मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -7

अन्तर्राष्ट्रीय समझौते के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर का उल्लंघन पूरी स्वतंत्रता से किया जा रहा है। उसको सदैव आधारभूत समझा गया कि संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य एवं सिद्धांत के   सम्बन्ध में अध्याय एक, धारा चार में यह कहा गया है कि सभी सदस्य देश अपने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बंधों में किसी भी देश की राजनैतिक स्वतंत्रता एवं भूभागीय एकता के खिलाफ धमकी एवं बल का प्रयोग करने से परहेज करेंगे। अध्याय एक, धारा सात के अन्तर्गत यह आवश्यक है कि ‘‘इस चार्टर के अन्तर्गत संयुक्त राष्ट्र संघ किसी राष्ट्र के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा या किसी राष्ट्र को चार्टर के अन्तर्गत किसी निपटारे के लिए विवश नहीं करेगा। परन्तु यह सिद्धांत अध्याय सात के अन्तर्गत किए गए किसी प्रकार के समाधान पर लागू नहीं होगा।
    अध्याय आठ, धारा 52 के अन्तर्गत जो क्षेत्रीय व्यवस्थाओं से सम्बंधित हैं, यह उल्लेख किया गया है कि वर्तमान चार्टर के अन्तर्गत क्षेत्रीय व्यवस्थाओं अथवा ऐसे मामलों के निपटारा करने में शीघ्रता करने से कदापि रोका नहीं गया जिनका सम्बंध अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को बनाए रखना है, शर्त यह कि ऐसी व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धांत एवं उद्देश्यों से भिन्न न हो।
    इन सभी नियमों की स्पष्टवादिता के बावजूद बिना किसी न्यायोचितता के लीबिया के आन्तरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप किया गया। जबकि अफ्रीकी संगठन ने शांतिपूर्वक निपटारें के लिए सिफारिशें पेश की थीं। एक पूरे समाज एवं उसके मानव निर्मित नई व्यवस्था को नष्ट कर दिया गया। नाटों देश, दूसरी तरफ यह चाहते हैं कि हम यह विश्वास करें कि उन्होंने ऐसा नागरिकों की सुरक्षा के लिए ‘‘नो फ्लाई जोन’’ प्रस्ताव संख्या 1973 (2011) के अन्तर्गत किया। नाटो वायुयानों को उड़ान भरने की छूट थी। नेशनल ट्रांजीशनल काउसिंल को महासभा एवं सुरक्षा परिषद द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में उस समय स्थान प्रदान किया जबकि लीबिया के अधिकतर भागों पर इसका नियंत्रण जाता रहा था। इसके विपरीत पैलिस्टीनियन राज्य एवं सरकार को संयुक्त राष्ट्र संघ मंे कोई स्थान प्रदान नहीं किया गया। जबकि अरब राज्य, पैलिस्टाइन की सीमाओं का निर्धारण संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा किया गया जैसा कि इस्राइल की सीमाओं का निर्धारण किया गया था। इस राज्य को पैलेस्टाइन राज्य की जमीन पर अवैध कब्जा करके बनाया गया था।
    डेनिस साउथ, नामक टीकाकार, ने टिप्पणी की है कि ‘‘युद्ध कर्नल-गद्दाफी के बारे में नहीं, युद्ध न्याय बनाम अन्याय के मध्य है। यह गुलामी बनाम आजादी के मध्य है। यह नृशंस जातिवादी आधिपत्य बनाम उदार इंसानी सहयोग एवं प्रेम के मध्य है।
    नेशनल ट्रांजीशनल काउसिंल प्रथम संस्था थी जिसने तथाकथित सीरियाई गठबंधन को मान्यता प्रदान की थी जिसे नाटों देशों ने तुर्की की मदद से बनाया था। सीरिया को पहले से ही नाटो एवं उसके पड़ोसी देशों जैसे सऊदी अरब, जार्डन एवं तुर्की के द्वारा सशस्त्र विद्रोहियों के माध्यम से निशाना बनाया गया। टर्की, जो एक नाटो देश है उसने लीबिया के अधिग्रहण को संगठनात्मक समर्थन प्रदान किया है। उसने अफगानिस्तान में सैनिक भेजे एवं सीरिया को आक्रमण की धमकी दी एवं उत्तरी इराक में कुर्दों के खिलाफ युद्ध किया। ईरान ने लीबिया की नेशनल ट्रांजीशनल काउंसिल को समर्थन प्रदान किया, तथा अपने हित में उसने अमरीकी आधिपत्य वाली सेनाओं को अफगानिस्तान तथा इराक में सहयोग प्रदान किया, किन्तु फिर ईरान, उन देशों की सूची में बहुत आगे है, जिनको नाटो देशों के द्वारा निशाना बनाया जा सकता है। कूटनीतिक तटस्थता के सारे आडम्बरों को ताक पर रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बानकी मून ने खुले ढंग से अपनी निराशा को व्यक्त किया कि कुछ लीबिया में घटित हुआ इसके बावजूद सीरिया के बारे में प्रस्ताव को वीटो कर दिया गया। संक्षेप में संयुक्त राष्ट्र संघ की गिरावट का यह खुला हुआ उदाहरण है। संयुक्त राष्ट्र संघ अब मानवाधिकार, प्रजातंत्र एवं मानवता की सेवा करने के बजाए, विश्व के प्रबल आर्थिक एवं कारपोरेट हस्तियों की सेवा में रत है।
-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

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