शुक्रवार, 22 जून 2012

झारखंड:संगीनों पर सुरक्षित गाँव -3


हम छत्तीसगढ़ की सीमाओं को छूते हुए बल्लीगढ़ और होमिया पहुँचे थे। राज्य ने भले ही प्रदेशों की इन सीमाओं को निर्धारित किया हुआ है पर प्रकृति और लोगों ने उसे मान्यता नहीं दी है। इन गाँवों के लिए छत्तीसगढ़ एक बाजार है, एक ओकड़ा (ओझा) का घर है, वहाँ से आकर एक बैगा रोज यहीं घूमा करता है, छत्तीसगढ़ का सबकुछ यहाँ ज्यादा से ज्यादा सुलभ है। यह गड़वा जिले का एक बड़ा गाँव है 12 किमी. में फैला हुआ। भुइयाड़, खरवार और गोड़ आदिवासियों की दस हजार जनसंख्या वाला गाँव। एक गाँव जिसमे दो नदियाँ बहती हैं। हम यहाँ के कुछ युवकों के साथ गाँव के बीच बहती पोपरा नदी तक गए। हमने यहाँ ज्यादा वक्त गुजारा और गाँव का लंबा इतिहास सुना। इस गाँव का इतिहास एक स्थानीय सामंत रामनाथ पाण्डे उर्फ फुल्लू पाण्डे के प्रताड़ना का इतिहास है। जिसके इल्जामों के दस्तावेज संक्षेप में लिखना भी मुश्किल है। एकनाथ भुईयाँ 67 साल पहले से कहानी को शुरु करते हैं जब फुल्लु पाण्डे का परिवार यहाँ आकर बसा था। गाँव के लोगों ने एक ब्राम्हण को पूजा-पाठ के लिए बसा लिया था। गाँव की सैकड़ों एकड़ जमीन अब उसके कब्जे में है। जमीनों पर यह कब्जेदारी भूदान और भू-सुधार के बाद की कथा है। अभी पिछले बरस ही गाँव वालों की 150 एकड़ जमीन के कागजात बनवाकर स्थानीय सामंत फुल्लु पाण्डे ने जिंदल के हाँथों बेंच दिया है। गाँव वाले जमीन को अब भी जोत रहे हैं, उन्होंने अपने जमीन के कागजों पर शहर में जाकर लेमिनेषन करवा लिया है कि कागज मजबूत रहेगा तो जमीन बनी रहेगी, पर लगातार यह भय बना हुआ है कि जिंदल जाने कब आ जाए। हम बीच में एकनाथ से किसी घटना की तारीख पूछते हैं तो वे अपनी भाषा में कहते हैं कि हम नहीं जानते कि तारीख कितने किलो की होती है। वे बताते हैं कि हम धन से नहीं, मन से पढ़े लोग हैं।
उनकी आवाज थोड़ी धीमी हो जाती है यह गाँव की बहु-बेटियों से जुड़ा मसला है, लड़कियों की उम्र बढ़ती, गाँव में नई बहुएँ आतीं तो किसको बख्श देना है यह फुल्लू पाण्डे की इच्छा पर निर्भर करता। लेकिन सैकड़ों को उसने नहीं बख्शा, इन घटनाओं के आँकड़े क्रूरता और शर्मिंदगी के हैं जिन्हें कोई नहीं जुटाता। ऐसी घटनाओं का जिक्र करने के बाद मैने एकनाथ के चेहरे पर पछतावे का भाव देखा मानो अपने गाँव के विरुद्ध उसने कोई अपराध कर दिया हो। एक लड़का जो पेड़ से सटा हुआ बैठा है उसकी उम्र तकरीबन 25 साल है और उसकी छः एकड़ जमीन चली गई है। वह कहता है कि अगर एम.सी.सी. के लोग साथ देंगे तो जिंदल यहाँ नहीं आएगा। फुल्लु पाण्डे अब गाँव से दूर किसी कस्बे में रहने लगा है। अब तक गाँव के सैकड़ों लोग इकट्ठा हो चुके हैं। हमारे कागजों पर सब अपना नाम दर्ज करा देना चाहते हैं। जाने उनकी क्या उम्मीदें हैं कि कागजों पर लिखे उनके नाम उनकी जोत की जमीन के दस्तावेज बन जाएँगे।
गड़वा, पलामू और लातेहार के कई गाँवों में हम घूमते रहे। कहानियाँ बदल जाती थीं, पीड़ाएँ कम या ज्यादा हो जाती थीं, बस। दुकानदार, किसान, मजदूर और गाँव के सरपंच जाने कितनों पर माओवादियों के सहयोग करने का आरोप है, उन्हें खाना खिलाने का आरोप, किसी विस्फोट में शामिल होने का आरोप। खाना खिलाने के आरोप में बरगड़, कुमीकोला के सरपंच रामदास मिंज और फिदा हुसैन 20 जनवरी से जेल में हैं। उन पर आरोप यह भी है कि भंडरिया में माओवादियों द्वारा सैन्य बलों की जो गाड़ी उड़ाई गई, वे उस घटना में सहयोगी थे। जबकि गाँव वालों का कहना है कि इस घटना के 12 घंटे पहले ही पुलिस उन्हें थाने में लेकर गई थी और घटना के दौरान वे थाने में ही थे। क्या राज्य के विरुद्ध माओवादियों के सहयोग में पूरा का पूरा इलाका खड़ा है? क्या और क्यों के प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं? झारखण्ड के एक सशस्त्र माओवादी दस्ते ने एक दोपहर हमसे मुलाकात की। यह कोयल नदी के किनारे की कोई जगह थी। अपनी लंबी बातचीत के दौरान उन्होंने कई ऐसे तथ्य बताए जो उनके संघर्ष से सीधे तौर पर जुड़े हुए थे। उन्होंने टी.पी.सी., जे.एल.टी., जे.पी.सी., पी.एल.एफ.आई. और जे.जे.एम.पी. जैसे संगठनो पर आरोप लगाए जो माओवाद के नाम पर उनके संघर्ष को बदनाम कर रहे हैं और जिनमे से कुछ को पुलिस द्वारा संरक्षण भी मिला हुआ है। वे चिंतित थे कि सैन्य बलों द्वारा गाँव वालों पर जो कार्यवाही की जा रही है उससे आदिवासियों की आर्थिकी पर इस बार भारी असर पड़ने वाला है। यह महुआ और तेंदू पत्ते का मौसम है। सैन्य बलों की प्रताड़ना के भय से लोग इसे इकट्ठा करने के लिए अपने गाँव से दूर नहीं जा पा रहे। कई उत्तरों के साथ हम लौट आए और जेहन में नए प्रश्न उभरने लगे। झारखण्ड मानवाधिकार संगठन के शषिभूषण पाठक ने डी.जी.पी. जी.एस. रथ से मिलने की इच्छा जाहिर की पर वे राज्यसभा के चुनाव में व्यस्त थे उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया। अलबत्ता दूसरे दिन उनका एक लेख अखबार में छपा जिसमें वे महाभारत के युद्ध से राष्ट्रहित की सीख लेने की सलाह दे रहे थे। शायद वे इस मिथक के सहारे झारखण्ड की मिट्टी को युद्ध में लाल होने की हिमायत में खड़े हैं।
-चन्द्रिका,
क्रमश:

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