मंगलवार, 24 जनवरी 2012

" तुम मुझे खून दो , मैं तुम्हे आज़ादी दूँगा "

बादशाह खान और नेताजी
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हमारे देश के स्वाधीनता -संग्राम के अग्रणी , प्रभावशाली , लोकप्रिय और महान योद्धा थे | उनके प्रतिभावान व्यक्तित्व में जननेता , क्रांतिकारी तथा सेनानायक के गुणों का अदभुत संश्लेष्ण था | सतत सक्रियता , आदमी साहस , प्रेरक,देदीप्यमान उत्कट बलिदान भाव , धारदार तर्क , प्रगतिशील वामपंथी विचारों की वैज्ञानिक सोच , विलक्षण संगठन क्षमता तथा अपराजेयता उनके व्यक्तित्व को ऐसा आभामंडल प्रदान करते है , जैसा कि विश्व -इतिहास में कम लोगो को ही प्राप्त रहा है |
कटक और कलकत्ता में तेज़ - तरार्र विद्यार्थी जीवन | 1920 में इन्डियन सिविल सर्विस में चौथा स्थान प्राप्त कर के गाँधी के आवहान पर 22 अप्रैल , 1921 को त्यागपत्र | 1925 तक देशबन्धु चितरंजन दास का राजनैतिक मार्गदर्शन मिला | नेशनल कालेज , कलकत्ता के प्रिंसिपल रहे | कलकत्ता - कारपोरेशन के मुख्य प्रशासक बने | असहयोग आन्दोलन वापस लेने पर गाँधी का विरोध किया |क्रान्तिकारियो से सम्पर्क के कारण अक्तूबर 1924 में गिरफ्तारी | वर्मा की मांडले जेल में रखे गये | 1927 में मद्रास-अधिवेशन में कांग्रेस के महासचिव चुने गये | 1928 में नेहरु के साथ कांग्रेस के भीतर ही इन्डियन इंडीपेंडेंस लीग नामक सशक्त वामपंथी गुरुप गठित किया |1928 में कलकत्ता-अधिवेशन में कांग्रेस के जनरल कमांडिंग अफसर बने |कांग्रेस से डोमिनियन दर्जा की जगह पूर्ण स्वराज के लक्ष्य की घोषणा करवाना चाहते थे | 1929 में लाहौर कांग्रेस में समाजवादी कार्यक्रम अपनाने पर जोर दिया | 23 जनवरी 1930 को फिर गिरफ्तारी , एक वर्ष बाद रिहाई 2 जनवरी 1931 को कलकत्ता में प्रतिबन्ध तोडकर जलूस का नेतृत्त्व किया और खून -सने कपड़ो में अदालत लाये गये |
4 जुलाई , 1931 को अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के मंच से वक्तव्य - " संसार को मुक्ति की भाँती ही भारत की मुक्ति भी समाजवाद पर निर्भर है | भारत को अन्य देशो से शिक्षा ग्रहण करना चाहिए | भारत को अपने ही प्रकार के समाजवाद का विकास करना चाहिए | जब कि सारा संसार समाजवादी प्रयोगों में लीन है , तो भारत ऐसा क्यों न करे ? यह हो सकता है कि भारत जिस प्रकार के समाजवाद को विकसित करे , उसमे नवीनता और मौलिकता हो और वह सारे संसार के लिए लाभदायी हो |"
कराची - कांग्रेस में -"मैं चाहता हूँ कि स्वतंत्र भारत समाजवादी गणतंत्र बने |" जनवरी 1932 से 1933 तक नजरबंद | बीमार होने पर सशर्त रिहाई | यूरोप के वियना सैनिटोरियम में स्वास्थ लाभ | दुसरा असहयोग आन्दोलन वापस लेने पर 9 मई,1933 को वियना से सुभाष और विठ्ठल भाई पटेल का पत्र -"हम गत 13 वर्षो से अपने को अधिक से अधिक और शत्रु को कम से कम कष्ट देने की रणनीति से जो युद्ध चला रहे है , वह सफल नही हो सकता | यह आशा करना बेकार है कि कष्ट उठाकर या प्यार कर के हम अपने शासको का हृदय -परिवर्तन कर सकते है |महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने की ताज़ा कारवाई यह सिद्ध करती है कि कांग्रेस का वर्तमान तरीका असफल हो गया है | अब कांग्रेस का नये तरीके से नये सिद्धांतो पर उग्रवादी पुनर्गठन करने का समय आ गया है | असहयोग को अधिक जुझारू तरीके से बदलना होगा और स्वाधीनता - संघर्ष हर मोर्चे पर शुरू करना होगा " बिठ्ठल भाई पटेल ने अपनी वसीयत में सुभाष के राजनैतिक कार्यो के लिए एक लाख रूपये दिए थे |उनके भाई सरदार बल्लभ भाई पटेल ने वसीयत को चुनौती दी और कोशिश की कि वह धन सुभाष को न मिले |
10 जून ,1933 को इन्डियन पोलिटिकल कांफ्रेंस , लन्दन में अध्यक्षीय भाषण में 1931 के गांधी -इरविन समझौते की आलोचना की और कहा -"19 वी सदी में जर्मनी ने मार्क्सवादी दर्शन के रूप में विश्व को सबसे शानदार भेट दी और 20 वी सदी में रूस ने विश्व की सभ्यता और संस्कृति को मेहनतकश जनता की क्रान्ति और संस्कृति के जरिये समृद्ध किया | विश्व की सभ्यता और संस्कृति को अलगी शानदार देन भारत से प्राप्त होगी | भारत पूंजीपतियों, जमीदारो और जातियों का देश नही रहेगा , अपितु वह सामाजिक और राजनितिक लोकतंत्र होगा |हम इस पार्टी को "साम्यवादी संघ "कह सकते है |'साम्यवादी संघ 'भारतीय जनता के हर भाग को न्याय दिलाने और उसकी चौतरफा स्वतंत्रता -सामाजिक ,राजनितिक ,आर्थिक -के लिए कार्य करेगा |" फरवरी 1935 में जनेवा में "हमारी गृहनीति तै करते समय यह कहना घातक होगा कि भारत को साम्यवाद और फासीवाद के बीचचयन करना है |हमारा विचार कि विभिन्न आंदोलनों में जो अच्छी चीजे है , उन्हें संश्लिष्ट करना होगा "
1934-35 में मास्को -सम्मलेन में सुभाष को जाने देने के सवाल पर सेट्रल असेम्बली में होम मेम्बर ने कहा "सुभाष कम्युनिस्ट है ,इसलिए उन्हें रूस जाने की इजाज़त नही दी जा सकती |"1938 में हरिपुरा -कांग्रेस के अध्यक्ष चुने जाने पर चरणबद्ध योजना -निर्माण का कार्य किया |"भारत के लिए आर्थिक योजना से मेरा मतलब भारत के औद्योगीकरण की बड़े पैमाने की योजना "हमे सबसे पहले विज्ञान की सहायता लेनी पड़ेगी |" अब स्वराज सपना नही रहा , हम सत्ता के निकट पँहुच चुके है |" "राजनितिक सत्ता हासिल करने के बाद यदि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण समाजवादी पद्धति से होता है - जैसा कि मुझे बिलकुल सन्देह नही है कि होगा ही -तो सर्वहारा सम्पत्तिशाली वर्गो की कीमत पर लाभान्वित होगा और भारतीय जनता को सर्वहारा की कोटि में ही रखना पडेगा |" " उपज बढाने के लिए वैज्ञानिक कृषि प्रणाली विकसित की जायेगी | राज्य के मालिकाने और राजकीय नियंत्रण में औधोगिक विकास की पूरी योजना बनाना अनिवार्य होगा | धीरे - धीरे राज्य द्वारा उद्योग और कृषि का भी समाजवादीकरण किया जाएगा |""वस्तुओ का वैज्ञानिक उत्पादन और वितरण केवल समाजवादी पद्धति से कारगर ढंग से किया जा सकता है |" गांधी ने सुभाष के उद्योगों और कृषि के समाजवादीकरण के विचार का विरोध किया | सुभाष ने जनसख्या नियंत्रण , भूमि -सुधार , जमीदारी -उन्मूलन की भी योजना बनायी |उन्होंने साम्प्रदायिकता आधार पर देश को तीन टुकडो में बाटने वाले 1935 के कानून में संघ -शासन के उल्लेख की निंदा की | वे अंग्रेजो से कोई समझौता नही चाहते थे | उनका मत था कि कांग्रेस पर पूंजीपतियों की जकड़ है और वे कांग्रेस को उनकी पकड से मुक्त करा कर समाजवाद की ओर ले जाना चाहते थे | 1939 में दूसरी बार त्रिपुरी -कांग्रेस के अध्यक्ष चुने जाने की पूर्व संध्या पर सुभाष ने एक वक्तव्य प्रकाशित किया -"कांग्रेस कार्यकारणी के कुछ महत्वपूर्ण मेरी जगह किसी को भी अध्यक्ष बना देने के लिएमेरे विरुद्ध मतदान का आदेश दे रहे है | वे मेरा विरोध क्या इसलिए कर रहे है कि मैं उनके हाथो का औजार नही बनूगा या मेरे विचारों और सिद्धांतो के कारण ? कार्यकारिणी के इस गुरुप का यह अतिरेक है कि वे हर बार अध्यक्ष के मनोनयन का आदेश दिया करेंगे | यह कांग्रेस के जनवादी संविधान के विरुद्ध है |" सुभाष को 1580 और डॉ पट्टाभि सीतारमैया को 1375 वोट मिले | दो दिन बाद गांधी का बयान आया - "श्री सुभाष ने अपने प्रतिद्वंदी डॉ पट्टाभि सीतारमैया पर एक निर्णायक विजय हासिल की है | मुझे अवश्य स्वीकारना चाहिए कि बिलकुल शुरू से ही मैं उनके पुननिर्वाचन का निश्चित रूप से विरोधी था |इसके कारणों के विस्तार में जाने की मुझे आवश्यकता नही है |फिर भी मैं उनके विजय से प्रसन्न हूँ और चूकि पट्टाभि को उम्मीदवारी से अपना नाम वापस न लेने देने के लिए भी मैं जिम्मेदार था उनकी तुलना में यह मेरी अधिक पराजय है | कांग्रेस तेज़ी से नकली सदस्यों वाली भ्रष्ट संस्था बनती जा रही है |सबके बाद , सुभाष देश के शत्रु नही है |" और गांधी ने उन लोगो के लिए , जो सुभाष की नीति और कार्यक्रम से तालमेल न कर सके , कांग्रेस से बाहर आने का आम निर्देश भी जारी कर डाला | त्रिपुरी अधिवेशन के समय सुभाष बीमार थे | दक्षिणपंथी कांग्रेसियों ने अभद्र व्यहार किया | स्वंय गांधी अधिवेशन में नही आये |वह राजकोट में अनशन पर बैठ गये और कहा "कार्य -समिति में हमारा कोई आदमी नही रहेगा |" सुभाष ने कार्यकारणी के जिन 14 सदस्यों को चुना , उनमे से 12 ने इस्तीफा दे दिया और कहा "आप समान विचारों वाली समिति चुन ले |" नेहरु ने अलग से अपना इस्तीफा दिया |अन्तत: अप्रैल 1939 में कलकत्ता में कांग्रेस - महासमिति की बैठक में सुभाष ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया |पन्त -प्रस्ताव पर जयप्रकाश नारायण और उनकी कांग्रेस समाजवादी पार्टी ने सुभाष के साथ विश्वासघात किया , किन्तु कम्यूनिस्टो ने पन्त - प्रस्ताव का विरोध करने में सुभाष का साथ दिया | गांधी ने सुभाष को कांग्रेस से निकालने के लिए साजिश की और अन्तत: सुभाष और उनके भाई शरद - दोनों ही कांग्रेस से निष्काषित कर दिए गये |
गांधीवादी दर्शन का खण्डन करते हुए सुभाष ने अखिल भारतीय युवा सम्मलेन में कलकत्ता में कहा , "यह अनुभूति और मान्यता वाहियात है कि आधुनिकता बुरी है , बड़े पैमाने का उत्पादन पाप है , जरूरते नही बढाई जानी चाहिए और जीवन - स्तर नही उठाना चाहिए , कि आत्मा इतनी महत्वपूर्ण है कि भौतिक संस्कृति और सैनिक -शिक्षा को नजरंदाज़ किया जा सकता है |" जेल से पत्र - "हमको अधिक से अधिक समय और उर्जा कांग्रेस हाई-कमान से लड़ने में लगानी होगी | यदि सत्ता ऐसे नीच , प्रतिशोधी और अनैतिक लोगो के हाथ में स्वराज जीतने के बाद चली गयी तो देश का क्या होगा ?यदि हम उनसे अभी संघर्ष नही करेंगे , तो उनके हाथ में सत्ता जाने से रोक नही पायेंगे | उनके पास राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की कोई सोच नही हैं |गांधीवाद आज़ाद भारत को खाई में उतार देगा | यदि गांधीवादी सिद्धांतो पर भारत पुनर्गठन किया गया तो भारत सभी प्रभावी शक्तियों को अपने आप आमंत्रित करता रहेगा | गांधीवाद की चरम स्थिति जनतंत्र पर पाखण्ड का प्रकोप है |यह आश्चर्य व्यक्त करने के लिए मैं विवश हूँ कि भारत के राजनितिक भविष्य के लिए बड़ा खतरा क्या है -अंग्रेज नौकरशाही या गांधीवादी ढोंग |"
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने गदर पार्टी के क्रान्तिकारियो की सेना समर्थित जनक्रांति की रणनीति कार्यान्वित की | अविस्मर्णीय है की उन्होंने आरम्भ में भी रूस जाने की असफल कोशिश की और जापान की पराजय के बाद भी रूस जाकर अपना मुक्ति संग्राम जारी रखना चाहते थे | बन्दी मोहन सिंह से सुभाष की केवल एक मुलाक़ात हुई | कांग्रेस समाजवादी पार्टी के डॉ लोहिया और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के डॉ हेडगेवार ने तथा कीर्ति पार्टी के नाम से पंजाब में सक्रिय कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा शेष कम्युनिस्ट पार्टी फारवर्ड ब्लाक का साथ नही दिया | जेल से लिखे पत्रों में वह कहते है ,
"इस नश्वर संसार में हर चीज होती है और नष्ट होगी | किन्तु विचार , आदर्श और स्वप्न नष्ट नही होंगे | एक व्यक्ति एक विचार के लिए मर सकता है | किन्तु उसकी मृत्यु के बाद वह विचार हजारो जिन्दगियों में स्वंय साकार कर लेगा | विकास का चक्र इसी तरह आगे बढ़ता है और एक पीढ़ी के विचार और स्वप्न अगली पीढ़ी द्वारा अपनाए जाते है | संसार में यातना और बलिदान के बिना कोई भी विचार अपने को पूर्णता तक नही पहुच सकता | अपने देश वासियों से मैं कहता हूँ - मत भूलो कि किसी इंसान के लिए गुलाम रहना सबसे बड़ा अभिशाप है |मत भूलो कि अन्याय और गलत से समझौता सबसे बड़ा अपराध है | शाश्वत नियम को याद करो - यदि तुम जीवन पाना चाहते हो तो तुम्हे अवश्य जीवन देना होगा | और याद रखो कि सबसे बड़ा पुण्यअसमानता के विरुद्ध युद्ध है | इसका कोई महत्व नही है कि मूल्य क्या होगा ?बर्लिन रेडियो से आई ललकार कि गरज आज भी रोमांच उत्त्पन्न कर देती है
"प्यारे देश वासियों आज हमारे देश कि शान खतरे में है | प्रत्येक भारत वासी को चाहे वह कोई भी हो और कही भी हो अपनी भारत माता की करुणा भरी पुकार का यथोचित उत्तर देना है |हमे खून का आखरी कतरा भी अपने देश के लिए बहाना होगा | अपने देश के लिए मर मिटना ही हमारे जीवन का अंतिम ध्येय होगा | तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा | जय हिन्द |"
सुभाष ने गांधी को कस्तूरबा कि मृत्यु पर भेजे सन्देश में राष्टपिता कहा और कहा " गांधी जी ने हमारे कदम आज़ादी की सीधी सडक पर जमा दीये |" जब कि गांधी ने - जिन्होंने दिसम्बर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में कहा था "यदि भारत के पास तलवार होती , तो उसने तलवार उठा ली होती "- सुभाष की मृत्यु पर अमृत कौर को पत्र लिखा " सुभाष महान देश्ब्क्त थे , किन्तु बहुत अधिक दिग्भ्रमित |" और न जाने किस उद्देश्य से जनवरी 1946 में आसाम - दौरे में कई जनसभाओ में गांधी ने कहा " सुभाष जीवित है और यदि मैं उनका पता जानता तो उनको पत्र लिखता |"
सुभाष क्रांतिकारी थे | उनके बारे में भ्रामक प्रचारों का हम विरोध और पर्दाफाश करना चाहते है और उनकी गौरव - गाथा को प्रचारित कर कृतज्ञ राष्ट्र कई और से श्रद्धांजली देना चाहते है | आज , जब २० वीसदी के जयचंद और मीरजाफर डंकल प्रस्ताव के फंदे में देश को जकड़ कर वित्तीय साम्राज्वाद को गुलाम बना चुके है | आइये नेता जी सुभाष चंद बोस के सपनो के महान , समृद्ध और समाजवादी भारत के नवनिर्माण को साकार करने के लिए सामाजिक - आर्थिक परिवर्तनों के वाहक क्रांतिकारी अभियानों की सूत्रपात करे।

सुनील दत्ता
ग्रिजेस तिवारी

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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गणतन्त्रदिवस की पूर्ववेला पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!