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रविवार, 1 अप्रैल 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -5

                                               प्रथम खाड़ी युद्ध (1990-91) के दौरान पहली बार यह साक्ष्य सामने आया कि संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद दबंग पश्चिमी आर्थिक एवं कारपोरेट घरानों की गुलाम बन चुकी है। इराक के लोगों पर उस समय प्रतिबंध लगाए गए ताकि इराक को आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक रूप से पूरी तरह से नष्ट किया जा सके। इस अवैध प्रस्ताव और तथाकथित भोजन के लिए तेल अभियान ने इराक के नागरिकों को पूरी तरह प्रभावित किया है। अनेक प्रतिबंधों के चलते बहुत सी सामग्रियाँ और वस्तुएँ जो सैनिक प्रकृति की नहीं थीं, उनको आयातित करने की अनुमति नहीं प्रदान की गई एवं इराक को तेल उत्पादन क्षेत्रों में पहुँच की अनुमति नहीं प्रदान की गई। केवल जनसंख्या की पौष्टिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन क्षेत्रों पर जाने की अनुमति प्रदान की गई। नागरिकों के लिए भयंकर परिस्थितियों के प्रतिक्रिया स्वरूप जो कि इराक पर लगाए गए प्रतिबंधों का सीधा परिणाम था, संयुक्त राष्ट्र संघ के दो सहायक महासचिव वान स्पोनेक एवं डेनिस हैली डे हैं जिनको इस कार्यक्रम के निरीक्षण के लिए नियुक्त किया गया था, उन्होंने त्याग पत्र दे दिया। उन्होंने घोषणा की कि इराक के लोगों पर जो प्रतिबंध लगाए गए हैं वे एक प्रकार से इराक के विरुद्ध युद्ध की घोषणा हैं एवं संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों के प्रतिकूल हैं। पूँजी संचय, युद्ध में प्राप्त धन एवं बल द्वारा प्राप्त अन्य लाभ इस बात के लिए बाध्य करते हैं कि अर्थशास्त्री जो कि विश्व व्यापार व्यवस्था के वैश्वीकरण से प्रेरित हैं, उन्हें यह चिंतन करना होगा कि उन्होंने जी-7 देशों की कम्पनियों को जो सर्वाधिक प्रिय कम्पनियों का दर्जा दिया है, उस पर उन्हें पुनः विचार करना पड़ेगा।
                         जब से सेसुरक्षा परिषद ने यूगोस्लाविया एवं रवान्डा के लिए विशेष न्यायालयों का गठन किया है तब से यह देखा गया है कि रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रंट के विरोधी दलों के नेता, सैन्य अधिकारी एवं राष्ट्राध्यक्षों को या तो अवैध रूप से गिरफ्तार कर लिया गया या उन्हें जेल भिजवा दिया गया। स्वर्गीय राष्ट्रपति मिलो सेविक  ने जो साक्ष्य अपने बचाव में पेश किया वे सुरक्षा परिषद एवं नाटों देशों के लिए इतनी ज्यादा परेशानी में डालने वाले थे कि उन्हें बहुत ज्यादा राहत मिली जब मिलोसेविक का हृदय रोग के कारण देहावसान हो गया। यद्यपि मिलोविक एक भूतपूर्व चयनित राष्ट्राध्यक्ष थे एवं ब्रिटेन उनकी बीमारी से पूरी तरह भिज्ञ था फिर भी उनके प्रति वह शिष्टाचार नहीं प्रदर्शित किया गया जो शिष्टाचार जनरल पिनोशित के प्रति प्रदर्शित किया गया। राष्ट्रपति मिलोसेविक पर विशेष न्यायालय द्वारा मुकदमा और भी तेजी से चलाया गया, यद्यपि कि उन्होंने साक्ष्य प्रस्तुत किया था कि नरसंहार का आरोप जो उन पर लगाया है कि वह वास्तव में नाटो की बमबारी का परिणाम था जिसके कारण कोसोवो एवं बेलग्रेड में नागरिकों की हत्याएँ हुईं। नाटो शक्तियों एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ के सैन्य बलों द्वारा आपराधिक संगठनों को सहायता प्रदान की गई। ये आपराधिक संगठन इस्लामी मुखौटा पहने हुए थे, इनको कुछ इस्लामी देशों के संगठनों द्वारा सहायता भी प्रदान की गई ताकि वे यूगोस्लाविया का बटवारा कर सकें एवं उसके पश्चात सर्बिया का बँटवारा करंे ताकि सर्वों की सामूहिक हत्याओं की जिम्मेदारी न रहे। नागरिकों द्वारा यूगोस्लाविया के न्यायालय के मुख्य सरकारी वकील से शिकायतें की गईं कि वे बेलगे्रड में नाटो देशों द्वारा की गई बमबारी की जाँच करें, परन्तु उनमें से एक पर भी मुकदमा नहीं चलाया गया। इसी प्रकार रवाण्डा में भी हत्याएँ की गईं जो नरसंहार की परिधि में थीं। रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रंट द्वारा की गई सामूहिक हत्याओं की जाँच नहीं की गई यद्यपि कि साक्ष्य मौजूद था कि सभी हत्याएँ रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रंट द्वारा की गई हैं, फिर भी कोई जाँच नहीं हुई क्योंकि रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रन्ट के अमरीका एवं ब्रिटेन से घनिष्ठ सम्बन्ध थे। वजह यह थी कि अमरीका एवं ब्रिटेन कान्गो तक फैले हुए सम्पूर्ण क्षेत्र के संसाधनों पर नियंत्रण करना चाहते थे। समकालीन युग के बहुत से देशों में धार्मिक या साम्प्रदायिक संगठनों की सहायता की गई कि वे आपराधिक प्रकृति के व्यक्तियों को संगठित करें ताकि वे गृह युद्ध को प्रारम्भ कर सकें एवं नाटो देश उस राष्ट्र में हस्तक्षेप करने का बहाना ढूढ सकें या छाया सरकारों द्वारा उन पर नियंत्रण कर सकंे। 
 -नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

शनिवार, 31 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन - 4

अन्तर्राष्ट्रीय वैधानिक व्यवस्था एवं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा व्यवस्था का पतन एवं अन्तर्राष्ट्रीय विधिक न्यायालय एवं संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति की निष्क्रियता।
    संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर की प्र्रस्तावना में यह लिखा हुआ है कि हम ‘‘संयुक्त राष्ट्र संघ’’ के लोग आने वाली पीढि़यों को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए कृत संकल्प हैं, जिसने कि मानवता को दो बार अनगिनत कष्टों में लिप्त किया है। इस घोषणा के बावजूद सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य जिन्होंने द्वितीय युद्ध के पश्चात व्याप्त भौगोलिक राजनैतिक, परिस्थिति के फलस्वरूप विशेष दर्जा प्राप्त किया। सहयोगी शक्तियों के राजनैतिक एवं सैनिक रूप से प्रबल होने के कारण स्थाई सदस्यों ने संयुक्त राष्ट्र संघ को निरन्तर एवं कभी न समाप्त होने वाले युद्धों की ओर ढकेला है, संयुक्त राष्ट्रों के आन्तरिक मामलों में सैनिक हस्तक्षेप किया है एवं छोटे देशों के खिलाफ आर्थिक रोक लगाई है ताकि वे उनके संसाधनों पर अनधिकृत कब्जा कर सकें। विश्व की नवीन राजनैतिक व्यवस्था जो कि मानवता के विपरीत है उस समय उत्पन्न हुई जब पूर्व सोवियत समाजवादी गणराज्य संगठन की पोलिट ब्यूरो 1991 में धराशायी हो गई। यह वह समय था जबकि विश्व के पश्चिमी देशों में अर्थ व्यवस्था मुसीबत से घिर चुकी थी, परन्तु लोगों की नजरों से यह बात छिपी हुई थी।
    चीन ने इन घटनाओं से पहले पश्चिमी संसार से यह समझौता किया था कि वह अपनी अर्थव्यवस्था और राजनीति को बदल देगा, यदि उसको सर्वाधिक प्रिय राष्ट्र का दर्जा प्रदान किया जाएगा।
    इसके बदले वह अमरीका तथा यूरोपियन कम्पनियों को एवं जी0 7 राष्ट्रों की अन्य कम्पनियों को चीन में व्यापार करने की अनुमति प्रदान करेगा तथा सभी प्रकार के व्यापारिक प्रतिबंधों को उठा लेगा। चीन इस बात पर सहमत हुआ कि वह विश्व के राजनैतिक एवं रणनीति सम्बंधी आदेशों को जिस पर अमरीका और उसके सहयोगी राष्ट्रों का पूरा दबदबा है, से पूरी तरह सहमत रहेगा। परिणाम स्वरूप चीन ने ईराक के विरुद्ध लगाए गए प्रतिबंधों पर अपने वीटों का प्रयोग नहीं किया। वह इस बात पर भी सहमत हुआ कि वह चीन का सस्ता लेबर बिना मोल भाव किए हुए प्रदान करेगा, बहुत से क्षेत्रों में राज्य द्वारा चलाई गई कम्पनियों को समाप्त कर देगा एवं इन कम्पनियों के मुनाफे को स्वदेश सुरक्षित भेज देगा एवं उत्पादन की कीमत को घटाएगा।
    सुरक्षा परिषद के द्वारा 1989 के पश्चात पारित किए गए अधिकतर प्रस्ताव अप्रजातांत्रिक हैं क्योंकि ये प्रस्ताव कमजोर राष्ट्रों को आर्थिक एवं सैनिक रूप से धमकाना चाहते हैं जो पहली दृष्टि में ही संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर का खुला हुआ अतिक्रमण है।
संयुक्त राष्ट्र संघ का चार्टर, यदि व्याख्या सम्बंधी कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो वह सभी समझौतों से सर्वोपरि है। केवल कुछ उदाहरण ही पर्याप्त हैं इस बात को साबित करने के लिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से धराशायी हो चुकी है एवं संयुक्त राष्ट्र संघ सैनिक रूप से कमजोर, छोटे सदस्यों के हितों को अब सुरक्षा प्रदान नहीं करता। सुरक्षा परिषद के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र संघ की महा सभा ने भी लीबिया के वर्तमान मामले में आश्चर्य जनक रूप से स्वेच्छाचारिता से काम लिया है। उसने संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार सभा एवं सुरक्षा परिषद की सिफारिश पर बगैर तथ्यों की जाँच किए हुए लीबिया को संयुक्त राष्ट्र संघ से निलम्बित कर दिया। कर्नल गद्दाफी पर यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 600 बगाज़ी नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया है। संयुक्त राष्ट्र संघ मंे भारत के स्थायी दूत श्री हरिदीप पुरी ने सुरक्षा परिषद द्वारा लीबिया के ऊपर पारित दो प्रस्तावों के संदर्भ में यह बात कही कि किसी विश्वसनीय जाँच का अभाव है। विडम्बना यह है कि नेशनल ट्रांजीशनल काउंसिल के नाटो के साथ सहयोग के बावजूद 60,000 लीबियाई नागरिकों की हत्या की गई, फिर भी सुरक्षा परिषद, महासभा एवं संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार सभा ने एन0टी0सी0 एवं नाटों शक्तियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की।
-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन - 3

विश्व स्तर पर प्रमुख आर्थिक एवं कार्पोरेट घरानों ने, जिन्हें उमड़ते हुए जन सैलाब का भय सता रहा है जैसा कि ग्रीस में देखा गया है, यह फैसला किया है कि वे लोगों के संवैधानिक अधिकारों को समाप्त करेंगे, हालाँकि इन घरानों के प्रमुख वक्ताओं ने अपने आधिकारिक वक्तव्यों में प्रजातंत्र एवं मानवाधिकारों का झूठा ढिंडोरा पीटा है। अधिकतर देशों में जहाँ कि अर्थव्यवस्था प्रबल है वहाँ की सरकारें चाहे वे सत्ता पक्ष की हों या विपक्ष की हों, उन्होंने मजदूर वर्ग एवं मध्यम वर्ग की आवाजों को दबाने का कार्य किया है। उन्होंने उचित एवं शांतिमय प्रतिरोधों को, भाषण एवं संगठन की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार के बावजूद, पूरी तरह से कुचल दिया है। राजनैतिक आन्दोलनों में धन लगाने वाले यह सुनिश्चित करते हैं कि यदि कही गंभीर प्रतिरोध की आवाज उठे तो उसको कभी भी गंभीरता से न सुना जाए। एक कारपोरेट मीडिया उस आन्दोलन को या तो दबा देती है या उसको तोड़ मरोड़ कर पेश करती है या ध्यान को दूसरी तरफ केन्द्रित कर देती हैं या गैर सरकारी संगठन (एन0जी0ओ0) जो कारपोरेट घरानों से धन प्राप्त करते हैं उनको इस मीडिया के माध्यम से विशेष रूप से प्रसारित किया जाता है। यह मीडिया थोड़ा बहुत प्रतिरोध या (फर्जी) प्रतिरोध को उभरने देता है ताकि असहमति की आवाजंे विस्फोटक न बनने पाएँ। कारपोरेट घरानों से धन प्राप्त कर रहे गैर सरकारी संगठनों को एक विशेष कार्य परिक्षेत्र आवंटित किया जाता है जैसे कि मानवाधिकार, पर्यावरण, भ्रष्टाचार एवं सार्वजनिक हितों वाले मुद्दे (पी.आई.एल.) और जब पूँजीपति एवं कारपोरेट घराने वालों का आर्थिक एवं राजनैतिक रास्ता दुष्कर हो जाता है तो वे राजनैतिक विकल्प के रूप में अराजकता वादी समूहों को बढ़ावा देते हैं जो कि आपराधिक एवं छिपे तरीकों से नियंत्रण करने की कोशिश करते हैं।
                                          इन्हीं क्षणों में धन प्राप्त करने वाले गैर सरकारी संगठन (फर्जी) विरोधी दलों के साथ मिलकर सत्ता से अपदस्थ किए जाने वाली पार्टी के खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं। सामाजिक समझौता जो पश्चिमी समाज के देशों के संगठित वेतनभोगी अथवा श्रमिक वर्ग एवं मध्य आय वर्ग के समूहों के साथ हुआ, वह पूर्व यू0एस0एस0आर0 एवं अन्य समाजवादी देशों की राजनैतिक समाप्ति के पश्चात धीरे-धीरे लुप्त होता गया। इन देशों को यह भय था कि कोई वैकल्पिक एवं आर्थिक व्यवस्था इसके स्थान पर आ जाएगी। इस राजनैतिक व्यवस्था के स्थान पर अब इन देशों में पुलिस राज्य स्थापित हो गया। संवैधानिक अधिकारों के ह्रास के सबसे प्रमुख उदाहरण संयुक्त राज्य अमरीका एवं ब्रिटेन हैं जहाँ भाषण देने की स्वतंत्रता का अधिकार, गोपनीयता का अधिकार, अनचाही गिरफ्तारी से स्वतंत्रता का अधिकार एवं दूसरे अधिकार जो केवल मध्यम एवं उच्च वर्ग एवं नस्ल विशेष को ही प्राप्त हैं, इनके ऊपर पिछले दो दशकों से बहुत ही व्यापक एवं गूढ़ निगरानी की जा रही है। विभिन्न वर्गों के बीच धन की विषमताएँ इतनी ज्यादा गहन है कि उन्हें भयावह की संज्ञा दी जा सकती है।
                                                   अभी हाल के दिनों मंे ब्रिटेन में जब पुलिस हत्याओं के विरोध में स्वाभाविक आंदोलन छिड़ा जिसके बाद गिरती हुई सामाजिक परिस्थितियों, बढ़ती हुई बेरोजगारी एवं गरीबी के फलस्वरूप दंगा भी हुआ। विरोधों का बर्बरता पूर्वक दमन कर दिया गया एवं रात को मजिस्टेªट नियुक्त किए गए जिन्होंने प्रथम बार के किशोर आरोपियों को भी जमानत नहीं दी, एवं उनके परिवारों को यह धमकी दी गई कि उनको सरकार द्वारा प्राप्त आवास से बेदखल कर दिया जाएगा। अमरीका में वकील एवं मुअक्किल के दरमियान पेशे वराना सम्बन्ध जो पहले बहुत पवित्र समझा जाता था, उस पर अब प्रतिबंध लगा दिया गया है। उन्हें सम्पर्क की गोपनीयता से अब वंचित कर दिया गया है। जिन राष्ट्रांे में नाटों शक्तियों एवं उनके सहयोगियों ने अधिग्रहण कर रखा है वे अब प्रजातांत्रिक देश नहीं रहें। उन्हें छावनियों में तब्दील कर दिया गया है ताकि वहाँ वे अधिक उत्पादों पर कब्जा जमा सकें। इन देशों में व्यक्तिगत एवं सामूहिक हत्याएँ आम हो गई हैं। आए दिन बम विस्फोट होते रहते हैं जैसा कि अफगानिस्तान एवं ईराक के उदाहरण से स्पष्ट हैं। ये सारी घटनाएँ नाटो शक्तियों अथवा उनकी सहयोगी सरकारों के द्वारा कराई जाती हैं, तथा इनकी कोई वैधानिक जिम्मेदारी भी नही .



 -नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

गुरुवार, 29 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -2

कारपोरेट एवं बैंकर्स फाउन्डेशन के सबसे बुद्धिमान एवं सर्वश्रेष्ठ पश्चिमी विचारकों ने सिफारिश की है कि विभिन्न देशों के संसाधनों, वित्त एवं राष्ट्रीय बजटों को नियंत्रित करने एवं उनके हाईड्रोकार्बन एवं खनिज पदार्थों को हड़पने का सबसे अच्छा तरीका युद्ध है। इसके माध्यम से वे अफगानिस्तान के नारकोटिक्स व्यापार को भी नियंत्रित कर रहे हैं जिससे प्राप्त आय को वे पश्चिमी बैंकों एवं प्रमुख आर्थिक संस्थाओं में जिनमें कि साख निर्गमन की सर्वाधिक शेयर होल्डिंग रखने वाली संस्थाएँ भी सम्मिलित हैं, लगाते हैं। उनके प्रमुख प्रस्तावित कार्यक्रमों में से एक यह भी है
कि वे तेल उत्पादन को नियंत्रित करना चाहते हैं, वे यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हाइड्रोकार्बन का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार केवल डालर के माध्यम से चलाया जाए। डालर एक ऐसी करेंसी है जो निरन्तर गिर रही हैं फिर भी यह विश्व की रिजर्व करेंसी के रूप में कार्य कर रही है।
    निरन्तर युद्ध की नीति से दो उद्देश्यों को प्राप्त करना है। एक, यह कि-उन राष्ट्रों के नागरिकों को, जिन्होंने युद्ध घोषित कर दिया है निरन्तर अधीनता में रखना। दो, दूसरी सरकारों एवं राष्ट्रों को धमकाना एवं विवश करना। अनेक देशों की राजनैतिक व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। हर जगह अनिश्चितता है एवं ‘‘वर्तमान परिस्थिति में निरन्तर एवं लगातार परिवर्तन, अस्थाई गणनाओं को भी प्रभावित देशों के राज्यों, उद्योगों, सामाजिक समूहों एवं व्यक्तियों के लिए अत्यधिक समस्यात्मक बना देते हैं। ऐसे अवसर आते हैं जबकि विशिष्ट राज्यों एवं विश्व के लिए शांति के क्षण होते हैं, परन्तु इन क्षणों को बड़ी शीघ्रता से नष्ट किया जा सकता है। जो चीज इस शांति एवं आराम के क्षण को भंग कर रही है, उनमें से एक दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुएँ ऊर्जा, खाद्यान्न आदि की कीमतों में तेजी से हो रही वृद्धि है। इन उतार चढ़ाओं के कारण विश्व के सभी स्थानों पर गरीब राज्यों, गरीब समूहों एवं गरीब व्यक्तियों के लिए समस्या उत्पन्न हो रही है।’’ इमानुअल वालर स्टीन की पुस्तक ’’विश्व में संरचनात्मक संकट’’ के अंश।
    वर्तमान समय में पूरे विश्व में अनिश्चिता है। निश्चितता केवल पश्चिमी संसार की आर्थिक व्यवस्था में अन्तहीन गिरावट है। जिसके कारण सर्वत्र रक्त, श्रम एवं आँसुओं की एक लकीर सी बन गई है। यह विश्व बैंक एवं अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के द्वारा हर समाज पर थोपी गई नवीन उदारवाद एवं संरचनात्मक समायोजन की नीतियों का सीधा परिणाम है। व्यापक बेरोजगारी एवं खाद्यान्न असुरक्षा की समस्या हर समाज में उत्पन्न हो रही है। जिन राष्ट्रों ने इन आर्थिक नीतियों को नहीं अपनाया है, उन्हें युद्ध द्वारा तबाह किया जा रहा है। नाटों देशों के नागरिक अपने राष्ट्रीय बजट में घाटा उठा रहे हैं क्योंकि वे सेना पर ज्यादा व्यय कर रहे हैं। वे इस सच्चाई की उपेक्षा कर रहे हैं कि वियतनाम में आक्रमण से ही अमरीका की आर्थिक व्यवस्था में गिरावट की शुरूआत हुई है।
    यहाँ पर यह आवश्यक है कि हम इस ऐतिहासिक विपत्ति की गंभीरता एवं सीमा को ध्यान में रखें, क्योंकि पश्चिमी देशों के संवैधानिक प्रजातंत्र में उदारवाद की नीति के धराशायी होने के कारण एवं मुसोलिनी की अराजकतावादी व्यापारिक नीति के अपनाए जाने के कारण यह आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ है। पहले भी विश्व इतिहास में कई बार यह घटित हो चुका है कि व्यापार की अधिकता की परिणति उसकी समाप्ति में हुई है। परन्तु इस बार यह व्यवस्था आर्थिक संचय की विफलता के परिणाम से ग्रसित है जो कि इस व्यवस्था द्वारा पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है या उन देशों के नागरिकों को सामूहिक रूप से मौत के घाट उतार देने की घोषणा  के पश्चात भी संभव नहीं, जिनके संसाधनों को सेना के द्वारा अधिगृहीत कर लिया गया है।
 -नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

बुधवार, 28 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -1




पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था की संरचनात्मक विपत्ति का प्रभाव संसार की सभी राजनैतिक व्यवस्थाओं पर हुआ है, इसके फलस्वरूप विश्व एक ऐतिहासिक मुसीबत में डूब चुका है। इसका प्रभाव सभी प्रजातंत्रों, संवैधानिक सरकारों पर हुआ है और करोड़ों लोगों के मानवाधिकारों का हनन हुआ हैं।
पश्चिम की अब तक प्रसुप्त आर्थिक व्यवस्था में एक अप्रत्याशित ऐतिहासिक विपत्ति के कारण संसार के सभी लोग एवं सभी संवैधानिक एवं विधिक व्यवस्थाएँ प्रभावित हुई हैं। राजनैतिक अर्थशास्त्रियों ने इसे दोहरी मंदी की संज्ञा दी हैं, उन्होंने स्वीकार किया है कि यह पश्चिम में तीस के दशक में आई ‘ग्रेट डिप्रेशन’ (विराट आर्थिक गिरावट) से भी ज्यादा गंभीर है। जिसकी परिणति संसाधनों पर नियंत्रण की वैष्विक होड़ में हुई एवं अन्ततोगत्वा द्वितीय विष्व युद्ध का इसने मार्ग प्रशस्त किया। इस युद्ध को पूँजीपतियों (बैंकर्स) द्वारा संसाधनों पर नियंत्रण का युद्ध भी कहा गया है। इस प्रकार की निर्ममता के सीधे कारकों में से एक कारक यह भी था कि प्राइवेट बैंकर्स ने प्रथम विश्व युद्ध में राष्टों को जो कर्ज दिया था उन्होंने उसका सूद वसूलना प्रारम्भ कर दिया एवं पराजित देशों की सरकारों से युद्ध में हुई क्षतिपूर्ति भी वसूलना प्रारम्भ कर दिया था। यह कार्य कुख्यात ‘‘वर्सिलीज’’ संधि के माध्यम से हुआ जिसको अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस के राष्ट्राध्यक्षों एवं बैंकर्स के अधिकारियों द्वारा जबरदस्ती इन राष्ट्रों पर थोपा गया, युद्ध क्षतिपूर्ति उन देशों के नागरिकों के द्वारा अदा की गई, जिन्होंने उस निर्णय में हिस्सा नहीं लिया था। उन राष्ट्रों की आर्थिक व्यवस्था बिल्कुल ढह गई एवं भीषण मुद्रास्फीति का जन्म हुआ, जिससे यूरोप के करोड़ों नागरिक बिल्कुल दरिद्र हो गए। समकालीन परिस्थिति एक बार फिर इसी प्रकार की पाश्विक घटनाओं की एक भिन्न ऐतिहासिक युग में पुनरावृत्ति है। अन्तर केवल यह है इसकी भीषणता पहले से कहीं अधिक है, क्योंकि इसका प्रभाव प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध के मुकाबले में अधिक दूरगामी है। इन्हीं पूँजीवादी तथा आर्थिक हितों के उत्तराधिकारियों द्वारा एक बार फिर विश्व के भिन्न-भिन्न राष्ट्रों का शोषण किया जा रहा हैं। वहीं बैंकिंग एवं कार्पोरेट हितों वाले अपनी सरकारों के माध्यम से फिर से, उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में लिप्त हैं। उन्होंने ऐसी नीतियों को अपनाया है जिससे कि इन देशों की सामाजिक सुरक्षा का सम्पूर्ण ढाँचा नष्ट हो रहा है।
वे इन राष्ट्रों के राजकोषों से बड़ी-बड़ी आर्थिक सहायता (सब्सीडी) प्रदान करवा रहे हैं। बैंकों एवं निगमों पर अपना आधिपत्य जमा रहे हैं जिससे मध्यम एवं कार्य करने वाले वर्ग की सम्पत्तियों एवं बचत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। परिणाम स्वरूप, ये राष्ट्र कर्ज में डूब रहे हैं और दिवालिया बन रहे हैं। प्रमुख रेटिंग ऐजेंसियों जैसे ‘‘स्टैण्डर्ड पुअर’’ ने इन सरकारों की आर्थिक विकास क्षमता की दर को कम कर दिया है जिसमें पूर्व के आर्थिक दैत्य अमरीका एवं जापान भी सम्मिलित हैं। फ्रांस जो कि सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है, वह भी इस प्रकार की स्थिति का सामना कर रहा है। जबकि विश्व की जी0डी0पी0 (सकल घरेलू उत्पाद) लगभग 65 ट्रिलियन या मोटे तौर पर विश्व सार्वभौमीकरण विपणन का 10.83 प्रतिशत है जैसा कि प्रमुख अखबार ‘‘दि एकोनाॅमिस्ट ने सूचना दी है। विश्व के चार बड़े बैंकों की साख रेटिंग भी कम कर दी गई है। बैंक आफ अमरीका, सिटीग्रुप, जे0पी0 मोरगन, गोल्डमैन साच, विशैली साख निर्गमन का 95 प्रतिशत नियंत्रित कर रहे हैं जो आर्थिक व्यवस्था को गलत ढंग से डुबाए हुए थीं। यह केवल बैंकों का ही प्रश्न नहीं रहा बल्कि पश्चिमी संसार की अधिकतर देशों की सरकारें अब आर्थिक रूप से विकासशील नहीं हैं।
कारपोरेट लालसा, बेरोजगारी, तालाबंदी एवं 2008 की कारपोरेट को छूट के विरोध में अब विश्व के 80 देशों में आन्दोलन फैल चुका है। वाल स्ट्रीट, सिटी आफ लाडर््स जोकि बैंकिंग एवं आर्थिक हितों के प्रमुख केन्द्र हैं तथा जिन्होंने वित्तीय अनियमितताएँ बड़े पैमाने पर की हैं, उनको बैंकिंग संसार का ‘ग्वान्टा नामो वे’ कहा जा रहा है। विभिन्न सरकारों का बैंक डिपाजिट एवं इन्वेस्टमेंट जो कि सत्ता परिवर्तन के लिए प्रयोग किया जाता है वह अमरीका, ब्रिटेन एवं अन्य यूरोपियन देशों में निवेश किया जाता है। अमरीका तथा ब्रिटेन की सरकारों के प्रशासनिक आदेशों द्वारा इनको अधिगृहीत कर लिया गया है ताकि लीबिया, ईराक एवं अन्य देशों में सत्ता परिवर्तन किया जा सके एवं नाटो शक्तियों के प्राइवेट बैंकों एवं निगमों की बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके।
नाटो शक्तियों ने इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को खतरे में डाल दिया है एवं उनके नागरिकों की बचत को या तो हड़प लिया है या नष्ट कर दिया है, जबकि बैंकर्स ने स्वयं अपने आपको करोड़ों रूपयों का बोनस प्रदान किया है। पुलिस ने बैंक खातेदारों को गिरफ्तार कर लिया है, ताकि वे उनके धन को निकाल सकें और खाते को बंद कर सकें। इन पाश्विक रणनीतियों की प्राप्ति के उद्देश्य से पूँजीपति एवं कापोरेट वर्ग, नागरिक एवं उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन करने में नहीं चूकते।
दिलचस्प बात यह है कि एक प्रभावशाली नाटो राष्ट्र के प्रतिनिधि ने हड़प करने वाली सरकारों के द्वारा बुलाए गए लीबिया सम्मेलन में जिसमें कि तेल कम्पनियों एवं पूँजीपतियों के प्रतिनिधि भी शामिल थे, उस देश को ‘‘मुकुट मंे आभूषण’’ की संज्ञा दी। यह एक ऐसा वाक्य है जिसके अर्थ से हम हिन्दुस्तानी खूब परिचत हैं। वास्तविकता यह है कि नाटो शक्तियों की राजनैतिक व्यवस्था अब संवैधानिक रूप से प्रजातांत्रिक व्यवस्था नहीं कही जा सकती, क्योंकि आर्थिक कुलीनतंत्रों ने इन देशों की राजनैतिक तथा आर्थिक व्यवस्था पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया है। उन देशों का पुनः उपनिवेशीकरण जो कभी उपनिवेशवाद से मुक्त हुए के अतिरिक्त शक्तिशाली पूँजीवादी हितों की दूसरी रणनीति जो नाटो को नियंत्रित कर रहे हैं उन देशों की सरकारों की राजनैतिक व्यवस्था को समाप्त करना है, जो उनके उद्देश्य में रोड़ा बन रहे हैं। इसके लिए वह उन देशों में ऐसे आन्दोलन चलाते हैं जिसका पैसा नेशनल इनडाउनमेंट फार डेमोक्रेसी अथवा ‘द फोर्ड’ अथवा ‘राकफेलर फाउन्डेशन अथवा अन्य बैंकिंग एवं कारपोरेट हितों के फाउन्डेशन जो यू0एस0ए0, यू0के0, एवं यूरोप के अश्वेत क्रांति के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इस उद्देश्य के लिए वे मानव अधिकारोंके हनन का बहाना लेते हैं अथवा फर्जी नरसंहार का आरोप लगाते हैं अथवा जिस सरकार को गिराना होता है उस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं। वे इस प्रकार की सरकार के स्थान पर दूसरी ऐसी सरकार या नेता को लाते हैं जो उनके आदेशों के पूरे गुलाम होते हैं।
-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:
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