रविवार, 11 मार्च 2012

खेती में दिखता पलायन का चेहरा-1




रेलिया ना बैरी से जहाजवा ना बैरी से
मोर सैंयाँ के बिल्मावे से पइसवा बैरी ना
(ना मुझे रेल से दुश्मनी है ना जहाज से। मेरा दुश्मन तो बस वह पैसा है जिसने मेरे प्रियतम को विदेश भेज दिया।) एक भोजपुरी लोकगीत
पंजाब और बिहार
रोजगार गारंटी क़ानून, जिसे बाद में महात्मा गांधी के नाम पर मनरेगा कर दिया गया, की वजह से 2009 में बिहार से पंजाब आकर धान की रोपाई करने वाले मज़दूरों की संख्या में कमी आई। इस बात का रोना पंजाब के लगभग हर जि़ले में किसानों ने हमें सुनाया कि अब बिहार के मज़दूर आना बहुत कम हो गए इसलिए खेती में बड़ी मुश्किल आती जा रही है। किसान परिवारों की ग्रामीण औरतें राजनीति में अपनी सीमित जानकारी की वजह से इसका दोष लालू को देती थीं हालाँकि तब लालूजी न बिहार की राजनीति में प्रभावी थे और न देश की। बाद में मनरेगा के असर जाँचने वाले अनेक अध्ययनों में यह बात सामने आई कि बिहार से पलायन कर आने वाले मज़दूरों की तादाद में बमुश्किल 10-12 फ़ीसदी ही कमी आई थी। इतनी कमी से ही पंजाब की खेती की चूलें हिलने लगी थीं।
दरअसल हरित क्रांति के बाद पंजाब में ज़मीन के संबंधों और खेती में आए बदलावों ने बेज़मीन लोगों के लिए गाँव में रोजगार की गुंजाइश ही बहुत कम कर दी। ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, स्प्रिंक्लर, आॅटोमेटिक टाइमिंग वाली पानी की मोटरें और पंप, उन्नत बीज, खर पतवार नाशक और कीटनाशक दवाएँ - इन सबके साझे असर से बुआई, सिंचाई, कटाई, वीडिंग, थ्रेसिंग, से लेकर मंडी में फसल बेचने तक के ज़्यादातर कामों में जहाँ 20-25 मज़दूर लगते थे वहाँ 1-2 मज़दूरों का ही काम रह गया और वह भी कम मेहनत वाला।
हाल में जोशी-अधिकारी इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल स्टडीज़ के अध्ययन के दौरान हमने पाया कि जालंधर और नवांशहर जैसे इलाक़ों में खेती के पूरी तरह मशीनीकृत हो जाने से गेहूँ की खेती में पूरी फसल के दौरान लगने वाला मानवीय श्रम कुल 10 दिन प्रति एकड़ तक रह गया है। दूसरी तरफ़ धान में रोपाई की और कपास में चुनाई की प्रक्रियाएँ अभी भी भारत में मशीनों के हवाले नहीं हो पाई हैं इसलिए धान और कपास में मज़दूरी की गुंजाइश बची हुई है। हालाँकि पंजाब में कुछ जापानी मशीनों का रोपाई और चुनाई के लिए प्रयोग किया गया था लेकिन वह अभी तो कामयाब नहीं हुआ है। लेकिन इसमें लगने वाली मज़दूरी भी इतने दिनों की नहीं होती कि उसके भरोसे कोई स्थाई ठिकाना गाँव में बना सके। पंजाब के गाँवों में स्थाई रहने वाले भूमिहीन मज़दूरों के लिए कोई रोज़गार न रहने से उन्होंने शहरों का रुख कर लिया। अब पंजाब की खेती में मज़दूरों की ज़रूरत को ज़्यादातर मौसमी पलायन कर आने वाले बिहार, झारखंड के मज़दूर पूरी करते हैं, और जिस वर्ष वे न आएँ, वह मौसम पंजाब के किसानों के लिए भारी गुजरता है।
यह तो पलायन कर आने वाले मज़दूरों पर निर्भरता की बात है। लेकिन ख़ुद पंजाब के किसान भी पलायन कर रहे हैं। खाद और दवाओं के बेहिसाब इस्तेमाल और ज़मीन को बग़ैर आराम जोतते रहने की वजह से वहाँ भी उत्पादकता घटी है और लागत बढ़ती ही गई है। यूरोप और अमरीका में बसे पंजाबी मूल के लोगों का आया अप्रवासी पैसा बहुतायत में होने, किसान केचप और पेप्सी जैसी काॅर्पोरेट कंपनियों की पंजाब की कृषि में मौजूदगी खेती की ज़मीन के भाव अभी भी आसमान पर टाँगे हुए है। नतीजा यह है कि पंजाब के जिन किसानों को पंजाब में खेती करना नुकसान का सौदा लग रहा है, वे पंजाब में अपनी थोड़ी सी ज़मीन बेचकर भी इतनी रकम हासिल कर लेते हैं जिससे वे दूसरे राज्यों में कम क़ीमत में ज़्यादा ज़मीन ख़रीद सकें। ग्वालियर, मुरैना, होशंगाबाद, इटारसी से लेकर महाराष्ट्र तक में पंजाब से आए ऐसे किसानों की मौजूदगी बहुत तेज़ी से बढ़ी है। बाज़ार के दाम से ज़्यादा दाम पाकर बेचने वाला किसान भी खुशी-खुशी ज़मीन बेच देता है लेकिन ज़मीन हाथ से जाने और थोड़े समय में पैसा ख़त्म हो जाने के बाद उसे भूमिहीन मज़दूरों की रोज़ बढ़ती तादाद का हिस्सा बनते देर नहीं लगती।
केरल और खाड़ी के देश
केरल में भी खेती और पलायन के रिश्ते पेचीदा और गहरे हैं। केरल की स्थानीय आबादी का पिछले दशकों में काम की तलाश में सऊदी और खाड़ी के अन्य देशों में बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है। नौजवान बेहतर आमदनी के लिए विदेश चले गए और गाँव में उनके बुजुर्ग माँ-बाप, पत्नी और बच्चे बचे। खेती के कामों के लिए उन्हें दूसरे राज्यों से पलायन कर आने वाले मज़दूरों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। विदेश से आने वाले पैसे की वजह से उनकी खर्च कर सकने की क्षमता भी है। केरल के अंदरूनी गाँवों में भी आश्चर्य में डाल देने वाले शानदार और आलीशान बंगले उसी अप्रवासी आमदनी के नतीजे के तौर पर देखे जा सकते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक सन् 2006-07 में विदेशों में बसे केरल मूल के लोगों द्वारा केरल में 24 हजार करोड़ रुपये की पूँजी भेजी गई। और इसका भी एक-तिहाई हिस्सा सिर्फ़खाड़ी के देशों से आया बताया जाता है।
-विनीत तिवारी
क्रमश:

1 टिप्पणी:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

केरल का बड़ा हिस्सा तो चलता ही अप्रवासियों की आय पर है