रविवार, 1 अप्रैल 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -5

                                               प्रथम खाड़ी युद्ध (1990-91) के दौरान पहली बार यह साक्ष्य सामने आया कि संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद दबंग पश्चिमी आर्थिक एवं कारपोरेट घरानों की गुलाम बन चुकी है। इराक के लोगों पर उस समय प्रतिबंध लगाए गए ताकि इराक को आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक रूप से पूरी तरह से नष्ट किया जा सके। इस अवैध प्रस्ताव और तथाकथित भोजन के लिए तेल अभियान ने इराक के नागरिकों को पूरी तरह प्रभावित किया है। अनेक प्रतिबंधों के चलते बहुत सी सामग्रियाँ और वस्तुएँ जो सैनिक प्रकृति की नहीं थीं, उनको आयातित करने की अनुमति नहीं प्रदान की गई एवं इराक को तेल उत्पादन क्षेत्रों में पहुँच की अनुमति नहीं प्रदान की गई। केवल जनसंख्या की पौष्टिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन क्षेत्रों पर जाने की अनुमति प्रदान की गई। नागरिकों के लिए भयंकर परिस्थितियों के प्रतिक्रिया स्वरूप जो कि इराक पर लगाए गए प्रतिबंधों का सीधा परिणाम था, संयुक्त राष्ट्र संघ के दो सहायक महासचिव वान स्पोनेक एवं डेनिस हैली डे हैं जिनको इस कार्यक्रम के निरीक्षण के लिए नियुक्त किया गया था, उन्होंने त्याग पत्र दे दिया। उन्होंने घोषणा की कि इराक के लोगों पर जो प्रतिबंध लगाए गए हैं वे एक प्रकार से इराक के विरुद्ध युद्ध की घोषणा हैं एवं संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों के प्रतिकूल हैं। पूँजी संचय, युद्ध में प्राप्त धन एवं बल द्वारा प्राप्त अन्य लाभ इस बात के लिए बाध्य करते हैं कि अर्थशास्त्री जो कि विश्व व्यापार व्यवस्था के वैश्वीकरण से प्रेरित हैं, उन्हें यह चिंतन करना होगा कि उन्होंने जी-7 देशों की कम्पनियों को जो सर्वाधिक प्रिय कम्पनियों का दर्जा दिया है, उस पर उन्हें पुनः विचार करना पड़ेगा।
                         जब से सेसुरक्षा परिषद ने यूगोस्लाविया एवं रवान्डा के लिए विशेष न्यायालयों का गठन किया है तब से यह देखा गया है कि रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रंट के विरोधी दलों के नेता, सैन्य अधिकारी एवं राष्ट्राध्यक्षों को या तो अवैध रूप से गिरफ्तार कर लिया गया या उन्हें जेल भिजवा दिया गया। स्वर्गीय राष्ट्रपति मिलो सेविक  ने जो साक्ष्य अपने बचाव में पेश किया वे सुरक्षा परिषद एवं नाटों देशों के लिए इतनी ज्यादा परेशानी में डालने वाले थे कि उन्हें बहुत ज्यादा राहत मिली जब मिलोसेविक का हृदय रोग के कारण देहावसान हो गया। यद्यपि मिलोविक एक भूतपूर्व चयनित राष्ट्राध्यक्ष थे एवं ब्रिटेन उनकी बीमारी से पूरी तरह भिज्ञ था फिर भी उनके प्रति वह शिष्टाचार नहीं प्रदर्शित किया गया जो शिष्टाचार जनरल पिनोशित के प्रति प्रदर्शित किया गया। राष्ट्रपति मिलोसेविक पर विशेष न्यायालय द्वारा मुकदमा और भी तेजी से चलाया गया, यद्यपि कि उन्होंने साक्ष्य प्रस्तुत किया था कि नरसंहार का आरोप जो उन पर लगाया है कि वह वास्तव में नाटो की बमबारी का परिणाम था जिसके कारण कोसोवो एवं बेलग्रेड में नागरिकों की हत्याएँ हुईं। नाटो शक्तियों एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ के सैन्य बलों द्वारा आपराधिक संगठनों को सहायता प्रदान की गई। ये आपराधिक संगठन इस्लामी मुखौटा पहने हुए थे, इनको कुछ इस्लामी देशों के संगठनों द्वारा सहायता भी प्रदान की गई ताकि वे यूगोस्लाविया का बटवारा कर सकें एवं उसके पश्चात सर्बिया का बँटवारा करंे ताकि सर्वों की सामूहिक हत्याओं की जिम्मेदारी न रहे। नागरिकों द्वारा यूगोस्लाविया के न्यायालय के मुख्य सरकारी वकील से शिकायतें की गईं कि वे बेलगे्रड में नाटो देशों द्वारा की गई बमबारी की जाँच करें, परन्तु उनमें से एक पर भी मुकदमा नहीं चलाया गया। इसी प्रकार रवाण्डा में भी हत्याएँ की गईं जो नरसंहार की परिधि में थीं। रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रंट द्वारा की गई सामूहिक हत्याओं की जाँच नहीं की गई यद्यपि कि साक्ष्य मौजूद था कि सभी हत्याएँ रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रंट द्वारा की गई हैं, फिर भी कोई जाँच नहीं हुई क्योंकि रवान्डन पैट्रियाटिक फ्रन्ट के अमरीका एवं ब्रिटेन से घनिष्ठ सम्बन्ध थे। वजह यह थी कि अमरीका एवं ब्रिटेन कान्गो तक फैले हुए सम्पूर्ण क्षेत्र के संसाधनों पर नियंत्रण करना चाहते थे। समकालीन युग के बहुत से देशों में धार्मिक या साम्प्रदायिक संगठनों की सहायता की गई कि वे आपराधिक प्रकृति के व्यक्तियों को संगठित करें ताकि वे गृह युद्ध को प्रारम्भ कर सकें एवं नाटो देश उस राष्ट्र में हस्तक्षेप करने का बहाना ढूढ सकें या छाया सरकारों द्वारा उन पर नियंत्रण कर सकंे। 
 -नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

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