शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

क्या वर्तमान समाज व्यवस्था में देश को एक देश कहा जा सकता है ?

देश का बटवारा निरंतर बढ़ता जा रहा है। यहाँ हम देश के इलाकाई या क्षेत्रीय बटवारे की या कश्मीर पूर्वोत्तर राज्यों के अलगाव की मांग के रूप में खड़े होते रहे बटवारे की बात नही कर रहे है |इन विवादों , बटवारों के समर्थन विरोध की चर्चाये तो आये दिन होती ही रहती है | निश्चित रूप से ये विवाद और झगड़े देश के लिए गंभीर खतरा हैं। लेकिन हम यहा देश में बढ़ते जा रहे उस आर्थिक सामाजिक बटवारे पर चर्चा कर रहे है , जो देश के एक या कुछ क्षेत्रो में ही सीमित नही हैं |बल्कि यह बटवारा देश-व्यापी हैं | देश के हर क्षेत्र हर समुदाय में फैलता बढ़ता जा रहा है।
यह बटवारा है , थोड़े से अमीर और व्यापक रूप से गरीब भारत का | यह बटवारा है ,छोटे से स्वच्छ व चमकदार और बड़े से लेकिन अँधेरे में रह रहे भारत का |छोटे से स्वस्थ तथा व्यापक रूप से बीमार भारत का | यह बटवारा है अरबपति , खरबपति बन रहे थोड़े से लोगो और समाज के व्यापक गरीब व निम्न माध्यम वर्गीय हिस्सों का | यह बटवारा है कुल आबादी के ७५ - ८० प्रतिशत जनसाधारण लोगो तथा २० - २५ प्रतिशत धनाढ्य एवं उच्च माध्यम वर्गियो का | इस बटवारे में एक तरफ साधारण मजदूरों , किसानो दस्तकारो , बुनकरों , छोटे -मोटे कारोबारियों , छोटे दुकानदारों तथा औसत रूप से पढ़ाई - लिखाई कर काम - धंधे में लगे लोगो की विशाल आबादी है तो दूसरी तरफ देश की धनाढ्य कम्पनियों , पद -प्रतिष्ठा प्राप्त राजनेताओं , अफसरशाहो , उच्च स्तरीय प्रचार माध्यमि सज्जनों , नामी गिरामी सांस्कृतिक कर्मियों , फिल्म स्टारों , माडलों , फैशनबाजो, तथा आम समाज में भी विभिन्न पेशो के जरिये अधिकाधिक कमाई कर रहे यह माध्यम वर्गियो आदि की छोटी आबादी हैं | यह देश और समाज का भारत , पाक , बांग्ला देश जैसा भौगोलिक व राजनैतिक बटवारा नही हैं | अपितु यह बटवारा है की देश के आर्थिक - सामाजिक हिस्सों का | बिडम्बना यह है की , देश के भौगोलिक इ राजनैतिक बटवारे की या कश्मीर व पुव्रोत्तर राज्यों के अलगाव इ बटवारे की आशकाओ व संभावनाओं पर तो बड़ी चर्चाये होती हैं , लेकिन राष्ट्र के निरंतर बढ़ते जा रहे आर्थिक व सामाजिक विभाजन पर कोई चर्चा नही होती | दूसरी बिडम्बना यह भी है कि भारत , पाक , बांग्लादेश में तो एकजुटता संभव है और वह किसी हद तक टूटती और फिर बनती बढती भी रही हैं | लेकिन राष्ट्र व समाज के निरंतर बढ़ते आर्थिक व सामाजिक विभाजन में एकता बनने व बढने कि कोई गुंजाइश नजर नही आती | कयोंकि समाज का धनाढ्य इ उच्च हिस्सा निचले समाज के शारीरिक व मानसिक श्रम को कम से कम मूल्य देकर हडपते रहने , छोटी - छोटी सम्मतियो का हिस्सा बनाते रहने और दुसरो को गरीबी बेकारी कि तरफ धकेलते रहने कि व्यवस्थागत प्रक्रिया को नही छोड़ सकता | कयोंकि देश - दुनिया व समाज में धनी - धनाढ्य बनने का कोई रास्ता न तो है और न हि हो सकता है |इस कडवी और तथ्यगत सच्चाई के वावजूद सबसे बड़ी बिडम्बना यह है कि इस परस्पर विरोधी प्रक्रिया से समाज में बढ़ते जा रहे आर्थिक , सामाजिक बटवारे के वावजूद उसमे एक्जुता बनी हुयी है | खासकर वर्तमान दौर में घराती जन समस्याओं के वावजूद अवाछित शान्ति बनी हुई है |इसे लेकर जन - विरोध , जन विद्रोह कि लहर उठती दिखाई नही पद रही हैं | इसी का परिणाम है कि आर्थिक , सामाजिक रूप से बढ़ते जा रहे बटवारे के वावजूद इस देश का धनाढ्य व उच्च हिस्सों के देश तथा गरीब व निम्न वर्गियो के देश के रूप में बटवारे को अनदेखा किया जाता रहा है | साफ़ बात है कि देश - दुनिया का धनाढ्य व उच्च हिस्सा राष्ट्र (व विश्व के ) इस आर्थिक सामाजिक बटवारे को , उसमे कभी भी एकजुटता न खड़ी हो सकने कि वास्तविकताओ को कभी नही क्बुलेगा | कयोंकि अभी तक बनी रही इसी एकजुटता से व धनी से धनाढ्य और अब धनाढ्यतम बनता रहा है | कयोंकि सत्ता सरकार में फिर समाज के विभिन्न क्षेत्रो में चद - बढ़ रहा उच्च वर्गीय हिस्सा इस धनाढ्य वर्ग का सेवक समर्थक बना हुआ हैं | लेकिन क्या यही काम समाज के जनसाधारण को भी करते रहना चाहिए ?क्या उन्हें परस्पर विरोधी दो राष्ट्रों कि मौजूदगी को समझना व स्वीकारना नही चाहिए ?अब यह जन - साधारण का हि दायित्व हैं कि वह धनाढ्य हिस्सों से राष्ट्र का संचालन , नियंत्रण अपने हाथ में लेकर राष्ट्र के इस बढ़ते बटवारे को रोके और घटाए ?राष्ट्र को कमोवेश एक जैसा अखण्ड राष्ट्र बनाये | क्या राष्ट्र की वास्तविक एकता का रास्ता इसी प्रयास और उसके लिए अपरिहार्य जन -संघर्ष से नही गुजरेगा ? इसे भी सोचे इस पे मंथन करे .............

सुनील दत्ता
पत्रकार

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