शनिवार, 14 जनवरी 2012

मार्क्सवाद और नई चुनौतियाँ-1

इंटरनेट आने के बाद पुरानी चीजें और पुराने विचार नवीकरण कर रहे हैं नए सिरे से समाज, सत्ता और सामाजिक संरचनाओं को परिभाषित किया जा रहा है। स्वचालितीकरण, उपग्रह, इंटरनेट और कम्प्युटर इस युग की चालकशक्ति हैं। भारत में भविष्य का सारा संचार, राजनीति, व्यापार, शिक्षा, न्याय, मित्रता, शत्रुता आदि का कम्युनिकेशन इन तीनों के माध्यम से ही होगा। एक जमाना था सारी दुनिया ने माक्र्सवाद को औद्योगिक क्रांति और प्रेस क्रांति के संदर्भ में पढ़ा और लागू किया। लेकिन पूँजीवाद ने परवर्ती पूँजीवाद के नाम से नए इंजन के रूप में स्वचालितीकरण, सैटेलाइट, इंटरनेट और कम्प्युटर के माध्यम से सारी दुनिया को नए सिरे से संगठित होने के लिए मजबूर किया है। माक्र्सवादी विचारकों और पूर्व-समाजवादी समाजों के नायकों और कम्युनिस्ट पार्टियों ने इस संदर्भ की उपेक्षा की है। इसका परिणाम यह निकला कि सामयिक यथार्थ उनकी पकड़ के बाहर चला गया। वे जिस समाज में रह रहे थे उससे ही कटते चले गए, जिस यथार्थ में जी रहे थे उसे देखने में असमर्थ रहे।
परवर्ती पूँजीवाद ने नए यथार्थ को संवाद या कम्युनिकेशन के बहाने बदला। इस क्रम में पुराने संवाद की समूची प्रक्रिया को ही अप्रासंगिक बना डाला। संवाद के बहाने आम जनता के जीवन में सीधे असर डाला। इसके लिए उपग्रह प्रणाली का इस्तेमाल किया। इसने जीवनशैली से लेकर आचार-व्यवहार, राजनीति, शिक्षा, धर्म, दर्शन आदि सभी क्षेत्रों को सीधे प्रभावित किया है। विकसित पूँजीवादी मुल्कों ने दुनिया के सारे कानून तोड़ते हुए सैटेलाइट कम्युनिकेशन को सारी दुनिया पर थोप दिया और इस अवैध कम्युनिकेशन के जरिए सारे संसार को नए सिरे से संगठित करने की कोशिशें तेज कर दीं। अमरीका ने अपनी तकनीकी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए कम्युनिकेशन के विश्व कानूनों की अवहेलना करते हुए इंटरनेट, सैटेलाइट, मोबाइल आदि की प्रचंड आँधी में सारी दुनिया को झोंक दिया। इस क्रम में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर संप्रभु राष्ट्रों की स्वतंत्र सरकारों तक सारी दुनिया को मजबूर किया गया कि वे आगे बढ़कर इंटरनेट परिवर्तन की प्रक्रिया का हिस्सा बनें, संचार क्रांति का हिस्सा बनें, अपने कानूनों को बदलें या बिना कानून बदले संचारक्रांति में शामिल हों। इंटरनेट और सैटेलाइट के तमाम कानून बाद में आए हैं उनका सामाजिक प्रयोग पहले हुआ है।
संचारक्रांति स्वाभाविक ढंग से नहीं आई है अपितु इसके पीछे बड़े पैमाने पर बहुराष्ट्रीय निगमों के हित काम करते रहे हैं। इंटरनेट और उपग्रहजनित कम्युनिकेशन का फैसला महज संचार का फैसला नहीं था अपितु यह समाज को नए सिरे से संगठित
करने का फैसला था। इस क्रम में पुराने सभी सामाजिक साँचों को तोड़ा गया, फलतः समाजवाद भी टूटा। इससे पूँजीवादी वर्चस्व के अबाधित विकास को सुनिश्चित बनाने में मदद मिली।
उल्लेखनीय है जिस समय गैट वार्ताएँ चल रही थीं और बौद्धिक संपदा और सांस्कृतिक मालों पर विश्ववार्ताएँ फेल हो गईं तो अचानक अमरीका ने उपग्रह संचार के जरिए इंटरनेट को सारी दुनिया पर थोप दिया और सीधे विभिन्न देशों की बौद्धिक संपदा, संगीत, मीडिया, संस्कृति आदि के कॉपीराइट के कानूनों को अप्रासंगिक बना दिया। सभी नागरिक अधिकारों और बौद्धिक संपदा कानूनों को सीधे बाजार की शक्तियों के हवाले कर दिया।
यह सच है कि संचार क्रांति ने बड़ी विलक्षण चीजें हमें दी हैं लेकिन इससे भी बड़ा सच है कि समूची बौद्धिक संपदा को निजी स्वामित्व के दायरे से निकालकर बाजार की शक्तियों खासकर बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों के हवाले कर दिया है। संचारक्रांति के जितने भी खिलौने, मसलन मोबाइल, आईपोड आदि हमारे हाथों में हैं, उनके द्वारा संचार कम और बौद्धिक संपदा के स्वामित्व का बड़े पैमाने पर अपहरण हुआ है। इससे राष्ट्रीय संपदा, संप्रभुता, सर्जकों-संस्कृतिकर्मियो और बुद्धिजीवियों को बड़ा नुकसान हुआ है। कालान्तर में विभिन्न देशों में इनके अधिकारों को संरक्षित करने के कानून बनाने की ओर ध्यान गया। लेकिन इस अवधि में सारी दुनिया की बौद्धिक संपदा की नेट कंपनियों ने खुली लूट की है।
कहने का तात्पर्य यह है कि आज माक्र्सवाद पर कोई भी बात संचार क्रांति के परिप्रेक्ष्य में ही संभव है। माक्र्सवाद को नए सिरे से परवर्ती पूँजीवाद के संदर्भ में पुनः पढ़ने और नई व्याख्याएँ तलाशने की जरूरत है। हमें पुरानी पढ़ने की पद्धति बदलनी होगी। पहले माक्र्स-एंगेल्स के उद्धरणों के जरिए बातें कहने की आदत थी, आज यह पद्धति बेकार हो गई है। हमें जानना होगा कि परवर्ती पूँजीवाद क्या है? माक्र्सवाद की कौन सी धारणाएँ आज भी प्रासंगिक हैं?
माक्र्सवाद के लिए अवधारणाओं में सोचना बेहद जरूरी है। परवर्ती पूँजीवाद अवधारणाओं का अवमूल्यन करता है। अवधारणाओं के अवमूल्यन से यथार्थ को समझने में असुविधा होती है । पूँजीवादी वर्चस्व को चुनौती देने के लिए माक्र्सवादी अवधारणाओं के व्यापक रूप में प्रयोग पर जोर दिया जाना चाहिए, अवधारणाओं को जनप्रिय बनाने के लिए सरल अर्थ की खोज की जानी चाहिए लेकिन अवधारणा का अवमूल्यन नहीं करना चाहिए। यहाँ हम सुविधा के लिए नव्य-आर्थिक उदारतावाद, माध्यम साम्राज्यवाद और पितृसत्ता की अवधारणा पर विचार करेंगे। ये तीनों धारणाएँ भारत के लिए बहुत महत्व की हैं।

नव्य-उदारतावाद-

नव्य-उदारतावाद का मूल लक्ष्य है सामुदायिक संरचनाओं का क्षय और बाजार के तर्क की प्रतिष्ठा। यह मूलतः वर्चस्ववादी विमर्श है। इसका लक्ष्य है श्रम का मूल्य घटाना, सरकारी खर्च घटाना, काम को और भी लोचदार बनाना। नव्य-उदारतावादी विमर्श, विमर्शों में से एक विमर्श नहीं है, बल्कि यह ‘‘ताकतवर का विमर्श’’ है। फलतः यह कठोर है, आक्रामक है, अपने साथ सारी दुनिया की ताकतों को एकीकृत कर लेना चाहता है। यह आर्थिक निर्णय और चयन को अपने अनुकूल ढाल रहा है। वर्चस्ववादी आर्थिक संबंधों को निर्मित कर रहा है। इसकी समस्त सैद्धांतिकी सामूहिकता की भूमिका को अस्वीकार करती है और वित्तीय संस्थानों के विनियमन पर जोर है। इसने व्यक्तिवादिता, व्यक्तिगत तनख्वाह और सुविधाओं को केन्द्र में ला खड़ा किया है। तनख्वाह का व्यक्तिकरण मूलतः सामूहिक तनख्वाह की विदाई की सूचना है। नव्य -उदारतावाद मूलतः बाजार के तर्क से चलने वाला दर्शन है। इसमें बाजार ही महान है। इसके लिए परिवार, राष्ट्र, मजदूर संगठन, पार्टी, क्षेत्र आदि किसी भी चीज का महत्व नहीं है, यदि किसी चीज का महत्व है तो वह है उपभोग का। उपभोग को बाजार के तर्क ने परमपद पर प्रतिष्ठित कर दिया है। नव्य उदारीकरण के दौर में संरचनात्मक हिंसाचार में इजाफा हुआ है। असुरक्षा बढ़ी है। मुक्तव्यापार, मुक्तमीडिया, अबाधित सूचना प्रवाह और कारपोरेट वर्चस्व इसके परम लक्ष्य हैं। नीति से लेकर मीडिया
प्रस्तुतियों तक व्यक्तिवादिता, प्रतिस्पर्धा और विशिष्टता इन तीन तत्वों का खास तौर पर ख़याल रखा जाता है।
नव्य-उदारतावाद ने सारी दुनिया में अमरीकी सभ्यता और समाज को पश्चिम के आदर्श मॉडल के रुप में पेश किया है। नव्य-उदारतावाद अथवा सामयिक ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया 1971 से आरंभ होती है। अमरीका के राष्ट्रपति निक्सन को इस प्रक्रिया को शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। राष्ट्रपति निक्सन ने इसी वर्ष ब्रिटॉन वुड सिस्टम की समाप्ति की घोषणा की थी, इसके बाद सन् 1973 में विश्व के बड़े देशों के नेता निश्चित विनिमय दर व्यवस्था के बजाय चंचल विनिमय दर व्यवस्था के बारे में एकमत हुए थे।
इसके बाद सन् 1974 में अमरीका ने अंतर्राष्ट्रीय पूँजी गतिविधि पर सभी किस्म की पाबंदियाँ हटा दीं। इसके बाद सन् 1989 में सोवियत संघ में समाजवादी व्यवस्था का अंत हुआ। बर्लिन की दीवार गिराई गई, जर्मनी को एकीकृत किया गया। इसके बाद नव्य-उदारतावाद की आँधी सारी दुनिया में चल निकली। इस आँधी का पहला पड़ाव था मध्यपूर्व का युद्ध, जिसने सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव छोड़े। तेल की कीमतों में अंधाधुंध वृद्धि हुई। मौजूदा ग्लोबलाइजेशन वित्तीय साम्राज्यवादी संस्थानों के दिशा-निर्देशों पर चल रहा है। इसमें अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों विश्वबैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि का वर्चस्व है।
पूँजी के अबाध आवागमन और सूचना तकनीक के अबाध प्रसार ने एकदम नए किस्म की दुनिया निर्मित की है, यह वह दुनिया है जिसने पुरानी औद्योगिक क्रांति के गर्भ से पैदा हुई दुनिया को बुनियादी तौर पर बदल दिया, औद्योगिक क्रांति और रैनेसां के गर्भ से पैदा हुए वैचारिक विमर्श और पैराडाइम को बदल दिया, यह सारा परिवर्तन इतनी तेज गति से हुआ है कि अभी तक हम सोच भी नहीं पाए हैं कि आखिरकार ग्लोबलाइजेशन किस तरह की दुनिया रच रहा है, मध्यवर्ग इसकी चमक में खो गया है, वहीं गरीब किसान और मजदूर अवाक् होकर देख रहे हैं।
आरंभ में नव्य-उदारतावाद को लोग समझ ही नहीं पाए किंतु धीरे-धीरे इसका जनविरोधी स्वरूप सामने आने लगा है और साधारण नागरिकों में इसके प्रति प्रतिवाद के स्वर फूटने लगे हैं। ग्लोबलाइजेशन की चमक और टी0वी0 चैनलों की आँधी ने सोचने के सभी उपकरणों को कुंद कर दिया है, कुछ क्षण के लिए यदि कोई आलोचनात्मक विचार आता भी है तो अगले ही क्षण उसके प्रति अनास्था पैदा हो जाती है। ग्लोबलाइजेशन ने मानव मस्तिष्क को संशय और अविश्वास से भर दिया है। अब हमें किसी पर विश्वास नहीं रहा, सारे नियम और कानून बार-बार हमें यही संकेत दे रहे हैं कि अपने पड़ोसी पर नजर रखो, उस पर विश्वास मत करो। आपके पास जो बैठा है उससे दूर रहो, उससे संपर्क, संवाद, खान-पान मत करो। विश्वास और आस्था से भरी दुनिया में संशय और अविश्वास की आँधी इस कदर चल निकली है कि अब प्रत्येक देश में प्रत्येक व्यक्ति पर नजर रखी जा रही है। प्रत्येक देश की मुद्रा का मूल्य घटा है।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी

1 टिप्पणी:

Girish Mishra ने कहा…

My book on Nav-Udarvad is ready to be released by Granth Shilpi. This is the second book in a series planned. The first Bazaar--Ateet and Vartman was released last year. The third will be on Upbhoktavad which will be submitted to the publisher after the second one is released. I expect friends to read the book on neoliberalism and give their comments.