गुरुवार, 12 जनवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में उत्तर प्रदेश का योगदान -8


आजादी के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

इन थोड़े पृष्ठों में 1947 से आज तक यू0पी0 में पार्टी के इतिहास और सी0पी0आई0 में उसकी भूमिका पर विचार संभव नहीं है हम केवल कुछ बिन्दुओं का उल्लेख भर कर देंगे। आजादी प्राप्त करने के बाद उत्तर प्रदेश और देश भर में सी0पी0आई0 ठीक ढर्रे पर चल रही थी कि अति वामपंथी संकीर्णतावाद और दुस्साहसिकता ने पार्टी को जकड़कर बरबाद कर दिया। पी0सी0 जोशी के नेतृत्व में सी0पी0आई0 ने आजादी का पुरजोर स्वागत किया था और अपनी उचित तथा सकारात्मक भूमिका अदा करना शुरू किया था। एक स्वतंत्र लेकिन पिछड़े तथा विकास मान रूप में पार्टी राष्ट्रीय और वर्गीय दोनों का ही सुन्दर संतुलित और द्वन्द्वात्मक रुख अपना रही थी। इसके अत्यन्त ही सकारात्मक नतीजे सामने आने लगे थे और पार्टी देश की राजनैतिक मुख्य में एक मजबूत शक्ति बनने लगी थी। लेकिन ठीक इसी वक्त चरम क्रांतिकारिता की बीमारी ने पार्टी को जकड़ लिया और उसे ध्वस्त कर दिया। जोशी को हटा दिया गया और इसके साथ ही पार्टी का स्वर्णिम युग भी समाप्त हो गया। इस दयनीय स्थिति को ठीक करने में फिर वर्षों और कई दशक लग गए। आज तक सी0पी0आई0 वह स्थिति पुनः वापस प्राप्त नहीं कर पाई है। उत्तर प्रदेश में भी बी0टी0आर0 लाइन के घातक परिणाम निकले। 1950 आते-आते पार्टी बिखर गई। 1951 में अजय घोष को एक गुप्त अखिल भारतीय सम्मेलन में पार्टी का महासचिव बनाया गया। डंागे, घाटे और सी0 राजेश्वर राव के साथ मिलकर वे धीरे-धीरे पार्टी को पटरी पर वापस लाए।
उत्तर प्रदेश में रमेश सिन्हा, सी0पी0 जोशी, सरजू पाण्डे, जेड0ए0 अहमद तथा अनेक अन्य ने पार्टी को रास्ते पर लाने और उसका पुनः निर्माण करने में बड़ी भूमिका अदा की। 1952 आते-आते पार्टी फिर से अपने पैरों पर खड़ी होने लगी। पार्टी ने चुनाव में हिस्सा लेने का फैसला लिया। इस चुनाव में सी0पी0आई0 को बड़ी सफलता मिली
और वह दूसरे नम्बर की पार्टी बन गई। उत्तर प्रदेश में भी पार्टी को सफलता मिली, उसकी एक सीट पर जीत हुई।
उत्तर प्रदेश में आगे चलकर झारखण्डे राय, सरजू पाण्डे, जय बहादुर सिंह जैसे दिग्गज पार्टी की ओर से जीत कर संसद तथा विधान सभा में पहुँचे। 1967 के चुनाव में रुस्तम सैटिन संविद सरकार में मंत्री भी बने। उत्तर प्रदेश में जहाँ 1952 में एक ही सीट मिली थी, वहीं 1957 के चुनाव में पार्टी को विधान सभा में 9 सीटें मिलीं। उत्तर प्रदेश में लोक सभा और विधान सभा पार्टी के मजबूत क्षेत्र रहे, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश, साथ ही अन्य इलाकों में भी। डाॅ0 जेड0ए0 अहमद ने विधान सभा और परिषद में लम्बी पारी खेली। इसके अलावा पार्टी का जनाधार भी काफी मजबूत रहा। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बाँदा, झाँसी, हमीरपुर, बस्ती, मुजफ्फरनगर और अन्य कई ऐसे इलाके विकसित हुए जहाँ पार्टी और उसके जनसंगठन बड़े ही शक्तिशाली बने। उत्तर प्रदेश ने पार्टी में जमीनदारी प्रथा के खिलाफ 1950 और 1960 के दशकों में अविस्मरणीय संघर्ष चलाए। 1960 और 70-80 के दशकों में हदबंदी कानून बनवाने और उन्हें लागू करवाने, फालतू जमीन भूमिहीनों के बीच बाँटने, खेतिहर मजदूरों तथागरीब किसानों का वेतन बढ़ाने और उनकी स्थिति सुधारने इत्यादि सवालों को लेकर पार्टी ने विशाल ऐतिहासिक आंदोलन खडे़ किए। 1960 के दशक में पार्टी और उसके जन संगठनों की ओर से छात्र और नौजवान आंदोलन संगठित किए गए। इनमें बंद आंदोलन प्रमुख थे जिन्होंने 1967 में कांगे्रस की सरकार गिराने में अपनी भूमिका अदा की। उत्तर प्रदेश में आर0एस0एस0-जनसंघ और आर0एस0एस0-बी0जे0पी0 जैसी साम्प्रदायिक शक्तियाँ काफी मजबूत रहीं। उत्तर प्रदेश बाबरी मस्जिद गिराने के लिए सारे देश में बदनाम हो गया। यह संघ परिवार की करतूतों के कारण मुख्य रूप से हुआ। पार्टी को ऐसी ताकतों से कड़ा मुकाबला करना पड़ा। साथ ही जातीय शक्तियाँ भी गंभीर खतरा थीं और हैं। 1960 के दशक में जब विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन पर माओवाद का हमला हुआ तो कम्युनिस्ट आंदोलन में फूट डाली जाने लगी। कम्युनिस्ट आंदोलन में माओवाद का जन्म हुआ। 1962 के चीनी आक्रमण ने माओवादियों को काफी बढ़ाया। पाला-पोसा और अन्त में कम्युनिस्ट पार्टी पर ही उन्होंने हमला कर दिया। इन फूट वादियों के कारण 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन कर दिया गया और आगे चलकर सी0पी0एम0 बनी।
इस प्रकार 1950 के बाद बड़ी कठिनाई से सी0पी0आई0 को रास्ते पर लाकर फैलाने का काम चल रहा था, पार्टी अब धीरे धीरे उठ खड़ी होकर जनता के लिए संघर्ष कर रही थी, ठीक ऐसे ही समय में यह एक बहुत बड़ा धक्का पहुँचा। फिर से एक बार पार्टी पीछे ढकेल दी गई। लेकिन पिछले 40 से अधिक वर्षों से सी0पी0आई0 फिर एक बार देश में और उत्तर प्रदेश में उभर कर आ रही है। चंडीगढ़ पार्टी कांग्रेस ने स्पष्ट कहा है कि पिछले चार दशकों की घटनाएँ आम तौर पर सी0पी0आई0 की राजनैतिक समझ को सही साबित करती हैं। कम्युनिस्ट और वाम एकता की लगातार कोशिशों के बाद कुछ थोड़ी सफलताओं के बावजूद अन्य वाम और कम्युनिस्ट पार्टियाँ इसके लिए तैयार नहीं हो रही हैं और उचित प्रतिक्रिया इस दिशा में नहीं रही है। इसलिए हम उसका इंतिजार करके पार्टी निर्माण और फैलाव का काम बन्द नहीं कर सकते।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपनी स्वतंत्र भूमिका निभाते हुए, जनता के प्रश्नों पर वाम जनवादी एकता की कोशिशें करते हुए एक मजबूत कम्युनिस्ट पार्टी बनाने का काम तेज करेगी। इससे जनता की ताकत बढ़ेगी, पार्टी व्यापक नवजवान पार्टी अर्थात जनता में फैली हुई पार्टी बनेगी और आम लोगों के हाथों में सी0पी0आई0 के रूप में एक संघर्ष का हथियार होगा। अपनी सारी कमजोरियों के बावजूद आज सी0पी0आई0 ही है जो उत्तर प्रदेश और समूचे भारत में सबसे आगे बढ़कर सबसे ज्यादा जन संघर्ष कर रही है। अतीत और वर्तमान के इस इतिहास में उत्तर प्रदेश की पार्टी का विशेष योगदान हैं।

अनिल राजिमवाले
समाप्त