मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

चीर अंधेरे को हम नया सवेरा लायेंगे !

सरकार का गेंहू समर्थन मूल्य में कटौती का यह निर्णय किसानो को आयोग के आकलित मूल्य से भी कम देने का निर्णय हैं | अत:यह निर्णय किसानो को गेंहू का न्यूनतम लाभकारी मूल्य देने के प्रस्ताव के विपरीत घोषित तौर पर लागत से कम मूल्य देकर घाटे में ढकेलने का निर्णय भी है |
केन्द्रीय कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ( सी0 ए0 पी0 सी0 ) ने अगले सीजन के लिए गेंहू के न्यूनतम समर्थन मूल्य को 1350 रूपये प्रति क्विंटल तय किए जाने का प्रस्ताव दिया था | आयोग ने इसे तय करने में गेंहू के पिछली बार के 1170 रूपये के न्यूनतम समर्थन मूल् (50 रूपये बोनस सहित ) में 180 रूपये की वृद्धि करके उसे 1350 रूपये तय किया था | आयोग का यह प्रस्ताव अक्तूबर माह के एकदम शरुआत में आ गया था | पर अक्तूबर के आखरी सप्ताह में हुई केन्द्रीय मंत्रीमंडल की बैठक में उसे मंजूरी नही मिल पायी | मंत्रीमंडल ने आयोग के 1350 रूपये प्रति क्विंटल के मूल्य में 65 रूपये क्विंटल की कमी करके उसे 1285 रूपये प्रति क्विंटल कर दिया |संभवत:यह पहला अवसर है जब केन्द्रीय मंत्रीमंडल द्वारा देश में कृषि उत्पादों की कीमत निर्धारित करने वाली शीर्ष संस्था के प्रस्ताव को दर किनार उसमे खासी कटौती कर दी | यह केवल शीर्ष संस्था के एक प्रस्ताव में कमी करने का ही ही द्योतक नही है बल्कि किसानो की बढती लागत को भी अनदेखा करने का मामला है | क्योंकि कृषि में बढती लागत को ही प्रमुख आधार मानकर कृषि लागत व मूल्य आयोग अपना प्रस्ताव तय करता हैं | जहा तक पिछले साल के लागत में वृद्धि का प्रश्न है तो खाद के दाम में डेढ़ गुने से लेकर दोगुने तक वृद्धि हो चूकी हैं |डीजल के मूल्य में भी 20 प्रतिशत से उपर वृद्धि हुई है |इसी तरह से लागत के अन्य सामानों में भी तीव्र वृद्धिया हुई है | इन सबके आकलन के आधार पर ही आयोग ने गेंहू के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि का प्रस्ताव दिया था | हालाकि आयोग के इस आकलन में छोटे या औसत किसानो के निजी व पारिवारिक श्रम शक्ति की या ( उसके पारिश्रमिक की )लागत के आकलन की आमतौर पर उपेक्षा की जाती रही है | फलस्वरूप आयोग द्वारा प्रस्तावित न्यूनतम समर्थन मूल्य भी औसत किसानो का वास्तविक समर्थन मूल्य नही बन पाता | फिर यह बात भी जगजाहिर है कि सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य पर भी आम किसान अपने अनाज की बिक्री नही कर पाता | इसमें कई झंझटो व् दिक्कतों का सामना करना पड़ता हैं इसके चलते किसान अपना अनाज समर्थन मूल्य से कही कम दाम पर स्थानीय व्यारियो को अपना अनाज बेच देते है | लेकिन औसत किसानो के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को दुरुस्त करने तथा उस पर किसानो के गल्ले की खरीद को सुनिश्चित करने की जगह सरकार ने अब दुसरा ही काम शुरू कर दिया | उसने तो अपने ही आयोग द्वारा प्रस्तावित गेंहू के न्यूनतम समर्थन मूल्य को घटा दिया है | साफ़ बात यह है कि सरकार का गेंहू समर्थन मूल्य में कटौती का यह निर्णय किसानो को गेंहू का न्यूनतम लाभकारी मूल्य देने के प्रस्ताव के विपरीत घोषित तौर पर लागत से कम मूल्य देने और किसानो को घाटे में ढकेलने का भी निर्णय है |ध्यान देने लायक बात यह कि सरकार ने आयोग के आकलन पर कोई सवाल नही खड़ा किया है और न ही अपनी तरफ से आयोग के आकलन में बदलाव करके ही यह कटौती की है | उसने तो किसानो को ज्यादा समर्थन मूल्य देने से , गेंहू की महगाई बढाने का सवा आगे कर दिया है | महगाई को नियंत्रित करने के नाम पर प्रस्तावित न्यूनतम समर्थन मूल्य में यह कमी की हैं | जबकि वास्तविकता यह है कि खाद्यान्नो एवं कृषि उत्पादों कि वास्तविक महगाई किसानो को मिलने वाले मूल्य से नही , बल्कि बाज़ार में चढने वाले मूल्य के चलते बढती हैं | इसका सबूत यह है कि खाद्यान्नो और अन्य कृषि उत्पादों की बिक्री में किसानो को मिलने वाले मूल्य भाव और उपभोक्ताओं द्वारा उसकी खरीद के मूल्य भाव में भारी अन्तर रहता है | सरकार ने यह तक बताना जरूरी नही समझा कि आखिर किसानो को बढती लागत के आधार पर मूल्य न मिलने पर वे लागत कि बढती महगाई का सामना कैसे करेंगे | जबकि यह बात सरकारे भी जानती है कि लागत की अपेक्षित आपूर्ति न कर पाने पर उत्पादन गिर जाएगा और उसके चलते गेंहू व अन्य खाद्यान्नो कि महगाई बढने की संभावना कही ज्यादा बढ़ जायेगी |
विरोधी पार्टियों एवं प्रचार माध्यमी विद्वानों द्वारा भी सरकार के इस कुतर्क का और न्यूनतम समर्थन मूल्य में इस अन्याय पूर्ण कटौती का कोई विरोध नही किया गया | क्योंकि यह मामला किसानो का हैं | अगर कही मामला धनाढ्य उद्योगपतियों की किसी कटौती का होता तो सारी पार्टिया व प्रचार माध्यमी विद्वान् आसमान सर पर उठा लेते और उसे 'अन्याय ' 'घोर अन्याय ' बताने के लिए दलीलों की मिसाइले दागने लग जाते | पर चूकि मामला किसानो का है इसलिए इस प्रछन्न अन्याय पर भी सारी पार्टिया चुप है | सारे दल सरकार के इस अन्याय पूर्ण निर्णय का चुप्पी भरा समर्थन कर रहे हैं | लेकिन क्या किसानो को भी इस पर चुप रहना चाहिए ? एकदम नही ! कत्तई नही ! उन्हें आयोग के प्रस्तावित न्यूनतम मूल्य के इस अन्याय पूर्ण कटौती का विरोध अवश्य ही करना चाहिए | सरकार से इसका जबाब भी मांगना चाहिए और संतुलित मूल्य भाव की माँग भी जरुर करना चाहिए | ऐसे में नचिकेता का यह गीत याद आ जाता हैं हम मज़दूर-किसान चले, मेहनतकश इंसान चले

चीर अंधेरे को हम नया सवेरा लायेंगे !

ताकत नई बटोर क्रान्ति के बीज उगायेंगे !


कसने लगी शिरायें तनती गई हथेली की

खुली ग्रंथियाँ शोषण की गुमनाम पहेली की

सुलग उठे अरमान चले, हम बनकर तूफ़ान चले

हंसिये और हथौड़े का अब गीत सुनायेंगे !


लगे फैलने पंख आज फिर ग़र्म हवाओं के

सीना तान खड़ा है आगे समय दिशाओं के

डाल हाथ में हाथ चले, हम सब मिलकर साथ चले

रक्त भरे अक्षर से निज इतिहास रचायेंगे !


श्रम की तुला उठाकर उत्पादन हम बाँटेंगे

शोषण और दमन की जड़ गहरे जा काटेंगे

करते लाल सलाम चले, देते यह पैग़ाम चले

समता और समन्वय का संसार बसायेंगे !


-सुनील दत्ता
पत्रकार

09415370672

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