शनिवार, 7 अप्रैल 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -11

मुम्बई शहर में जहाँ छिपी शक्तियाँ  कार्यरत हैं, हममें से कुछ लोगों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया जिसको कि वर्तमान समय मंे सर्वाधिक विध्वंसात्मक गतिविधियों में एक समझा जाता है। बिना किसी आधार के प्रोफेशनलस के चैम्बर को तलाशा गया तथा उनके टेलीफोन एवं मोबाइल को टेप किया गया। नीरा राडिया टेप्स उन लोगों की दृष्टि मंे एक प्रकार से ईश्वरीय न्याय था जिनके कम्प्यूटर को गुप्तचर एजेंसिया खगालती हैं तथा जिनके कम्प्यूटरों को ऐसे व्यक्तियों तथा अधिवक्ताओं के द्वारा खँगाला जाता है जो भारतीय कारपोरेट घरानों एवं विदेशी गुप्तचर एजेंसियों के लिए कार्य करते हैं। यद्यपि कि हमारे कार्य में नाम मात्र की भी अवैधता नहीं थी एवं हर सम्पर्क को रिकार्ड किया गया था एवं सुना गया था।
    सामाजिक रूप से यह समय व्यापक गिरावट का रहा है, क्योंकि दलितों के ऊपर जानलेवा हमला किया गया। राज्यों की पुलिस द्वारा भी शांतिपूर्वक राजनैतिक आन्दोलनों के लिए उनका दमन किया गया। क्षेत्रीय एवं   धार्मिक पहचान को राष्ट्रीय परिवेश की तुलना में ज्यादा उभारा गया। बावजूद इसके कि आधुनिकता, तकनीकी एवं वैज्ञानिक प्रगति का ढिंढोरा पीटा गया। अब संसार में राजनैतिक दलों के पास सामाजिक एवं राजनैतिक परिवर्तन के लिए कोई गंभीर आन्दोलन नहीं है। परिणाम स्वरूप यह राजनैतिक रिक्तता कारपोरेट के द्वारा विदेशों से धन प्राप्त गैर सरकारी संगठनों जैसे फोर्ड, राकफेल्लर अथवा अन्य कारपोरेट फाउन्डेशनों द्वारा भरी जा रही है। ये संगठन जिनको धन प्राप्त होता है,  प्रतिदिन भ्रष्टाचार पर लम्बा चैड़ा भाषण देते हैं एवं इसके पीछे राजनेता एवं नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के वास्तविक स्रोत को बड़ी चतुराई से छुपाते हैं क्योंकि कारपोरेटों के द्वारा ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जाती है। परिणाम स्वरूप, भ्रष्टाचार के विरोध में चुने हुए शब्दों का निन्दा स्वरूप प्रयोग का उद्देश्य केवल सरकार अथवा संस्था विशेष को गिराना होता है, ताकि वे बेहतर अराजकतावादी विकल्प को ला सकें। देश की राजधानी के निकट खाप पंचायतें बड़ी आजादी के साथ मौत की धमकी निर्गत करती हंै एवं ऐसे लोगों की हत्या कर देती हैं जो अन्तर्जातीय या अन्तर्धर्मी विवाह करते हैं। इस सम्बन्ध में लड़कियों की हत्या आम है।
       एक विद्वान राजनीतिज्ञ एवं आर्थिक टीकाकार जाने बेलामी फास्टर ने स्तवान मेस्जारी की पुस्तक ‘‘राजधानी की संरचनात्मक विपत्ति’’ के प्राकथन में लिखा कि वर्तमान आर्थिक विपत्ति ऐसे खतरों को सामने लाती है जो विश्व की 1929-33 की बड़ी आर्थिक मंदी से भी ज्यादा गंभीर है। यह विपत्ति पूरे विश्व में है। यह ऐतिहासिक विपत्ति है। जैसा कि 19वीं शताब्दी के सांस्कृतिक इतिहासकार जैकब बरखाई ने टिप्पणी की। उनके अनुसार ऐतिहासिक विपत्ति एक ऐसी विपत्ति है जिसमें वस्तुआंे की सभी अवस्थाओं में विपत्ति आती है एवं जिसमें सभी युग एवं सभी सभ्यताओं के सभी लोग शामिल होते हैं। ऐतिहासिक प्रक्रिया अचानक भयंकर रूप से तेज कर दी जाती है। विकास जिसमें अन्यथा सदियों लगते हैं वे महीनों या सप्ताहों मंे परछाइयों की भाँति गुजरते प्रतीत होते हैं एवं पूरे हो जाते हैं।
    हम एक ऐसे ही आर्थिक गिरावट के ऐतिहासिक युग में रह रहे हैं एवं परिणाम स्वरूप देशों की संवैधानिक एवं विधिक व्यवस्थाएँ जो अब तक प्रमुख आर्थिक शक्तियाँ समझी जाती थीं पूरी तरह ढह चुकी हैं। हमने देखा है कि आर्थिक इतिहास में सबसे बड़े बैंक एवं कारपोरेट धोखाधड़ी के परिक्षेत्र में उनकी विधिक व्यवस्थाएँ पंगु हो चुकी हैं। आश्चर्य की बात यह है कि यह वही आर्थिक राजनैतिक, संवैधानिक एवं विधिक नमूने हैं जिसका अनुकरण करने के लिए हमें उत्प्रेरित किया जाता हैं। हम यह भूल गए हैं कि हममें से एक अधिवक्ता अर्थात महात्मा गांधी ही थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य धारा का नेतृत्व किया, जिसकी कई धाराएँ थी। उसी वकील ने यह इच्छा जाहिर की थी कि हम प्रजातंत्र के इस पश्चिमी राजनैतिक, आर्थिक नमूने का अतिक्रमण करें क्योंकि उन्होंने इस नमूने की प्रारम्भिक अराजकता देखी। गांधी जी कि यह इच्छा थी कि हम समाज के आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सबसे कमजोर वर्ग के हितों को अपने नीतियों में प्रमुख स्थान प्रदान करें। डाॅ0 अम्बेडकर जो एक प्रसिद्ध वकील एवं प्रथम श्रेणी के कानूनवेत्ता थे उन्होंने हमें सचेत किया था कि बिना आर्थिक न्याय के हम प्रजातंत्र के सम्पूर्ण संवैधानिक ढाँचे को खतरे में डाल देंगे। जबकि भगत सिंह ने साम्राज्यवाद से अपने आपको स्वतंत्र रखने की आवश्यकता पर बल दिया। तीनों महानुभाव इसके खिलाफ थे कि हम अपने देश को ‘‘भूखों के गणतंत्र’’ में परिवर्तित करें।
    अभी हाल के दिनों डाॅ0 अशोक मिश्रा ने एक पुस्तक ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था: समस्याएँ एवं भविष्य’’ की विवेचना करते हुए यह विचार व्यक्त किया कि ‘आर्थिक उदारवाद के उन्माद ने एक खतरनाक भ्रम उत्पन्न कर दिया है, वह यह कि इतिहास का अपमान’ ’’यह एक भिन्न भारत है एवं योजना आयोग’’ जैसा कि इस समय अस्तित्व में है गरीबों को और गरीब बनाना चाहता है। यह प्रजातंत्र एवं मानवाधिकार को और अधिक विपरीत ढंग से प्रभावित करेगा। जो पहले से ही निगमोें एवं बैंकों के द्वारा शुरू किए गये विश्व व्यापार संगठन के सुधारों से कमजोर हो चुका है। सर्वोच्च न्यायालय के मशहूर जज, जस्टिस लुईस बैन्डिस ने बीसवीं सदी के प्रारम्भ में एक चिंतनीय निर्णय में कहा था कि ‘अमरीकी समाज का निगमों द्वारा गुलाम बनाना अफ्रीकी-अमरीकी समुदाय की गुलामी के समान होगा। यह हमारी मूर्खता होगी यदि हम इस चेतावनी की उपेक्षा करें। 

-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
मो. 08009513850

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