बुधवार, 28 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -1




पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था की संरचनात्मक विपत्ति का प्रभाव संसार की सभी राजनैतिक व्यवस्थाओं पर हुआ है, इसके फलस्वरूप विश्व एक ऐतिहासिक मुसीबत में डूब चुका है। इसका प्रभाव सभी प्रजातंत्रों, संवैधानिक सरकारों पर हुआ है और करोड़ों लोगों के मानवाधिकारों का हनन हुआ हैं।
पश्चिम की अब तक प्रसुप्त आर्थिक व्यवस्था में एक अप्रत्याशित ऐतिहासिक विपत्ति के कारण संसार के सभी लोग एवं सभी संवैधानिक एवं विधिक व्यवस्थाएँ प्रभावित हुई हैं। राजनैतिक अर्थशास्त्रियों ने इसे दोहरी मंदी की संज्ञा दी हैं, उन्होंने स्वीकार किया है कि यह पश्चिम में तीस के दशक में आई ‘ग्रेट डिप्रेशन’ (विराट आर्थिक गिरावट) से भी ज्यादा गंभीर है। जिसकी परिणति संसाधनों पर नियंत्रण की वैष्विक होड़ में हुई एवं अन्ततोगत्वा द्वितीय विष्व युद्ध का इसने मार्ग प्रशस्त किया। इस युद्ध को पूँजीपतियों (बैंकर्स) द्वारा संसाधनों पर नियंत्रण का युद्ध भी कहा गया है। इस प्रकार की निर्ममता के सीधे कारकों में से एक कारक यह भी था कि प्राइवेट बैंकर्स ने प्रथम विश्व युद्ध में राष्टों को जो कर्ज दिया था उन्होंने उसका सूद वसूलना प्रारम्भ कर दिया एवं पराजित देशों की सरकारों से युद्ध में हुई क्षतिपूर्ति भी वसूलना प्रारम्भ कर दिया था। यह कार्य कुख्यात ‘‘वर्सिलीज’’ संधि के माध्यम से हुआ जिसको अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस के राष्ट्राध्यक्षों एवं बैंकर्स के अधिकारियों द्वारा जबरदस्ती इन राष्ट्रों पर थोपा गया, युद्ध क्षतिपूर्ति उन देशों के नागरिकों के द्वारा अदा की गई, जिन्होंने उस निर्णय में हिस्सा नहीं लिया था। उन राष्ट्रों की आर्थिक व्यवस्था बिल्कुल ढह गई एवं भीषण मुद्रास्फीति का जन्म हुआ, जिससे यूरोप के करोड़ों नागरिक बिल्कुल दरिद्र हो गए। समकालीन परिस्थिति एक बार फिर इसी प्रकार की पाश्विक घटनाओं की एक भिन्न ऐतिहासिक युग में पुनरावृत्ति है। अन्तर केवल यह है इसकी भीषणता पहले से कहीं अधिक है, क्योंकि इसका प्रभाव प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध के मुकाबले में अधिक दूरगामी है। इन्हीं पूँजीवादी तथा आर्थिक हितों के उत्तराधिकारियों द्वारा एक बार फिर विश्व के भिन्न-भिन्न राष्ट्रों का शोषण किया जा रहा हैं। वहीं बैंकिंग एवं कार्पोरेट हितों वाले अपनी सरकारों के माध्यम से फिर से, उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में लिप्त हैं। उन्होंने ऐसी नीतियों को अपनाया है जिससे कि इन देशों की सामाजिक सुरक्षा का सम्पूर्ण ढाँचा नष्ट हो रहा है।
वे इन राष्ट्रों के राजकोषों से बड़ी-बड़ी आर्थिक सहायता (सब्सीडी) प्रदान करवा रहे हैं। बैंकों एवं निगमों पर अपना आधिपत्य जमा रहे हैं जिससे मध्यम एवं कार्य करने वाले वर्ग की सम्पत्तियों एवं बचत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। परिणाम स्वरूप, ये राष्ट्र कर्ज में डूब रहे हैं और दिवालिया बन रहे हैं। प्रमुख रेटिंग ऐजेंसियों जैसे ‘‘स्टैण्डर्ड पुअर’’ ने इन सरकारों की आर्थिक विकास क्षमता की दर को कम कर दिया है जिसमें पूर्व के आर्थिक दैत्य अमरीका एवं जापान भी सम्मिलित हैं। फ्रांस जो कि सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है, वह भी इस प्रकार की स्थिति का सामना कर रहा है। जबकि विश्व की जी0डी0पी0 (सकल घरेलू उत्पाद) लगभग 65 ट्रिलियन या मोटे तौर पर विश्व सार्वभौमीकरण विपणन का 10.83 प्रतिशत है जैसा कि प्रमुख अखबार ‘‘दि एकोनाॅमिस्ट ने सूचना दी है। विश्व के चार बड़े बैंकों की साख रेटिंग भी कम कर दी गई है। बैंक आफ अमरीका, सिटीग्रुप, जे0पी0 मोरगन, गोल्डमैन साच, विशैली साख निर्गमन का 95 प्रतिशत नियंत्रित कर रहे हैं जो आर्थिक व्यवस्था को गलत ढंग से डुबाए हुए थीं। यह केवल बैंकों का ही प्रश्न नहीं रहा बल्कि पश्चिमी संसार की अधिकतर देशों की सरकारें अब आर्थिक रूप से विकासशील नहीं हैं।
कारपोरेट लालसा, बेरोजगारी, तालाबंदी एवं 2008 की कारपोरेट को छूट के विरोध में अब विश्व के 80 देशों में आन्दोलन फैल चुका है। वाल स्ट्रीट, सिटी आफ लाडर््स जोकि बैंकिंग एवं आर्थिक हितों के प्रमुख केन्द्र हैं तथा जिन्होंने वित्तीय अनियमितताएँ बड़े पैमाने पर की हैं, उनको बैंकिंग संसार का ‘ग्वान्टा नामो वे’ कहा जा रहा है। विभिन्न सरकारों का बैंक डिपाजिट एवं इन्वेस्टमेंट जो कि सत्ता परिवर्तन के लिए प्रयोग किया जाता है वह अमरीका, ब्रिटेन एवं अन्य यूरोपियन देशों में निवेश किया जाता है। अमरीका तथा ब्रिटेन की सरकारों के प्रशासनिक आदेशों द्वारा इनको अधिगृहीत कर लिया गया है ताकि लीबिया, ईराक एवं अन्य देशों में सत्ता परिवर्तन किया जा सके एवं नाटो शक्तियों के प्राइवेट बैंकों एवं निगमों की बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके।
नाटो शक्तियों ने इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को खतरे में डाल दिया है एवं उनके नागरिकों की बचत को या तो हड़प लिया है या नष्ट कर दिया है, जबकि बैंकर्स ने स्वयं अपने आपको करोड़ों रूपयों का बोनस प्रदान किया है। पुलिस ने बैंक खातेदारों को गिरफ्तार कर लिया है, ताकि वे उनके धन को निकाल सकें और खाते को बंद कर सकें। इन पाश्विक रणनीतियों की प्राप्ति के उद्देश्य से पूँजीपति एवं कापोरेट वर्ग, नागरिक एवं उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन करने में नहीं चूकते।
दिलचस्प बात यह है कि एक प्रभावशाली नाटो राष्ट्र के प्रतिनिधि ने हड़प करने वाली सरकारों के द्वारा बुलाए गए लीबिया सम्मेलन में जिसमें कि तेल कम्पनियों एवं पूँजीपतियों के प्रतिनिधि भी शामिल थे, उस देश को ‘‘मुकुट मंे आभूषण’’ की संज्ञा दी। यह एक ऐसा वाक्य है जिसके अर्थ से हम हिन्दुस्तानी खूब परिचत हैं। वास्तविकता यह है कि नाटो शक्तियों की राजनैतिक व्यवस्था अब संवैधानिक रूप से प्रजातांत्रिक व्यवस्था नहीं कही जा सकती, क्योंकि आर्थिक कुलीनतंत्रों ने इन देशों की राजनैतिक तथा आर्थिक व्यवस्था पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया है। उन देशों का पुनः उपनिवेशीकरण जो कभी उपनिवेशवाद से मुक्त हुए के अतिरिक्त शक्तिशाली पूँजीवादी हितों की दूसरी रणनीति जो नाटो को नियंत्रित कर रहे हैं उन देशों की सरकारों की राजनैतिक व्यवस्था को समाप्त करना है, जो उनके उद्देश्य में रोड़ा बन रहे हैं। इसके लिए वह उन देशों में ऐसे आन्दोलन चलाते हैं जिसका पैसा नेशनल इनडाउनमेंट फार डेमोक्रेसी अथवा ‘द फोर्ड’ अथवा ‘राकफेलर फाउन्डेशन अथवा अन्य बैंकिंग एवं कारपोरेट हितों के फाउन्डेशन जो यू0एस0ए0, यू0के0, एवं यूरोप के अश्वेत क्रांति के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इस उद्देश्य के लिए वे मानव अधिकारोंके हनन का बहाना लेते हैं अथवा फर्जी नरसंहार का आरोप लगाते हैं अथवा जिस सरकार को गिराना होता है उस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं। वे इस प्रकार की सरकार के स्थान पर दूसरी ऐसी सरकार या नेता को लाते हैं जो उनके आदेशों के पूरे गुलाम होते हैं।
-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

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