रविवार, 8 अप्रैल 2012

कृषि प्रधान देश-बदहाल किसान



     कहने को तो भारतवर्ष   को दुनिया  में  कृषि प्रधान देश के रूप में जाना जाता है। इतना ही नहीं बल्कि हमारे देश में भी किसानों को अन्नदाता कहकर सम्बोधित किया जाता है। परन्तु देश में चल रही पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित कथित ‘विकास धारा’ की ज़द में आकर यही कृषक समाज अथवा किसान देश की विभिन्न सरकारों द्वारा कभी अपनी खेती की ज़मीनों से बेदख़ल किया जाता दिखाई देता है तो कभी इसका विरोध करने पर लाठियाँ, गोलियाँ तक खानी पड़ती हैं, और कई बार किसानों के साथ होने वाली यही दमनात्मक कार्यवाई किसान-पुलिस संघर्ष का रूप धारण कर लेती है। परिणाम स्वरूप कई लोगों को अपनी जानें तक गँवानी पड़ती हैं। ऐसा ही दुर्भाग्यपूर्ण नज़ारा गत कुछ वर्षों में सिंगूर, नंदीग्राम, गुड़गाँव, जैतापुर तथा दिल्ली से सटे गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के समीप भट्ठा पारसौल गाँव आदि जैसे कई स्थानों में देखा गया। उन दिनों भट्ठा पारसौल गाँव में घटित किसान पुलिस संघर्ष तो इतना बढ़ा कि इसका प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर आगरा तक देखा गया। नोएडा से आगरा तक यमुना एक्सप्रेस हाईवे के निर्माण के अन्तर्गत आने वाली किसानों की जमीनों के अधिग्रहण के विरोध में यह रोष भड़का था। इस संघर्ष एवं रोष ने कई सुरक्षाकर्मियों व किसानों की जानें ले लीं तथा सम्पत्ति का भारी नुकसान हुआ।
    भारतवर्ष को एक विकसित राष्ट्र बनाए जाने की दिशा में राजकीय स्तर पर प्रयास जारी हैं। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए देश में तमाम नए उद्योग स्थापित करने की आश्यकता महसूस की जा रही है। तमाम नए उपनगर बसाए जा रहे हैं। तमाम नए एक्सप्रेस हाईवे तथा राजमार्ग निर्मित हो रहे हैं तथा बड़े पैमाने पर सड़कों के चैड़ीकरण का काम भी चल रहा है। जाहिर है विकास के इन कार्यों के लिए जमीन उपलब्ध कराने की सबसे बड़ी चुनौती सरकार के समक्ष है। हमारे देश में कुछ राज्य ऐसे हैं जोकि निवेशकों के लिए अपने प्रवेश द्वार खोले हुए बैठे हैं। जबकि कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहंा विशेष आर्थिक जोन (सेज़) हेतु जमीनों का
अधिग्रहण तो जरूर किया गया है परन्तु इस विषय पर गहरी राजनीति होती हुई भी देखी जा रही है। पश्चिम बंगाल का नंदीग्राम तो पूरे देश के सेज विरोधियों के लिए गोया एक प्रतीक सा बन चुका है। प्रश्न यह है कि क्या कृषि योग्य भूमि को समाप्त करने की शर्त पर विकास कार्य किए जाएँगे? और इन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सरकार के पास उपजाऊ भूमि के अधिग्रहण के अतिरिक्त विकास करने हेतु कोई दूसरा विकल्प बचा ही नहीं है?
    जब बात विकास की हो तो प्रायः हम अपने देश की तुलना चीन से करने लगते हैं। चीन व भारत को मिली आजादी में कोई विशेष समय अन्तराल नहीं है। इसके बावजूद आखिर चीन इतना विकसित कैसे हो गया। जबकि भारत अभी अपने विकास का खाका मात्र ही तैयार कर रहा है। भारत के विकास की योजना बनाने वाले रणनीतिकारों ने जब चीन का दौरा किया तथा उनकी औद्योगिक, वाणिज्यिक एवं आर्थिक नीतियों को न सिर्फ कागजों व फाइलों में बल्कि धरातलीय स्तर पर भी उसे गौर से देखा तो उनके कान खड़े हो गए। दरअसल चीन में बने तमाम विशेष औद्योगिक क्षेत्र की तर्ज पर ही भारत में विशेष आर्थिक जोन अथवा सेज स्थापित किए जा रहे हैं। चीन में स्थापित इस प्रकार के अधिकांश विशेष औद्योगिक क्षेत्र समुद्र के किनारे स्थापित किए गए हैं या फिर इसके लिए बंजर भूमि का इस्तेमाल किया गया है। समुद्र के किनारे स्थापित होने वाले विशेष औद्योगिक क्षेत्रों हेतु अलग बन्दरगाहों की व्यवस्था है। ये औद्योगिक क्षेत्र समुद्र के किनारे होने के कारण शहरों को प्रदूषण से मुक्त रखते हैं। चूँकि इन क्षेत्रों में अधिकांश कच्चे माल की आपूर्ति भी जलमार्ग के द्वारा हो जाती है तथा इनके द्वारा निर्मित माल का निर्यात भी जलमार्ग से ही हो जाता है, इसलिए इन औद्योगिक  क्षेत्रों में प्रयोग में आने वाले ट्रांसपोर्ट का बोझ भी शहरों पर नहीं पड़ता।
    अतः न सिर्फ यातायात व्यवस्था प्रभावित होने से बचती है बल्कि शहरों में प्रदूषण कम होने कारण पर्यावरण पर भी इस औद्योगीकरण का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। चीन में किसानों की उपजाऊ जमीनों का अधिग्रहण कर उनकी पुश्तैनी जमीनों से भारत की तर्ज पर जबरन बेदखल नहीं किया जाता। चीन में उपजाऊ जमीन को बलात् अधिगृहीत कर उस पर सड़कें बनाने के बजाए फ्लाईओवर बनाने पर ज्यादा जोर दिया जाता है।
    हमारे देश में विशेष औद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने तथा नए राजमार्ग बनाने व टाउनशिप बसाने का फैसला तो जरूर किया गया, परन्तु कृषि रूपी पारंपरिक उद्योग को उजाड़कर उन जगहों पर अन्य शहर, मार्ग अथवा उद्योग स्थापित किए जाने का फैसला हरगिज सही नहीं कहा जा सकता। हमारे देश में भी लंबी दूरी के फ्लाईओवर हाईवे बनाए जा सकते हैं। यहाँ भी समुद्री किनारों पर लाखों एकड़ जमीन उद्योग स्थापित करने हेतु अधिगृहीत की जा सकती है। यदि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से नए औद्योगिक जोन समुद्र के किनारे स्थापित नहीं भी करना चाहते तो भारत जैसे विशाल देश में बंजर व बेकार भूमि की भी कोई कमी नहीं है। इन पर बड़े से बड़े औद्योगिक क्षेत्र बनाए जा सकते हैं। बल्कि ऐसा करने से तो नए औद्योगिक शहर बसने की संभावनाएँ भी बढ़ जाती हैं। फिर आखिर कृषि योग्य भूमि पर ही क्योंकर नजर रखी जाती है? कहीं यह सब किसानों के विरुद्ध रची जा रही एक बड़ी साजिश का हिस्सा तो नहीं? या कहीं सत्ता में बैठे मुट्ठी पर दलालों के द्वारा देश के विकास के नाम पर इसी भूमि अधिग्रहण के नाम पर धनवान बनने की यह कोशिश तो नहीं?
    यदि वास्तव में भारत सरकार व देश के औद्योगिक विकास के क्षेत्र में उसका साथ देने वाली राज्य सरकारें कृषि प्रधान देश होने के चलते देश के औद्योगिक विकास के लिए गंभीर हैं तो उन्हें किसानों से उनकी जमीनों का अधिग्रहण करने के बजाए कृषि उद्योग को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाना चाहिए। उन्हें नई तकनीक पर आधारित उन्नत खेती करने के उपाय सुझाने चाहिए तथा इसके लिए उनकी सहायता करनी चाहिए। हमें यह हरगिज नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश की 30 से लेकर 40 प्रतिशत तक की आबादी गाँवों में रहती है तथा उसके जीविकोपार्जन का साधन भी मात्र खेती ही है। लिहाजा यदि चन्द पैसे देकर किसानों से उनकी जमीनें छीन ली गईं तो निःसन्देह यह उन किसान परिवारों के बच्चों के भविष्य के लिए बेहतर नहीं होगा। जब कृषि प्रधान देश भारतवर्ष का अन्नदाता कृषक समाज ही खुश व संतुष्ट नहीं रहेगा फिर आखिर हम देश की खुशहाली की कल्पना कैसे कर सकते हैं? किसानों को मात्र अन्नदाता मानना ही काफी नहीं है बल्कि यह देश का वह विशाल समाज है जो अपनी फ़सलों के कटने के बाद बाजार में खुशहाली लाने का कारक भी बनता है। परन्तु जब यही अन्नदाता जमीनों से बेदखल किया जाने लगेगा फिर आखिर हम इस किसान से न तो अन्न के पैदावर की उम्मीद रख सकेंगे न ही किसी प्रकार की खरीददारी की। बजाए इसके वह किसान व उसका परिवार स्वयं अपनी आजीविका के लिए दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हो जाएगा।
    लिहाजा जरूरत इस बात की है कि केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें अथवा देश को औद्योगिक विकास की राह पर ले जाने वाले विशेष रणनीतिकार, सभी को देश के किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए ही कोई फैसला लेना चाहिए। किसी भी भूमि के अधिग्रहण से पूर्व तुगलकी फरमान जारी करने के बजाए राजनैतिक तथा जमीनी स्तर पर आपसी सहमति बनने के बाद ही किसी निर्माण अथवा उद्योग को आमंत्रित किया जाना चाहिए। भारत में लागू भूमि अधिग्रहण अधिनियम की पुनर्समीक्षा की जानी चाहिए तथा इसमें किसानों के हितों को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए और इन सबसे बड़ी बात यह है कि यदि वास्तव मंे सरकार देश में नए राजमार्ग बनाना चाहती है, नई टाउनशिप अथवा बड़े उद्योग आमंत्रित व स्थापित करना चाहती है तो उसे उपजाऊ भूमि की ओर देखना बन्द कर देना चाहिए तथा केवल समुद्री तटों की अथवा दूरदराज की बंजर जमीनों का इस्तेमाल करना चाहिए। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में कृषि जैसी अन्नपूर्ण व्यवस्था को उजाड़कर उद्योग के नाम पर आग एवं धुआँ उगलती हुई चिमनियाँ स्थापित कर देना हरगिज मुनासिब नहीं है और न ही सरकार की ऐसी गलत नीतियों के चलते देश के किसानों व सुरक्षाकर्मियों के मध्य होने वाले दुर्भाग्यपूर्ण खूनी संघर्ष उचित हैं। 
-तनवीर जाफ़री
   मो. 09896219228

1 टिप्पणी:

यशवन्त माथुर ने कहा…

आज 22/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर (सुनीता शानू जी की प्रस्तुति में) लिंक की गया हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!