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शनिवार, 23 जून 2012

झारखंड:संगीनों पर सुरक्षित गाँव -4


इस दौरान अखबार हमारी पहुँच से दूर थे, पर हम कई अप्रकाशित खबरों के करीब। बहेरटाड़ के सरपंच बीफा और गाँव के अन्य 8 लोगों को हफ्ते भर पहले सी.आर.पी.एफ. ने पिटाई के बाद छोड़ दिया है। बीफा की दाहिनी आँख से दिखना कम हो गया है। गाँव के बगल में सी.आर.पी.एफ. का एक स्थायी कैम्प बनाया जा रहा है। बगल ही मुर्गीडीह गाँव है जहाँ बिरजू ओराँव की दसों उंगलियों को कटर से चीर दिया गया है, उंगली में पट्टी बाँधकर वे काम पर चले गए हैं। अपनी-अपनी तकलीफों के साथ सब अपने-अपने गाँव में जिंदा हैं।
संतोष जिनके दोस्त राजेन्द्र प्रसाद की हत्या जतिन नरवाल एस।पी। के आवास में पिटाई से हुई थी, इसके एवज में राजेन्द्र की पत्नी मंजू को कोई नौकरी दे दी गई है। संतोष जो राजद के स्थानीय नेता हैं वे अपने दोस्त की हत्या के अपराधियों को सजा दिलाना चाहते हैं। उनको लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। कुछ माओवादी घटनाओं के तहत इनका नाम अखबारों और पुलिस के दस्तावेजों में शामिल किया जा चुका है। सुल्तानी घाटी में नशे मे धुत सी.आर.पी.एफ. के ‘जवानों’ ने एक टेम्पो ड्राइवर दारा सिंह की कुछ दिन पहले हत्या कर दी है। चंद दिनों में अनगिनत घटनाएँ हैं। वह जो अखबारों में प्रकाशित हुईं और वे जिनका किसी अखबार में कोई जिक्र भी नहीं। गाँव में अखबार कम पहुँचते हैं और अखबारों में गाँव भी।
यह 28 मार्च की तारीख थी जब रात के 10 बजे हम चेमू-सान्या पहुँचे। यह 1857 के क्रांतिकारी नीलांबर-पीतांबर का गाँव है, यहाँ आने के लिए सड़क को 20 किमी. पीछे छोड़ना पड़ता है। जिसके सहारे यहाँ तक हम पहुँचे हैं वह नदी-नाले-सड़क-खाई का एक मिश्रित रूप है। पूरे झारखण्ड में आज उनकी 153वीं शहादत मनाई जा रही है। झारखण्ड के नेता नामधारी सिंह इंदर चंदवा में नीलांबर-पीतांबर की प्रतिमा स्थापना के लिए आए हुए हैं. उन्होंने युवाओं से नीलांबर-पीतांबर जैसा होने का आवाह्न किया है। आज के ही दिन नीलांबर-पीतांबर विष्वविद्यालय ने भी एक बड़ा आयोजन रखा है। माओवादियों के सशस्त्र दस्ते ने धनकारा गाँव में मशाल जुलूस निकाला है। हम गाँव के एक सिरे पर हैं यहाँ काफी ठंड है, गाँव के लोगों ने सूखी लकडि़याँ जला रखी हैं और इसके आसपास कुछ लोग बैठे हैं। अलाव की रोशनी के सहारे इर्दगिर्द के 2-3 घरों को देखा जा सकता है। बाँस के फट्ठों का एक लंबा सा तख़त है जहाँ गाँव के लोग अक्सर इकट्ठा हुआ करते हैं। किसी भी आयोजन से गाँव के लोग अनभिज्ञ हैं। शायद माओवादियों का एक दस्ता थोड़ी देर पहले यहाँ से गुजर चुका है। थोड़ी देर बाद कुछ बच्चे आते है, जो संघम के बाल कलाकार है और जलते अलाव की आँच में जीतन मराँडी के कुछ गीत सुनाते हैं। ये झारखण्ड के लूटे जाने के गीत हैं, इनमे लोगों के संघर्ष में बुलाने की पुकार है। यह गाँव कुटकु-मंडल बाध परियोजना के तहत 32 डूबने वाले गाँवों में से एक है। 1912 में पूरे सौ साल पहले किए गए सर्वे के आधार पर लोगों की जमीनों का जो मुआवजा तय किया गया था वह कुछ लोगों को मिल चुका है। इन सौ वर्षों में पीढि़याँ बदल चुकी हैं और उनके गाँव छोड़ने के इरादे भी। 1972 में बाँध बनने की जो परियोजना चालू हुई थी वह 97 से स्थगित है। बगैर किसी सूचना के बाँध के इंजीनियर बैजनाथ मिश्रा ने बाँध के अस्थाई फाटक को बंद कर दिया था और पूरा इलाका डूब गया था। जानवरों की संख्या नहीं गिनी जा सकी, तबाही के अन्य आँकलन नहीं लगाए जा सके पर 21 लोग पानी में डूब कर मर गए। बनवारी लाल अंतिम युवक के मौत की याद सुनाते हैं कि कैसे वह 7 दिनों तक बगैर कुछ खाए-पिए पेड़ पर लटका रहा और जब लोग तसले के सहारे तैरते हुए उसके पास पहुँचे तो अचानक वह पानी में गिर गया। डूबते गाँवों से लोगों को बचाने इस दौरान कोई प्रशासन की ओर से न आया। माओवादियों ने उसी बीच इंजीनियर बैजनाथ पंडा को इस तबाही के इल्जाम में मौत की सजा सुनाई और उसकी हत्या कर दी गई। इसके बाद परियोजना का कार्य स्थगित कर दिया गया। यह स्थगन अभी भी जारी है और 32 गाँवों का उजड़ना थम सा गया है। लोगों के पलायन की वजहें बदल गयी हैं। अब सैन्य बल आते हैं और माओवादियों के सहयोग के लिए युवकों को पीटते हैं, उनके घरों के ताले तोड़ दिए जाते हैं, वे उनके अनाज एक दूसरे में मिला देते हैं। मनगू, सतीस, जोखन सिंह, करम दयाल सब कहीं चले जाना चाहते हैं। ऐसी जगह जहाँ वे पुलिस प्रताड़ना से बच सकें। वे चले भी जाते हैं पर जब भी वे साल-दो साल बाद इलाहाबाद, बनारस से लौटकर आते हैं। कोई न कोई इल्जाम उनके इंतजार में होता है। अपने गाँव में लौटना किसी खतरे में लौटने जैसा है। युवाओं के नीलांबर-पीतांबर बनने का नामधारी सिंह इंदर द्वारा किया गया आवाह्न दूसरे दिन अखबारों में प्रमुखता से छपा है। हम वहाँ से लौट आए हैं, बस घटनाएँ वहाँ पर चल रही हैं। घटनाओं अपना रास्ता नहीं भूलतीं और न ही उन्हें किसी रास्ते की जरूरत होती है। जब यह रिपोर्ट लिखी जा रही है आपरेशन ऑक्टोपस वहाँ शुरु हो चुका हैै। नीलांबर-पीताम्बर के गाँव चेमू-सान्या में सैन्य बलों ने गोलियाँ चलाई हैं, हत्या हुए लोगों की संख्या का पता नही चल रहा है यहाँ महिलाओं के साथ बलात्कार भी हुए हैं इलाके में जाने पर पत्रकारों को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। मनोज विश्वकर्मा के पास लातेहार में नीलांबर पीताम्बर की जीवनी मिली थी जिसके आरोप मे 1 अप्रैल को उन्हंे जेल भेज दिया गया है। बरवाडीह में एक ‘मुठभेड़’ में छः माओवादियों के मारे जाने की खबरें अखबारों के पहले पन्ने पर छपी हैं। दूसरे दिन माओवादियों ने इस खबर के गलत होने की पुष्टि की है। जो कहीं छपने के बजाय, कहीं छिप गयी है।
मोबाइल: 09890987458

शुक्रवार, 22 जून 2012

झारखंड:संगीनों पर सुरक्षित गाँव -3


हम छत्तीसगढ़ की सीमाओं को छूते हुए बल्लीगढ़ और होमिया पहुँचे थे। राज्य ने भले ही प्रदेशों की इन सीमाओं को निर्धारित किया हुआ है पर प्रकृति और लोगों ने उसे मान्यता नहीं दी है। इन गाँवों के लिए छत्तीसगढ़ एक बाजार है, एक ओकड़ा (ओझा) का घर है, वहाँ से आकर एक बैगा रोज यहीं घूमा करता है, छत्तीसगढ़ का सबकुछ यहाँ ज्यादा से ज्यादा सुलभ है। यह गड़वा जिले का एक बड़ा गाँव है 12 किमी. में फैला हुआ। भुइयाड़, खरवार और गोड़ आदिवासियों की दस हजार जनसंख्या वाला गाँव। एक गाँव जिसमे दो नदियाँ बहती हैं। हम यहाँ के कुछ युवकों के साथ गाँव के बीच बहती पोपरा नदी तक गए। हमने यहाँ ज्यादा वक्त गुजारा और गाँव का लंबा इतिहास सुना। इस गाँव का इतिहास एक स्थानीय सामंत रामनाथ पाण्डे उर्फ फुल्लू पाण्डे के प्रताड़ना का इतिहास है। जिसके इल्जामों के दस्तावेज संक्षेप में लिखना भी मुश्किल है। एकनाथ भुईयाँ 67 साल पहले से कहानी को शुरु करते हैं जब फुल्लु पाण्डे का परिवार यहाँ आकर बसा था। गाँव के लोगों ने एक ब्राम्हण को पूजा-पाठ के लिए बसा लिया था। गाँव की सैकड़ों एकड़ जमीन अब उसके कब्जे में है। जमीनों पर यह कब्जेदारी भूदान और भू-सुधार के बाद की कथा है। अभी पिछले बरस ही गाँव वालों की 150 एकड़ जमीन के कागजात बनवाकर स्थानीय सामंत फुल्लु पाण्डे ने जिंदल के हाँथों बेंच दिया है। गाँव वाले जमीन को अब भी जोत रहे हैं, उन्होंने अपने जमीन के कागजों पर शहर में जाकर लेमिनेषन करवा लिया है कि कागज मजबूत रहेगा तो जमीन बनी रहेगी, पर लगातार यह भय बना हुआ है कि जिंदल जाने कब आ जाए। हम बीच में एकनाथ से किसी घटना की तारीख पूछते हैं तो वे अपनी भाषा में कहते हैं कि हम नहीं जानते कि तारीख कितने किलो की होती है। वे बताते हैं कि हम धन से नहीं, मन से पढ़े लोग हैं।
उनकी आवाज थोड़ी धीमी हो जाती है यह गाँव की बहु-बेटियों से जुड़ा मसला है, लड़कियों की उम्र बढ़ती, गाँव में नई बहुएँ आतीं तो किसको बख्श देना है यह फुल्लू पाण्डे की इच्छा पर निर्भर करता। लेकिन सैकड़ों को उसने नहीं बख्शा, इन घटनाओं के आँकड़े क्रूरता और शर्मिंदगी के हैं जिन्हें कोई नहीं जुटाता। ऐसी घटनाओं का जिक्र करने के बाद मैने एकनाथ के चेहरे पर पछतावे का भाव देखा मानो अपने गाँव के विरुद्ध उसने कोई अपराध कर दिया हो। एक लड़का जो पेड़ से सटा हुआ बैठा है उसकी उम्र तकरीबन 25 साल है और उसकी छः एकड़ जमीन चली गई है। वह कहता है कि अगर एम.सी.सी. के लोग साथ देंगे तो जिंदल यहाँ नहीं आएगा। फुल्लु पाण्डे अब गाँव से दूर किसी कस्बे में रहने लगा है। अब तक गाँव के सैकड़ों लोग इकट्ठा हो चुके हैं। हमारे कागजों पर सब अपना नाम दर्ज करा देना चाहते हैं। जाने उनकी क्या उम्मीदें हैं कि कागजों पर लिखे उनके नाम उनकी जोत की जमीन के दस्तावेज बन जाएँगे।
गड़वा, पलामू और लातेहार के कई गाँवों में हम घूमते रहे। कहानियाँ बदल जाती थीं, पीड़ाएँ कम या ज्यादा हो जाती थीं, बस। दुकानदार, किसान, मजदूर और गाँव के सरपंच जाने कितनों पर माओवादियों के सहयोग करने का आरोप है, उन्हें खाना खिलाने का आरोप, किसी विस्फोट में शामिल होने का आरोप। खाना खिलाने के आरोप में बरगड़, कुमीकोला के सरपंच रामदास मिंज और फिदा हुसैन 20 जनवरी से जेल में हैं। उन पर आरोप यह भी है कि भंडरिया में माओवादियों द्वारा सैन्य बलों की जो गाड़ी उड़ाई गई, वे उस घटना में सहयोगी थे। जबकि गाँव वालों का कहना है कि इस घटना के 12 घंटे पहले ही पुलिस उन्हें थाने में लेकर गई थी और घटना के दौरान वे थाने में ही थे। क्या राज्य के विरुद्ध माओवादियों के सहयोग में पूरा का पूरा इलाका खड़ा है? क्या और क्यों के प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं? झारखण्ड के एक सशस्त्र माओवादी दस्ते ने एक दोपहर हमसे मुलाकात की। यह कोयल नदी के किनारे की कोई जगह थी। अपनी लंबी बातचीत के दौरान उन्होंने कई ऐसे तथ्य बताए जो उनके संघर्ष से सीधे तौर पर जुड़े हुए थे। उन्होंने टी.पी.सी., जे.एल.टी., जे.पी.सी., पी.एल.एफ.आई. और जे.जे.एम.पी. जैसे संगठनो पर आरोप लगाए जो माओवाद के नाम पर उनके संघर्ष को बदनाम कर रहे हैं और जिनमे से कुछ को पुलिस द्वारा संरक्षण भी मिला हुआ है। वे चिंतित थे कि सैन्य बलों द्वारा गाँव वालों पर जो कार्यवाही की जा रही है उससे आदिवासियों की आर्थिकी पर इस बार भारी असर पड़ने वाला है। यह महुआ और तेंदू पत्ते का मौसम है। सैन्य बलों की प्रताड़ना के भय से लोग इसे इकट्ठा करने के लिए अपने गाँव से दूर नहीं जा पा रहे। कई उत्तरों के साथ हम लौट आए और जेहन में नए प्रश्न उभरने लगे। झारखण्ड मानवाधिकार संगठन के शषिभूषण पाठक ने डी.जी.पी. जी.एस. रथ से मिलने की इच्छा जाहिर की पर वे राज्यसभा के चुनाव में व्यस्त थे उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया। अलबत्ता दूसरे दिन उनका एक लेख अखबार में छपा जिसमें वे महाभारत के युद्ध से राष्ट्रहित की सीख लेने की सलाह दे रहे थे। शायद वे इस मिथक के सहारे झारखण्ड की मिट्टी को युद्ध में लाल होने की हिमायत में खड़े हैं।
-चन्द्रिका,
क्रमश:

बुधवार, 20 जून 2012

झारखंड:संगीनों पर सुरक्षित गाँव -2


बल्कि इंसानी व्यवहारों के तहत किया गया सहयोग है। वे गाँव या पड़ोस के गाँव से आए किसी आगंतुक को खाना खिलाते हैं, संभव है वह पड़ोस का ही कोई युवक हो, वे उसे पानी पिलाते हैं। अगले दिन पुलिस आती है और गाँव वालों के इस व्यवहार को ‘अपराध’ घोषित कर देती है ‘माओवादियों को सहयोग करने का अपराध’। सामुदायिकता के इस सहज व्यवहार और सामाजिकता को राज्य ने प्रतिबंधित कर दिया है. तो क्या लोगों को ‘असामाजिक’ हो जाना चाहिए कि भूखे को खाना न खिलाएँ, कि प्यासे को पानी न पिलाएँ और एक राहगीर को रास्ता न बताएँ।
मानवाधिकार के प्रश्न बहुत पीछे छूट चुके हैं। शायद यह जैव अधिकार या जैव व्यवहार जैसी किसी अवधारणा के दायरे में आएगा। एक मोबाइल और सिम का दुकानदार आखिर अपने सामानों को किसे बेचे जबकि पुलिस व सैन्य बल की निगाह में जाने कौन ग्राहक कल माओवादी घोषित कर दिया जाए।
बरवाडीह के लादी गाँव में परइया, कोरबा और उराँव जनजाति के तकरीबन 80 घर हैं। यह एक घाटी नुमा जगह है जो चारो तरफ पहाड़ों से घिरी हुई दिखती है। गाँव की तरफ आती हुई लीक खत्म होती है और पहला घर जसिंता देवी का है जो पुलिस की गोली से अपने घर में ही मारी गई थी, इस घटना को एक लंबा अरसा बीत चुका है। हमारे पहुँचते ही एक महिला आँगन में उस जगह जा कर खड़ी हो जाती है जहाँ जसिंता देवी गोली से निढाल हुई थी। वह महिला जसिंता देवी की सास हैं। क्रोधित हो उन्होंने हमे पहले कैमरा बंद करने को कहा। फिर बताया कि पुलिस उस दिन माओवादियों को खोजने आई थी और हमारे घर में आग लगाना चाह रही थी जिसका जसिंता ने विरोध किया और वह उनकी गोलियों से मारी गई। मिट्टी की दीवारों में गोलियों के निशान अभी भी बने हुए हैं। जसिंता को जिस समय गोली मारी गई उसकी 7 महीने की बेटी प्रियंका उसके पास ही थी जो अब थोड़ी बड़ी हो गई है। गाँव वाले बताते हैं कि पुलिस ने अपनी इस हत्या का इल्जाम माओवादियों पर लगाया। चुरकुन पहडि़या गुस्से में बोलते हैं कि गाँव में एकता है और हमने पुलिस को दोबारा यहाँ आने से मना कर दिया है। जब दोबारा पुलिस आई तो हमने उसे खदेड़ भी दिया। अक्सर गाँवों में हमने पाया कि हत्या के बाद सैन्य बलों द्वारा दी गई एक “मोहलत” होती है। वे कुछ महीने तक दोबारा गाँव में लौटकर नहीं आते। एक हत्या पूरे गाँव में वर्षों तक खौफ को जिंदा रखती है। खौफ इतना कि लोग काम करने के बाद मजदूरी लेने तक से डरते हैं। मनरेगा, सड़क निर्माण, इंदिरा आवास जैसी योजनाओं के लिए वे काम करते हैं और उनकी मजदूरी इन योजनाओं की तरह ही अधूरी पड़ी है।
वहाँ लड़कियाँ फिर से स्कूल जाने लगी हैं और कुछ बच्चे स्कूल की चहरदीवारी पर बैठे हैं। करमडीह के स्कूल से सैन्य बलों का कैम्प वापस जा चुका है। यह एक सामान्य स्थिति है जो 31 जनवरी की शाम के दहशत के बाद लौटी है। दुकानदार ने अपने घर के आसपास खोदी गई मिट्टी को पाट दिया है। सैन्य बलों द्वारा यह खुदाई माओवादियों के छुपाए गए शस्त्र खोजने के लिए की गई थी। यहाँ से उन्हें भिंड़ी के पौधे की कुछ जड़ें मिली थीं। 31 जनवरी की शाम को सात बजे माओवादियों के एक दस्ते ने हवाई फायरिंग की। देर रात तक गोलियाँ चली, देर रात तक दहशत पली। लोग बंदूकों की एक आवाज के बाद दूसरी आवाज का इंतजार करते रहे और दूसरी के बाद तीसरी फिर सुबह जाने किस गिनती के बाद आई। सुबह तक सब कुछ शांत हो चुका था। रात की घटना के अवशेष में दीवारों पर सुराख के निषान बचे थे। अगले दिन सैन्य बल स्कूल छोड़कर चले गए, उसके एक दिन बाद बच्चे भी स्कूल चले गए। अध्यापकों से ज्यादा इन स्कूलों में बच्चे खाना बनाने वाले का इंतजार करते हैं और स्कूल की चहरदीवारी पर बैठे बच्चे वही कर रहे हैं।
अगले गाँव नवरनागू जाने के लिए यहाँ से हमे पैदल चलना था, पहाड़ी के उस पार तक। यह कोयल नदी के किनारे का एक गाँव है। 250 किमी। लम्बी इस नदी में कई छोटी नदियाँ मिलती हैं। अपनी पूरी यात्रा के दौरान हमने कोयल नदी को कई बार पार किया। गाँव में एक महिला चटाई बीन रही है, यह किसी पेड़ की मजबूत पत्तियाँ हैं जिन्हें एक-दूसरे के ऊपर-नीचे गूथा जा रहा है। एक कमसिन उम्र की बच्ची झाड़ू बहार रही है, गाँव के अकेले अध्यापक पढ़ाने के लिए चले गए हैं। लूकस मिंज की हत्या को एक महीने बीत चुके हैं। गाँव से ढोल परवला तकरीबन एक किमी। की दूरी पर है, जहाँ लूकस मिंज की लाश नदी की रेत पर 5 दिनों बाद पाई गई थी, जो पानी में सड़ चुकी थी। लूकस बोलने और सुनने में अक्षम थे और नदी किनारे वे गाय चराने जाया करते थे। उनकी हत्या की सही तारीख गाँव के लोगों को नहीं पता पर यह शायद 1 फरवरी की तारीख थी। इस घटना को नदी में एक मछली पकड़ने वाले ने देखा था, सैन्य बलों ने नदी के उस पार से दो गोलियाँ चलाई थीं। एक महीने बीत चुके हैं सैन्य बलों ने इधर आना स्थगित किया हुआ है।
-चन्द्रिका,
क्रमश:

रविवार, 10 जून 2012

झारखंड:संगीनों पर सुरक्षित गाँव -1



नैतिकता की रक्षा के करने के लिए कुरुक्षेत्र में 18 अक्षौहिणी सेना के विनाश लीला की भी हम निंदा नहीं करते बल्कि उन सबों से हम राष्ट्रहित की सीख लेते हैं-जी.एस.रथ (डी.जी.पी. झारखण्ड, 30 मार्च 2012, )
‘‘भारतीय राज्य हमारे आंदोलन को हिंसा के नाम पर दुष्प्रचारित करता है क्योंकि वह हिंसा पर एकाधिकार चाहता है, जबकि राज्य के परमाणु बम से लेकर वृहद सैन्य बल अहिंसा के लिए नहीं हैं।’’ प्रशांत, (माओवादी पार्टी के सदस्य)। यह मार्च की पतझड़ का मौसम है। पेड़ों की पत्तियाँ सूख कर गिर चुकी हैं और रात के तकरीबन नौ बजे हैं जब हम जंगल में अपना रास्ता भूल चुके हैं। झारखण्ड झाड़ों का प्रदेश है और यहाँ घूमते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि यहाँ राज्य, नौकरशाही और लोकतंत्र सब अपना रास्ता भूल चुके हैं। यह गड़वा और लातेहार के बीच की कोई जगह है। मेरे साथ दैनिक के पत्रकार सतीश हैं जिन्हें कुछ महीने पहले माओवादी होने के आरोप में पुलिस द्वारा प्रताडि़त किया जा चुका है। सड़क जैसी कोई चीज इन्हीं पत्तियों के नीचे दबी है जो साहस के साथ बगैर किसी पुल के नदी और नालों के उस पार निकल जाती है, मसलन नदी को सड़क नहीं, सड़क को नदी पार करती है। हम मोटरसाइकिल को बार-बार रोक, पीछे मुड़कर देखते हैं और स्वाभाविक भय के साथ आगे बढ़ जाते हैं। सूखी पत्तियों पर घूँमते पहिए किसी के पीछा करने का आभास देते हैं। यह पहियों के रौंदने से पत्तियों के चरमराने की आवाज है। साखू के फूल पूरे जंगल को खुशबू से भरे हुए हैं पर खौफ और भय किसी भी खुशबू और आनंद पर भारी होता है। सतीश को इन इलाकों में जंगली जानवरों का उतना भय नहीं है जितना कि कोबरा बटालियन का, जो कई बार ग्रीन हंट अभियान के दौरान रात को जंगलों में रुक जाते हैं। यह अभियान “माओवादियों के सफाए” के लिए इन इलाकों में पिछले दो वर्षों से चलाया जा रहा है। सतीश एक घटना का जिक्र करते हैं जिसमें सी.आर.पी.एफ. ने एक गूँगे बहरे चरवाहे की कुछ दिन पहले गोली मारकर हत्या कर दी है। 20-25 कि.मी. भटकने के बाद हमें वह रास्ता मिल जाता है जिसके सहारे हम जंगल से बाहर निकल पाते हैं।
हम अपने यात्रा की शुरुआत कर रहे थे जबकि यहाँ के स्थानीय पत्रकारों ने मुलाकात की और वे इन इलाकों की कहानियाँ सुनाते रहे। मौत और हत्याओं की कहानियाँ, बरसों पहले के किस्से, झारखण्ड बनने के बाद से कल परसों तक के किस्से। कहना मुश्किल है कि झारखण्ड बना या बिगड़ गया। जबकि राज्य और ज्यादा असुरक्षित हुआ और स्कूलों-गाँवों में सी.आर.पी.एफ. व कोबरा कमांडो लगा दिए गए। लोगों की सुरक्षा यह है कि इन इलाकों से अक्सर कोई गायब हो जाता है और हफ्ते-दस दिन बाद गाँव वालों को अखबारों से पता चलता है कि उसकी लाष किसी नदी किनारे या किसी नाले में सड़ चुकी है या जिले पार किसी जेल में उसे कैद कर दिया गया है। सैन्य बल उसे ‘माओवादी’ बताते हैं जो एक “मुठभेड़” में मारा गया और यदि वह कैद है तो जाने कितने ‘इल्जामों’ का दोषी। वह उन घटनाओं का भी दोषी है जो उसके सूरत या बम्बई में किसी फैक्ट्री में काम करते हुए घटित हुई। गाँव के लोगों को तब थोड़ा सुकून होता है जब गायब शख्स जेल में पहुँच जाता है। यहाँ जेल में पहुँचना ही सुरक्षित होने का प्रमाण है। जबकि कुछ प्रमाण ऐसे भी हैं कि वर्षों पहले गायब लोग अभी तक जेल नहीं पहुँचे और न ही उनकी लाश मिली है। पिता, पत्नी और परिवार के अलावा ऐसे लोगों का इंतजार अब कोई गाँव वाला नहीं करता, क्योंकि लोगों को पता हैं कि किसी भी इंतजार की एक उम्र होती है।
लातेहार जिले में जिस जगह पर हम रुके हुए हैं वहाँ से बरवाडीह तकरीबन 20 किमी. है। जयराम प्रसाद अपने छोटे बेटे के साथ तड़के ही हमसे मिलने पहुँचते हैं और बातचीत शुरु हो इससे पहले उनका गला रुँध जाता है, वे देर तक रोते रहते हैं। फिर वे बताते हैं कि 21 मार्च को पुलिस ने उनके बड़े बेटे संजय को थाने में बुलाया था और आज पाँच दिन से वह लापता है। संजय बरवाडीह में मोबाइल की एक दुकान चलाता था। कोई अधिकारी कहता हैं कि बातचीत के बाद उन्होंने उसे उसी रात छोड़ दिया था, एस.पी. क्रांति कुमार कहते हैं कि उसे मंडल के आसपास जंगल से 23 की रात को पकड़ा गया है। जयराम कानून का हवाला देते हुए कहते हैं कि अगर एस.पी. की ही बात को सही मान लें तो 24 घंटे में उसे कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए था पर पाँच दिन बीत चुके हैं। यदि उसे छोड़ दिया गया तो 35 साल की उम्र में क्या वह अपने घर का रास्ता भूल जाएगा। जयराम की आशंकाएं कुछ और हैं पर अभी तक किसी लावारिस लाश की खबर किसी भी अखबार में नहीं छपी है। उस दोपहर हमे पता चला कि संजय को माओवादियों का सहयोग करने के आरोप में जेल भेज दिया गया है। पकड़े जाने के पूरे छः दिन बाद, इन इलाकों में ‘सहयोग’ सबसे बड़ा जुल्म है। यह ‘सहयोग’ किसी अपराध में सहयोग करना नहीं है

-चन्द्रिका,
क्रमश:
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