शनिवार, 23 जून 2012

झारखंड:संगीनों पर सुरक्षित गाँव -4


इस दौरान अखबार हमारी पहुँच से दूर थे, पर हम कई अप्रकाशित खबरों के करीब। बहेरटाड़ के सरपंच बीफा और गाँव के अन्य 8 लोगों को हफ्ते भर पहले सी.आर.पी.एफ. ने पिटाई के बाद छोड़ दिया है। बीफा की दाहिनी आँख से दिखना कम हो गया है। गाँव के बगल में सी.आर.पी.एफ. का एक स्थायी कैम्प बनाया जा रहा है। बगल ही मुर्गीडीह गाँव है जहाँ बिरजू ओराँव की दसों उंगलियों को कटर से चीर दिया गया है, उंगली में पट्टी बाँधकर वे काम पर चले गए हैं। अपनी-अपनी तकलीफों के साथ सब अपने-अपने गाँव में जिंदा हैं।
संतोष जिनके दोस्त राजेन्द्र प्रसाद की हत्या जतिन नरवाल एस।पी। के आवास में पिटाई से हुई थी, इसके एवज में राजेन्द्र की पत्नी मंजू को कोई नौकरी दे दी गई है। संतोष जो राजद के स्थानीय नेता हैं वे अपने दोस्त की हत्या के अपराधियों को सजा दिलाना चाहते हैं। उनको लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। कुछ माओवादी घटनाओं के तहत इनका नाम अखबारों और पुलिस के दस्तावेजों में शामिल किया जा चुका है। सुल्तानी घाटी में नशे मे धुत सी.आर.पी.एफ. के ‘जवानों’ ने एक टेम्पो ड्राइवर दारा सिंह की कुछ दिन पहले हत्या कर दी है। चंद दिनों में अनगिनत घटनाएँ हैं। वह जो अखबारों में प्रकाशित हुईं और वे जिनका किसी अखबार में कोई जिक्र भी नहीं। गाँव में अखबार कम पहुँचते हैं और अखबारों में गाँव भी।
यह 28 मार्च की तारीख थी जब रात के 10 बजे हम चेमू-सान्या पहुँचे। यह 1857 के क्रांतिकारी नीलांबर-पीतांबर का गाँव है, यहाँ आने के लिए सड़क को 20 किमी. पीछे छोड़ना पड़ता है। जिसके सहारे यहाँ तक हम पहुँचे हैं वह नदी-नाले-सड़क-खाई का एक मिश्रित रूप है। पूरे झारखण्ड में आज उनकी 153वीं शहादत मनाई जा रही है। झारखण्ड के नेता नामधारी सिंह इंदर चंदवा में नीलांबर-पीतांबर की प्रतिमा स्थापना के लिए आए हुए हैं. उन्होंने युवाओं से नीलांबर-पीतांबर जैसा होने का आवाह्न किया है। आज के ही दिन नीलांबर-पीतांबर विष्वविद्यालय ने भी एक बड़ा आयोजन रखा है। माओवादियों के सशस्त्र दस्ते ने धनकारा गाँव में मशाल जुलूस निकाला है। हम गाँव के एक सिरे पर हैं यहाँ काफी ठंड है, गाँव के लोगों ने सूखी लकडि़याँ जला रखी हैं और इसके आसपास कुछ लोग बैठे हैं। अलाव की रोशनी के सहारे इर्दगिर्द के 2-3 घरों को देखा जा सकता है। बाँस के फट्ठों का एक लंबा सा तख़त है जहाँ गाँव के लोग अक्सर इकट्ठा हुआ करते हैं। किसी भी आयोजन से गाँव के लोग अनभिज्ञ हैं। शायद माओवादियों का एक दस्ता थोड़ी देर पहले यहाँ से गुजर चुका है। थोड़ी देर बाद कुछ बच्चे आते है, जो संघम के बाल कलाकार है और जलते अलाव की आँच में जीतन मराँडी के कुछ गीत सुनाते हैं। ये झारखण्ड के लूटे जाने के गीत हैं, इनमे लोगों के संघर्ष में बुलाने की पुकार है। यह गाँव कुटकु-मंडल बाध परियोजना के तहत 32 डूबने वाले गाँवों में से एक है। 1912 में पूरे सौ साल पहले किए गए सर्वे के आधार पर लोगों की जमीनों का जो मुआवजा तय किया गया था वह कुछ लोगों को मिल चुका है। इन सौ वर्षों में पीढि़याँ बदल चुकी हैं और उनके गाँव छोड़ने के इरादे भी। 1972 में बाँध बनने की जो परियोजना चालू हुई थी वह 97 से स्थगित है। बगैर किसी सूचना के बाँध के इंजीनियर बैजनाथ मिश्रा ने बाँध के अस्थाई फाटक को बंद कर दिया था और पूरा इलाका डूब गया था। जानवरों की संख्या नहीं गिनी जा सकी, तबाही के अन्य आँकलन नहीं लगाए जा सके पर 21 लोग पानी में डूब कर मर गए। बनवारी लाल अंतिम युवक के मौत की याद सुनाते हैं कि कैसे वह 7 दिनों तक बगैर कुछ खाए-पिए पेड़ पर लटका रहा और जब लोग तसले के सहारे तैरते हुए उसके पास पहुँचे तो अचानक वह पानी में गिर गया। डूबते गाँवों से लोगों को बचाने इस दौरान कोई प्रशासन की ओर से न आया। माओवादियों ने उसी बीच इंजीनियर बैजनाथ पंडा को इस तबाही के इल्जाम में मौत की सजा सुनाई और उसकी हत्या कर दी गई। इसके बाद परियोजना का कार्य स्थगित कर दिया गया। यह स्थगन अभी भी जारी है और 32 गाँवों का उजड़ना थम सा गया है। लोगों के पलायन की वजहें बदल गयी हैं। अब सैन्य बल आते हैं और माओवादियों के सहयोग के लिए युवकों को पीटते हैं, उनके घरों के ताले तोड़ दिए जाते हैं, वे उनके अनाज एक दूसरे में मिला देते हैं। मनगू, सतीस, जोखन सिंह, करम दयाल सब कहीं चले जाना चाहते हैं। ऐसी जगह जहाँ वे पुलिस प्रताड़ना से बच सकें। वे चले भी जाते हैं पर जब भी वे साल-दो साल बाद इलाहाबाद, बनारस से लौटकर आते हैं। कोई न कोई इल्जाम उनके इंतजार में होता है। अपने गाँव में लौटना किसी खतरे में लौटने जैसा है। युवाओं के नीलांबर-पीतांबर बनने का नामधारी सिंह इंदर द्वारा किया गया आवाह्न दूसरे दिन अखबारों में प्रमुखता से छपा है। हम वहाँ से लौट आए हैं, बस घटनाएँ वहाँ पर चल रही हैं। घटनाओं अपना रास्ता नहीं भूलतीं और न ही उन्हें किसी रास्ते की जरूरत होती है। जब यह रिपोर्ट लिखी जा रही है आपरेशन ऑक्टोपस वहाँ शुरु हो चुका हैै। नीलांबर-पीताम्बर के गाँव चेमू-सान्या में सैन्य बलों ने गोलियाँ चलाई हैं, हत्या हुए लोगों की संख्या का पता नही चल रहा है यहाँ महिलाओं के साथ बलात्कार भी हुए हैं इलाके में जाने पर पत्रकारों को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। मनोज विश्वकर्मा के पास लातेहार में नीलांबर पीताम्बर की जीवनी मिली थी जिसके आरोप मे 1 अप्रैल को उन्हंे जेल भेज दिया गया है। बरवाडीह में एक ‘मुठभेड़’ में छः माओवादियों के मारे जाने की खबरें अखबारों के पहले पन्ने पर छपी हैं। दूसरे दिन माओवादियों ने इस खबर के गलत होने की पुष्टि की है। जो कहीं छपने के बजाय, कहीं छिप गयी है।
मोबाइल: 09890987458

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