बुधवार, 9 मई 2012

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ..............दस मई





राष्ट्र मुक्ति के संघर्ष का दिन

10 मई 1857 इस राष्ट्र के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम दिवस है |सभी जानते है कि यह संग्राम मेरठ छावनी के सैनिको के विद्रोह के साथ शुरू हुआ था | लेकिन बाद में यह राजाओं , नवाबो , जमीदारो के साथ किसानो , दस्तकारो आदि के जन -- विद्रोह का रूप ग्रहण कर लिया था |
निश्चित तौर पर इस संग्राम का विस्फोट ब्रिटिश कम्पनी और उसकी हुकूमत द्वारा किए जाते रहे लूट -- अन्याय -- अत्याचार और दमन आदि के प्रति समाज के सभी वर्गो में निरंतर बढ़ते असंतोष विरोध के चलते हुआ था | उसमे कारतूसो में गाय - सूअर कि चर्बी के इस्तेमाल जैसे चर्चित तात्कालिक कारणों ने तो उस संग्राम कि पहली चिंगारी भडकाने का ही काम किया था |
एक साल से उपर चले इस संघर्ष में भले ही हिन्दुस्तानियों कि हार हो गयी | लेकिन इस संघर्ष ने न केवल उभरते हुए आधुनिक राष्ट्र के लिए ऐतिहासिक महत्व कि उपलब्धिया प्रदान
है कि बल्कि राष्ट्र के जनसाधारण को वर्तमान युग के संघर्षो के लिए एक विरासत और दिशा भी प्रदान की है |
इसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धी तो यह है की इसने सदियों से सोते रहे इस राष्ट्र को झकझोर कर उठा दिया | तलवार पकडवाकर युद्ध के मैदान में उतार दिया |सैन्य दृष्टि से अत्यंत प्रशिक्षित सुसंगठित तथा उस समय के आधुनिक हथियारों से लैस ब्रिटिश फ़ौज से युद्ध में सामना करने की निडरता प्रदान कर
दिया | इसने जन -- जन में विदेशी राज को , विदेशी लूट व व्यापार को , विदेशी विजातीय धर्म व संस्कृति को पूरी तरह से उखाड़ फेकने का साहस व पराक्रम प्रदान कर दिया | 1857 के स्वतंत्रता सेनानियों ने इस युद्ध में
अपने रक्त भरकर एक नए जुझारू राष्ट्रवाद को अंकुरित कर दिया | फिर बाद के वर्षो में देश के समर्पित राष्ट्रवादियो एवं क्रान्तिकारियो को इस महान संघर्ष से प्रेरणा लेने का सुअवसर भी प्रदान किया | भगत सिंह व उनके साथियो ने भी अपने क्रांतिकारी संघर्ष में 10 मई को याद किया | उसे शुभ --- दिन का नाम दिया | इसे मनाने के लिए देशवासियों एवं राष्ट्रभक्तो का आह्वान किया | यह सब भगत सिंह एवं उनके साथियो के दस्तावेज में " 10 मई शुभ दिन " नाम से लेख के रूप में मौजूद है | 1857 के संघर्ष ने इस क्षेत्र को खासकर सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश व बिहार के पूर्वी क्षेत्र को इस संघर्ष का नायक बनने का ऐतिहासिक गौरव प्रदान किया है | इस संघर्ष में प्रदेश का पूर्वांचल भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ -- साथ चला | यह युद्ध इस प्रदेश के लगभग हर क्षेत्र में लड़ा गया | पूरे प्रदेश में यह युद्ध एक साथ युद्ध का रूप तो नही ले सका , पश्चिम से पूरब की ओर एक आगे बढती हुई लहर का रूप जरुर ग्रहण किया | निश्चित ही यह युद्ध समूचे क्षेत्र को और युद्धरत रहे इस व अन्य क्षेत्रो की जनता को विशेष गौरव प्रदान करता है और उन्हें भविष्य में ऐसे संघर्षो के लिए प्रेरणा प्रदान करता है |
1857 के इस महासंग्राम ने एक और ख़ास ऐतिहासिक उपलब्धि प्रदान की है |
सदियों तक इस देश के हिन्दुओं -- मुसलमानों में एक साथ रहने के वावजूद
राजनितिक , सामाजिक भिन्नताए उपर से नीचे तक बनी रही | एक साथ का रहन - सहन उसे तोड़ने में कही से सफल नही हो पाया | लेकिन 1857 के इस महासमर ने उनमे अभूतपूर्व राजनितिक एकता खड़ी कर दी | इसे देखकर स्वंय ब्रिटिश शासक भी आश्चर्य चकित रह गये और उन्होंने उसे तोड़ने का उपक्रम ठीक इसी युद्ध के बाद
शुरू कर दिया |
इसके अतिरिक्त 1857 के संग्राम की एक और बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धी यह है की
इसने युद्धरत क्षेत्र के सैनिको , राजाओं , नवाबो , जागीरदारों , किसानो , दस्तकारो , व्यापारियों में ब्रिटिश राज के विरुद्ध भारी एकजुटता खड़ी कर दी | हम यहा 1857 के युद्ध में अग्रेजो का साथ दे रहे विभिन्न समुदायों के उपरी व निचले हिस्से की ब्रिटिश प्रशस्ति और युद्ध में जैसी गद्दारी जैसी गतिविधियों को नजरअंदाज नही कर रहे है , लेकिन याद रखने वाली बात है की हिनुस्तानियो के एक हिस्से में ऐसी भूमिकाये ब्रिटिश राज के स्थापित होने के साथ ही बढने लगी थी | ये भूमिकाये 1857 की देन नही थी | इसके विपरीत वे तमाम लोग जो 1857 के संग्राम में अंग्रेजो के विरुद्ध स्वतंत्रता की तलवार उठाये , वे निसंदेह:1857 की देन थी | उनमे युद्ध के लिए उपर से नीचे तक बनी जो एक्ताये भी 1857 की देन थी | यह सब इस संग्राम की ऐतिहासिक उपलब्धी थी व है | इसलिए इतिहास व इतिहासकार यहा तक अंग्रेज इतिहासकार भी उन लड़ते रहे हिन्दुस्तानियों के मुकाबले अंग्रेजो का साथ दिए हिन्दुस्तानियों को बहुत कम महत्व दिए है | युद्धरत सेनानायको व बहादुरों की हिम्मत व पराक्रम को सम्मान दिए है |अब प्रश्न है कि क्या आज 1857 का महासमर इस देशवासियों के लिए उनके भावी आंदोलनों संघर्षो के लिए प्रेरणा श्रोत बन सकता है ? संघर्ष कि इस विरासत को आगे बढाने में मददगार साबित हो सकता है ?
एकदम हो सकता है पर सभी देशवासियों के लिए कदापि नही | जिस तरह से ब्रिटिश कम्पनी और उसके लूट , दमन व अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने वाले विभिन्न सामाजिक हिस्से उसके भुक्तभोगी के रूप में संघर्ष के लिए उठ खड़े हुए थे उसी तरह वर्तमान दौर में विदेशी व देशी धनाढ्य कम्पनियों कि लूट और उसके लिए लाये जाते रहे नीतियों कानूनों आदि के भुक्त भोगी जनसाधारण भी उनके विरोध व विद्रोह के लिए उठ खड़े हो सकते है | जिस तरह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और उसके व्यापार के लिए कम्पनी राज के लिए और इस देश के उनके सहयोगियों के लिए 1857 के के स्वतंत्रता संग्राम डगर था , बगावत था राजद्रोह था उसी तरह से वर्तमान दौर में बढ़ते जनसमस्याओ को लेकर उभ्दने वाला जन -- विरोध -- जन आन्दोलन व संषर्ष भी " राष्ट्र विरोधी " राज विरोधी संघर्ष ही प्रचारित किया जाएगा | 1920 -- 30 के बाद ब्रिटिश कम्पनियों और ब्रिटिश राज के साथ उद्योग व्यापार तथा सत्ता के समझौते में लगे रहे लोगो ने देश कि धनाढ्य कम्पनियों और कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों ने1857 के संघर्ष को बीत गया इतिहास कहकर स्वतंत्रता संघर्ष में इसकी उपयोगिता को , मार्गदर्शन को पूरी तरह से खारिज कर दिया | |1947 में स्वतंत्रता समझौते के बादशिक्षा मंत्री बने श्री अबुल कलाम आजाद ने इसे खुलकर कहा था कि " पूर्व में घटित युद्ध कि घटनाओं से प्रेरणा लेने का समय बीत गया है | भारत और ब्रिटेन के बीच राजनितिक समस्या को आपसी बातचीत एवं सुलह समझौते द्वारा सुलझा लिया गया है | उसने दोनों देशो के बीच दोस्ती कि नयी भावना भर दी है | भारत ब्रिटिश संबंधो में बीते कल के कडवाहट ' जो उसकी चारित्रिक विशेषता थी अब नही रही |'...................(
इतिहासकार एस. एन . सेन कि पुस्तक एट्टींन फिफ्टीसेवन में अबुल कलाम आजाद कि लिखी भूमिका से उद्घृत )
सत्ता सरकार के उच्च पदों पर आसीन श्री आजाद एवं दूसरे कांग्रेसी लीडरो ने सुलह व समझौतों कि इस प्रक्रिया शुरू होने के बाद 1857 को याद करना बंद कर दिया था जबकि क्रांतिकारी 10 मई को मनाते रहे और आम जनता का इसके लिए आह्वान भी करते रहे | पुस्तक कि भूमिका लिखते समय श्री आजाद यह बात भूल गये1857 में भी हिन्दुस्तान --- ब्रिटिश संबंधो कि कड़वाहट को अंग्रेजो का साथ दे रहे देशवासियों ने कत्तइ नही महसूस किया |फिर 1920 -- 30के बाद ब्रिटिश साम्राज्य व ब्रिटिश राज के साथ समझौता कर रहे देश के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से तथा कांग्रेस व मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों के लिए संबंधो को कडवाहट तथा 1857 के युद्ध को याद करने कि कोई जगह नही थी |अब उन्हें ब्रिटेन के साथ बढ़ते जा रहे सम्बन्ध में उन्हें भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियो कि कडवाहट कत्तई महसूस नही हो सकती थी |1947 के बाद तो वह रिश्तो कि वह कडवाहट पूरी तरह से मिठास में बदल गयी |भारत -- ब्रिटेन के रिश्तो कि मिठास व कडवाहट १८५७ में भी थी और आज भी है | जिन तबको के रिश्ते लुटेरे , साम्राज्यवादियों के साथ बनते और मधुर होते गये उन्हें संबंधो में मिठास कि अनुभूति होती गयी , पर जिनके साथ अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे देशो के साथ रिश्ते कडवे बने रह गये , उन्हें 1857 जैसी कडवाहट ही महसूस होगी और हो भी रही है |
कौन नही जानता कि वर्तमान दौर में देश के समूचे धनाढ्य एवं उच्च हिस्से के सम्बन्ध अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी साम्राज्यी देशो कि सरकारों से साम्राज्यी कम्पनियों से व साम्राज्यी पूंजी से मधुरतम होते गये |इन संबंधो के जरिये यहा और वहा के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों के निजी हितो -- स्वार्थो का परस्पर सहयोग अधिकाधिक मुनाफाखोरी व सूदखोरी कि लूट का अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे साम्राज्यी ताकतों के प्रभुत्व या दबदबे के अधिकाधिक बढाव का काम निरंतर बढ़ता रहा है |इन्ही लुटेरे व प्रभुत्वकारी संबंधो में आम मजदूरों , किसानो , दस्तकारो , बुनकरों , दुकानदारों एवं अन्य मध्यम वर्गियो का जीवन चौतरफा संकटों से घिरता जा रहा है | उन्हें महगाई , बेकारी आदि कि मार सहने के साथ -- साथ लाखो कि संख्या में आत्महत्याए तक के लिए विवश करता जा रहा है |
देसंश के जन साधारण के लिए ये सम्बन्ध कडवे है निरंतर कटू से कटुतम होते गये है | उन्हें ऐसे शोषणकारी प्रभुत्वकारी संबंधो से राष्ट्र के जन साधारण को मुक्त कराने के लिए १८५७ को और देश -- दुनिया के अन्य क्रांतकारी घर्षो आंदोलनों को याद करना ही पडेगा | उन्हें इन संघर्षो को अपना पथ प्रदर्शक मानकर आगे बढना ही होगा
-कबीर

1 टिप्पणी:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

सादर नमन |
आभार ||