शुक्रवार, 9 मार्च 2012

मानव सभ्यता की धुरी हैं हमारे खेत-3


हमने किसानों के विकास के लिए तेज औद्योगिकीकरण का रास्ता नहीं अपनाया। मैन्यूफैक्चरिंग से सेवाक्षेत्र की ओर समूचे विकास की दिशा को मोड़ दिया है। इससे किसान की पामाली और बढ़ी है। उसके सामाजिक रुपान्तरण की प्रक्रिया में विचलन आ गया है। वह लगातार लंपट सर्वहारा बनता चला जा रहा है। भारत की विलक्षण स्थिति है कि यहाँ पर किसान का तेजी से विस्थापन हो रहा है, वह नगर महानगर की ओर पलायन कर रहा है।
इस क्रम में एक बड़ी आबादी क्रमषः निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग में रूपान्तरित हो रही है। शहरों की झुग्गी-झोंपडि़यों के इलाकों में समानान्तर बस्तियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। एक अवधि के बाद इन बस्तिया
को वैध बनाने की माँग उठती है और देखते-ही देखते इन कच्ची बस्तियों की जगह पक्की रिहायशी कॉलोनी जन्म ले लेती है। कुछ महानगरों में झुग्गी बस्तियों में रहने वालों को ठेलकर उपनगरों और पुनः गाँवों की ओर बसाया जा रहा है। दिल्ली-मुंबई आदि में यह फिनोमिना साफ तौर पर देखा जा सकता है। मूल बात यह है कि किसान का विस्थापन सिर्फ किसान को ही अस्त-व्यस्त नहीं करता अपितु अन्य शहरी बाषिंदों को भी सीधे प्रभावित करता है। मुश्किल यह है कि किसानों के विस्थापन के बारे में हमारे पास सही समझ नहीं है, दीर्घकालिक प्रतिवाद का कार्यक्रम नहीं है, यदा-कदा वामदलों और कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने किसानों की बेदखली का विरोध किया है, अनेक स्थानों पर आंदोलन किए हैं। इस प्रसंग में उनकी नजर में तात्कालिक राजनैतिक कार्यभार प्रमुख रहे हैं। वे समूची प्रक्रिया और उससे जुड़े राजनैतिक एजेण्डे को आम जनता में लोकप्रिय बनाने में असमर्थ रहे हैं।
किसानों के जीवन में मच रही तबाही के स्वर जितने तीव्र होने चाहिए वे कहीं नजर नहीं आते, इसका प्रधान कारण है किसानों में निरंतर संगठन और आंदोलन का अभाव। दूसरा कारण है, किसान की गैर-क्रांतिकारी वर्गीय प्रकृति। मसलन् किसानों की माँगों पर ज्यों ही किसी इलाके में आंदोलन आरंभ होता है कुछ अर्से के बाद किसान नेताओं और आम किसानों को तरह-तरह के प्रलोभन मिलने आरंभ हो जाते हैं। यह प्रलोभन निजी लाभ से लेकर राजनैतिक कैरियर तक फैले होते हैं। दूसरा कारण है कि किसानों को सामाजिक परिवर्तन के बृहत्तर परिप्रेक्ष्य के इर्दगिर्द लामबंद नहीं कर पाए हैं।
वामदलों के द्वारा संचालित किसानों के अधिकाँश आंदोलन तात्कालिक अर्थवाद से आरंभ होते हैं और उसके इर्दगिर्द ही समाप्त हो जाते हैं। इसके कारण किसानों को सामाजिक परिवर्तन की बृहत्तर प्रक्रिया में खींचने में अभी तक सफलता नहीं मिली है। वामदलों के नेतृत्व में चलने वाले किसान संगठनों में साझा माँगें हैं, साझा लक्ष्य हैं, लेकिन इस आंदोलन और किसान संगठनों का देश में असमान विकास हुआ है।
किसान सभाओं की अब तक की माँगों पर गौर करें तो अधिकाँश समय कृषि उपज का उचित मूल्य, मुफ्त में बिजली, अवैध भूमि अधिग्रहण के प्रतिवाद के मसले आंदोलन में प्रमुखता से उठे हैं। किसानों के सांस्कृतिक हितों और जरूरतों के सवालों पर कभी कोई संघर्ष नहीं हुआ है। आर्थिक मसलों को उठाने के कारण जहाँ एक ओर नीतिगत संघर्ष सामने आए वहीं दूसरी ओर किसान जीवन का अर्थवाद सामने आया और अंततः किसान आंदोलन अर्थवाद में ही फँसकर रह गया। किसान सभाएँ और आंदोलनकारी संगठन इन मसलों पर चले संघर्षों को बड़े राष्ट्रीय या क्षेत्रीय प्रतिवाद बनाने में सफल नहीं हो पाए। इसका परिणाम यह निकला कि केन्द्र सरकार के द्वारा किसानों की सब्सीडी कटौती को नहीं रोका गया। स्थानीय मसलों पर सरकार से यत्किंचित रिहायत हासिल करके शांत हो गए।
मसलन, अनेक इलाकों में किसानों ने सेज और दूसरे प्रकल्पों के लिए भूमि अधिग्रहण को वापस करा दिया या रुकवा दिया। इससे स्थानीय स्तर पर लाभ हो गया, लेकिन किसानों के ऊपर आर्थिक उदारीकरण के कारण पड़ रहे नीतिगत सवालों पर कोई राष्ट्रीय बहस और आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए। इसी तरह उदारीकरण के विभिन्न चरणों में कृषि क्षेत्र में आए परिवर्तनों को लेकर कोई सुसंगत मूल्यांकन प्रतिवादी संगठन पेश नहीं कर पाए। यहाँ तक कि संसद में भी कोई मुकम्मल बहस नहीं हुई।
एक तरफ सरकार ने सब्सीडी कम कर दी दूसरी ओर किसानों की खेती में लागत बढ़ती गई इससे किसानों की पामाली में इजाफा हुआ। विष्व व्यापार संगठन और अन्य विष्व संस्थाओं के दबाब में केन्द्र सरकार ने विदेशों से कृषि और उससे जुड़े मालों के अबाध प्रवेश का मार्ग खोल दिया। उन पर लगने वाले टैक्सों में इच्छित रियायतें दीं। इससे विदेशी माल धड़ल्ले से बाजार में आ गए। फलतः विदेशी माल की तुलना में देशी किसान के माल की कीमत ज्यादा हो गई और वह बाजार में टिकने की अवस्था में नहीं रहा। पामाली की अवस्था में किसानों को बैंकों से कर्ज मँहगा और जटिल हो गया, इससे किसानों को मजबूरी में सूदखोरों की शरण में जाना पड़ा। फलतः आत्महत्याओं में तेजी आई। केन्द्र सरकार ने यदि आर्थिक उदारीकरण के आरंभ में ही किसानों के कर्ज माफ कर दिए होते और बैंकों से आसान ब्याज दरों पर कर्ज मुहैय्या करा दिया होता तो बड़े पैमाने पर किसानों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता था। मसलन् 1995-96 में ही कर्जमाफी और कर्ज की ब्याज दरों में कमी का फैसला ले लिया जाता तो कम से कम 2 लाख किसानों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता था।
इसी तरह ग्रामीण विकास के कार्यक्रमों जैसे सड़क, बिजली, पानी, परिवहन के लिए आवंटित धन, सुविधा और राजनैतिक सक्रियता में इस दौर में गिरावट आई है। कृषि के अनुसंधान पर होने वाले कामों में धनाभाव के कारण कमी आई है।
केन्द्र सरकार के नीतिगत कदमों के किस तरह के दूरगामी असर हो सकते हैं इनके बारे में मीडिया से लेकर राजनैतिक दलों तक व्यापक अचेतनता को सहज ही देखा जा सकता है। मसलन् केन्द्र सरकार ने अमरीका के बुश प्रशासन के साथ 2006 में उनकी भारतयात्रा के दौरान एक समझौता किया था इसे “भारत-अमरीका कृषि ज्ञान पहलकदमी” के नाम से जाना जाता है। इसे सरकार ने दूसरी हरित क्रांति के नाम से आम लोगों में प्रचारित-प्रसारित किया है।
अमरीका के साथ किए गए इस समझौते ने ज्ञान से लेकर सामाजिक-आर्थिक धरातल तक समस्त संरचनाओं को प्रभावित किया है। इस समझौते के कारण नीतिगत और आर्थिक विकास की दिषा को अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पक्ष में मोड़ दिया गया है। यही वह मुख्य समझौता है जिसके आधार पर हमारे देश में बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियाँ अपने बीज लेकर आ रही हैं। यही वह समझौता है जिसके आधार पर हमारे देष में कृषि अनुसंधानों पर होने वाले खर्चों में कटौती की गई है। इसके आधार पर ही बीज नीति, खाद नीति आदि बनाई गई हैं। यही वह समझौता है जिसके आधार पर वॉलमार्ट के भारत में प्रवेश का आधार बना है। इस समझौते के आधार पर अमरीका को सीधे हमारी कृषि नीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े सवालों पर हस्तक्षेप करने का अधिकार मिल गया है और वे लोग आए दिन तरह-तरह के सुझाव देते रहे हैं और भारत सरकार उन सुझावों को आँख बंद करके मानती रही है।
-डा जगदीश्वर चतुर्वेदी
क्रमश:

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!