधान की प्रस्तावना इस बात पर जोर देती है कि हमारे राष्ट्र का ध्येय मानव गरिमा का विकास भी है। एस0पी0ओ0 की नियुक्ति आवश्यक रूप से मानव की गरिमा को ठेस पहुँचाना है।
63. ऐसे अनुपयुक्त नवजवानों की नियुक्ति एस0पी0ओ0 के रूप में करना एवं उन्हें हथियार सौंपना, समाज के अन्य लोगों के जीवन को खतरे में डालना है एवं यह संविधान की धारा 21 का उल्लंघन भी है।
64. एस0पी0ओ0 को मानदेय प्रदान करना एवं उन्हें केवल एक संक्षिप्त समय के लिए नियुक्त करना संविधान की धारा 14 एवं धारा 21 का उल्लंघन है। हम इसका विस्तार से वर्णन पहले ही कर चुके हैं। इन नवयुवकों को केवल मानदेय देना हालाँकि वे नियमित पुलिस बल की तुलना में अधिक खतरे में रहते हैं, उनके जीवन की गरिमा एवं मूल्य को घटाना है। इसके अतिरिक्त इन नवयुवकों की निर्धनता को दृष्टिगत करते हुए तथा क्रोध एवं बदले की भावना जो उनमें विद्यमान है एवं पूर्व में उनके साथ हुए आचरण के कारण, उनको जोखिम भरे कार्य में लगाना एवं भावनाओं को भड़काना, मानवता एवं मानव की गरिमा को ठेस पहुँचाना है।
65. यह पहले ही कहा जा चुका है कि इन नवयुवकों की अस्थाई सेवा के कारण, सेवा समाप्ति के उपरान्त, उन्हें माओवादियों का निशाना बनने के लिए विवश कर देती है। इसके कारण सम्पूर्ण समाज, व्यक्तियों एवं समूहों को जोखिम में डालना है। यह धारा 21 का स्पष्ट उल्लंघन है।
66. उपर्युक्त तथ्यों के प्रकाश में, यह अदालत उचित आदेश पारित करती है। फिर भी यहाँ पर हमारे समक्ष कुछ महत्वपूर्ण मामले हैं जिनके ऊपर हमें गंभीरता पूर्वक विचार करना पड़ेगा। यह आवश्यकता इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि छत्तीसगढ़ राज्य एवं भारत सरकार इस बात का दावा करती है कि इन नवयुवकों की भर्ती आवश्यक है एवं माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

क्रमश:

अनुवादक : मो0 एहरार
मो 08009513858

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