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रविवार, 12 जनवरी 2014

एक था शहर 'मुजफ्फर नगर'

एक था शहर 'मुजफ्फर नगर' मुजफ्फर नगर दंगा पीड़ितों के शिविर से लौटकर

पिछले महीनों में उन्होंने अपने घर छोड़े,गांव छोड़ा और अपनी पुस्तैनी जमीनों से ज़िंदगी का नाता भी छूट गया. हर रोज उनके लिए मुश्किलें हैं, शहर की,सरकार कीए मौसम की, बाज़ार की इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है कि साम्प्रदायिक दंगों के बाद किसी शहर की सूरत में कोई बदलाव आता है. शायद वक्त के साथ लोगों के चेहरों से खौफ थोड़ा उतर जाता है. शायद वह खौफ कहीं बहुत भीतर गुजर जाता है. कहना यह भी मुश्किल है कि चार महीने पहले हुए मुजफ्फर नगर दंगे के वक्त स्टेशन के बाहर टंगी यह बड़ी वाली होर्डिंग थी या नहीं.जो फिलहाल नई.नई सी दिख रही है और जिस पर लिखा है. हर.हर मोदी, घर.घर मोदी. बहुत कम समय में यह भी कहना मुश्किल है कि होर्डिंग पर लिखा यह सिर्फ तुकबंदी है या हर घर में
मोदी को पैदा किए जाने की कवायद. हर शहर अपनी छोटी.छोटी चीजों के जरि, सवाल पैदा करता है और अपने छोटे.छोटे प्रतीकों में जवाब देता है.शहरों के मोड़ पर लगी होर्डिंगें शहर की कलाई पर बधी घड़ियां होती हैं जो शहर की संस्कृति और राजनीति के मिजाज का समय बताती हैं.ऐसा क्यों होता है कि जिन शहरों में दंगे होते हैं  वहां मोदी की होर्डिंग                                  का  कद   बढ़ जाता है.ऐसा क्यों होता है कि ऑटो के स्टीयरिंग पर चिपका किसी मस्जिद का फोटो उधड़ जाता है.हमशक्ल दिखते लोगों के बीच वह कौन सा संतुलन है जो कुछ दिनों के भीतर इतना बिगड़ जाता है कि वे अपने पड़ोसी का कत्ल कर देते हैं. हाजिरा खातून जिन पडोसियों के घर रोटियां खाती थी वे इतने उन्मादी कैसे हो गए कि खा़तून को अपना गांव खेड़ी छोड़ना पड़ गया. इन सवालों के जवाब संसद के दरवाजे खोलकर आते हैं. जहां देश का हर नागरिकए धर्म और जाति में बांटकर वोट बन जाता है जो संसद जाने की तैयारी में जुटी पार्टियों के लिए एक 'ओट' का काम करता है'
पिछले चार महीने से मुजफ्फर नगरए दंगे होने और दंगे गुजर जाने के बाद का शहर बना हुआ है दंगाईयों के उन्माद कुछ दिनों के थे अब उन्माद के बाद का भय है,असुरक्षा है और कहीं पनाह न मिल पाने की बेबसी और एकजुट रहने का साहस है
  दंगे में पीड़ित ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोग अपना गांव छोड़कर कई किलोमीटर दूर चले आए हैं उनके घर छूट चुके हैंए जानवर भी छूट चुके हैं कई लोगों से बात करते हुए ऐसा लगा कि वे खुद को भी छोड़ आए हैंए उनके साथ बस एक मुसलमान चला आया है शिविरों में मौलवियों का भाषण जिसे और मजबूत बना रहा है उनके बच्चे, उनका परिवार है और उन सबके साथ उनके गांवों का भुगता हुआ का डर है किन्हीं सड़क के किनारे उन्होंने झुग्गियां बना ली हैं  कई.कई गांव एक साथ हो गए हैं हजार झुग्गियों वाले गांवए जिसने आसमान और जमीन के बीच लाल.नीली पालीथीन से खुद को ढक लिया है एक साथ और एकजुट होना शायद उनके भय को थोड़ा कम करता हैण् हिन्दू उन्मादियों जो मुजफ्फर नगर की स्थानीयता में जाट हैं,उनसे खुद को उन्होंने बचा लिया है सरकारों के लिए उनका जीवन.मौतए भय.आक्रोश, उजड़ना.बसना २०१४ के चुनाव में किन्हीं तारीखों का सवाल है सभी पार्टियां इस सवाल को ठीक ढंग से हल कर लेना चाहती है            
जनवरी की ज्यादातर सुबहें धुंध भरी होती होती हैं कुहरे की धुंध और ठंड में यह शहर मुजफ्फर नगर उत्तर.भारत के सबसे ज्यादा ठंडे शहरों में से एक है. इसी बरस कुछ देहाती इलाकों में पारा शून्य तक पहुंच चुका है. यहां ४ जनवरी के पहले की रातें और भी ठंडी रही है. इन्हीं किन्ही रातों में दंगा पीड़ितों के कैम्पों से कई बच्चों के ठंड से मरने की ख़बरें अखबारों में आई हैं.जिसके बाद मौसम और भी सर्द होता गया और वोटमार पार्टियों की राजनीति और भी गर्म होती गई है.अलग.अलग पार्टियों के काफिले यहां घूम रहे हैं. सब यहां रोटियां सेंकना चाहते हैं और राहत शिविरों के लोग अपने चूल्हे पर रोटी छोड़कर यह देखने के लिए जुट रहे हैं कि बात.बेबात से रोटियां कैसे सेंकी जाती हैं. थोड़ी देर बाद भूख उन्हें फिर से उनकी झुग्गियों की तरफ लेकर चली जाती है. इस बीच मौत की संभावनाएं और बढ़ती गई है. कई बच्चों को निमोनिया ने जकड़ रखा है. इन मौतों को ठीक.ठीक सरकार के द्वारा की गई हत्या नहीं कहा जाता क्योंकि ऐसी हत्याएं ईश्वर की मंजूरी के बिनाह पर होती हैं. जबकि इतनी सारी हत्याओं के बाद ईश्वर को भी हत्यारा कहना मुमकिन नहीं. वोट की राजनैतिक विद्रूपताओं ने पिछले कुछ वषों में प्राकृतिक आपदाओं और मौसमों के बदलाओं को अपने सियासती संभावनाओं में तब्दील करने की प्रवृत्ति अपनाई है.साम्प्रदायिक दंगे में हुई हत्याओं से उपजी जन असुरक्षाए सरकारों और पार्टियों के लिए राजनैतिक रूप से सुरक्षा और सुविधा मुहैया कराती है. यह अखबारों के लिए ख़बरए गैर.सरकारी संगठनों के लिए 'समाज.सेवा', राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं के लिए जन 'पक्षधर' होने का समय है. वे सब व्यस्त हैं और एक मामूली हो चुकी सड़क की अहमियत बढ़ गई है. कई सफेद गाड़ियां उन पर घूम रही हैं.  
४ जनवरी वह आखिरी तारीख थी जब मुजफ्फर नगर के दंगा पीड़ितों को अपने कैम्प खाली कर देने का आदेश सरकार ने दिया था. एक कैम्प की कुछ झुग्गियां उठकर सांझक के कब्रिस्तान में जा चुकी हैं. यह अखबार की खबर है जिसने सरकार की भाषा में लोगों के शिविरों में बसने पर आपत्ति सी दर्ज की है. अमर उजाला अहमियत देते हुए अपनी पहली ख़बर में शिइर में बसे पीड़ित लोगों फटकार रहा है.उसका ऐसा मानना है कि मुख्यमंत्री यह तय करेगा कि राज्य में कौन कहां रहेए कहां न रहे, जिए या मर जाए.जनता ने उसे पांच साल के लिए यह अधिकार दे रखा है. झुग्गियों में बसने की बेबसी को दुसाहस की तरह दर्ज किया गया है. मौत और हत्याओं के पहले कब्रिस्तान में बसना एक प्रतीक सरीखे है. जैसे दफ्न होने से पहले अपनी कब्र का मुआयना कर लेना, जैसे कब्र में जाने की पूरी तैयारी खुद करना, जैसे दंगे में बचकर सरकारी आदेश से मर जाना. कई कैम्प के लोगों ने कैम्प छोड़ने से मना कर दिया है. लगातार पुलिस की गाड़ियां आकर झुग्गियां हटाने का दबाव बना रही हैं. प्रदेश का मुख्यमंत्री झुग्गियों में बसे लोगों को भाजपा और कांग्रेस के लोग कह रहा है.क्योंकि सरकार ने दंगे में हुई हत्याओं के मुआवजे दे दिए हैं. पर हत्याओं और मौतों की संभावनाओं से उपजे व्यापक भय का कोई मुआवजा किसी सरकार के पास नही है. किन्ही और हत्याओं के बाद सरकार फिर से उनकी मौत के मुआवजे दे सकती है. सरकारों का यही चलन है वह जिंदा लोगों के लिए कुछ नहीं करती. मुआवजे देकर वह लोगों के लाशों की कीमत अदा कर देती है.अलग.अलग हत्याओं में मारे गए लाशों की दरें तय कर दी जाती हैं. जो दो लाख से पांच लाख तक हो सकती है.
मलकपुर कैम्प दंगा पीड़ितों का सबसे बड़ा कैम्प है. कुल छः वार्डों का कैम्प और हजार से ज्यादा झुग्गियों वाला कैम्प. दोनों किनारों पर अस्थाई रूप से दो मस्जिदें भी बनाई जा चुकी हैं. इसलिए अस्थाई रूप से अल्लाह को भी यहां रहने की मजबूरी सी है और उसकी गवाही में ३२ लोगों की मौतें इस ठंड में यहां हो चुकी हैं. लोगों की जिंदगियां बचाने में जैसे वह असफल सा रहा हो. बोराखुर्द, कैथल, सिसोली अलग.अलग गांवों के लोग अब पड़ोसी हो चुके हैं. ये सब के सब पीड़ित हैं और सब के सब मुस्लिम समुदाय के लोग हैं. यह कहते हुए मोदी,आडवानी और भाजपा के नेताओं का वह वाक्य याद आता है जिसे आतंकवाद और मुस्लिम के लिए वे अक्सर अपनी जन सभाओं में दुहराते रहते हैं. जिस समुदाय के आतंक में ये मुसलमान,झुग्गियों में रहने पर विवश हैं वे सब के सब हिन्दू हैं और शायद हिन्दू होने का उन्हें गर्व भी है. कैम्प छोड़ने के सरकारी आदेश पर बाते करते हुए अयूबए यासीन और सादिक खुद को अलाव से गर्म कर रहे हैं. कुछ झुग्गियों में चाय बन रही है और कुछ चूल्हों पर रोटियां सेंकी जा रही है. इन अस्थाई कैम्पों से जो बच्चे पढ़ने के लिए बगल के स्कूलों में जाते थे वे आज नहीं गए हैं. नजदीकी कस्बे में जो कुछ लोग मजदूरी के लिए जाते थे उनका काम आज बंद है. सरकार के आदेश को न मानने के लिए एक साथ और एकजुट रहना जरूरी है.सरकार उन्हें उनके घर लौटने का दबाव बना रही है. अनवर बताते हैं कि दंगे के कुछ दिन बाद उनका भाई काशिम घर के हालात देखने के लिए गांव की तरफ गया और दो महीने से नहीं लौटा.फिलहाल अनवर अपने भाई के न लौटने की आशंकाओं से घिरे हैं पर पड़ोसी उनकी आशंका को यकीन की तरह मान रहे हैं.उन्हें यकीन है कि अब वह कभी नहीं लौटेगा. यह उनकी असुरक्षा के प्रमाण हैं और यही वजहे हैं कि वे अपने गांव नहीं लौटना चाहते. कैम्पों में रहना मुश्किल हैए अस्थायी जिंदगियां बसर करना दुरूह भी पर यह सब जीवन बच जाने के बाद की बातें हैं.
शम्सुद्दीनए मलकपुर कैम्प के पांच नम्बर वार्ड में रहते हैं. वे कहते हैं कि वे सभी वार्डों में रहते हैंए वे घूमते रहते हैं और अपनी स्थितियों के साथ शिविर के और परिवारों का जायज़ा लेते रहते हैं. वे नज़्म लिखते हैं और शिविर के बच्चों को नजदीक के मदरसे में भेजने के लिए कहते हैं.एक अस्थायी जिंदगी में यह स्थायीत्व सा प्रयास है. वे हमे स्थानीय और उर्दू भाषा में मिश्रित अपनी लिखी एक नज्म सुनाते हैं. जिसके मायने हैं कि लफंगे, चौधरी हो गए हैं. चुनाव और वोट की राजनीति गुंडों का त्योहार बन गई है. जब इनका काम निकल जाता है तो नेता अपनी नज़र घुमा लेते हैं और ओड़ी.सोड़ी बात करते हैं. शमसुद्दीन कहते हैं कि हमे कोई सरकार नहीं बचाएगी. जब हमे कैम्पों से हटा दिया जाएगा तो हर जगह ऊपर आसमान है और नीचे जमीन हम इसी के बीच कहीं ठहर जाएंगे. यह एक बड़ा दायरा है और इसके बीच ठहरना नाउम्मीदी की हद तक गुजर जाने की बयानी है.कैम्प से कुछ लोग आज आसपास के गांवों की तरफ गए हैं. ताकि समर्थन जुटाया जा सके. ताकि कैम्प हटाने से बचाया जा सके. ज्यादातर महिलाएं चूल्हे पर कुछ न कुछ पका रही हैंए जैसे वे पकाती आई हैं. थोड़ी आग और थोड़ा धुआं हर झुग्गी पर दिख रहा है.
नूरपुर खुरगान कैम्प में राहुल गांधी के बड़े.बड़े पोस्टर लगे हुए हैं. किसी दिन की गुनगुनी धूप में यहां आकर राहुल गांधी ने अपना 'फर्ज अदा' कर दिया हैण् बच्चों को कपड़े बांटे गए हैं जिस पर 'कांग्रेस' लिखा हुआ है.इसी 'कांग्रेस'को पहनकर वे दिनभर झुग्गियों और सड़कों पर घूमते हैं. बच्चों के लिए यह ठंड से बचने की मजबूरी है और उनकी पीठ कांग्रेस के प्रचार के लिए जरूरी है. २०१४ के गर्मियों तक सभी पार्टियों को इस तरह के पीठ की जरूरत है.भाजपा कुछ पीठों को नंगा करती है और कुछ पार्टियां उसे ढक देती हैं. इस तरह से नंगा करने वाला भाजपा का और नंगा होने वाला ढंकने वाले का हो जाता है. साइस्ता इस कैम्प के पहले छोर पर रहती है. वे बागपत के तिलवाड़ा गांव से हैं.वे मानती हैं कि सब गड़बड़ हैं, कांग्रेस थोड़ी ठीक है. उसने ही हमारी थोड़ी मदद की है. उनके पति मोहसिन पेंटर का काम करते थे. पिछले तीन महीने से वे इसी कैम्प में रह रही हैं..यहां से उनके नातेदारों के घर नजदीक हैं.गांव में कुल दस घर मुस्लिमों के थे. दंगे के भय से सब चले आए. सब के सब अब नूरपुर कैम्प की झुग्गियों में रह रहे हैं. वे गांव जाने के बजाय यहां मरने को बेहतर मानती हैं. वे कहती हैं कि यहां अपने लोग हैं. कम से कम मरने के बाद वे दफन तो कर देंगे. कम से कम हमारी इज्जत तो बची रहेगी.उनके पड़ोस की झुग्गी डूंगर गांव मुजफ्फर नगर की है. दंगे के वक्त जब रात में वे लोग भागे तो अपने साथ एक बूढ़े को न ला सके. बाद में उन्हें पता चला कि मेरू नाम के उस बूढ़े को फासी लटकाकर मार दिया गया. दंगाई उनके जानवर अपने घर लेकर चले गए. इन सबके पास गांव में जमीने नहीं थी. जितना बड़ा इनका घर था उतनी ही बड़ी कुल जमीन थी.पर वह जमीन इन झुग्गियों से बड़ी थी और स्थाई भी. मौत और हत्याओं के भय से अपने घर को फिर से पाने की उम्मीद उन्होंने छोड़ दी है.ज़ाकिर कहते हैं कि आने वाले चुनावों के चलते यह सब और ज्यादा बढ़ सकता है.वे बेहद गरीब लोग हैए बहुत कम पढ़े.लिखे, मुसलमानों की स्थिति के लिए बरसों पहले बनाई गई सच्चर कमेटी की फाइलों में दर्ज ये वे लोग हैं जिनके हालात पिछले कई सालों से सरकारें सुधारने का वायदा कर रही थी और कर रही हैं.अपने जीवन के अनुभवों से उन्होंने चुनाव, हिंसा और भय को पढ़ लिया है. इस बार ये समाजवादी पार्टी से नाराज है और कांग्रेस को ठीक मान रहे हैंए इसके पहले नाराज हुए थे तो बहुजन समाज पार्टी की तरफ गए थे. वे अपनी हालातों और प्रायोजित दुर्घटनाओं के चलते पार्टियां बदल देते हैं पर इस सब के बीच जो स्थायी बचा रह जाता है वह है उनके हालात.
इसके अगले पड़ाव में कुछ ही दूरी पर एक मदरसा है. जिसके बगल में बनाए गए कैम्प को मदरसा कैम्प कहा जाता है. यह पिछले कैम्पों से छोटा है. शाहीन, फातिमा, ज़ोया ये बच्चियां है जिनकी ठंड और बीमारी से मौत हो चुकी है. इसके अलावा भी और कई बच्चे मर चुके हैं.वैदा और अनवरी खा़तून सरकारी आदेश से क्रोधित हैं.वे कहती हैं कि इस मौसम में कैम्पों में रहना हमारी चाहत नही है, यह हमारी मजबूरी है. यहां हम सब एक साथ हैं. अगर सरकार ने हमे यहां से भी हटाया तो हम कहां जाएंगे पर उनमे निराशा या हताशा के भाव नहीं हैं.वे एक मोटा सा डंडा उठाती हैं और कहती हैं कि हमने तय कर लिया है कि अगर हमे हटाया गया तो हम कहीं नहीं जाएंगे.हम सरकार को मार देंगे या मर जाएंगे. मर्दों से यह न होगा, हम ही लड़ेंगे उनसे, हम यहीं पर रहेंगे.
           - चन्द्रिका   

शुक्रवार, 22 जून 2012

झारखंड:संगीनों पर सुरक्षित गाँव -3


हम छत्तीसगढ़ की सीमाओं को छूते हुए बल्लीगढ़ और होमिया पहुँचे थे। राज्य ने भले ही प्रदेशों की इन सीमाओं को निर्धारित किया हुआ है पर प्रकृति और लोगों ने उसे मान्यता नहीं दी है। इन गाँवों के लिए छत्तीसगढ़ एक बाजार है, एक ओकड़ा (ओझा) का घर है, वहाँ से आकर एक बैगा रोज यहीं घूमा करता है, छत्तीसगढ़ का सबकुछ यहाँ ज्यादा से ज्यादा सुलभ है। यह गड़वा जिले का एक बड़ा गाँव है 12 किमी. में फैला हुआ। भुइयाड़, खरवार और गोड़ आदिवासियों की दस हजार जनसंख्या वाला गाँव। एक गाँव जिसमे दो नदियाँ बहती हैं। हम यहाँ के कुछ युवकों के साथ गाँव के बीच बहती पोपरा नदी तक गए। हमने यहाँ ज्यादा वक्त गुजारा और गाँव का लंबा इतिहास सुना। इस गाँव का इतिहास एक स्थानीय सामंत रामनाथ पाण्डे उर्फ फुल्लू पाण्डे के प्रताड़ना का इतिहास है। जिसके इल्जामों के दस्तावेज संक्षेप में लिखना भी मुश्किल है। एकनाथ भुईयाँ 67 साल पहले से कहानी को शुरु करते हैं जब फुल्लु पाण्डे का परिवार यहाँ आकर बसा था। गाँव के लोगों ने एक ब्राम्हण को पूजा-पाठ के लिए बसा लिया था। गाँव की सैकड़ों एकड़ जमीन अब उसके कब्जे में है। जमीनों पर यह कब्जेदारी भूदान और भू-सुधार के बाद की कथा है। अभी पिछले बरस ही गाँव वालों की 150 एकड़ जमीन के कागजात बनवाकर स्थानीय सामंत फुल्लु पाण्डे ने जिंदल के हाँथों बेंच दिया है। गाँव वाले जमीन को अब भी जोत रहे हैं, उन्होंने अपने जमीन के कागजों पर शहर में जाकर लेमिनेषन करवा लिया है कि कागज मजबूत रहेगा तो जमीन बनी रहेगी, पर लगातार यह भय बना हुआ है कि जिंदल जाने कब आ जाए। हम बीच में एकनाथ से किसी घटना की तारीख पूछते हैं तो वे अपनी भाषा में कहते हैं कि हम नहीं जानते कि तारीख कितने किलो की होती है। वे बताते हैं कि हम धन से नहीं, मन से पढ़े लोग हैं।
उनकी आवाज थोड़ी धीमी हो जाती है यह गाँव की बहु-बेटियों से जुड़ा मसला है, लड़कियों की उम्र बढ़ती, गाँव में नई बहुएँ आतीं तो किसको बख्श देना है यह फुल्लू पाण्डे की इच्छा पर निर्भर करता। लेकिन सैकड़ों को उसने नहीं बख्शा, इन घटनाओं के आँकड़े क्रूरता और शर्मिंदगी के हैं जिन्हें कोई नहीं जुटाता। ऐसी घटनाओं का जिक्र करने के बाद मैने एकनाथ के चेहरे पर पछतावे का भाव देखा मानो अपने गाँव के विरुद्ध उसने कोई अपराध कर दिया हो। एक लड़का जो पेड़ से सटा हुआ बैठा है उसकी उम्र तकरीबन 25 साल है और उसकी छः एकड़ जमीन चली गई है। वह कहता है कि अगर एम.सी.सी. के लोग साथ देंगे तो जिंदल यहाँ नहीं आएगा। फुल्लु पाण्डे अब गाँव से दूर किसी कस्बे में रहने लगा है। अब तक गाँव के सैकड़ों लोग इकट्ठा हो चुके हैं। हमारे कागजों पर सब अपना नाम दर्ज करा देना चाहते हैं। जाने उनकी क्या उम्मीदें हैं कि कागजों पर लिखे उनके नाम उनकी जोत की जमीन के दस्तावेज बन जाएँगे।
गड़वा, पलामू और लातेहार के कई गाँवों में हम घूमते रहे। कहानियाँ बदल जाती थीं, पीड़ाएँ कम या ज्यादा हो जाती थीं, बस। दुकानदार, किसान, मजदूर और गाँव के सरपंच जाने कितनों पर माओवादियों के सहयोग करने का आरोप है, उन्हें खाना खिलाने का आरोप, किसी विस्फोट में शामिल होने का आरोप। खाना खिलाने के आरोप में बरगड़, कुमीकोला के सरपंच रामदास मिंज और फिदा हुसैन 20 जनवरी से जेल में हैं। उन पर आरोप यह भी है कि भंडरिया में माओवादियों द्वारा सैन्य बलों की जो गाड़ी उड़ाई गई, वे उस घटना में सहयोगी थे। जबकि गाँव वालों का कहना है कि इस घटना के 12 घंटे पहले ही पुलिस उन्हें थाने में लेकर गई थी और घटना के दौरान वे थाने में ही थे। क्या राज्य के विरुद्ध माओवादियों के सहयोग में पूरा का पूरा इलाका खड़ा है? क्या और क्यों के प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं? झारखण्ड के एक सशस्त्र माओवादी दस्ते ने एक दोपहर हमसे मुलाकात की। यह कोयल नदी के किनारे की कोई जगह थी। अपनी लंबी बातचीत के दौरान उन्होंने कई ऐसे तथ्य बताए जो उनके संघर्ष से सीधे तौर पर जुड़े हुए थे। उन्होंने टी.पी.सी., जे.एल.टी., जे.पी.सी., पी.एल.एफ.आई. और जे.जे.एम.पी. जैसे संगठनो पर आरोप लगाए जो माओवाद के नाम पर उनके संघर्ष को बदनाम कर रहे हैं और जिनमे से कुछ को पुलिस द्वारा संरक्षण भी मिला हुआ है। वे चिंतित थे कि सैन्य बलों द्वारा गाँव वालों पर जो कार्यवाही की जा रही है उससे आदिवासियों की आर्थिकी पर इस बार भारी असर पड़ने वाला है। यह महुआ और तेंदू पत्ते का मौसम है। सैन्य बलों की प्रताड़ना के भय से लोग इसे इकट्ठा करने के लिए अपने गाँव से दूर नहीं जा पा रहे। कई उत्तरों के साथ हम लौट आए और जेहन में नए प्रश्न उभरने लगे। झारखण्ड मानवाधिकार संगठन के शषिभूषण पाठक ने डी.जी.पी. जी.एस. रथ से मिलने की इच्छा जाहिर की पर वे राज्यसभा के चुनाव में व्यस्त थे उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया। अलबत्ता दूसरे दिन उनका एक लेख अखबार में छपा जिसमें वे महाभारत के युद्ध से राष्ट्रहित की सीख लेने की सलाह दे रहे थे। शायद वे इस मिथक के सहारे झारखण्ड की मिट्टी को युद्ध में लाल होने की हिमायत में खड़े हैं।
-चन्द्रिका,
क्रमश:

बुधवार, 20 जून 2012

झारखंड:संगीनों पर सुरक्षित गाँव -2


बल्कि इंसानी व्यवहारों के तहत किया गया सहयोग है। वे गाँव या पड़ोस के गाँव से आए किसी आगंतुक को खाना खिलाते हैं, संभव है वह पड़ोस का ही कोई युवक हो, वे उसे पानी पिलाते हैं। अगले दिन पुलिस आती है और गाँव वालों के इस व्यवहार को ‘अपराध’ घोषित कर देती है ‘माओवादियों को सहयोग करने का अपराध’। सामुदायिकता के इस सहज व्यवहार और सामाजिकता को राज्य ने प्रतिबंधित कर दिया है. तो क्या लोगों को ‘असामाजिक’ हो जाना चाहिए कि भूखे को खाना न खिलाएँ, कि प्यासे को पानी न पिलाएँ और एक राहगीर को रास्ता न बताएँ।
मानवाधिकार के प्रश्न बहुत पीछे छूट चुके हैं। शायद यह जैव अधिकार या जैव व्यवहार जैसी किसी अवधारणा के दायरे में आएगा। एक मोबाइल और सिम का दुकानदार आखिर अपने सामानों को किसे बेचे जबकि पुलिस व सैन्य बल की निगाह में जाने कौन ग्राहक कल माओवादी घोषित कर दिया जाए।
बरवाडीह के लादी गाँव में परइया, कोरबा और उराँव जनजाति के तकरीबन 80 घर हैं। यह एक घाटी नुमा जगह है जो चारो तरफ पहाड़ों से घिरी हुई दिखती है। गाँव की तरफ आती हुई लीक खत्म होती है और पहला घर जसिंता देवी का है जो पुलिस की गोली से अपने घर में ही मारी गई थी, इस घटना को एक लंबा अरसा बीत चुका है। हमारे पहुँचते ही एक महिला आँगन में उस जगह जा कर खड़ी हो जाती है जहाँ जसिंता देवी गोली से निढाल हुई थी। वह महिला जसिंता देवी की सास हैं। क्रोधित हो उन्होंने हमे पहले कैमरा बंद करने को कहा। फिर बताया कि पुलिस उस दिन माओवादियों को खोजने आई थी और हमारे घर में आग लगाना चाह रही थी जिसका जसिंता ने विरोध किया और वह उनकी गोलियों से मारी गई। मिट्टी की दीवारों में गोलियों के निशान अभी भी बने हुए हैं। जसिंता को जिस समय गोली मारी गई उसकी 7 महीने की बेटी प्रियंका उसके पास ही थी जो अब थोड़ी बड़ी हो गई है। गाँव वाले बताते हैं कि पुलिस ने अपनी इस हत्या का इल्जाम माओवादियों पर लगाया। चुरकुन पहडि़या गुस्से में बोलते हैं कि गाँव में एकता है और हमने पुलिस को दोबारा यहाँ आने से मना कर दिया है। जब दोबारा पुलिस आई तो हमने उसे खदेड़ भी दिया। अक्सर गाँवों में हमने पाया कि हत्या के बाद सैन्य बलों द्वारा दी गई एक “मोहलत” होती है। वे कुछ महीने तक दोबारा गाँव में लौटकर नहीं आते। एक हत्या पूरे गाँव में वर्षों तक खौफ को जिंदा रखती है। खौफ इतना कि लोग काम करने के बाद मजदूरी लेने तक से डरते हैं। मनरेगा, सड़क निर्माण, इंदिरा आवास जैसी योजनाओं के लिए वे काम करते हैं और उनकी मजदूरी इन योजनाओं की तरह ही अधूरी पड़ी है।
वहाँ लड़कियाँ फिर से स्कूल जाने लगी हैं और कुछ बच्चे स्कूल की चहरदीवारी पर बैठे हैं। करमडीह के स्कूल से सैन्य बलों का कैम्प वापस जा चुका है। यह एक सामान्य स्थिति है जो 31 जनवरी की शाम के दहशत के बाद लौटी है। दुकानदार ने अपने घर के आसपास खोदी गई मिट्टी को पाट दिया है। सैन्य बलों द्वारा यह खुदाई माओवादियों के छुपाए गए शस्त्र खोजने के लिए की गई थी। यहाँ से उन्हें भिंड़ी के पौधे की कुछ जड़ें मिली थीं। 31 जनवरी की शाम को सात बजे माओवादियों के एक दस्ते ने हवाई फायरिंग की। देर रात तक गोलियाँ चली, देर रात तक दहशत पली। लोग बंदूकों की एक आवाज के बाद दूसरी आवाज का इंतजार करते रहे और दूसरी के बाद तीसरी फिर सुबह जाने किस गिनती के बाद आई। सुबह तक सब कुछ शांत हो चुका था। रात की घटना के अवशेष में दीवारों पर सुराख के निषान बचे थे। अगले दिन सैन्य बल स्कूल छोड़कर चले गए, उसके एक दिन बाद बच्चे भी स्कूल चले गए। अध्यापकों से ज्यादा इन स्कूलों में बच्चे खाना बनाने वाले का इंतजार करते हैं और स्कूल की चहरदीवारी पर बैठे बच्चे वही कर रहे हैं।
अगले गाँव नवरनागू जाने के लिए यहाँ से हमे पैदल चलना था, पहाड़ी के उस पार तक। यह कोयल नदी के किनारे का एक गाँव है। 250 किमी। लम्बी इस नदी में कई छोटी नदियाँ मिलती हैं। अपनी पूरी यात्रा के दौरान हमने कोयल नदी को कई बार पार किया। गाँव में एक महिला चटाई बीन रही है, यह किसी पेड़ की मजबूत पत्तियाँ हैं जिन्हें एक-दूसरे के ऊपर-नीचे गूथा जा रहा है। एक कमसिन उम्र की बच्ची झाड़ू बहार रही है, गाँव के अकेले अध्यापक पढ़ाने के लिए चले गए हैं। लूकस मिंज की हत्या को एक महीने बीत चुके हैं। गाँव से ढोल परवला तकरीबन एक किमी। की दूरी पर है, जहाँ लूकस मिंज की लाश नदी की रेत पर 5 दिनों बाद पाई गई थी, जो पानी में सड़ चुकी थी। लूकस बोलने और सुनने में अक्षम थे और नदी किनारे वे गाय चराने जाया करते थे। उनकी हत्या की सही तारीख गाँव के लोगों को नहीं पता पर यह शायद 1 फरवरी की तारीख थी। इस घटना को नदी में एक मछली पकड़ने वाले ने देखा था, सैन्य बलों ने नदी के उस पार से दो गोलियाँ चलाई थीं। एक महीने बीत चुके हैं सैन्य बलों ने इधर आना स्थगित किया हुआ है।
-चन्द्रिका,
क्रमश:

रविवार, 10 जून 2012

झारखंड:संगीनों पर सुरक्षित गाँव -1



नैतिकता की रक्षा के करने के लिए कुरुक्षेत्र में 18 अक्षौहिणी सेना के विनाश लीला की भी हम निंदा नहीं करते बल्कि उन सबों से हम राष्ट्रहित की सीख लेते हैं-जी.एस.रथ (डी.जी.पी. झारखण्ड, 30 मार्च 2012, )
‘‘भारतीय राज्य हमारे आंदोलन को हिंसा के नाम पर दुष्प्रचारित करता है क्योंकि वह हिंसा पर एकाधिकार चाहता है, जबकि राज्य के परमाणु बम से लेकर वृहद सैन्य बल अहिंसा के लिए नहीं हैं।’’ प्रशांत, (माओवादी पार्टी के सदस्य)। यह मार्च की पतझड़ का मौसम है। पेड़ों की पत्तियाँ सूख कर गिर चुकी हैं और रात के तकरीबन नौ बजे हैं जब हम जंगल में अपना रास्ता भूल चुके हैं। झारखण्ड झाड़ों का प्रदेश है और यहाँ घूमते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि यहाँ राज्य, नौकरशाही और लोकतंत्र सब अपना रास्ता भूल चुके हैं। यह गड़वा और लातेहार के बीच की कोई जगह है। मेरे साथ दैनिक के पत्रकार सतीश हैं जिन्हें कुछ महीने पहले माओवादी होने के आरोप में पुलिस द्वारा प्रताडि़त किया जा चुका है। सड़क जैसी कोई चीज इन्हीं पत्तियों के नीचे दबी है जो साहस के साथ बगैर किसी पुल के नदी और नालों के उस पार निकल जाती है, मसलन नदी को सड़क नहीं, सड़क को नदी पार करती है। हम मोटरसाइकिल को बार-बार रोक, पीछे मुड़कर देखते हैं और स्वाभाविक भय के साथ आगे बढ़ जाते हैं। सूखी पत्तियों पर घूँमते पहिए किसी के पीछा करने का आभास देते हैं। यह पहियों के रौंदने से पत्तियों के चरमराने की आवाज है। साखू के फूल पूरे जंगल को खुशबू से भरे हुए हैं पर खौफ और भय किसी भी खुशबू और आनंद पर भारी होता है। सतीश को इन इलाकों में जंगली जानवरों का उतना भय नहीं है जितना कि कोबरा बटालियन का, जो कई बार ग्रीन हंट अभियान के दौरान रात को जंगलों में रुक जाते हैं। यह अभियान “माओवादियों के सफाए” के लिए इन इलाकों में पिछले दो वर्षों से चलाया जा रहा है। सतीश एक घटना का जिक्र करते हैं जिसमें सी.आर.पी.एफ. ने एक गूँगे बहरे चरवाहे की कुछ दिन पहले गोली मारकर हत्या कर दी है। 20-25 कि.मी. भटकने के बाद हमें वह रास्ता मिल जाता है जिसके सहारे हम जंगल से बाहर निकल पाते हैं।
हम अपने यात्रा की शुरुआत कर रहे थे जबकि यहाँ के स्थानीय पत्रकारों ने मुलाकात की और वे इन इलाकों की कहानियाँ सुनाते रहे। मौत और हत्याओं की कहानियाँ, बरसों पहले के किस्से, झारखण्ड बनने के बाद से कल परसों तक के किस्से। कहना मुश्किल है कि झारखण्ड बना या बिगड़ गया। जबकि राज्य और ज्यादा असुरक्षित हुआ और स्कूलों-गाँवों में सी.आर.पी.एफ. व कोबरा कमांडो लगा दिए गए। लोगों की सुरक्षा यह है कि इन इलाकों से अक्सर कोई गायब हो जाता है और हफ्ते-दस दिन बाद गाँव वालों को अखबारों से पता चलता है कि उसकी लाष किसी नदी किनारे या किसी नाले में सड़ चुकी है या जिले पार किसी जेल में उसे कैद कर दिया गया है। सैन्य बल उसे ‘माओवादी’ बताते हैं जो एक “मुठभेड़” में मारा गया और यदि वह कैद है तो जाने कितने ‘इल्जामों’ का दोषी। वह उन घटनाओं का भी दोषी है जो उसके सूरत या बम्बई में किसी फैक्ट्री में काम करते हुए घटित हुई। गाँव के लोगों को तब थोड़ा सुकून होता है जब गायब शख्स जेल में पहुँच जाता है। यहाँ जेल में पहुँचना ही सुरक्षित होने का प्रमाण है। जबकि कुछ प्रमाण ऐसे भी हैं कि वर्षों पहले गायब लोग अभी तक जेल नहीं पहुँचे और न ही उनकी लाश मिली है। पिता, पत्नी और परिवार के अलावा ऐसे लोगों का इंतजार अब कोई गाँव वाला नहीं करता, क्योंकि लोगों को पता हैं कि किसी भी इंतजार की एक उम्र होती है।
लातेहार जिले में जिस जगह पर हम रुके हुए हैं वहाँ से बरवाडीह तकरीबन 20 किमी. है। जयराम प्रसाद अपने छोटे बेटे के साथ तड़के ही हमसे मिलने पहुँचते हैं और बातचीत शुरु हो इससे पहले उनका गला रुँध जाता है, वे देर तक रोते रहते हैं। फिर वे बताते हैं कि 21 मार्च को पुलिस ने उनके बड़े बेटे संजय को थाने में बुलाया था और आज पाँच दिन से वह लापता है। संजय बरवाडीह में मोबाइल की एक दुकान चलाता था। कोई अधिकारी कहता हैं कि बातचीत के बाद उन्होंने उसे उसी रात छोड़ दिया था, एस.पी. क्रांति कुमार कहते हैं कि उसे मंडल के आसपास जंगल से 23 की रात को पकड़ा गया है। जयराम कानून का हवाला देते हुए कहते हैं कि अगर एस.पी. की ही बात को सही मान लें तो 24 घंटे में उसे कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए था पर पाँच दिन बीत चुके हैं। यदि उसे छोड़ दिया गया तो 35 साल की उम्र में क्या वह अपने घर का रास्ता भूल जाएगा। जयराम की आशंकाएं कुछ और हैं पर अभी तक किसी लावारिस लाश की खबर किसी भी अखबार में नहीं छपी है। उस दोपहर हमे पता चला कि संजय को माओवादियों का सहयोग करने के आरोप में जेल भेज दिया गया है। पकड़े जाने के पूरे छः दिन बाद, इन इलाकों में ‘सहयोग’ सबसे बड़ा जुल्म है। यह ‘सहयोग’ किसी अपराध में सहयोग करना नहीं है

-चन्द्रिका,
क्रमश:

सोमवार, 29 अगस्त 2011

एक दिन बंदूकों से पानी जरूर निकलेगा

शायद वहां मान्यताएं इतिहास से भी ज्यादा मजबूत हैं। वे ऐसी मान्यताएं हैं जिसने जीने और लड़ने की ललक पैदा की थी। ये सहज जिन्दगियों के लिए आसान रास्ते थे जिस पर चलकर वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में उतर रहे थे। ऐसे अतीत में बीता हुआ इतिहास उनके लिए एक किस्सा है जिसे वे रोज दुहराते हैं और हर दुहराव के साथ यह थोड़ा बदल जाता है और हर बदलाव के साथ एक इतिहास टूट जाता है। आखिर इतिहास को दिनों और तारीखों में सजोने से क्या फ़ायदाण् विस्मृतियां कई बार मनुष्य को मजबूत बनाती हैं जबकि स्मृतियां एक घायल इतिहास को लगातार ढोती रहती हैं। वे हर वक्त जिंदगी को कुरेदती है और कुढ़न पैदा करती हैंए कोई सीख देने के बजाय वे आतंकित करती हैं और एक डरावने स्वप्न की तरह गहरी नीदों में उतर आती हैंण् विद्रोहों की कहानियों में जश्न और हताशा दोनों होती है पर विद्रोहों का रुख ही जश्न और हताशा में किसी एक के चेहरे को उभार देता हैण् रात दुहराती है अंधेरे को और अंधेरा पुत जाता है समय की पीठ परए ठीक उसी अंधेरे के साथ नही बल्कि रात जाने कहां से हर रोज नया और इतना ढेर सारा अंधेरा लाती है। यहां घटनाएं एक कटे हुए पेड़ सरीखी हैं जिसमे से कई कोपलें निकल आई हैं ठीक पेड़ सरीखी पर जाने कितनी जिनकी पत्तियांए तने और आकार मिलते।जुलते लगते हैंण् किसी एक घटना की कई।कई गाथाएं हैं हर बदली हुई आवाज एक नई गाथा पेश करती हैण् आसमान का रंग नीला है इसके अपने वैग्यानिक कारण हो सकते हैं पर यहां के लोगों के लिए इससे भी ज्यादा मौजू कारण यह हो सकता है कि ढेर सारे नील गायों ने आसमान पर अपनी पीठ रगड़ी हैण् ऐसे में विग्यान औंधे मुंह गिर पड़ता है। दण्डकारण्य के आदिवासियों के पास जंगल की कोई पुरानी आग है जिसकी रोशनी में वे एक नया स्वप्न देख रहे हैंण् पर आंच हैए आग है जिसमे वे झुलस भी रहे हैं.
सोड़ी दीपक का नाम कुछ और भी हो सकता है उन्हे अपनी उम्र तक का पता नही वे अपने उम्र का मापन आपकी आंखों पर छोड़ देते हैं। जिंदगी जीने का उम्र से कोई वास्ता हो सकता है क्याघ् शायद इसकी उन्हें जरूरत ही नहीं महसूस होतीण् क्योंकि वहां मौत उम्र और गुनाह पूंछ कर नहीं आतीण् अपनी जमीन पर जिंदा रहना ही उनका गुनाह हो सकता हैए उनका गुनाह हो सकता है माओवादियों के सहयोग से बने तालाबों में मछली पकड़नाए उनका गुनाह हो सकता है कि अपने गांव मसले को फैसले में बदलना जो सब मिलजुल कर आपस में निबटा लेते हैं और वहां गुनाहों की लम्बी फेहरिस्त हैए जहां आदिवासियों ने सरकार से अब उम्मीदें छोड़ दी है। सरकार से उम्मीदों के प्रबल दावेदार वे हैं जो इनकी जमीनों पर अपनी मशीने खड़ा करना चाहते हैंए जिनके लिए देश एक कच्चा माल है और देश का हर नागरिक संसाधनण् शायद इस कच्चे माल को उन्हें खोदना हैए पकाना है और राख की शक्ल में उसे फेंक देना हैण् लाल किले से १५ अगस्त को हर बार दुहराया जाने वाला प्रगति और विकास का कोई संदेस इन आदिवासियों के लिए नहीं होता। वे प्रधानमंत्री की जुबान में बस एक भयानक खतरे की तरह आते हैं और एक दिन किसी नाले के किनारे उनकी लाश मिल सकती है या संभव है लाश भी न मिले जिंदा पकड़े जाने पर वे उन छत्तीस वारदातों के दोषी हो सकते हैं जिन इलाकों को उन्होंने देखा तक नहीं वे कई अनाम नामों के साथ महान गुनाहों की श्रेणी में शामिल हैं यह नवम्बर २०१० के किसी घटना की स्मृति है जिसे सोडी दीपक साझा कर रहे हैं इससे पहले की ढेर सारी स्मृतियां धुंधली पड़ चुकी हैं या शायद वे उसमे लौटना नहीं चाहते।
इस गांव की सबसे बुजुर्ग महिला बंजामी बुधरी के आंखों की रोशनी जा चुकी हैए इसमे ७० साल का इतिहास था जिसे किसी कागज पर नहीं उतारा जा सकाए जो अब बस जेहन में बचा है उनके पास जंगलों में पूरे के पूरे गांव के टहलने के कई किस्से हैं। इसे पलायन नही कहा जा सकता इन जंगलों में बसने वाले गांवों की जनसंख्या जब बढ़ जाती थी तो उनमे से कुछ घर उठकर थोड़ी दूर जाकर बस जाते थे बंजामी 40 साल पहले गदरा सुकमा के नजदीक किसी जगह से आकर आखिरी बार इस गांव में बसी थी और तब से यहां रह रही हैं अब वे यहां से नहीं जाना चाहती दो साल पहले उनका पोते की पुलिस ने हत्या कर दी है वे बताती हैं कि वह तो बस पार्टी माओवादीद्ध वालों के साथ रहता था और सलवाजुडूम के खिलाफ था.
दण्डकारण्य का एक बड़ा हिस्सा आज माओवादी आंदोलन के प्रभाव में है और राज्य का एक बड़ा तंत्र इसके चिंता के प्रभाव में यहां माओवादी होना उतना ही सहज है जितना जंगल में पेड़ होना सबके सब आदिवासी और सबके सब माओवादी ये गांव मुरिया और कोया समुदाय का है जिसमे माओवादियों द्वारा नियुक्त एक अध्यापक तेलगू और हिन्दी दोनो जानता है यहां कोई नहीं जानता कि वह कितना खतरनाक है यह बात सिर्फ देश के प्रधान मंत्री को पता है जिसे वे बार-बार दुहराते रहते है।
इन सब बातों से अलग एक इतिहास है जो मिथक के साथ लगातार प्रभावी बना रहा है। पूर्ववर्ती विद्रोहों को इन मिथकों ने संबल दिया थाण् आदिवासियों का एक राजा जो कभी नहीं मारा गय. विद्रोह का एक नायक जिसके शरीर पर आते ही बंदूक की गोलियां पानी में बदल जाती थी. आम की टहनियां जो गांवों में पहुंचते ही लड़ाई का आगाज कराती थीये अब मौखिक कहानी बन गये हैंए इससे अलग जिंदगी एकदम उलट गयी हैण् जबकि उनके गांव खाली कराये जा रहे हैंए उन्हें कैम्पों में ढकेला जा रहा हैए उनके शिकार के लिए ग्रीन हंट चलाया जा रहा है और बंदूक की नालें उन पर तान दी गयी हैंण् वे बंदूकें छीनकर उनकी नालें मोड़ना सीख चुके हैंण् अब तक इन आदिवासियों को भारतीय राज्य सत्ता ने हमेशा एक ऐसे तत्व के रूप में देखा जो कभी किसी सत्ता के खांचे में फिट नहीं हो पाएण् यह एक देशज असमानता का परिणाम था जहां हमेशा से इन पर साशन करने के ही बारे में सोचा गया और ये स्वसाशन के बारे मे सोचते रहेण् विकास नाम की कोई चीज है जो इन तक कभी नहीं पहुंच पाई और जब भी वह इन तक आई इनके कई सारे विनाश को एक साथ लेकरण् जिसमे उस संस्कृति का विनासए उस सामूहिकता का विनाश और उस जंगल का विनाश समाहित थाए जहां वे अब तक जीते आ रहे थेण् १९१० के भूमकाल और उसके पूर्व में हुए विद्रोहों ने हमेशा एक बाहरी व्यवस्था को थोपने की अस्वीकार्यता को प्रकट किया हैण् जब अंग्रेजों के खिलाफ जंग छिड़ी तो आदिवासी यह सोच कर गोलियां खाते रहे कि उनका नायक गुंडाधुर कभी नहीं मारा जाएगा और गोलियां पानी में बदल जाएंगीए पर गोलियां पानी में नहीं बदलीण् वे चली और कुछ चीखें उठीए कुछ उनके बीच से हमेशा के लिए जाने कहां चले गए और फिर कभी लौटे भारतीय सत्ता से पहली बार ६० के दशक में शुरु हुए राजा भंजदेव के नेतृत्व में भी यही मान्यता रही कि राजा को मारा नहीं जा सकता और पुलिस की गोली पानी में बदल जाएगीण् भंजदेव की हत्या के बाद उन्हें कई वर्षों तक यह यकीन नहीं हुआ कि वह मारा जा चुका है और उसके तकरीबन १६ अवतार हुए जो यह दावा करते रहे कि वे राजा भंजदेव हैं अब जबकि ८० के दशक में माओवादियों ने यहां प्रवेश किया और धीरे.धीरे वे इनमे घुले मिले उन्होने आदिवासियों के सहयोग से उनका जो विकास कियाए उन्हें जिस तरह की व्यवस्था मुहैया कराई शायद वह उनके समाज के अनुरूप थीए वे इसे अपने समाज की व्यवस्था के रूप में स्वीकार्य कर चुके हैंण् वर्तमान में दण्डकारन्य इलाके में माओवादियों ने जो बड़ा फर्क लाया है वह यह है कि उन्होंने अधिकांस स्थानीय व्यवस्था को वहां की स्थानीय लोगों के साथ जोड़ दिया है और वे माओवादी पार्टी के और वहां की जनताना.सरकार के तमाम पदों पर स्थित हो गए हैं
यदि इतिहास हमे भविष्य निर्मित करने की समझ देता है तो पिछले चार दशकों यानि ४० वर्षों में नक्सलवाडी से आज तक माओवादियों के संघर्ष और सत्ता द्वारा उनके उन्मूलन को लेकर अख्तियार किये गये अब तक के तरीकों से सीखना होगा जो कि मामूली नहीं रहे हैंण् छत्तीसगढ़ तब मध्यप्रदेश का हिस्सा था जब नक्सली उन्मूलन के महानीरिक्षक अयोध्यानाथ पाठक बनाये गये उस समय नक्सली इलाकों में पुलिस कर्मी शिक्षक के वेश में जाया करते थे और नक्सली गतिविधियों पर नजर रखते थेण् यह माना गया कि नक्सली गाँव वालों के साथ इतने घुले मिले होते हैं कि कई बार पहचान ही मुश्किल हो जाती है और इस तरीके को अपनाते हुए तत्काल पुलिस अधीक्षक सुदर्शन ने ग्रामीणों के साथ अपने तौर तरीकों में बदलाव लायाण् जब वे ग्रामीणों के बीच जाते तो जमीन पर बैठतेए पता नहीं गाँव वालों ने इस पुलिस के बदले हुए रूप किस तरह लिया पर मीडिया को यह तरीका कफी पसंद आया और पुलिस का यह उदार चरित्र बडे पैमाने पर प्रसारित किया गया तरीका यह भी अख्तियार किया गया कि पुलिस कई दिनों तक जंगलों में नक्सली दलम बनकर घूमती रही 1990.92 के आस.पास जनजागरण अभियन चलाये गये और गाँव.गाँव जाकर यह बताया गया कि नक्सली अपराधी हैंण् एनएसजी जैसी एजेंसी जो कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को सुरक्षा प्रदान करती है उसे तैनात किया गया इस तरह के अन्य कई प्रयोग किये गए।
वहाँ के तत्कालीन डी.आइ.जी पन्ना लाल ने दावा किया कि बहुत जल्द ही राज्य इस समस्या से मुक्त हो जाएगा उस समय के गृह राज्य मंत्री गौरी शंकर शेजवार ने तो यह भी कह डाला कि नक्सलवाद आखिरी सांसें ले रहा है यह बात १९९३ की है तब से अब तक १६ वर्ष बीत चुके हैं ये सारे प्रयोग और दावे आज खारिज हो चुके हैंण् अगर जुनून में न हो तो वास्तविक स्थिति का अंदाजा कोई पुलिस वाला भी लगा सकता हैण् १९९७ में देव प्रकाश खन्ना जो वहाँ के डी.जी.पी थे ने अपनी पुस्तक 'हम सब अर्जुन हैं' में इसे स्पष्ट भी किया है और व्यवस्था की संरचना व नक्सलवाद की समस्या को नये दृष्टि से रखने का प्रयास किया है अंततः उस समय यह मान लिया गया कि नक्सलवाद के लिये कोई भी फौरी कार्यवाही महज आदिवासियों को नष्ट करना और उनका कत्लेआम होगा इसलिये इसका एलोपैथिक इलाज किया जाना चाहिये।
लिहाजा इस आंदोलन को बंदूकों से खत्म करना एक बड़े आदिवासी समाज की हत्या के रूप में ही आएगा। सरकार ने यहां के बड़े इलाके को कब्जे मे लेकर एक सैन्य प्रशिक्षण केन्द्र बना रही है ताकि इस प्रशिक्षण में आदिवासी उन्हें शिकार के तौर पर मुहैया हो सकें। देश की रक्षा के लिए जिन्हें हम सिपाही और प्रहरी से सम्बोधित करते हैं वे अपने ही देश के आदिम निवासियों का शिकार करने को तैयार हो रहे हैं और कुछ शिकार किए जा चुके हैं।


-चन्द्रिका
मीडिया विभाग महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व०विद्यालयए वर्धा

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

पत्रकारों की हत्या का लोकतंत्र, भाग : 2

जब 26 जनवरी 1950 को लिखी गई एक मोटी पोथी का 19वाँ अनुच्छेद धुंधला पड़ने लगे और लोकतंत्र की एक संरचना में इतना कम लोकतंत्र बचे कि आँखों पर चढ़े चश्में का काँच सरकारी तस्वीर के अलावा कुछ भी देखने से मना कर दे तो जेहन के पत्थर पर अपनी भाषा और कलम की धार कुछ लोग तेज करते ही हैं जबकि यही एक स्थिर और जड़ संरचना का अतिवाद होता है, लोकतंत्र को पूरा का पूरा माँगना। छोटी-बड़ी कमियों को न तलाशने के बजाय पूरी संरचना का मूल्यांकन करना और उसके खिलाफ खड़े होना।
दुनिया में जब लोकतंत्र की बहस चल रही थी तो कई ऐसे विचारक थे जिन्होंने लोकतंत्र की व्यापकता के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अहम माना। 17वीं सदी में फ्रांस के विचारक वाल्तेयर की जुबान को भी हम जमीन पर नहीं उतार सके जिसमें उन्होंने कहा था कि “मैं जानता हूँ कि वह झूठ बोल रहा है, पर वह अपनी बात कह सके इसके लिए मैं अपनी जान दे दूँगा” वरना आज की स्थितियाँ इसके उलट पत्रकारों को यह चेतावनी दे रही हैं और सत्ता हेमचन्द्र की हत्या के साथ यह एलान कर रही है कि तुम अगर इतना सच बोलोगे तो वह तुम्हारी जान ले लेगी। जबकि हमारे समय में एक सच को स्थापित करने के लिए हजार बार बोले जा रहे झूठों को खण्डित कर, हजार बार, हजारों तरीके से सच बोलने की जरूरत है कितना मुश्किल है यह सब कुछ, मौत से बेपरवाह होकर ऐसा करना, किसी हत्या में मारा जाना और वर्तमान के इतिहास में दर्ज तक न होना।
एक पत्रकार के माओवादी या माओवाद समर्थक होने का मसला यहीं से जुड़ा है. 1828 में जब ब्रिटिश राजनैतिक एडमण्ड बर्क ने मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ कहा था तो वह इस रूप में कतई नहीं था कि मीडिया को लोकतंत्र की किसी एक संरचना का जनसम्पर्क माध्यम हो जाना चाहिए बल्कि उसे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लगातार व्यापक आजादी के संघर्ष का सहयोगी बनना चाहिए और सत्ता तंत्र द्वारा प्रतिस्थापित किए जाने वाले लोकतंत्र से आगे जाकर सोचना चाहिए। ऐसी स्थिति में एक पत्रकार का आज के समय में यह अन्तद्र्वन्द्व है जब वह व्यक्ति की व्यापक आजादी के लिए संसदीय संरचना को नाकाफी पाता है तो उस जनपक्षधरता के साथ खड़ा होता है जो इस ढाँचे से संघर्ष कर रहे हैं, फिर तो माओवादी शक्तियाँ ही आज देश के फलक पर जुझारूपन के साथ सत्ता से लड़ती हुई दिखती हैं, भले ही इनमे कई खामियाँ हों और इनके क्षेत्र अभी सीमित हों, एक बौद्धिक तबका इन सीमित क्षेत्रों में चल रहे संघर्षों का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है और उन्हें मजबूत बनाता है, किसी समय में चल रहे संघर्ष की यह एक भूमिका है, अपने लिए उचित स्थान की तलाश करना जबकि सरकार द्वारा हत्या किए जाने की सम्भावनाएँ जंगलों और शहरों में कम-ओ-बेस बराबर हो चुकी हैं और लोकतंत्र व आजादी के स्वप्न हमारे प्रतिलोम में खड़े हैं।
ऐसे में यदि कोई पत्रकार उस आजादी को माँगेगा जिससे चंद लोगों या एक वर्ग की स्वछन्दता को खतरा हो तो वर्ग संघर्ष की लड़ाइयाँ और तीखी ही होंगी, तब हत्याओं के लिए मुठभेड़ का नाम नहीं दिया जाएगा, आफ्सपा जैसे कानून बनाकर हत्याएँ वैध कर दी जाएँगी, छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम जैसे कानून कई लोगों के जिन्दगी के उस हिस्से को सलाखों के पीछे धकेलने में काफी होंगे जिसमें सच बोलने का साहस जिंदा बचा रहता है।

चन्द्रिका
मो0: 09890987458
(समाप्त)
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
मो0: 09890987458

बुधवार, 15 सितंबर 2010

पत्रकारों की हत्या का लोकतंत्र, भाग : 1

हमारे समय के पत्रकार हो जाओ सरकारी रोशनाई में कलम डुबोकर सरकार के चेहरे की शिकन लिखो...2020 तक सरकार के मिशन लिखो, इतना काफी न हो तो हाथों में दस्ताने बाँधकर समय के मुँह पर कालिख लगा दो और पोंछ लो अपने हाँथ किसी सरकारी गमछे में.... जरूरत पड़े तो थोड़ा मुस्कुराओ, आँखे भी नम कर लो...... और इस अदब के साथ हाथ मिलाओ कि लोकतंत्र जैसी कोई चीज आस-पास की हवा में घुल-मिल रही है। अखबारों में छपी खबरों की स्याही के रंग जैसा कुछ इतना गाढ़ा लिखो कि सरकार की आँखों में मुहब्बत की तरह उतर जाओ और एक दिन ढेर सारे पदकों के साथ अपने घर लौटो दिल्ली से.... या दिल्ली जैसे किसी शहर से, या फिर दिल्ली को अपना घर और उस सरकार को अपना परिवार मान लो जो पाँच सालों में अदला-बदली करके वापस लौट आती है। विपक्ष में रहो पर उतना जितना मनमोहन सिंह-आडवानी के, मुलायम सिंह-मायावती के, ममता बनर्जी-बुद्धदेव के या कोई भी पार्टी, संसद के इर्द गिर्द किसी पार्टी के। इतने विपक्षी मत बनों की सरकार के लिए माओवादी हो जाओ....कि बेगुनाही के बावजूद सलाखों के पीछे भेजने का लोकतंत्र है...इतने विपक्षी होना प्रशांत राही होना है, लिखने की इतनी आजादी मत माँगो कि सीमा आजाद या लक्ष्मण चैधरी जैसा बर्ताव करना पड़े सरकार को, इतने भी नहीं कि लिखने और लड़ने की कीमत हेमचन्द्र पाण्डेय जितना अदा करनी पड़े सरकार द्वारा की गई हत्या के रूप में, पत्रकारिता के ये उसूल जिन्दगी को सुकून और भविष्य में लोकतंत्र को फुर्सत देंगे। लोकतंत्र के बुढ़ापे का समय है, मौत धीरे-धीरे इसी तरह आएगी।
जंगलों में आदिवासी अपने विस्थापन, प्रताड़ना, असंतुष्टि के खिलाफ लड़ रहे हैं और उनकी लड़ाई को माओवादियों ने सशस्त्र बना दिया है और एक राजनैतिक व सांगठनिक स्वरूप में वे ज्यादा मजबूती के साथ उभर कर आए हैं इतनी मजबूती कि सरकार नहीं बल्कि संसदीय संरचना अपने को असुरक्षित मान रही है, स्थानीयता के लिहाज से अपनी समस्याओं के खिलाफ और एक बड़े फलक पर तंत्र के खिलाफ इस उभार को देखा जा सकता है, अभी हाल के दिनों में जबकि यह बहस जारी ही है कि माओवादी जंगलों तक ही क्यों सीमित हैं? इस बीच पिछले कुछ सालों में कई ऐसे पत्रकारों को सलाखों के पीछे भेजा गया है, प्रताड़ित किया गया है या फिर उनकी हत्याएँ की गईं हैं, जिन्हें सरकार ने माओवादी के रूप में चिह्नित किया है या माओवादी गतिविधियों में शामिल पाया है। वरिष्ठ माओवादी नेता आजाद के साथ हेमचन्द्र पाण्डेय की हाल में की गई हत्या या पुलिस हिरासत में पीपुल्स मार्च के बंगला संस्करण के सम्पादक स्वप्न दास गुप्ता की मौत बहस में कुछ नए पन्ने जोड़ती है, मसलन, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हेमचन्द्र एक पत्रकार थे बावजूद इसके यदि माओवादी भी थे तो वह कौन सी चीज थी जिसने एक पत्रकार को माओवादी बना दिया और सरकार को उनकी हत्या करनी पड़ी, वे न तो उन जंगलों से थे जहाँ जमीनों को छीना जा रहा है और लोगों को विस्थापित किया जा रहा है और न ही वे लालगढ़, सिंगूर, बस्तर, गड़चिरौलि से थे, सलवा जुड़ुम का दमन उनके घरों तक नहीं पहुँचा था बावजूद इसके एक पत्रकार माओवादी क्यों हो गया। आदिवासियों के असंतुष्टि के आधार पर माओवादी होने की प्रक्रिया को समझना थोड़ा आसान है क्योंकि रोज-बरोज हो रही मौत और गाँवों में सुबह मिल रही किसी पड़ोसी की लाश, चुप-चाप मौत से पहले लड़ने का एक साहस तो देती ही है। पर पत्रकारिता को जारी रखते हुए, सुकून की जिंदगी जीते हुए और शायद सरकारी लोकतंत्र का समर्थन करते हुए हेमचन्द्र, प्रशांत राही, सीमा आजाद, स्वप्न दास गुप्त के अलावा कई ऐसे पत्रकार थे और हैं जो अपनी जिंदगियाँ वैसी ही गुजार सकते थे जैसी ठीक-ठाक जिन्दगी के बारे में आप सोच सकते हैं, पर नाम बदल कर, गुमनामी और बगैर किसी पहचान के जीना महज जुनून नहीं होता बल्कि यह माओवाद की जंगल से जेहन तक की यात्रा है। दरअसल माओवाद का सैद्धांतिक और बौद्धिक पक्ष वहीं मजबूत होता है जहाँ सत्ता को कार्यवाहियों और संस्थानों के टूटने का भय ही नहीं बल्कि एक ऐसी संरचना के बेनकाब होने का खतरा है जो अपने चरम व्यवस्थित स्थिति में क्रूरता और तानाशाहियों के साथ चंद लोगों के वर्चस्व को ही चरम पर पहुँचाती है। शायद ऐसी व्यवस्था के खिलाफ उग्र होने की कवायद ही एक पत्रकार को उग्रवादी या उग्रवाद समर्थक बना देती है, जो मणिपुर, असम से लेकर देश के किसी भी शहर में मिल सकते हैं अपने नाम या किसी और नामों के साथ, अपनी कलम को हथियार बनाते हुए।

चन्द्रिका
मो0: 09890987458
क्रमश:
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

बुधवार, 23 जून 2010

अतिवाद की लड़ाई - 2

राजशाही जब खारिज की गयी जोकि एक समय तक ईश्वर प्रदत्त मानी जाती थी और यह तय हुआ कि अब राजाओं को जनता चुनेगी तो संसदीय लोकतंत्र की स्थापना, सैद्धांतिक तौर पर लोगों द्वारा ईश्वर के लिये खारिजनामा ही था, क्योंकि राजा उसके प्रतिनिधि होते थे और राजा को खा़रिज करना इश्वर को खारिज करने से कहीं कम न था बल्कि वह एक प्रत्यक्ष भय था. इस नयी व्यवस्था के बारे में प्रस्फुटित होने वाले विचार जरूरी नहीं कि वे केवल लिंकन के ही रहे हों पर ये विचार राजशाही के लिये अतिवादी ही थे. राजशाही के समय का यही अतिवाद आज हमारे समय के लोकतंत्र में परिणित हुआ. अतिवाद हमेशा समय सापेक्ष रहा है पर वह भविष्य की संरचना के निर्माण का भ्रूण विचार भी रहा जिसे ऐतिहासिक अवलोकन से समझा जा सकता है.
ज्योतिबाफुले, सावित्रीबाई फुले, राजाराम मोहनराय जैसे कितने नाम हैं जो लोग अपने समय के अतिवादी ही थे. इन्हें आज का माओवादी भी कह सकते हैं चूंकि ये संरचना प्रक्रिया में विद्रोह कर रहे थे एक दमनकारी व शोषणयुक्त प्रथा का अंत करने में जुटे थे. भविष्य में जब समाज के मूल्यबोध बदले तो इन्हें सम्मानित किया गया, क्या नेपाल में ऐसा नहीं हुआ. सत्तावर्ग ने इन शब्दों के मायने ही आरक्षित कर लिये हैं. किसी भी समय का अतिवाद, उस समय के सत्तावर्ग के लिये अपराधी और भविष्य के समाज का निर्माता होता है बशर्ते वह उन मूल्यों के लिये हो जो मानवीयता और आजादी के दायरे को व्यापक बनाये.
उन्हें उग्रवादी घोषित कर दिया जायेगा, आसानी से अराजक कह दिया जायेगा जो आवाज उठाते हैं कि घोषित करने वालों की बनी बनायी व्यवस्थायें, भले ही वह एक व्यापक समुदाय के लिये निर्मम और अमानवीय हो पर उनके लिये सुविधा भोगी है, के खिलाफ आवाज उठाना, उनकी व्यवस्थित जिंदगी व उनके जैसे भविष्य में आने वालों की जिंदगी में खलल पैदा करती है. मसलन आप असन्तुष्ट रहें पर इसे व्यक्त न करें, व्यक्त भी करें तो उसकी भी एक सीमा हो, उसके तौर-तरीके उन्होंने बना रखें हैं. इसके बाहर यदि आप उग्र हुए, गुस्सा आया तो यह उग्रवादी होना है. इस प्रवृत्ति को आपसी बात-चीत, छोटे संस्थानों से लेकर देश की बड़ी व्यवस्थाओं तक देखा जा सकता है जहाँ असंतुष्ट होना, असहमति उनके बने बनाये ढांचे से बाहर दर्ज करना, अराजक और उग्रवादी होना है और इन शब्दों के बोध जनमानस में अपराधिकृत कर दिये गये हैं.
अभिषेक मुखर्जी जिसकी बंगाल पुलिस द्वारा हाल में ही हत्या कर दी गयी क्या यह सोचने पर विवश नहीं करता कि आखिर वे क्या कारण हैं कि १३ भाषाओं का जानकार और जादवपुर विश्वविद्यालय का एक प्रखर छात्र देश की उच्च पदाधिकारी बनने की सीढ़ीयां चढ़ते-चढ़ते लौट आता है और लालगढ़ के जंगलों में आदिवासियों की लड़ाई लड़ने चला जाता है, क्या यह सचमुच युवाओं का भटकाव है जो गुमराह हो रहे हैं, जिसे सरकार बार-बार दोहराती रहती है या व्यवस्था की कमजोरी और सीमा की पहचान कर विकल्प की तलाश. अनुराधा गांधी, कोबाद गांधी, साकेत राजन, तपस चक्रवर्ती, शायद देश और दुनिया के बड़े नौकरसाह बन सकते थे, पर वर्षों बरस तक लगातार जंगलों की उस लड़ाई का हिस्सा बने रहे जिसे सरकार अतिवाद की लड़ाई मानती है और ये उसे अधिकार की. शायद समाज में जब तक अतिवाद और अतिवादि रहेंगे, स्वभाव में जब तक उग्रता बची रहेगी तमाम दुष्प्रचारों के बावजूद नये समाज निर्माण की उम्मीदें कायम रहेंगी.

( समाप्त )

-चन्द्रिका
स्वतंत्र लेखन व शोध
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2010 अंक में प्रकाशित

मंगलवार, 22 जून 2010

अतिवाद की लड़ाई - 1

कुछ दिन पहले ही हम सब दण्डकारण्य घूम कर लौटे हैं, अरुंधती रॉय के साथ, भूमकाल में कॉमरेडों के साथ-साथ घूमते हुए. दण्डकारण्य के ग्राम स्वराज्य को देखते हुए, आउटलुक, समयांतर और फिलहाल, पत्रिकाओं के पन्ने पलटते हुए. भारत सरकार के असुरक्षा की महसूसियत को खारिज होती जा रही थी, जंगलों में चलते हुए, पहाड़ों पर चढ़ते हुए. हमे ऐसा ही लग रहा था कि जमीन पर पेड़ों से टूटकर गिरे सूखे पत्ते हमारे ही पैरों के नीचे दब रहे हैं और उनकी चरमराहट हमारे कानों में किसी संगीत की तरह बज रही है. संगीत, जिसे भारत सरकार और उसकी दलाली करने वाली कार्पोरेट मीडिया भय के रूप में हमारे जेहन में भरते रहने का लगातार प्रयास करती रहती है. इंद्रावती नदी के पार जो “पाकिस्तान” है (पुलिस की भाषा में) वहाँ के किस्से सी.वेनेजा, रुचिरगर्ग और कई पत्रकार पहले भी ला चुके हैं. जब हम आजादी की बात करते हैं तो उसके क्या मायने होते हैं? अरुंधती इस अवधारणा को ही एक वाक्य में ही बताती हैं “वहाँ मुक्ति का मतलब असली आजादी था”, वे उसे छू सकते थे, चख सकते थे, इसका मतलब भारत की स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा था. यह नकली आजादी को पेपर्द करने वाला वाक्य है और यह भी कि नकली आजादी जैसी चीज बहुतायत पायी जाती हैं, मसलन हमारी आजादी और हमारे देश की आजादी. सरकार और पूजीपतियों की आजादी से अलग. ये “जनताना सरकार” के क्षेत्र में रहने वाली महिलायें हैं जिन्हें रात और दिन का फर्क सिर्फ रोशनी का फर्क होता है, असुरक्षा और भय का नहीं, एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी को वे कभी भी पार कर सकती हैं. इसके लिये आखों में इतनी ही रोशनी की जरूरत है कि आप उससे रास्ता बना सकें. दिल्ली को भी भारत सरकार ऐसा नहीं बना पायी और शायद संसद भवन को भी. “ये लोग अपने सपनों के साथ जीते हैं, जबकि बाकी दुनिया अपने दुरूस्वप्नों के साथ” इस पूरे लेखन को यात्रा वृतांत कहें, कविता कहें, रिपोर्ताज कहें या इन विधाओं से अलग एक दस्तावेज, जहाँ भूमकाल साल में एक दिन मनाया जाता है और भूमकाल के विद्रोह की आवाजें दशकों से वहाँ की हवाओं में और वेग के साथ प्रवाहित होती जा रही हैं. इतिहास जरूरी नहीं कि सफेद पन्नों पर काली रोशनाई से लिखे जायें वे जंगलों की हलचल में रोज-रोज घटित होकर पीढ़ीयों के व्यवहारों में शामिल हो सकते हैं, उनके बच्चों की रगों में, उनके गाँवों के घरों की दीवारों पर. इस लेखन के बाद अरुंधती को अतिवादी घोषित करने की होड़ सी लगी रही, उनके तर्कों को ख़रिज करने की जहमत न उठाते हुए. जिसका खारिज किया जाना शायद मुमकिन भी नहीं था एक उग्रता और उन्माद में कुछ कह देने की व्यग्रता ही दिखी. आखिर यह अतिवाद ही तो था जो संसदीय लोकतंत्र के खतरे को इस तरह प्रस्तुत कर रहा था कि लोकतंत्र हमे घुटन की तरह लग रहा था और भूमकाल में शामिल न हो पाने का क्षोभ भी. फिर तो यह ऐसा अतिवाद है जो हमे व्यग्र कर देता है. एक “अतिवादी” की डायरी के विचार यदि हमे व्यग्र करते हैं, तो क्या सरकार के हर रोज के दमन से आदिवासीयों को उग्र नहीं होना चाहिये.
परिवर्तन सबसे पहले स्वप्न में आता है. रात की नींद के सपनों में नहीं, जीवन के बेहतरी की लालसा के स्वप्न में, और कहीं अपने भीतर एक बना बनाया ढांचा टूटता है, अपने समय के मूल्य ढहते हुए दिखते हैं. यह ढांचा पहले आदमी के विचार से टूटता है फिर व्यवहार से फिर वह आदमी के दायरे को ही तोड़कर, संरचना के दायरे को तोड़ने की प्रक्रिया में शामिल हो जाता है. वे हर बार आतिवादी ठहरा दिये गये होंगे जिन्होंने समय के मूल्यों को तोड़ा होगा क्योंकि किसी भी समय में व्यवस्था के संरचना की एक सीमा रही है, उसके एक मूल्य रहे हैं उसी के भीतर सोचने की इजाजत होती है, पर दुनिया में हर बार संरचना और सत्ता के बाहर की सोच पैदा हुई. यह परिस्थिति की देन मात्र नहीं थी बल्कि चिंतन की व्यापकता थी जो व्यापक आजादी के लिये हर समय विद्रोह करती रही और अपने समय में समय के आगे का विचार पैदा होते रहे. किसी भी समय का अतिवाद यही होता है जो समय की संरचना से विद्रोह करता है, एक नये संरचना की तलास करता है लिहाजा हर दौर में नये समाज बनाने के सपने रहे हैं और हर समय में वे लोग जो अपने समय की संरचना को नकारने का साहस रखते हों. जबकि इतिहास से वे नयी संरचना को बिम्बित करने में असफल भी होते हैं फिर भी उम्मीद और मूल्यों ने उनके विचारों को आगे बाढ़ाया और भविष्य के समाज उन्हीं के विचारों की निर्मिति रहे हैं. शायद दुनिया का अंत किसी प्रलय या दैवीय शक्ति से नहीं, बल्कि उस दिन होगा जब ये नकार के साहस खत्म हो जायेंगे. जो जैसा है उसी रूप में स्वीकार्य होगा तो बदलाव की प्रक्रियायें रुक जायेंगी और दुनिया की सारी घढ़ियां और कलेंडर अर्थ विहीन हो जायेंगे. समय का ठहराव यही होगा कि नये चिंतनकर्म समाप्त हो जायें और सब सत्ता के आगे नतमस्तक दिखेंगे, पर मानवीय प्रवृत्तियां इन्हें अस्वीकार करती रही हैं कि इंसान है तो सोचना जारी रहेगा.

(क्रमश: )

-चन्द्रिका
स्वतंत्र लेखन व शोध
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