बुधवार, 20 जून 2012

झारखंड:संगीनों पर सुरक्षित गाँव -2


बल्कि इंसानी व्यवहारों के तहत किया गया सहयोग है। वे गाँव या पड़ोस के गाँव से आए किसी आगंतुक को खाना खिलाते हैं, संभव है वह पड़ोस का ही कोई युवक हो, वे उसे पानी पिलाते हैं। अगले दिन पुलिस आती है और गाँव वालों के इस व्यवहार को ‘अपराध’ घोषित कर देती है ‘माओवादियों को सहयोग करने का अपराध’। सामुदायिकता के इस सहज व्यवहार और सामाजिकता को राज्य ने प्रतिबंधित कर दिया है. तो क्या लोगों को ‘असामाजिक’ हो जाना चाहिए कि भूखे को खाना न खिलाएँ, कि प्यासे को पानी न पिलाएँ और एक राहगीर को रास्ता न बताएँ।
मानवाधिकार के प्रश्न बहुत पीछे छूट चुके हैं। शायद यह जैव अधिकार या जैव व्यवहार जैसी किसी अवधारणा के दायरे में आएगा। एक मोबाइल और सिम का दुकानदार आखिर अपने सामानों को किसे बेचे जबकि पुलिस व सैन्य बल की निगाह में जाने कौन ग्राहक कल माओवादी घोषित कर दिया जाए।
बरवाडीह के लादी गाँव में परइया, कोरबा और उराँव जनजाति के तकरीबन 80 घर हैं। यह एक घाटी नुमा जगह है जो चारो तरफ पहाड़ों से घिरी हुई दिखती है। गाँव की तरफ आती हुई लीक खत्म होती है और पहला घर जसिंता देवी का है जो पुलिस की गोली से अपने घर में ही मारी गई थी, इस घटना को एक लंबा अरसा बीत चुका है। हमारे पहुँचते ही एक महिला आँगन में उस जगह जा कर खड़ी हो जाती है जहाँ जसिंता देवी गोली से निढाल हुई थी। वह महिला जसिंता देवी की सास हैं। क्रोधित हो उन्होंने हमे पहले कैमरा बंद करने को कहा। फिर बताया कि पुलिस उस दिन माओवादियों को खोजने आई थी और हमारे घर में आग लगाना चाह रही थी जिसका जसिंता ने विरोध किया और वह उनकी गोलियों से मारी गई। मिट्टी की दीवारों में गोलियों के निशान अभी भी बने हुए हैं। जसिंता को जिस समय गोली मारी गई उसकी 7 महीने की बेटी प्रियंका उसके पास ही थी जो अब थोड़ी बड़ी हो गई है। गाँव वाले बताते हैं कि पुलिस ने अपनी इस हत्या का इल्जाम माओवादियों पर लगाया। चुरकुन पहडि़या गुस्से में बोलते हैं कि गाँव में एकता है और हमने पुलिस को दोबारा यहाँ आने से मना कर दिया है। जब दोबारा पुलिस आई तो हमने उसे खदेड़ भी दिया। अक्सर गाँवों में हमने पाया कि हत्या के बाद सैन्य बलों द्वारा दी गई एक “मोहलत” होती है। वे कुछ महीने तक दोबारा गाँव में लौटकर नहीं आते। एक हत्या पूरे गाँव में वर्षों तक खौफ को जिंदा रखती है। खौफ इतना कि लोग काम करने के बाद मजदूरी लेने तक से डरते हैं। मनरेगा, सड़क निर्माण, इंदिरा आवास जैसी योजनाओं के लिए वे काम करते हैं और उनकी मजदूरी इन योजनाओं की तरह ही अधूरी पड़ी है।
वहाँ लड़कियाँ फिर से स्कूल जाने लगी हैं और कुछ बच्चे स्कूल की चहरदीवारी पर बैठे हैं। करमडीह के स्कूल से सैन्य बलों का कैम्प वापस जा चुका है। यह एक सामान्य स्थिति है जो 31 जनवरी की शाम के दहशत के बाद लौटी है। दुकानदार ने अपने घर के आसपास खोदी गई मिट्टी को पाट दिया है। सैन्य बलों द्वारा यह खुदाई माओवादियों के छुपाए गए शस्त्र खोजने के लिए की गई थी। यहाँ से उन्हें भिंड़ी के पौधे की कुछ जड़ें मिली थीं। 31 जनवरी की शाम को सात बजे माओवादियों के एक दस्ते ने हवाई फायरिंग की। देर रात तक गोलियाँ चली, देर रात तक दहशत पली। लोग बंदूकों की एक आवाज के बाद दूसरी आवाज का इंतजार करते रहे और दूसरी के बाद तीसरी फिर सुबह जाने किस गिनती के बाद आई। सुबह तक सब कुछ शांत हो चुका था। रात की घटना के अवशेष में दीवारों पर सुराख के निषान बचे थे। अगले दिन सैन्य बल स्कूल छोड़कर चले गए, उसके एक दिन बाद बच्चे भी स्कूल चले गए। अध्यापकों से ज्यादा इन स्कूलों में बच्चे खाना बनाने वाले का इंतजार करते हैं और स्कूल की चहरदीवारी पर बैठे बच्चे वही कर रहे हैं।
अगले गाँव नवरनागू जाने के लिए यहाँ से हमे पैदल चलना था, पहाड़ी के उस पार तक। यह कोयल नदी के किनारे का एक गाँव है। 250 किमी। लम्बी इस नदी में कई छोटी नदियाँ मिलती हैं। अपनी पूरी यात्रा के दौरान हमने कोयल नदी को कई बार पार किया। गाँव में एक महिला चटाई बीन रही है, यह किसी पेड़ की मजबूत पत्तियाँ हैं जिन्हें एक-दूसरे के ऊपर-नीचे गूथा जा रहा है। एक कमसिन उम्र की बच्ची झाड़ू बहार रही है, गाँव के अकेले अध्यापक पढ़ाने के लिए चले गए हैं। लूकस मिंज की हत्या को एक महीने बीत चुके हैं। गाँव से ढोल परवला तकरीबन एक किमी। की दूरी पर है, जहाँ लूकस मिंज की लाश नदी की रेत पर 5 दिनों बाद पाई गई थी, जो पानी में सड़ चुकी थी। लूकस बोलने और सुनने में अक्षम थे और नदी किनारे वे गाय चराने जाया करते थे। उनकी हत्या की सही तारीख गाँव के लोगों को नहीं पता पर यह शायद 1 फरवरी की तारीख थी। इस घटना को नदी में एक मछली पकड़ने वाले ने देखा था, सैन्य बलों ने नदी के उस पार से दो गोलियाँ चलाई थीं। एक महीने बीत चुके हैं सैन्य बलों ने इधर आना स्थगित किया हुआ है।
-चन्द्रिका,
क्रमश:

कोई टिप्पणी नहीं: