गुरुवार, 29 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -2

कारपोरेट एवं बैंकर्स फाउन्डेशन के सबसे बुद्धिमान एवं सर्वश्रेष्ठ पश्चिमी विचारकों ने सिफारिश की है कि विभिन्न देशों के संसाधनों, वित्त एवं राष्ट्रीय बजटों को नियंत्रित करने एवं उनके हाईड्रोकार्बन एवं खनिज पदार्थों को हड़पने का सबसे अच्छा तरीका युद्ध है। इसके माध्यम से वे अफगानिस्तान के नारकोटिक्स व्यापार को भी नियंत्रित कर रहे हैं जिससे प्राप्त आय को वे पश्चिमी बैंकों एवं प्रमुख आर्थिक संस्थाओं में जिनमें कि साख निर्गमन की सर्वाधिक शेयर होल्डिंग रखने वाली संस्थाएँ भी सम्मिलित हैं, लगाते हैं। उनके प्रमुख प्रस्तावित कार्यक्रमों में से एक यह भी है
कि वे तेल उत्पादन को नियंत्रित करना चाहते हैं, वे यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हाइड्रोकार्बन का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार केवल डालर के माध्यम से चलाया जाए। डालर एक ऐसी करेंसी है जो निरन्तर गिर रही हैं फिर भी यह विश्व की रिजर्व करेंसी के रूप में कार्य कर रही है।
    निरन्तर युद्ध की नीति से दो उद्देश्यों को प्राप्त करना है। एक, यह कि-उन राष्ट्रों के नागरिकों को, जिन्होंने युद्ध घोषित कर दिया है निरन्तर अधीनता में रखना। दो, दूसरी सरकारों एवं राष्ट्रों को धमकाना एवं विवश करना। अनेक देशों की राजनैतिक व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। हर जगह अनिश्चितता है एवं ‘‘वर्तमान परिस्थिति में निरन्तर एवं लगातार परिवर्तन, अस्थाई गणनाओं को भी प्रभावित देशों के राज्यों, उद्योगों, सामाजिक समूहों एवं व्यक्तियों के लिए अत्यधिक समस्यात्मक बना देते हैं। ऐसे अवसर आते हैं जबकि विशिष्ट राज्यों एवं विश्व के लिए शांति के क्षण होते हैं, परन्तु इन क्षणों को बड़ी शीघ्रता से नष्ट किया जा सकता है। जो चीज इस शांति एवं आराम के क्षण को भंग कर रही है, उनमें से एक दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुएँ ऊर्जा, खाद्यान्न आदि की कीमतों में तेजी से हो रही वृद्धि है। इन उतार चढ़ाओं के कारण विश्व के सभी स्थानों पर गरीब राज्यों, गरीब समूहों एवं गरीब व्यक्तियों के लिए समस्या उत्पन्न हो रही है।’’ इमानुअल वालर स्टीन की पुस्तक ’’विश्व में संरचनात्मक संकट’’ के अंश।
    वर्तमान समय में पूरे विश्व में अनिश्चिता है। निश्चितता केवल पश्चिमी संसार की आर्थिक व्यवस्था में अन्तहीन गिरावट है। जिसके कारण सर्वत्र रक्त, श्रम एवं आँसुओं की एक लकीर सी बन गई है। यह विश्व बैंक एवं अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के द्वारा हर समाज पर थोपी गई नवीन उदारवाद एवं संरचनात्मक समायोजन की नीतियों का सीधा परिणाम है। व्यापक बेरोजगारी एवं खाद्यान्न असुरक्षा की समस्या हर समाज में उत्पन्न हो रही है। जिन राष्ट्रों ने इन आर्थिक नीतियों को नहीं अपनाया है, उन्हें युद्ध द्वारा तबाह किया जा रहा है। नाटों देशों के नागरिक अपने राष्ट्रीय बजट में घाटा उठा रहे हैं क्योंकि वे सेना पर ज्यादा व्यय कर रहे हैं। वे इस सच्चाई की उपेक्षा कर रहे हैं कि वियतनाम में आक्रमण से ही अमरीका की आर्थिक व्यवस्था में गिरावट की शुरूआत हुई है।
    यहाँ पर यह आवश्यक है कि हम इस ऐतिहासिक विपत्ति की गंभीरता एवं सीमा को ध्यान में रखें, क्योंकि पश्चिमी देशों के संवैधानिक प्रजातंत्र में उदारवाद की नीति के धराशायी होने के कारण एवं मुसोलिनी की अराजकतावादी व्यापारिक नीति के अपनाए जाने के कारण यह आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ है। पहले भी विश्व इतिहास में कई बार यह घटित हो चुका है कि व्यापार की अधिकता की परिणति उसकी समाप्ति में हुई है। परन्तु इस बार यह व्यवस्था आर्थिक संचय की विफलता के परिणाम से ग्रसित है जो कि इस व्यवस्था द्वारा पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है या उन देशों के नागरिकों को सामूहिक रूप से मौत के घाट उतार देने की घोषणा  के पश्चात भी संभव नहीं, जिनके संसाधनों को सेना के द्वारा अधिगृहीत कर लिया गया है।
 -नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

2 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

FActs ||

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति भी है,
आज चर्चा मंच पर ||

शुक्रवारीय चर्चा मंच ||

charchamanch.blogspot.com