बुधवार, 15 सितंबर 2010

पत्रकारों की हत्या का लोकतंत्र, भाग : 1

हमारे समय के पत्रकार हो जाओ सरकारी रोशनाई में कलम डुबोकर सरकार के चेहरे की शिकन लिखो...2020 तक सरकार के मिशन लिखो, इतना काफी न हो तो हाथों में दस्ताने बाँधकर समय के मुँह पर कालिख लगा दो और पोंछ लो अपने हाँथ किसी सरकारी गमछे में.... जरूरत पड़े तो थोड़ा मुस्कुराओ, आँखे भी नम कर लो...... और इस अदब के साथ हाथ मिलाओ कि लोकतंत्र जैसी कोई चीज आस-पास की हवा में घुल-मिल रही है। अखबारों में छपी खबरों की स्याही के रंग जैसा कुछ इतना गाढ़ा लिखो कि सरकार की आँखों में मुहब्बत की तरह उतर जाओ और एक दिन ढेर सारे पदकों के साथ अपने घर लौटो दिल्ली से.... या दिल्ली जैसे किसी शहर से, या फिर दिल्ली को अपना घर और उस सरकार को अपना परिवार मान लो जो पाँच सालों में अदला-बदली करके वापस लौट आती है। विपक्ष में रहो पर उतना जितना मनमोहन सिंह-आडवानी के, मुलायम सिंह-मायावती के, ममता बनर्जी-बुद्धदेव के या कोई भी पार्टी, संसद के इर्द गिर्द किसी पार्टी के। इतने विपक्षी मत बनों की सरकार के लिए माओवादी हो जाओ....कि बेगुनाही के बावजूद सलाखों के पीछे भेजने का लोकतंत्र है...इतने विपक्षी होना प्रशांत राही होना है, लिखने की इतनी आजादी मत माँगो कि सीमा आजाद या लक्ष्मण चैधरी जैसा बर्ताव करना पड़े सरकार को, इतने भी नहीं कि लिखने और लड़ने की कीमत हेमचन्द्र पाण्डेय जितना अदा करनी पड़े सरकार द्वारा की गई हत्या के रूप में, पत्रकारिता के ये उसूल जिन्दगी को सुकून और भविष्य में लोकतंत्र को फुर्सत देंगे। लोकतंत्र के बुढ़ापे का समय है, मौत धीरे-धीरे इसी तरह आएगी।
जंगलों में आदिवासी अपने विस्थापन, प्रताड़ना, असंतुष्टि के खिलाफ लड़ रहे हैं और उनकी लड़ाई को माओवादियों ने सशस्त्र बना दिया है और एक राजनैतिक व सांगठनिक स्वरूप में वे ज्यादा मजबूती के साथ उभर कर आए हैं इतनी मजबूती कि सरकार नहीं बल्कि संसदीय संरचना अपने को असुरक्षित मान रही है, स्थानीयता के लिहाज से अपनी समस्याओं के खिलाफ और एक बड़े फलक पर तंत्र के खिलाफ इस उभार को देखा जा सकता है, अभी हाल के दिनों में जबकि यह बहस जारी ही है कि माओवादी जंगलों तक ही क्यों सीमित हैं? इस बीच पिछले कुछ सालों में कई ऐसे पत्रकारों को सलाखों के पीछे भेजा गया है, प्रताड़ित किया गया है या फिर उनकी हत्याएँ की गईं हैं, जिन्हें सरकार ने माओवादी के रूप में चिह्नित किया है या माओवादी गतिविधियों में शामिल पाया है। वरिष्ठ माओवादी नेता आजाद के साथ हेमचन्द्र पाण्डेय की हाल में की गई हत्या या पुलिस हिरासत में पीपुल्स मार्च के बंगला संस्करण के सम्पादक स्वप्न दास गुप्ता की मौत बहस में कुछ नए पन्ने जोड़ती है, मसलन, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हेमचन्द्र एक पत्रकार थे बावजूद इसके यदि माओवादी भी थे तो वह कौन सी चीज थी जिसने एक पत्रकार को माओवादी बना दिया और सरकार को उनकी हत्या करनी पड़ी, वे न तो उन जंगलों से थे जहाँ जमीनों को छीना जा रहा है और लोगों को विस्थापित किया जा रहा है और न ही वे लालगढ़, सिंगूर, बस्तर, गड़चिरौलि से थे, सलवा जुड़ुम का दमन उनके घरों तक नहीं पहुँचा था बावजूद इसके एक पत्रकार माओवादी क्यों हो गया। आदिवासियों के असंतुष्टि के आधार पर माओवादी होने की प्रक्रिया को समझना थोड़ा आसान है क्योंकि रोज-बरोज हो रही मौत और गाँवों में सुबह मिल रही किसी पड़ोसी की लाश, चुप-चाप मौत से पहले लड़ने का एक साहस तो देती ही है। पर पत्रकारिता को जारी रखते हुए, सुकून की जिंदगी जीते हुए और शायद सरकारी लोकतंत्र का समर्थन करते हुए हेमचन्द्र, प्रशांत राही, सीमा आजाद, स्वप्न दास गुप्त के अलावा कई ऐसे पत्रकार थे और हैं जो अपनी जिंदगियाँ वैसी ही गुजार सकते थे जैसी ठीक-ठाक जिन्दगी के बारे में आप सोच सकते हैं, पर नाम बदल कर, गुमनामी और बगैर किसी पहचान के जीना महज जुनून नहीं होता बल्कि यह माओवाद की जंगल से जेहन तक की यात्रा है। दरअसल माओवाद का सैद्धांतिक और बौद्धिक पक्ष वहीं मजबूत होता है जहाँ सत्ता को कार्यवाहियों और संस्थानों के टूटने का भय ही नहीं बल्कि एक ऐसी संरचना के बेनकाब होने का खतरा है जो अपने चरम व्यवस्थित स्थिति में क्रूरता और तानाशाहियों के साथ चंद लोगों के वर्चस्व को ही चरम पर पहुँचाती है। शायद ऐसी व्यवस्था के खिलाफ उग्र होने की कवायद ही एक पत्रकार को उग्रवादी या उग्रवाद समर्थक बना देती है, जो मणिपुर, असम से लेकर देश के किसी भी शहर में मिल सकते हैं अपने नाम या किसी और नामों के साथ, अपनी कलम को हथियार बनाते हुए।

चन्द्रिका
मो0: 09890987458
क्रमश:
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

Shah Nawaz ने कहा…

अच्छा लेख है!