सोमवार, 12 दिसंबर 2011

भारत के मुसलमानों का भविष्य भाग 2

कांग्रेस शासित आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में भी मासूम मुसलमानों के फर्जी एनकाउंटर और बेबुनियाद गिरफ्तारियाँ बदस्तूर होती रही हैं। प्रतिक्रियावादी, साम्प्रदायिक और मुस्लिम-विरोधी हिन्दुओं का वोट भारतीय जनता पार्टी को न चला जाए इस डर से कांग्रेस पार्टी की सरकारें भी मुसलमानों को आतंकवादी बता कर गिरफ्तार करती रहती हैं। फिर, आतंकवाद से लड़ने के नाम पर पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की दुकानें भी खूब जम कर चलती हैं। करोड़ों का असलहा खरीदा जाता है, नई-नई एजेंसियाँ कायम की जाती हैं जिनमें पुलिस वालों को और नौकरी के रास्ते दिखते हैं। ऐसे कानून बनाए जाते हैं जो पुलिस को दिए इकबालिया बयान को सबूत मान लेते हैं और मुजरिम के थोड़े-बहुत अधिकार भी खत्म कर देते हैं। गिरफ्तारियाँ करने वाले पुलिस वालों को इनाम मिलता है और उनकी तरक्की की जाती है। आतंकवाद में फँसाने का भय दिखा कर पुलिस घर-घर मुसलमानों से हफ्ता वसूली करती है और तरह-तरह के फायदे उठाती है।
अब सवाल यह उठता है कि जब देश के मुस्लिम समाज पर इतना बड़ा खतरा पैदा हुआ तो उसके प्रति कौम का क्या रुख रहा? जबकि यह साफ हो गया है कि मुसलमानों को जानबूझ कर एक सोची समझी साजिश के तहत दाग़दार किया जा रहा है .......और इस घिनौनी साजिश में पूरी सरकारी व्यवस्था और लगभग सभी राजनैतिक दल शामिल हैं तो मुस्लिम लीडरान और तंजीमों ने इससे लड़ने के लिए क्या कदम उठाए? इसका अफसोसनाक जवाब है ...कुछ भी नहीं। देखने में यह आया है कि इस चुनौती से शिद्दत से लड़ने के लिए मुस्लिम समाज संगठित होने से लगातार कतराता रहा है। अपनी रहनुमाई का जो सेहरा मुसलमान पहले कांग्रेस पार्टी के सर बाँधते थे वह सेहरा अब एन0जी0ओ0 के सर बाँधा जाने लगा है। मुसलमानों को खुद पर आज भी यकीन नहीं है, इसलिए वे बार-बार
मानवाधिकार संगठनों, एक्टिविस्टों, वकीलों और अदालतों के चक्कर काटते हैं।
गोधरा हो या आजमगढ़, हैदराबाद हो या मालेगाँव, मुसलमान अपनी बेचारगी पर अफसोस करते पाए जा सकते हैं। जिनके बच्चे या घर वाले जेल में हैं उनका जीवन तो खैर नर्क हो ही चुका है, लेकिन उनका साथ देने के लिए भी सामाजिक तौर पर न कोई सोच बन पाई है और न ही कोई मुहिम खड़ी हो पाई है। यह जरूर है की जमीअत उलमा-ए-हिंद, जमात-ए-इस्लामी और अन्य कौमी तंजीमों से जुड़े कुछ सामाजिक कार्यकर्ता इन अभागे परिवारों को गुप्त तौर पर मदद देते रहते हैं, लेकिन यह इमदाद भी ज्यादातर वकील और कोर्ट-कचेहरी के सिलसिले से ही होती है। जिस मुसलमान परिवार का सदस्य गिरफ्तार होता है उसके यहाँ रिश्तेदार भी आना बंद कर देते हैं, क्योंकि उनको डर रहता है कि उन्हें भी पुलिस केस में फँसा देगी। वे मोहल्ले वाले हिम्मती होते हैं जो ऐसे परिवारों की हौसला अफजाई के लिए उनका साथ देते हैं। आपसी बातचीत में हर मुसलमान यह मानता है कि आतंकवाद की यह छद्म कहानी सिर्फ मुसलमानों को दबा कर रखने के लिए गढ़ी गई है, लेकिन सार्वजनिक तौर पर कोई भी मुसलमान या मुस्लिम संगठन इस बात को कहने के लिए और इस मुल्क के निज़ाम को चुनौती देने के लिए तैयार नहीं होता है। बल्कि सभी आस लगाए रहते हैं कि देश भर की अदालतों में चल रहे मुकदमों में कभी तो इन्साफ मिलेगा, और यह सोच कर वे शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सर घुसाए बैठे रहते हैं। आपको किसी भी शहर में उभरते जवान मुसलमान नेता मिल जाएँगे जो कांग्रेस या बी0जे0पी0 या समाजवादी पार्टी या बसपा या ए0आई0ए0डी0एम0के0 या राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी या राजद या किसी भी दल में कर्मठता से काम कर रहे हैं, लेकिन आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों पर हो रहे जुल्म से लड़ने के लिए उनकी राजनीति में कोई जगह नहीं है। लखनऊ में मोहम्मद शुऐब, उज्जैन में नूर मोहम्मद और भोपाल में परवेज आलम जैसे इक्का-दुक्का मुसलमान वकीलों को छोड़ कर ज्यादातर मुसलमान वकील भी खुलकर सामने आने से कतराते हैं। जिस तरह से शुऐब साहब और नूर मोहम्मद साहब को बजरंगदल के कार्यकर्ताओं ने सरेआम पीटा, और जिस तरह फरवरी 2010 में मुंबई के निडर वकील शाहिद आज़मी की गोली मार कर हत्या कर दी गई, उस से मुसलमानों के हौसले और भी पस्त हो गए।

-अजित शाही
क्रमश:

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