शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -10

सुधारों का यह समय समाज के विघटन में परिवर्तित हुआ है, हमारी आर्थिक  नीतियों को पश्चिम के प्रमुख आर्थिक केन्द्रों से जोड़ने के नतीजे में ऐसी राजनैतिक व्यवस्था उभरकर सामने आई है जहाँ अपराधीकरण बढ़ रहा है एवं जो विशिष्ट एवं कारपोरेट हितों को लाभांवित कर रहे हैं। इसका यह भी परिणाम हुआ है कि दो दशकों तक अल्पसंख्यकों के प्रति अन्याय होते रहे। साथ ही साथ इस सुधार के समय जवाबी हत्याएँ एवं बम विस्फोट होते रहे हैं जिससे कि समाज में भय एवं असुरक्षा फैल गई है। डाॅ0 विनायक सेन, जिन्होंने आदिवासियों में दीर्घ समय तक समाज सेवा की, वे नागरिक स्वतंत्रता संगठन, पी0यू0सी0एल0 के कार्यकर्ता रहे, उन्हें कुछ अन्य लोगों के साथ गलत ढंग से माओवादी कहा गया, उन पर झूठा मुकदमा चलाया गया एवं उन्हें दो वर्षों से जेल में बन्द कर दिया गया है। उनके खिलाफ यह जाँच भी शुरू की गई कि उन्होंने ‘सलवा जुडूम’ को बेनकाब किया। सलवा जुडूम जैसा कि ग्रामीण विकास मंत्रालय की सूचना है, एक प्राइवेट सेना है जिसको भारत के अग्रणी कारपोरेट घरानों से धन प्राप्त होता है। कारपोरेट घराने आदि वासियों को उनके पैतृक स्थानों से हटाना चाहते थे जिससे कि वे आदिवासियों के क्षेत्र में खनिज पदार्थों पर कब्जा कर सकें। इसी कारण वहाँ गृहयुद्ध शुरू हो गया है। सलवा जुडूम में भर्ती व्यक्तियों को राज्यद्वारा स्वीकार कर लिया गया ताकि सरकार इस अवैध पेशेवर संगठन को सम्मान प्रदान कर सके। जिसका गठन बड़े-बड़े कारपोरेट घरानों के द्वारा किया गया, ताकि वे आदिवासियों को खनिज पदार्थों से समृद्ध स्थानों से बेदखल कर सकें। इन आदिवासी नौजवानों की विशिष्ट पुलिस अधिकारी के रूप में नियुक्ति माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवैध करार दे दी गई क्योंकि इसके माध्यम से गरीब वर्गों का एक वर्ग, गरीब वर्गों के दूसरे वर्ग की हत्याएँ कर रहा था। राजनैतिक तथा सामाजिक संगठनों के ऐसे अनेक उदाहरण है जैसे कि गांधीवादी एवं दलित आन्दोलन। सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों जिनको गलत एवं जानबूझकर निशाना बनाया गया है, एवं देश के अन्य भागों में माओवादी एवं नक्सलवादी कहकर गिरफ्तार कर लिया गया है ताकि वैकल्पिक शान्तिपूर्ण राजनैतिक संगठन उभरकर सामने न आ जाएँ।
    पुलिस ने इस दौरान एक वर्ग पर आधारित योजना अपनाई। उन्होंने समाज के कमजोर एवं निर्धन वर्गों, किसानों असंगठित मजदूरों एवं अल्पसंख्यकों को समाज का प्रमुख शत्रु समझा। पुलिस प्रशिक्षण  विद्यालयों एवं सिविल सेवा प्रशिक्षण केन्द्रों में इसी तरह की बातें की जाती हैं। नवीन उदारवादी, आर्थिक सुधारों के दो दशकों के दौरान शहर एवं ग्रामीण क्षेत्र कारपोरेट घरानों, पूँजीपतियों, रियल स्टेट कम्पनियों एवं ठेकेदारों के चंगुल में पूरी तरह फँस चुके हैं। इसके प्रत्यक्ष उदाहरण गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ एवं कर्नाटक हैं। कारपोरेट घरानों से जुडे़ हुए अपराधीकृत राजनैतिक समूह राज्य के अन्दर एक अन्य राज्य के रूप में कार्य करते हैं। वे प्रशासन पर पूरा नियंत्रण रखते हैं एवं राजनैतिक गतिविधियों को अपने कब्जे में रखते हैं। इस प्रकार वे नागरिकों की सुरक्षा को प्रत्येक जगह खतरे मंे डालते हैं। बम्बई जैसे बड़े महानगर में भी, जो एक अन्तर्राष्ट्रीय हितों का नगर है तथा राजनैतिक एवं आपराधिक माफियाओं का नगर है, जहाँ कई बम विस्फोट हो चुके हैं, अपराधीकृत राजनैतिक गुटों एवं व्यक्तियों को राजकीय संस्थाओं द्वारा सुरक्षा प्रदान की जाती है।
    गुजरात राज्य के उच्च पुलिस अधिकारी जिसमें कुछ ने नागरिकों के खिलाफ गंभीर अपराध किए हैं एवं दूसरे व्यक्तियों जिन्होंने सरकारी जाँच पड़ताल के दौरान उन अवैध क्रिया कलापों को जाहिर करने का प्रयास किया, उन्हें इन मुठभेड़ों एवं अल्पसंख्यकों की हत्याओं को जाहिर करने के लिए उत्पीडि़त किया गया। ये सारे दृष्टान्त इस सुधार के युग में पुलिस एंव प्रशासन की वास्तविक भूमिका को उजागर करते हैं। संयुक्त कमिश्नर आॅफ पुलिस श्री हेमंत करकरे की ईमानदार पुलिस एवं जाँच अधिकारी के रूप में हत्या एक उदाहरण है। टेलीफोन एवं प्रिंट मीडिया पर श्री करकरे को जान से मारने की  धमकियाँ दी गईं जिसकी कभी गंभीरता से जाँच नहीं की गई। अनेक बम विस्फोटों में श्री हेमंत करकरे द्वारा की गई गंभीर जाँचों को स्वामी असीमानन्द की न्यायिक स्वीकारोक्ति के द्वारा पुष्टि की गई जिसने पूरे देश में एक आक्रोश की लहर फैला दी क्यांेकि यह समाज को धर्म के आधार पर बाँटने के लिए किया गया था, जैसा कि देश के बँटवारे के समय किया गया था। एजेंसियाँ ऐसा करने के लिए विदेशों से पैसा प्राप्त कर रही थीं। हेमंत करकरे की हत्या, उनके सहयोगियों अशोक कामटे, अनेक पुलिसवालों एवं नागरिकों की हत्याएँ, नौजवान अधिवक्ता शाहिद आजमी की बम्बई में उनके चैम्बर में हत्या, क्योंकि उन्होंने अल्पसंख्यक वर्ग के एक निर्दोष व्यक्ति को जिसे फर्जी तौर पर बम विस्फोट में फँसाया जा रहा था, सफलतापूर्वक बचाने का कार्य किया था। इस नौजवान वकील को यह पेशेवर कार्य जिसको एक राष्ट्रीय संगठन ने सौंपा था, उसकी हत्या की पूरी जाँच की कभी माँग नहीं की, हालाँकि राज्य सभा में इस मामले को उठाया भी गया। शाहिद आजमी की हत्या के बारे मंे उस समय की मुम्बई अपराध शाखा द्वारा यह कहा गया कि अपराध जगत के देशभक्तों के द्वारा यह कार्य किया गया। यह अपने आप में स्वयं एक सबक है क्योंकि अधिवक्ताओं के माध्यम से यह बात पहली बार सामने आई कि अपराध जगत में भी देशभक्ति की जड़ें हैं। एक नौजवान अधिवक्ता की उसके चैम्बर में नृशंस हत्या किए जाने पर पूरे देश के बार एसोसिएशनों द्वारा निंदा उस स्तर पर नहीं की गई जिस स्तर पर होनी चाहिए। यह बात अत्यन्त आश्चर्यजनक है। किन्तु जब अल्पसंख्यक वर्ग के निर्दोष व्यक्तियों को बम विस्फोट एवं तथाकथित आतंकवादी कार्यों के लिए आरोपित किया गया तो कई राज्यों के जिला बार एसोसिएशन जिसके सदस्य एक विशेष राजनैतिक दल से जुड़े हुए हैं अवैध प्रस्ताव पारित किए एवं वकीलों का आह्वान किया कि वे बम विस्फोट में आरोपित व्यक्तियों के मुकदमें न लड़ें। इन मुकदमों में पूरे देश के बहुत से निर्दोष नौजवानों को आरोपित किया गया है, जबकि वे क्षेत्र जिनमें सीमा पार आतंकवाद की समस्या है वे ऐसे प्रदेश हैं जिसकी अन्तर्राष्ट्रीय सीमाएँ हैं, न कि वे भारत के केन्द्रीय भाग में स्थित हैं। जिन वकीलों ने इन आरोपित निर्धन व्यक्तियों को बचाने के लिए मुकदमा अपने हाथ में लिया उनको उनके साथी वकीलों द्वारा या तो धमकी दी गई या उन पर हमला किया गया। बार काउंसिल द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई। यह अधिवक्ताओं का ऐसा निंदनीय आचरण है जिसके द्वारा उन्होंने एक दोषारोपित व्यक्ति को अदालत में अपने आप को बचाने के कानूनी अधिकार से वंचित किया। यह कार्य पेशेवराना आचार संहिता के खिलाफ है। इसके विपरीत हमारे देश के उच्च वर्गीय अधिवक्ता जो आपराधिक एवं अराजकतावादी गतिविधियों में लिप्त व्यक्तियों के मुकदमें लड़ते हैं उनको उसी प्रकार न तो धमकी दी जाती है और न उनकी आलोचना की जाती है।
    इससे यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि हमारी विधिक व्यवस्था एवं हमारे पेशे के नैतिक मूल्यों का पूरी तरह ह्रास हो चुका है।
-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:


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