मार्क्सवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मार्क्सवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 12 मई 2017

मार्क्सवाद विरोध नस्लवाद हैं



      दलितों, गरीबों और मजदूरों को दुःख से निवृत होने के लिए अनन्तः अपनाना ही पड़ेगा। बौद्ध धर्म भी एक धर्म है। एक समय अद्वितीय प्रगतिशील होने के उपरांत आज वह भी अन्य धर्मों की ही तरह कर्मकांडों में फंस गया है। जो लोग यह कहते हैं कि बौद्ध धर्म भारतीय परिवेश से निकला हुआ हिन्दू धर्म का ही अंग है, वे सही कहते हैं। धर्मों में ईश्वर की विचारधारा गरीबों का अवलम्बन होते हुए भी एक भ्रम है। धर्म झगड़े की जड़ है। पूजा प्रार्थनाएं मनुष्य के मनोबल को संतुलित रखती है लेकिन उससे अधिक वह साम्प्रदायिकता बढ़ाकर मनुष्य को दुःख पहुँचाती रहती है। मैं अपनी सारी बात गलत मान लूँ तो क्या विकल्प है कि पूँजीवादी-व्यवस्था ख़त्म हो जाय? एक बात तो आप को समझना ही चाहिए कि निजीकरण के बजाय राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। एक व्यक्ति के हाथों में अरबों-खरबों की पूँजी निरर्थक पड़ी रहती है और दूसरी तरफ लोग भूंखों मरते हैं। क्या आप को नहीं लगता है यदि पूँजी का अकाधिकारीकरण न हो तो पूरी दुनिया अमन-चैन से रह सकती है। समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के लिए क्या हमें कुछ करना चाहिए? क्या सब को शिक्षा और सब को काम के लिए सामूहिक आंदोलन होना चाहिए? कोई विकल्प सोचिए।
      मैं सिर्फ दलितों की गरीबी और अशिक्षा के सवाल को ही नहीं देखता हूँ। मैं दलितवादी या आम्बेडकरवादी भी नहीं हूँ।  मुझे दलित खेमें का व्यक्ति न समझें। मैं हर जातियों-धर्मों के गरीबों-मजलूमों की धारा का व्यक्ति हूँ। सभी से तर्क प्रस्तुत करते हुए मार्क्सवाद की वकालत करता हूँ। सिर्फ दलितों के लिए शिक्षा की बात की जाय तो क्या संभव है शिक्षा पूरी हो जाएगी? बिना व्यवस्था परिवर्तित हुए, बिना समाजवादी संविधान लागू किए, किसी भी जाति, व्यक्ति व समूह को दुखों से छुटकारा नहीं मिलेगा। आप को चिंतित होना चाहिए कि परम्परावादी सवर्ण और इसके अनुसांगिक संगठन तथा दलितों के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संगठन दोनों मार्क्सवाद विरोधी हैं। मुझे नहीं पता कि कौन सा डीएनए का अंश इनके बीच में समरूप है। परम्परावादी सवर्ण ईश्वर को मानता है, हिन्दू धर्म को मानता है, वर्ण को मानता है, जाति को मानता है,  जातिप्रथा को तोड़ना नहीं चाहता है। हाँ, भोज में छुआछूत नहीं करता है। उठने-बैठने में भिन्नता नहीं करता है। समता की बात नहीं समरसता की बात करता है। समरसता समता का विपरीतार्थी अर्थ है। उसके लोग शादी-ब्याह जाति, कुल, गोत्र, राशि और कुंडली विचार-देखकर ही करते हैं। कम्युनिस्ट व आंबेडकरवादी पूरी जाति-व्यवस्था को ही नष्ट करना चाहते हैं। यहां पर हम-आप दो राष्ट्र के रूप में हैं। हमारे विचार आप के विचार के हमेशा विपरितार्थी ही लगेंगे। ठीक इसका उल्टा भी। यहां हम दो विचारधाराओं के व्यक्ति हैं। फिर विचारों में संतुलन का होना नामुमकिन है।
      मैं सवर्णों को साथ लेने की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि गरीब और प्रगतिशील सवर्णों को वर्गीय एकता के लिए साथ लेना चाहता हूँ और उन्हें बताता रहता हूँ कि तुम्हारे जाति के सम्भ्रांत लोग तुम्हारे लिए कभी नहीं लड़ेंगे, तुम्हारे शिक्षा और रोजगार के लिए कुछ उपाय नहीं करेंगे। सिर्फ जाति के नाम पर, मंदिर के नाम पर और हिंदुत्व के नाम पर तुम्हारा शोषण करेंगे। वर्ग की चेतना ही दलित और सवर्ण व अन्य धर्मों के गरीबों का कल्याण कर सकता है।
      जाति ही तो अमीर सवर्णों के सम्मान से जीने का आधार है लेकिन वर्ग-संघर्ष के बाद जो व्यवस्था हासिल होगी, वहां सभी जातियां और धर्म के लोग खुशहाल और सम्मान पूर्वक जिएंगे, कोई किसी का शोषण नहीं कर पाएंगे। एक दिन क्रान्ति होगी ही। हो सकता है मेरी पीढ़ी न कर पाए लेकिन सत्य हमेशा विजई होता है। यह मानवता का सबसे सुन्दर सिद्धांत है। यह अलगाववादी नहीं है। इसमें ऊँच और नीच का फर्क मिट जाएगा। यह छुआछूत नहीं करेगा। यह कामचोरों से भी काम करवाएगा। यह हराम का किसी को नहीं खाने देगा। यह व्यवस्था निजी हाथों से सब कुछ छीनकर राष्ट्रीयकरण कर देगा। अब निजीकरण में आराम और मौजमस्ती से जीने वालों को तो कष्ट होगा ही क्योंकि उन्हें भी बराबर की मेहनत करना पड़ेगी।
     कुछ लोग अच्छे हैं किन्तु वैचारिक रूप से भिन्न विचारधारा उनको गरीबों के पक्ष में क्रान्ति नहीं सहानुभूति का दृष्टिकोण देता है और आप जैसे विद्वान और ईमानदार साथियों को भी यही लगता है कि क्राँति एक स्वप्न है, ऐसा नहीं हो सकता है। वैज्ञानिक समाजवाद के लिए एंगेल्स की पुस्तक "From utopian to scientific communism" जरूर पढ़ डालें। मैं यह आग्रह नहीं पालता की आप कम्युनिस्ट हो जाएंगे लेकिन सत्य आप को कचोटेगा जरूर।
     बिना दलित के क्रांतिकारी हुए,बिना दलितों के मार्क्सवादी हुए, बिना दलितों के नेता हुए इस देश में क्रान्ति नहीं हो सकती है। जब तक सही मायने में दलित क्रांतिकारी नहीं होंगे, न ब्रह्मणवाद ख़त्म होगा न पूँजीवाद। अगर मेरी बात से सहमत हों और बाबा साहब के बातों से इत्तिफ़ाक बने, तो भी और न बने तो भी, आप अपनी राय बनाएं कि ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद कैसे ख़त्म हो? हम लोग क्या करें? मैं लेख लिखता रहता हूँ। कोई सही कहता है कोई गलत। सभी अपने -अपने विचार रखते हैं। पिछले लेख पर लोगों ने बहुत विमर्श किया। कई लोग मेरी विचारधारा से सहमत नहीं हैं, फिर भी बहस तो हो रही है। लोग अपने विचार को लेकर चैतन्य तो हैं इसलिए ऊर्जा बेकार नहीं है। माना कुछ न लिखूं,  कुछ न पढूं, तो खाकर सोने का क्या मतलब? ऐसे में आप लोगों का प्रेम, गुस्सा और विचारधारा का फायदा तो देखने को मिल रहा है। कई बार इससे भी ख़ुशी मिलती है कि मेरे भाइयों में तर्क-वितर्क और लड़ने का माद्दा तो पैदा हो रहा है। आप चूंकि मेरा लेख पढ़ रहे हैं इसलिए आप से निवेदन है कि इससे पूर्व मेरा लेख "डा.आम्बेडकर का अवतारीकरण" पढ़ डालें। उस पर बहुत लोगों ने अच्छा-बुरा दोनों कमेंट्स किया है। कुछ साथी आरएसएस के भी हैं और आरएसएस को अच्छा कहते हुए बाबा साहब को अनुचित खाते में डाल रहे हैं। जो मुझसे नहीं बन पा रहा है आप लिखकर मेरे अध्याय को पूरा करें। मेरी आलोचनाओं के साथ-साथ उन  बिंदुओं को भी दिखाइए, जिससे दलित समाज का फायदा हो और अर्थशास्त्र का सत्य भी उद्घाटित हो। सिर्फ मुझ से चिढ़ने या चिढ़ाने से हमारा-आप का-दलित समाज का-गरीबों का मकसद तो पूरा नहीं होगा। उम्मीद है आप मेरी विनम्रता का मतलब समझ रहे होंगे। मैं समाज को दिशा देने के लिए लिखता हूँ, बड़े होने के लिए नहीं। कोई भी लेखक अपने नाम के लिए नहीं लिखता है। उसको यह समझ में आता है कि यह समाज की जरूरत है। एक निवेदन और कि आप जब भी आलोचना करिए तो बाबा साहब के शब्दों को रखिए जिससे मुझे भी तथा समाज को भी उसके सापेक्ष विचार प्राप्त हो।
      मजदूर विभिन्न जातियों में विभक्त है। मजदूरों-गरीबों को उनके जातियों के मोहपाश से मुक्त कराना होगा। भारत का ऐतिहासिक भौतिकवाद जातियों के मध्य से होकर गुजरता है। हर जातियों के मध्य अंतर्द्वंद है और एक जाति का दूसरी जाति के साथ अंतर्द्वंद्व है। भारत का ब्राह्मणवाद असमानता, छुआछूत और ऊँच-नीच की भावना पर आधारित हैं। जब आप फेसबुक को देखते हैं, वहाँ "आम्बेडकर का अवतरीकरण" पर आए कमेंट्स को पढ़ते हैं और देखते हैं कि जातियों की भावना कैसी विषाक्त होती है। दलित गरीब है लेकिन मार्क्सवाद से क्यों नहीं जुड़ना चाहता है? मेरे लेखों का विरोध करने वाला अधिकतर दलित ही है या फिर विशुद्ध ब्राह्मणवादी सवर्ण, ऐसा क्यों है?
     इस बार हिंदुत्व के नाम पर बीजेपी जीत गई। अब तो जातियों को भी धर्म के तरफ मोड़ा जा रहा है। हिंदुत्व को इस्लाम के विरुद्ध खड़ा किया जा रहा है तथा दलितों को हिंदुत्व के झंडे के नीचे लाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। हैं तो सभी गरीब, लेकिन गरीबों को भी जाति और धर्म का नशा है। ये गरीब भी इस्लाम के विरुद्ध क्रियाशील हैं और कहीं-कहीं तो दलितों के विरुद्ध मुसलमान भी हैं। सारी कम्युनिस्ट पार्टियाँ मिलकर भी वर्ग-संघर्ष के लिए वर्गीय एकता बनाने में क्यों फेल हो रही हैं? आप को पता होना चाहिए कि दलित और परम्परावादी सवर्ण दोनों मार्क्सवाद का घोर विरोध भी करते हैं। कहा तो जाता है कि ब्राह्मण और दलित जातियां एक दूसरे के विरुद्ध हैं किंन्तु कौन सा ऐसा कामन फैक्टर है जो दोनों को मार्क्सवाद विरोध के लिए एक कर देता है? मुझे जहाँ तक ज्ञात है कि दोनों नस्लवादी हैं।
     दलित आम्बेडकर के जातिप्रथा उन्मूलन से इत्तिफ़ाक नहीं रखता है। वह जाति को मजबूत कर सत्ता प्राप्त करने में विश्वास रखने लगा है। ब्राह्मण अपने सुपेर्मेसी को त्यागना नहीं चाहता है। कम्युनिस्ट पार्टियों में ब्राह्मण सर्वहारा संस्कृति से आज भी महरूम है। खुद के बाद घर की दूसरी पीढ़ी कम्युनिस्ट नहीं हो पाई, क्या कारण है? जो हैं वो बहुत ही रेयर हैं,  इसलिए आम्बेडकर और दलितों के मध्य जाति के सवाल से टकराते हुए मार्क्सवाद के वास्तविक समझ को इनके बीच ले जाना होगा।
     बहुत साथियों की कोशिश तो यही रहती है किन्तु कुछ गैर विचारधारा के लोग प्रहार करके उलझाते रहते हैं। हम भी उनको जवाब देने के चक्कर में यह भूल जाते हैं कि इन पर हमें उतना ध्यान नहीं देना चाहिए जितना आवश्यक विचारों पर। इन्हें न आम्बेडकर साहब का ज्ञान है न मार्क्सवाद का और न ही ये साथी यह समझ पा रहे हैं कि दलितों के मध्य किन विषयों पर चर्चा की जानी चाहिए। वे आम्बेडकर के पक्ष में तर्क को भी गलत ठहराने की कोशिश करते हैं और मार्क्सवादी दृष्टिकोण को भी गलत साबित करते हैं। वे अपना दृष्टिकोण न आम्बेडकर साहब के विचारों पर स्पष्ट कर पाते हैं न मार्क्स पर। जो मैं लिख रहा हूँ वह तुरंत न दलितों को ग्राह्य है और न सवर्णों को ही। इस लिहाज से यह एक कठिन विषय पर व्यवहारिक लेख चल रहा है। जो साथी वर्तमान की आवश्यकता को नहीं समझेगा तथा डा.आम्बेडकर के सपनों, विचारों, दर्शन और सहयोगी की भूमिका को नहीं समझेगा तो वह गलती कर रहा होगा। आज दलितों का गलती करना कम से कम 100 साल पीछे चले जाना है।
     जब हम "जय भीम" कहते हैं तो उसका मतलब होता है "जातिप्रथा उन्मूलन" और जब "लाल सलाम"  कहते हैं तो उसका मतलब होता है "सम्पूर्ण क्रान्ति"। जब लाल सलाम का मतलब सम्पूर्ण क्रान्ति होता है तो प्रश्न उठता है कि जातिप्रथा उन्मूलन उसी में समाहित है फिर जय भीम की क्या आवश्यकता है? दरसल, जय भीम शब्द दलित से भावनात्मक रूप से जुड़ा शब्द है और जय भीम उसके लिए क्रान्ति का ही प्रयाय हैं। यदि दलित की भावनाओं को क्रान्ति के साथ नहीं जोड़ा गया तो वह भावनात्मक रूप से क्रान्ति से अलग रहेगा जबकि क्रान्ति दलितों के आर्थिक और मनोवैज्ञानिक शोषण के विरुद्ध अत्याधिक आवश्यक अवधारणा है। यदि दलित क्रान्ति को भावनात्मक जुड़ाव के कारण छोड़ दे तो मूल रूप से दलित वर्ग का ही नुकसान होता है इसलिए जय भीम के साथ लाल सलाम को जोड़ देने की आवश्यकता गंभीर रूप से महसूस किया गया है। इस शब्द से हमारे परम्परावादी-नस्लवादी दलित साथियों को भी परहेज है, और आरएसएस के लोगों को अत्यधिक क्रोध आ रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि "जय भीम और लाल सलाम" करने से दलित और अन्य जातियों के सर्वहारा वर्ग के आपस में संगठित हो जाने का खतरा उनको दिखता है।
      यदि ऐसा मुमकिन हो गया तो नस्लवादी कमजोर हो जाएंगे। इनके चालाक लोग यह नहीं चाहते हैं कि आम्बेडकर और मार्क्स एक स्थान पर खड़े हों। कुछ दलित साथी भी विरोध करते हैं किन्तु वे चालाकी वश नहीं करते हैं, बल्कि उनके अंदर यह भावना काम करती है कि कहीं मार्क्सवाद के आड़ में कोई हमारे साथ छल न कर ले, किन्तु यह साथियो का डर उन्हें नस्लवाद की तरफ ही ले जाता है जो देर-सबेर नस्लवाद की ही झोली में गिरता है। नस्लवाद की जीत दलितों,गरीबों,  मजदूरों और किसानों के हित में कभी भी नहीं होगा।
-आर डी आनंद

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

सन् 1917 की अक्टूबर क्रांति के मौके पर - साधारण मनुष्य की महानता का महाख्यान

मैं निजी तौर पर जिस उमंग,उत्साह और वैचारिक गर्मजोशी के साथ दीपावली मनाता हूँ, दुर्गापूजा के सार्वजनिक समारोहों में शामिल होता हूँ। ठीक उसी उत्साह और उमंग के साथ मार्क्सवादियों और उदारमना लोगों के राजनीतिक -साहित्यिक जलसों में भी शामिल होता हूँ। मेरे अंदर जितना उत्साह होली को लेकर रहता है वही उत्साह 7 नबम्वर 1917 की अक्टूबर क्रांति को लेकर भी है।
     आनंद और क्रांति के बीच,मनोरंजन और क्रांति के बीच,जीवंतता और क्रांति के बीच गहरा संबंध है। आप जितने जीवंत होंगे।बृहत्तर सामाजिक सरोकारों में जितना व्यापक शिरकत करेंगे। उतना ही ज्यादा क्रांतिकारी परिवर्तनों को मदद करेंगे। जीवन में जितना रस लेंगे,आनंद लेंगे,आराम करेंगे उतने ही क्रांति के करीब होंगे।
     समाजवादी विचारों और सामाजिक क्रांति से हमारी दूरी बढ़ने का प्रधान कारण है सामाजिक जीवन और निजी जीवन से आनंद और सामाजिकता का उठ जाना। हम अब प्रायोजित आनंद में घिर गए हैं। स्वाभाविक आनंद को हम भूल ही गए हैं कि कैसे स्वाभाविक ढ़ंग से आनंद और रस की सृष्टि की जाए। जीवन का नशा गायब हो गया है। जीवन में जो स्वाभाविक नशा है उसकी जगह हर मेले ठेले में दारू की बोतल आ गयी है। बिना बोतल के हमारे समाज में लोगों को नशा ही नहीं आता,आनंद के लिए उन्हें नशे की बोतल की जरूरत पड़ती है।
    आनंद ,उत्सव, उमंग और जीवतंता के लिए दारू की बोतल का आना इस बात का संकेत है कि हमने प्रायोजित आनंद के सामने घुटने टेक दिए हैं। हमें देखना चाहिए विगत 60 सालों में भारत में दारू की खपत बढ़ी है या घटी है ? आंकड़े यही बताते हैं कि दारू की खपत बढ़ी है। इसका अर्थ है जीवन में स्वाभाविक आनंद घटा है। स्वाभाविक आनंद की बजाय प्रायोजित आनंद के सामने हमारा समर्पण इस बात का भी संकेत है कि हमें जश्न मनाने की तरकीब नहीं आती।
     हमने जन्म तो लिया लेकिन खुशी और आनंद का पाठ नहीं पढ़ा। आनंद से कैसे रहे हैं। इसके लिए वैद्य,हकीम,योगी,बाबा,नेता आदि के उपदेशों या उसके योग शिविरों में जाने की जरूरत नहीं है। हमारी आसपास की जिन्दगी और बृहत्तर सामाजिक दुनिया के प्यार में आनंद छिपा है।
    जीवन में आनंद का ह्रास तब होता है जब स्वयं से प्यार करना बंद कर देते हैं,दूसरों से प्यार करना बंद कर देते,स्वार्थवश प्यार करने  लगते हैं। मुझे सोवियत क्रांति इसलिए अच्छी लगती है कि उसने पहलीबार सारी दुनिया को वास्तव अर्थों में प्यार करने का पाठ पढ़ाया। सोवियतों के साथ प्यार करना सिखाया। मजदूरों -किसानों को महान बनाया ।शासक बनाया।
    सोवियत अक्टूबर क्रांति इसलिए अच्छी लगती है कि मानव सभ्यता के इतिहास में पहलीबार शासन अपने सिंहासन से उतरकर गरीब के घर पहुँचा था। गरीबों को उसने जीवन की वे तमाम चीजें दीं जिनका मानव सभ्यता सैंकड़ों सालों से इतजार कर रही थी।
   सारी दुनिया में एक से बढ़कर एक शासक हुए हैं। बड़े यशस्वी और प्रतापी राजा हुए हैं, बड़े दानी राजा हुए हैं। लेकिन सोवियत क्रांति के बाद जिस तरह की शासन व्यवस्था का उदय हुआ और सोवियतों के काम ने सोवियत संघ और सारी दुनिया को बगैर किसी युद्ध,दबाब और दहशत के जिस तरह प्रभावित किया वैसा इतिहास में देखने को नहीं मिलता।
    आज हमारे पास इंटरनेट है, सैटेलाइट टीवी है, रेडियो है, प्रेस है, हवाई जहाज हैं, दुनिया की शानदार उपभोक्ता वस्तुओं का संसार है। खाते पीते घरों में वस्तुओं का ढ़ेर लगा है। हम किसी भी चीज को आसानी से पा सकते हैं। बैंकों का समूह कर्ज देने के लिए हमारे दरवाजे पर खड़ा है। विचारों,सामाजिक सरोकारों और सामाजिक जिम्मेदारी के पैराडाइम से निकलकर हम वस्तुओं और भोग के महासमुद्र में डूबते-उतराते रहते हैं। आए दिन नामी-गिरामी लोगों को टीवी और मीडिया में देखते रहते हैं,उनके विचार सुनते रहते हैं, लेकिन हमें याद नहीं है कि इन नामी-गिरामी लोगों के विचारों का सारी दुनिया या भारतवर्ष पर कितना असर हो रहा है। आज मीडिया है उनके जयकारे हैं, वे मीडिया के भोंपू हैं ,और सुंदर-सुंदर एंकर से लेकर हीरोइनें हैं जिनके पासएक भी सहेजने लायक विचार नहीं है। ये लोग सबके मिलकर उपभोग का वातावरण बना रहे हैं। जिस व्यक्ति को हम मीडिया में रोज देखते और सुनते हैं उसके विचारों का कोई असर नहीं हो रहा।
   इसके विपरीत अक्टूबर क्रांति के समय न तो टीवी था, न रेडियो था, और न कोई खास प्रचार सामग्री थी वितरित करने लिए। इसके बावजूद सोवियत संघ और उसके बाहर सारी दुनिया में क्रांति के विचार की चिंगारी कैसे फैल गयी ?
     आज जो लोग हिन्दुत्व की हिमायत कर रहे हैं और मार्क्सवाद पर हमले कर रहे हैं, वे जरा जबाब दें कि हिन्दुत्व का विचार आधुनिक प्रचार माध्यमों के जोर जोर से नगाड़े बजाने के बाबजूद भारत में मात्र 20-22 प्रतिशत लोगों को प्रभावित कर पाया है। भारत में कम्युनिस्ट संख्या में कम हैं,उनके पास बड़े संसाधन नहीं हैं। मैनस्ट्रीम मीडिया आए दिन उन पर हमले करता रहता है। इसके बाबजूद सामाजिक और राजनीतिक जीवन में कम्युनिस्टों का प्रभाव बहुत ज्यादा है। कम्युनिस्टों की राजनीतिक साख है। समाजवाद की प्रतिष्ठा है। उनका दल छोटा है। महत्व बड़ा है।
      अक्टूबर क्रांति ने समाजवाद के विचार को महान बनाया। बगैर मीडिया समर्थन के समाजवाद के विचार को एकही झटके में सारी दुनिया में संप्रेषित कर दिया। दूसरा महान कार्य यह किया कि पहलीबार सारी दुनिया को यह विश्वास दिलाया कि वंचित लोग,शोषित लोग शासन में आ सकते हैं। 
   सोवियत क्रांति के पहले यही मिथ था कि सत्ता हमेशा ताकतवर लोगों के हाथ में रहेगी चाहे जैसी भी शासन व्यवस्था आए। तीसरा संदेश यह था शासकों और जनता में बगैर किसी भेदभाव और असमानता के जी सकते हैं। शासकों और जनता के बीच के महा-अंतराल को अक्टूबर क्रांति ने धराशायी कर दिया था।
       सात नबम्बर 1917 को सोवियत संघ में दुनिया की पहली समाजवादी क्रांति हुई। यह सामान्य सत्ता परिवर्तन नहीं था। यह महज एक देश का राजनीतिक मसला भी नहीं था। लेनिन,स्टालिन आदि मात्र एक देश के नेताभर नहीं थे। आज जिस तरह का घटिया प्रचार क्रांतिविरोधी ,समाजवाद विरोधी ताकतें और कारपोरेट मीडिया कर रहा है उसे देखकर यही लगता है कि अक्टूबर क्रांति कोई खूंखार और बर्बर सत्ता परिवर्तन था। एक शासक की जगह दूसरे शासक का सत्ता संभालना था। जी नहीं।
    अक्टूबर क्रांति विश्व मानवता के इतिहास की विरल और मूलगामी सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों को जन्म देनी वाली विश्व की महान घटना थी। कहने के लिए अक्टूबर क्रांति सोवियत संघ में हुई थी लेकिन इसने सारी दुनिया को प्रभावित किया था। हमें गंभीरता के साथ इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि ऐसा क्या हुआ इस क्रांति के साथ जिसने सारी दुनिया का राजनीतिक पैराडाइम ही बदल दिया।
   सारी दुनिया में सत्ताओं का परिवर्तन अमीरों के लिए खुशहाली लेकर आता रहा है,खजानों से शासकों के ऐशो आराम की चीजें खरीदी गयी हैं। लेकिन सोवियत संघ में एकदम विलक्षण मिसाल कायम की गई। ऐसी मिसाल मानव सभ्यता के इतिहास में नहीं मिलती। सोवियत खजाने से पहला भुगतान एक सामान्य घोड़े वाले को किया गया। 
संक्षेप में वाकया कुछ इस प्रकार है- फरवरी क्रांति के ठीक पहले 1917 में जार के जमाने में एक बूढ़े घोडेवाले के घोड़ों को युद्ध के कामों के लिए जारशासन ने जबर्दस्ती ले लिया था। उसे घोड़ों की अच्छी कीमत का वायदा किया गया था ,लेकिन समय बीतता गया और उस बूढ़े को अपने घोड़ों के पैसों का भुगतान नहीं हुआ। वह बूढ़ा पैत्रोग्राद आया और उसने अस्थायी सरकार के सभी दफ्तरों में चक्कर काटे। दफ्तर के बाबू उसे एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस में टरकाते रहे , वह बेहद परेशान हो गया था। उसका सारा पैसा और धैर्य खत्म हो गया था। जार का शासन धराशायी हो गया लेकिन उसका कोई पैसा देने वाला नहीं था। इसी भागदौड़ में उस बूढ़े को किसी ने बताया कि तुम बोल्शेविकों से मिलो वे मजदूरों और किसानों की वे सारी चीजें लौटा रहे हैं जो जार के जमाने में जमीदारों और जार शासन ने छीन ली थीं। किसी ने यह भी कहा कि उसके लिए उसे सिर्फ लेनिन की एक चिट्ठी की जरूरत है। वह बूढ़ा किसी तरह लेनिन के पास पहुँच गया और सुबह होने के पहले ही उसने लेनिन को जगा दिया और उनसे चिट्ठी लेने में सफल हो गया। और सीधे वह चिट्ठी लेकर अलेक्सान्द्रा कोल्लोन्ताई के घर पर जा पहुँचा। दरवाजे पर पहुँचते ही उसने घंटी बजायी। कोल्लोन्ताई ने दरवाजा खोला और पूछा किससे मिलना है तो उसने कहा मुझे कोल्लोन्ताई से मिलना है, मैं उनके सबसे बड़े बोल्शेविक लेनिन की चिट्ठी देना चाहता हूँ। कोल्लान्ताई ने उसके हाथ चिट्टी लेकर देखी तो पाया कि वह सचमुच में लेनिन का पत्र था।  लिखा था- ‘‘ उसके घोड़े की कीमत का भुगतान सामाजिक सुरक्षा कोष से कर दीजिए।’’ कोल्लान्ताई ने उस बूढ़े से कहा चिट्ठी दे दो। उसने कहा ‘‘ पैसा मिल जाने पर ही मैं आपको यह चिट्टी दूंगा। तब तक मैं इसे अपने पास ही रखूंगा।’‘
   उल्लेखनीय है यह लेनिन की पहला सरकारी आदेश था। लेकिन उस समय मंत्रालयों में भयानक अराजकता छायी हुई थी,नौकरशाही असहयोग कर रही थी। खजाने में हंगामा और अराजकता का माहौल था। बोल्शेविकों का अभी तक सभी मंत्रालयों पर कब्जा हुआ नहीं हुआ था। उस समय कम्युनिस्टों के सामने समस्या थी कि मंत्रालयों पर जोर-जबर्दस्ती कब्जा करें या प्यार से ? नौकरशाही परेशान थी कि कम्युनिस्टों के शासन में उन सबकी नौकरियां चली जाएंगी। लेकिन लेनिन ने आदेश निकाला कि जो जहां जिस पद पर काम कर रहा है वह वहीं पर काम करता रहेगा। इससे मामला थोड़ा शांत हुआ लेकिन खजाने में अभी भी अशांति और अराजकता बनी हुई थी। खजाने के कर्मचारी, टाइपिस्ट, क्लर्क आदि खजाने का सामान लेकर भागे जा रहे थे,कोल्लान्ताई अपने साथ कुछ मजदूरों और तकनीकी जानकारों की एक टोली लेकर खजाने पर पहुँची और देखा कि लोग सामान लेकर भाग रहे हैं। खजाने की चाभियां नहीं मिल नहीं थीं, वे कहीं छिपा दी गयी थीं अथवा कोई उन्हें लेकर चला गया था,कुछ भी पता नहीं चल रहा था। अराजकता का आलम यह था कि बैंक के सारे कागज कर्मचारियों ने नष्ट कर दिए थे, बैंक के बाहर भीड़ लगी थी। यह भी परेशानी थी कि खजाने के ताले लगे रहेंगे तो अन्य विभागों का पैसे के बिना काम कैसे चलेगा। वह घोड़े वाला किसान कई दिन से लेनिन की चिट्ठी लिए घूम रहा था अपना भुगतान पाने के लिए वह रोज सुबह ही आ जाया करता था कि मेरा भुगतान कब होगा। दो दिनबाद तिजोरियों की कुंजियां हाथ लगीं और जब खजाना खुला तो उससे समाजवादी क्रांतिकारी शासन के द्वारा पहला भुगतान उस घोड़ों के मालिक बूढ़े किसान को किया गया। इस पहले भुगतान ने मानव सभ्यता के नए इतिहास का आरंभ किया। साधारण आदमी को महान बनाया और  सत्ता को उसका सच्चे अर्थ में सेवक बनाया।
------- जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

शनिवार, 14 जनवरी 2012

मार्क्सवाद और नई चुनौतियाँ-1

इंटरनेट आने के बाद पुरानी चीजें और पुराने विचार नवीकरण कर रहे हैं नए सिरे से समाज, सत्ता और सामाजिक संरचनाओं को परिभाषित किया जा रहा है। स्वचालितीकरण, उपग्रह, इंटरनेट और कम्प्युटर इस युग की चालकशक्ति हैं। भारत में भविष्य का सारा संचार, राजनीति, व्यापार, शिक्षा, न्याय, मित्रता, शत्रुता आदि का कम्युनिकेशन इन तीनों के माध्यम से ही होगा। एक जमाना था सारी दुनिया ने माक्र्सवाद को औद्योगिक क्रांति और प्रेस क्रांति के संदर्भ में पढ़ा और लागू किया। लेकिन पूँजीवाद ने परवर्ती पूँजीवाद के नाम से नए इंजन के रूप में स्वचालितीकरण, सैटेलाइट, इंटरनेट और कम्प्युटर के माध्यम से सारी दुनिया को नए सिरे से संगठित होने के लिए मजबूर किया है। माक्र्सवादी विचारकों और पूर्व-समाजवादी समाजों के नायकों और कम्युनिस्ट पार्टियों ने इस संदर्भ की उपेक्षा की है। इसका परिणाम यह निकला कि सामयिक यथार्थ उनकी पकड़ के बाहर चला गया। वे जिस समाज में रह रहे थे उससे ही कटते चले गए, जिस यथार्थ में जी रहे थे उसे देखने में असमर्थ रहे।
परवर्ती पूँजीवाद ने नए यथार्थ को संवाद या कम्युनिकेशन के बहाने बदला। इस क्रम में पुराने संवाद की समूची प्रक्रिया को ही अप्रासंगिक बना डाला। संवाद के बहाने आम जनता के जीवन में सीधे असर डाला। इसके लिए उपग्रह प्रणाली का इस्तेमाल किया। इसने जीवनशैली से लेकर आचार-व्यवहार, राजनीति, शिक्षा, धर्म, दर्शन आदि सभी क्षेत्रों को सीधे प्रभावित किया है। विकसित पूँजीवादी मुल्कों ने दुनिया के सारे कानून तोड़ते हुए सैटेलाइट कम्युनिकेशन को सारी दुनिया पर थोप दिया और इस अवैध कम्युनिकेशन के जरिए सारे संसार को नए सिरे से संगठित करने की कोशिशें तेज कर दीं। अमरीका ने अपनी तकनीकी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए कम्युनिकेशन के विश्व कानूनों की अवहेलना करते हुए इंटरनेट, सैटेलाइट, मोबाइल आदि की प्रचंड आँधी में सारी दुनिया को झोंक दिया। इस क्रम में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर संप्रभु राष्ट्रों की स्वतंत्र सरकारों तक सारी दुनिया को मजबूर किया गया कि वे आगे बढ़कर इंटरनेट परिवर्तन की प्रक्रिया का हिस्सा बनें, संचार क्रांति का हिस्सा बनें, अपने कानूनों को बदलें या बिना कानून बदले संचारक्रांति में शामिल हों। इंटरनेट और सैटेलाइट के तमाम कानून बाद में आए हैं उनका सामाजिक प्रयोग पहले हुआ है।
संचारक्रांति स्वाभाविक ढंग से नहीं आई है अपितु इसके पीछे बड़े पैमाने पर बहुराष्ट्रीय निगमों के हित काम करते रहे हैं। इंटरनेट और उपग्रहजनित कम्युनिकेशन का फैसला महज संचार का फैसला नहीं था अपितु यह समाज को नए सिरे से संगठित
करने का फैसला था। इस क्रम में पुराने सभी सामाजिक साँचों को तोड़ा गया, फलतः समाजवाद भी टूटा। इससे पूँजीवादी वर्चस्व के अबाधित विकास को सुनिश्चित बनाने में मदद मिली।
उल्लेखनीय है जिस समय गैट वार्ताएँ चल रही थीं और बौद्धिक संपदा और सांस्कृतिक मालों पर विश्ववार्ताएँ फेल हो गईं तो अचानक अमरीका ने उपग्रह संचार के जरिए इंटरनेट को सारी दुनिया पर थोप दिया और सीधे विभिन्न देशों की बौद्धिक संपदा, संगीत, मीडिया, संस्कृति आदि के कॉपीराइट के कानूनों को अप्रासंगिक बना दिया। सभी नागरिक अधिकारों और बौद्धिक संपदा कानूनों को सीधे बाजार की शक्तियों के हवाले कर दिया।
यह सच है कि संचार क्रांति ने बड़ी विलक्षण चीजें हमें दी हैं लेकिन इससे भी बड़ा सच है कि समूची बौद्धिक संपदा को निजी स्वामित्व के दायरे से निकालकर बाजार की शक्तियों खासकर बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों के हवाले कर दिया है। संचारक्रांति के जितने भी खिलौने, मसलन मोबाइल, आईपोड आदि हमारे हाथों में हैं, उनके द्वारा संचार कम और बौद्धिक संपदा के स्वामित्व का बड़े पैमाने पर अपहरण हुआ है। इससे राष्ट्रीय संपदा, संप्रभुता, सर्जकों-संस्कृतिकर्मियो और बुद्धिजीवियों को बड़ा नुकसान हुआ है। कालान्तर में विभिन्न देशों में इनके अधिकारों को संरक्षित करने के कानून बनाने की ओर ध्यान गया। लेकिन इस अवधि में सारी दुनिया की बौद्धिक संपदा की नेट कंपनियों ने खुली लूट की है।
कहने का तात्पर्य यह है कि आज माक्र्सवाद पर कोई भी बात संचार क्रांति के परिप्रेक्ष्य में ही संभव है। माक्र्सवाद को नए सिरे से परवर्ती पूँजीवाद के संदर्भ में पुनः पढ़ने और नई व्याख्याएँ तलाशने की जरूरत है। हमें पुरानी पढ़ने की पद्धति बदलनी होगी। पहले माक्र्स-एंगेल्स के उद्धरणों के जरिए बातें कहने की आदत थी, आज यह पद्धति बेकार हो गई है। हमें जानना होगा कि परवर्ती पूँजीवाद क्या है? माक्र्सवाद की कौन सी धारणाएँ आज भी प्रासंगिक हैं?
माक्र्सवाद के लिए अवधारणाओं में सोचना बेहद जरूरी है। परवर्ती पूँजीवाद अवधारणाओं का अवमूल्यन करता है। अवधारणाओं के अवमूल्यन से यथार्थ को समझने में असुविधा होती है । पूँजीवादी वर्चस्व को चुनौती देने के लिए माक्र्सवादी अवधारणाओं के व्यापक रूप में प्रयोग पर जोर दिया जाना चाहिए, अवधारणाओं को जनप्रिय बनाने के लिए सरल अर्थ की खोज की जानी चाहिए लेकिन अवधारणा का अवमूल्यन नहीं करना चाहिए। यहाँ हम सुविधा के लिए नव्य-आर्थिक उदारतावाद, माध्यम साम्राज्यवाद और पितृसत्ता की अवधारणा पर विचार करेंगे। ये तीनों धारणाएँ भारत के लिए बहुत महत्व की हैं।

नव्य-उदारतावाद-

नव्य-उदारतावाद का मूल लक्ष्य है सामुदायिक संरचनाओं का क्षय और बाजार के तर्क की प्रतिष्ठा। यह मूलतः वर्चस्ववादी विमर्श है। इसका लक्ष्य है श्रम का मूल्य घटाना, सरकारी खर्च घटाना, काम को और भी लोचदार बनाना। नव्य-उदारतावादी विमर्श, विमर्शों में से एक विमर्श नहीं है, बल्कि यह ‘‘ताकतवर का विमर्श’’ है। फलतः यह कठोर है, आक्रामक है, अपने साथ सारी दुनिया की ताकतों को एकीकृत कर लेना चाहता है। यह आर्थिक निर्णय और चयन को अपने अनुकूल ढाल रहा है। वर्चस्ववादी आर्थिक संबंधों को निर्मित कर रहा है। इसकी समस्त सैद्धांतिकी सामूहिकता की भूमिका को अस्वीकार करती है और वित्तीय संस्थानों के विनियमन पर जोर है। इसने व्यक्तिवादिता, व्यक्तिगत तनख्वाह और सुविधाओं को केन्द्र में ला खड़ा किया है। तनख्वाह का व्यक्तिकरण मूलतः सामूहिक तनख्वाह की विदाई की सूचना है। नव्य -उदारतावाद मूलतः बाजार के तर्क से चलने वाला दर्शन है। इसमें बाजार ही महान है। इसके लिए परिवार, राष्ट्र, मजदूर संगठन, पार्टी, क्षेत्र आदि किसी भी चीज का महत्व नहीं है, यदि किसी चीज का महत्व है तो वह है उपभोग का। उपभोग को बाजार के तर्क ने परमपद पर प्रतिष्ठित कर दिया है। नव्य उदारीकरण के दौर में संरचनात्मक हिंसाचार में इजाफा हुआ है। असुरक्षा बढ़ी है। मुक्तव्यापार, मुक्तमीडिया, अबाधित सूचना प्रवाह और कारपोरेट वर्चस्व इसके परम लक्ष्य हैं। नीति से लेकर मीडिया
प्रस्तुतियों तक व्यक्तिवादिता, प्रतिस्पर्धा और विशिष्टता इन तीन तत्वों का खास तौर पर ख़याल रखा जाता है।
नव्य-उदारतावाद ने सारी दुनिया में अमरीकी सभ्यता और समाज को पश्चिम के आदर्श मॉडल के रुप में पेश किया है। नव्य-उदारतावाद अथवा सामयिक ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया 1971 से आरंभ होती है। अमरीका के राष्ट्रपति निक्सन को इस प्रक्रिया को शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। राष्ट्रपति निक्सन ने इसी वर्ष ब्रिटॉन वुड सिस्टम की समाप्ति की घोषणा की थी, इसके बाद सन् 1973 में विश्व के बड़े देशों के नेता निश्चित विनिमय दर व्यवस्था के बजाय चंचल विनिमय दर व्यवस्था के बारे में एकमत हुए थे।
इसके बाद सन् 1974 में अमरीका ने अंतर्राष्ट्रीय पूँजी गतिविधि पर सभी किस्म की पाबंदियाँ हटा दीं। इसके बाद सन् 1989 में सोवियत संघ में समाजवादी व्यवस्था का अंत हुआ। बर्लिन की दीवार गिराई गई, जर्मनी को एकीकृत किया गया। इसके बाद नव्य-उदारतावाद की आँधी सारी दुनिया में चल निकली। इस आँधी का पहला पड़ाव था मध्यपूर्व का युद्ध, जिसने सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव छोड़े। तेल की कीमतों में अंधाधुंध वृद्धि हुई। मौजूदा ग्लोबलाइजेशन वित्तीय साम्राज्यवादी संस्थानों के दिशा-निर्देशों पर चल रहा है। इसमें अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों विश्वबैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि का वर्चस्व है।
पूँजी के अबाध आवागमन और सूचना तकनीक के अबाध प्रसार ने एकदम नए किस्म की दुनिया निर्मित की है, यह वह दुनिया है जिसने पुरानी औद्योगिक क्रांति के गर्भ से पैदा हुई दुनिया को बुनियादी तौर पर बदल दिया, औद्योगिक क्रांति और रैनेसां के गर्भ से पैदा हुए वैचारिक विमर्श और पैराडाइम को बदल दिया, यह सारा परिवर्तन इतनी तेज गति से हुआ है कि अभी तक हम सोच भी नहीं पाए हैं कि आखिरकार ग्लोबलाइजेशन किस तरह की दुनिया रच रहा है, मध्यवर्ग इसकी चमक में खो गया है, वहीं गरीब किसान और मजदूर अवाक् होकर देख रहे हैं।
आरंभ में नव्य-उदारतावाद को लोग समझ ही नहीं पाए किंतु धीरे-धीरे इसका जनविरोधी स्वरूप सामने आने लगा है और साधारण नागरिकों में इसके प्रति प्रतिवाद के स्वर फूटने लगे हैं। ग्लोबलाइजेशन की चमक और टी0वी0 चैनलों की आँधी ने सोचने के सभी उपकरणों को कुंद कर दिया है, कुछ क्षण के लिए यदि कोई आलोचनात्मक विचार आता भी है तो अगले ही क्षण उसके प्रति अनास्था पैदा हो जाती है। ग्लोबलाइजेशन ने मानव मस्तिष्क को संशय और अविश्वास से भर दिया है। अब हमें किसी पर विश्वास नहीं रहा, सारे नियम और कानून बार-बार हमें यही संकेत दे रहे हैं कि अपने पड़ोसी पर नजर रखो, उस पर विश्वास मत करो। आपके पास जो बैठा है उससे दूर रहो, उससे संपर्क, संवाद, खान-पान मत करो। विश्वास और आस्था से भरी दुनिया में संशय और अविश्वास की आँधी इस कदर चल निकली है कि अब प्रत्येक देश में प्रत्येक व्यक्ति पर नजर रखी जा रही है। प्रत्येक देश की मुद्रा का मूल्य घटा है।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

चरवाहे से नाराज भेड़ों ने कसाई को मौका दे दिया


अन्तराष्ट्रीय शायर, वैज्ञानिक, डाक्युमेंट्री फिल्म निर्माता व सामाजिक कार्यकर्ता श्री गौहर रजा से समसामयिक विषय पर लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर सिंह सुमन ने जंहगीराबाद मीडिया इंस्टिट्यूट में जाकर विशेष साक्षात्कार लिया

प्रश्न : पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम से आप क्या सोचते हैं ?

उत्तर : ब्रेख्त ने लिखा था और चरवाहे से नाराज भेड़ों ने कसाई को मौका दे दियाउन्होंने जनवाद के खिलाफ मत दिया क्योंकि वह जनवादी थे बंगाल के सन्दर्भ में यह लाईनें मुझे याद आयीं इस रियलिटी से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि बंगाल की जनता सरकार से नाराज थी। उसकी वजह वामपंथ की गलतियाँ थी। जिसका सम्बन्ध मनोवैज्ञानिक था। इससे जो कुछ हुआ है भयंकर है। भयंकर इसलिए है कि चुनाव के बाद एक महीने के अन्दर ही पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा दिए गए।
बिना लगाम के बाजार के हाथों मुल्क बेचने की प्रक्रिया इतनी तेज व भयंकर है कि इससे पहले इस मुल्क को यह गति देखने को नहीं मिली। जब वामपंथ कमजोर होता है तब वह अपने अन्दर कमजोर ही नहीं होता है बल्कि बुर्जुवा पार्टियों के अन्दर जो वामपंथी असर होता है वह भी कमजोर हो जाता है और हमारे सामने सैकड़ों हजारो उदहारण है बी.टी डंकल से लेकर मोंसंटो वहां से लेकर परमाणु डील तक या छोटे दफ्तर से लेकर कैबिनेट मिनिस्टर तक एक लूट की स्तिथि पैदा हो गयी है और इसमें आम आदमी की आवाज जो वामपंथी विचारधारा के गले से निकलती थी वह पूरी तरह से दब गयी यह है हमारी गलतियों का नतीजा है बंगाल में।

प्रश्न: क्या मार्क्सवाद प्रासंगिक है ?

उत्तर : जहाँ तक मार्क्सवाद को मैं एक वैज्ञानिक विचारधारा मानता हूँ वैज्ञानिक विचारधारा कहने का मतलब यह है बदलाव। इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ धर्म एक ऐसी चीज है जो नहीं बदलता है। जितना पुराना हो उतना ही बेहतर यह सिर्फ ससियेंस है जो जितनी नयी हो उतनी बेहतर।
विचारधारा का जहाँ तक ताल्लुक है। विचारधारा में बदलाव ही उसे ससियेंस बनता है। दुनिया में अभी भी पूँजीवाद व सामंतवाद मौजूद है इसलिए मूल कानून है आज भी मार्क्सवाद पूरे उतरते हैं लेकिन हर जगह की परिस्तिथियों के हिसाब से लागू किया जा सकता है। इसका उदहारण हम टेक्नोलॉजी से लें हमारे देश में छोटे खेत हैं जब हम ट्रक्टर की टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करते हैं तब हमें छोटे ट्रक्टर की जरूरत होती है जिन मुल्कों में बड़े-बड़े खेत होते हैं वहां बड़े ट्रक्टर की जरूरत होती है। बिलकुल यही बात मार्क्सवाद तक पूरी उतरती है मार्क्सवाद को देश की परिस्तिथियों की हिसाब से अप्लाई किया जाना चाहिए जो बातें बंगाल पर लागू होंगी, वह बातें शायद गुजरात व उत्तर प्रदेश पर सही न उतरें।
मशीनी तरीके मर्क्सिजम अप्लाई करने से हर चूक इन्कलाब को कई दशक पीछे धकेल देती हैयही हुआ है दुनिया में अलग-अलग हिस्सों में जहाँ मार्क्सवाद धर्म की तरह इस्तेमाल किया गया वहां व्यक्ति या समूह धर्म की और मुड़ेगा मार्क्सवाद की तरफ नहीं

प्रश्न: वामपंथ के नए मुद्दे क्या होने चाहिए ?

उत्तर: बदलाव की गुंजाइश हर वक्त है। बंगाल केरल की स्तिथि झकझोरने वाले हालात हैं। हमें यह समझना होगा कि पुराने तरीके से काम नहीं चलेगा नए तरीके से सोचना होगा और रचनात्मक होना होगा जो हम तीस चालीस दशक में थे रचनात्मक आन्दोलन की जरूरत है। नया कम्युनिस्ट पैदा करना होगा और जिन सवालों से हमने मुंह फेरा है। जिसमें प्रमुख सवाल है जाति का सवाल व साम्प्रदायिकता के सवाल पर चिंतन करना बहुत जरूरी है। अगर इस देश में फासिस्ज्म आयेगा वह साम्प्रदायिकता व जातिवाद के नाम से आएगा। इन दोनों मुद्दों को हमने नहीं समझा तो हम पिछड़ जायेंगे। हमारे पिछड़े देश की जनता को और पिछड़ना होगा। हमारे आस-पास के देशों में अमेरिका ने यह स्तिथि पैदा कर दी है कि लोकतंत्र न बचे जो हमारे लिये बहुत बड़ा खतरा है।
अगर इस देश में लोकतंत्र बचाना है तो उसकी भी जिम्मेदारी वामपंथ की है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
Share |