गुरुवार, 8 मार्च 2012

मानव सभ्यता की धुरी हैं हमारे खेत-2



59वें राष्ट्रीय नमूना सर्वे के अनुसार 40 फीसदी किसान तुरंत किसानी छोड़ने को तैयार बैठे हैं यदि उनको जीने का अन्य कोई विकल्प मिल जाए। इस दौरान एक नया फिनोमिना सामने आया है कि खेतिहर किसानों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। सन् 1992 में 22 फीसदी खेतिहर किसान थे, सन् 2002-03 में इनकी संख्या बढ़कर 32 फीसदी हो गई है। दूसरी ओर कृषि उत्पादन में तेजी से गिरावट आई है। खासकर प्रतिव्यक्ति उत्पादन दर में आई गिरावट को अर्थषास्त्री बड़ा खतरा मान रहे हैं। कृषि क्षेत्र में काम के अवसर कम होते जा रहे हैं। एक तरफ उद्योग के क्षेत्र म नौकरियों की कमी है वहीं दूसरी ओर कृषि में भी नौकरियाँ नहीं हैं। ऐसी अवस्था में सामाजिक आर्थिकदशा के और भी बदतर होते चले जाने की संभावनाएँ हैं।
कृषि क्षेत्र में सन् 1990-91 में 3.27 फीसदी विकास दर थी जो सन् 2004-05 में घटकर 1.74 फीसदी रह गई है। जबकि इसी अवधि में गैर-कृषि क्षेत्र में विकास दर 7 और सवा सात फीसदी के आसपास घूमती रही है। कृषि क्षेत्र में काम करने वाली श्रमशक्ति को देखें तो पाएँगे कि सन् 2004 के 61वें राष्ट्रीय नमूना सर्वे के अनुसार 58.5 फीसदी श्रमशक्ति इस क्षेत्र में लगी हुई है। जबकि 1993-94 में इसकी तादाद 62 फीसदी थी। यानी इस दौर में कृषि क्षेत्र में काम धंधा करने वालों की संख्या में कमी आई है। औसत 2 फीसदी की दर से रोजगार दर में गिरावट आई है। पगारजीवी कृषि मजदूरों की संख्या में गिरावट आई है वहीं दूसरी ओर स्व-रोजगार करने वालों की संख्या में 3 फीसदी की दर से इजाफा हुआ है। कृषि मजदूरों, खासकर पुरुषों का बड़ी मात्रा में भवन निर्माण, सड़क निर्माण, होटल, रेस्टोरेंट के कामों की ओर स्थानान्तरण हुआ है। यह भी फिनोमिना सामने आया है कि 1990-91 से 2004-05 के बीच में दैनिक पगार पर काम करने वाले पुरुष मजदूरों की मजदूरी में कोई इजाफा नहीं हुआ, इसके विपरीत औरतों की पगार में कमी आई। 19-24 साल की उम्र के ग्रामीण युवाओं में बेकारी दर चरम पर है।
राष्ट्रीय नमूना सर्वे के 59वें चक्र के सर्वे के अनुसार 48.6 फीसदी किसान कर्ज में डूबे हुए हैं। इसी तरह का सर्वे 1991 में किया गया था उस समय 26 फीसदी किसान कर्ज में डूबे थे। यानी इस बीच में कर्जगीर किसानों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। यानी कर्जगीर किसानों की संख्या दोगुना हो गई है। आंध्र में किए गए सर्वे के अनुसार वहाँ पर 5 में से 4 किसान परिवार कर्जगीर थे। तमिलनाडु में तीन-चैथाई किसान परिवार, केरल, पंजाब और कर्नाटक में दो-तिहाई किसान परिवार कर्जगीर हैं, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात,
मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 50 फीसदी किसान परिवार कर्जगीर हैं। सर्वे से यह भी पता चला है कि स्थानीय सूदखोर सबसे बड़ा ताकतवर वर्ग बनकर सामने आया है। क्योंकि ज्यादातर किसानों पर उसका ही कर्ज है। तकरीबन 29 फीसदी किसान उससे ही कर्ज लेते हैं। जबकि 12 फीसदी किसानों ने विभिन्न वस्तुओं के लेन-देन के रूप में दुकानदारों से कर्ज लिया है। मात्र 56 फीसदी किसानों ने वित्तीय संस्थानों जैसे बैंक आदि से कर्ज लिया है। कर्ज से मरने वाले किसानों की संख्या 1995 के बाद गैर सरकारी तौर पर दो लाख से ज्यादा आँकी गई है।
अधिकांष किसानों की आत्महत्या का प्रधान कारण था सूदखोरों का कर्ज न चुका पाना और उपज के उचित मूल्य का न मिलना। यह भी देखा गया कि कई दशक से किसान जो खेती कर रहा है वह घाटे में कर रहा है। उसका लागत मूल्य उसे नहीं मिल रहा है। इसकी ओर किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत मीडिया, कारपोरेट स्वार्थ और सरकार ने मिलकर किसान की आत्महत्या के मसले को लोकल मसला बना दिया। कानून-व्यवस्था और कर्ज का मसला बना दिया। किसान की आत्महत्या का प्रधान कारण है उसके लागत मूल्य का न मिलना। वह कर्ज से परेशान है इसलिए क्योंकि लागत मूल्य नहीं मिलता। वह लगातार साल दर साल घाटा उठाकर खेती करता रहता है और जब घाटे का बोझ उठाने में अपने को असमर्थ पाता है तो आत्महत्या कर लेता है। यह भी पाया गया कि महाराष्ट्र में आत्महत्या करने वाले 80 फीसदी किसानों को कोई आर्थिक मदद राज्य सरकार से नहीं मिली।
भारत के किसानों की दुर्दशा के साथ चीन या किसी भी विकसित देश के किसानों की तुलना नहीं की जा सकती है। केन्द्र सरकार की नीतियों और विभिन्न राज्य सरकारों की नीतियों के केन्द्र में किसान कभी नहीं रहा, किसान की तकलीफों को कभी केन्द्रीय महत्व का दर्जा नहीं दिया गया। किसान को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखने के बजाए स्थानीय परिप्रेक्ष्य में देखा गया। उसकी समस्याओं को स्थानीय समस्याओं के रूप में पेश किया गया।
किसान को उसके संकट से निकालने का मार्ग किसानी में से नहीं निकलता। किसान को किसानी से हम जितना बेहतर ढंग से सुरक्षा देते हुए मुक्त करते जाएँगे, उतना ही कृषि संकट कम होगा। कृषि उत्पादन बढ़ाकर इस संकट से नहीं निकल सकते। इस संकट से निकलने के लिए वैकल्पिक नजरिए की आवष्यकता है। किसान की समस्या को जब तक सरकार किसान वर्ग की समस्या के रूप में नहीं देखती तब तक संकट पीछा नहीं छोड़ेगा। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि विश्व व्यापार संगठन की विश्वनीतियों का बुरा असर सीधे किसानों पर पड़ रहा है। उन नीतियों से बचाने के लिए नीतिगत संरक्षणात्मक उपाय भी सरकार को करने चाहिए। अभी हालात यह हैं कि हमारे देश में विश्व व्यापार संगठन की नीतियों से बचाने के कोई भी उपाय करने की स्थिति में सरकार नहीं दिखती। उस पर बहुराष्ट्रीय कृषि कारपोरेट घरानों का दबाब है जिसके कारण किसानों को अरक्षित छोड़ दिया गया है।
किसानों की तबाही का एक स्तर आर्थिक है और दूसरा सांस्कृतिक है। आर्थिक तबाही की ओर कभी-कभार ध्यान भी चला जाता है लेकिन सांस्कृतिक तबाही की ओर हमारा ध्यान एकदम नहीं जाता। हम किसान की आत्महत्या पर खबरें देख भी लेते हैं लेकिन किसान की सांस्कृतिक हत्या के सवाल हमारे विवादों का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। हम जानते तक नहीं हैं कि आखिरकार किसानों को किस तरह की सांस्कृतिक बर्बादी का सामना करना पड़ रहा है।
केन्द्र सरकार की ओर से 11वीं पंचवर्षीय योजना में 25 हजार करोड़ की आर्थिक मदद की घोषणा की गई थी, जबकि उसी योजना में उद्योगपतियों को एक लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष के करों में छूट देने की घोषणा की गई। शहरों में सिनेमा हैं, स्कूल हैं, कॉलेज हैं, विश्वविद्यालय हैं, लेकिन गाँवों में इनका पूरी तरह अभाव है। मनोरंजन के नाम पर कहीं-कहीं टी0वी0 चैनल हैं खाली। गाँवों में अखबार नहीं पहुँचते। स्थानीय भाषा में शिक्षा, लोक कला, लोक संगीत आदि की शिक्षा, प्रशिक्षण, मंचन, संचार आदि का कोई ढांचा उपलब्ध नहीं है।
-डा जगदीश्वर चतुर्वेदी
क्रमश:

कोई टिप्पणी नहीं: